लघु चोट और अवैध अवरोध के मामले में सज़ा घटाई गई — पटना उच्च न्यायालय, 2025

चोट पहुँचाने और अवैध अवरोध के अपराध में दोषसिद्ध दो व्यक्तियों ने पटना उच्च न्यायालय के समक्ष केवल अपनी कारावास की अवधि को चुनौती दी थी। न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि में कोई हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन उनकी सज़ा को घटाकर उस अवधि तक सीमित कर दिया, जो वे पहले ही हिरासत में बिता चुके थे। इस प्रकार आपराधिक पुनरीक्षण आंशिक रूप से स्वीकार किया गया और अब उन्हें आगे कोई कारावास नहीं भुगतना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला थाना खजौली, जिला मधुबनी, बिहार में दर्ज पी.एस. केस नंबर 75 वर्ष 1991 से उत्पन्न हुआ। उस प्राथमिकी के आधार पर जी.आर. केस नंबर 869 वर्ष 1991 दर्ज किया गया, जिसे बाद में न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी, मधुबनी के समक्ष ट्रायल नंबर 420 वर्ष 1999 के रूप में अंकित किया गया।

उस विचारण में दोनों अभियुक्तगण (जो बाद में पुनरीक्षण में याचिकाकर्ता बने) पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 और 341 के अंतर्गत अपराधों के लिए मुकदमा चलाया गया। धारा 323 IPC स्वेच्छा से चोट पहुँचाने के लिए दंड से संबंधित है तथा धारा 341 IPC अवैध अवरोध के लिए दंड से संबंधित है।

विचारणोपरांत, माननीय न्यायिक दंडाधिकारी ने दोनों अभियुक्तों को धारा 323 और 341 IPC के अंतर्गत दोषी ठहराया। धारा 323 IPC के अपराध के लिए प्रत्येक को तीन माह का कठोर कारावास (RI) से दंडित किया गया। धारा 341 IPC के अपराध के लिए प्रत्येक को एक माह के कठोर कारावास से दंडित किया गया। दंडाधिकारी ने निर्देश दिया कि दोनों सजाएँ साथ-साथ चलेंगी।

दोषसिद्ध व्यक्तियों ने इसके बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-द्वितीय, मधुबनी की अदालत में आपराधिक अपील संख्या 70 वर्ष 1999 दायर की। दिनांक 28.05.2018 को अपीलीय न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और विचारण न्यायालय द्वारा दर्ज दोषसिद्धि एवं दण्डों की पुष्टि की।

इस अपीलीय निर्णय से क्षुब्ध होकर दोषसिद्ध व्यक्तियों ने पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 172 वर्ष 2019 दायर की। इस पुनरीक्षण की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार द्वारा की गई, जिन्होंने दिनांक 31.01.2025 को मौखिक निर्णय सुनाया।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने यह नहीं चुनौती दी कि वे धारा 323 और 341 IPC के अंतर्गत दोषी हैं। उनके अधिवक्ता के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि वे अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा दर्ज दोषसिद्धि को स्वीकार करते हैं।

उनकी आपत्ति केवल सज़ा की अवधि तक सीमित थी। याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय से प्रार्थना की कि उन पर लगाई गई कारावास की अवधि, विशेष रूप से धारा 323 IPC के अंतर्गत दी गई तीन माह की कठोर कारावास तथा धारा 341 IPC के अंतर्गत एक माह की सज़ा को कम किया जाए।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता द्वारा निम्नलिखित दलीलें दी गईं:

  • याचिकाकर्ता केवल सज़ा को चुनौती दे रहे हैं, धारा 323 और 341 IPC के अंतर्गत दर्ज दोषसिद्धि को नहीं।
  • धारा 323 IPC के अंतर्गत अधिकतम निर्धारित दंड एक वर्ष का कारावास है तथा धारा 341 IPC के अंतर्गत अधिकतम दंड एक माह का कारावास है।
  • यद्यपि लगाई गई सजाएँ विधिक सीमा के भीतर हैं, तथापि समग्र परिस्थितियों को देखते हुए सज़ा की मात्रा अधिक है और इसे घटाया जाना चाहिए।
  • याचिकाकर्ता पहले ही न्यायिक हिरासत में दो माह से अधिक समय बिता चुके हैं।
  • अपराध की घटना वर्ष 1991 के समय याचिकाकर्ता अपेक्षाकृत युवा थे। याचिकाकर्ता संख्या 1, हरेंद्र झा, लगभग 27 वर्ष के थे और याचिकाकर्ता संख्या 2, सुधीर झा, लगभग 40 वर्ष के थे।
  • यह याचिकाकर्ताओं का प्रथम अपराध था तथा पूर्व आपराधिक इतिहास होने का कोई आरोप नहीं था।

इन आधारों पर, अधिवक्ता ने प्रार्थना की कि सज़ा में उपयुक्त कमी कर दी जाए और उसे केवल उस अवधि तक सीमित कर दिया जाए जो वे पहले ही हिरासत में भुगत चुके हैं।

राज्य बिहार की ओर से उपस्थित माननीय अतिरिक्त लोक अभियोजक (A.P.P.) ने इस आग्रह का गंभीर विरोध नहीं किया। इसके विपरीत, उन्होंने निष्पक्ष रूप से यह प्रस्तुत किया कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए सज़ा को याचिकाकर्ताओं द्वारा पहले से भुगती गई अवधि तक घटाया जा सकता है।

उच्च न्यायालय ने इन दलीलों पर विचार किया और केवल इस सीमित प्रश्न के लिए अभिलेखों पर उपलब्ध सामग्री का परीक्षण किया कि क्या पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार में सज़ा में किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख तथ्यों पर ध्यान दिया:

  • याचिकाकर्ताओं को धारा 323 और 341 IPC के अंतर्गत दोषसिद्ध किया गया था।
  • धारा 323 IPC के अंतर्गत उन्हें तीन माह के कठोर कारावास और धारा 341 IPC के अंतर्गत एक माह के कठोर कारावास से दंडित किया गया था।
  • दोनों सजाएँ विचारण न्यायालय द्वारा साथ-साथ चलने के लिए निर्देशित की गई थीं और उस निर्देश की पुष्टि अपीलीय न्यायालय ने भी की थी।
  • याचिकाकर्ता इस मामले में दो माह से अधिक की हिरासत पहले ही भुगत चुके थे।
  • कथित घटना के समय दोनों याचिकाकर्ताओं की आयु अपेक्षाकृत कम थी — एक 27 वर्ष का और दूसरा 40 वर्ष का।
  • याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध यह उनका प्रथम आपराधिक मामला था।

इन तथ्यों के आलोक में उच्च न्यायालय ने दंड की आवश्यकता और उपशामक परिस्थितियों (mitigating circumstances) के बीच संतुलन किया। न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि:

  • यद्यपि स्वेच्छा से चोट पहुँचाने के लिए कानून अधिकतम एक वर्ष तक कारावास का प्रावधान करता है, न्यायालयों के पास परिस्थितियों के अनुसार कम सज़ा देने का विवेकाधिकार होता है।
  • याचिकाकर्ता पहले ही दो माह से अधिक की सज़ा भुगत चुके हैं, जो धारा 323 IPC के अंतर्गत दिए गए तीन माह के दंड की अवधि के क़रीब है।
  • घटना बहुत पुरानी है, जो वर्ष 1991 के पुलिस मामले से उत्पन्न हुई थी, और यह प्रकरण लम्बे समय से आपराधिक न्याय प्रणाली में लंबित रहा।
  • अभिलेखों में ऐसा कोई सामग्री नहीं था जिससे यह प्रतीत हो कि याचिकाकर्ता अभ्यस्त अपराधी हैं या कार्यवाही के दौरान उन्होंने स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया हो।

समग्र दृष्टिकोण से विचार करते हुए न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि, न्याय के हित में, दोषसिद्धि को यथावत रखते हुए सज़ा में उपयुक्त कमी की जा सकती है।

तदनुसार, पटना उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि धारा 323 और 341 IPC के अंतर्गत याचिकाकर्ताओं पर लगाई गई सज़ा की मात्रा घटाकर उतनी कर दी जाए, जितनी वे पहले ही हिरासत में भुगत चुके हैं।

इसका अर्थ यह हुआ कि, चूँकि याचिकाकर्ता पहले ही दो माह से अधिक की न्यायिक हिरासत भुगत चुके थे, अतः इस मामले में उन्हें आगे कोई कारावास नहीं भुगतना होगा। धारा 323 और 341 IPC के अंतर्गत दोषसिद्धि यथावत बनी रही, किन्तु जेल में बिताई जाने वाली वास्तविक अवधि को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया गया।

इसी आधार पर आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 172 वर्ष 2019 आंशिक रूप से स्वीकार की गई। यह “स्वीकार” इस सीमा तक की गई कि सज़ा घटा दी गई, और “आंशिक रूप से” इसलिए क्योंकि स्वयं दोषसिद्धि में कोई हस्तक्षेप या निरस्तीकरण नहीं किया गया।

न्यायालय ने कार्यालय को यह भी निर्देश दिया कि अधीनस्थ न्यायालय के अभिलेख (LCR) को संबंधित निचली अदालत को वापस भेज दिया जाए, ताकि पुनरीक्षण के निपटारे के पश्चात औपचारिक प्रक्रिया पूर्ण की जा सके।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय विशेष रूप से बिहार में धारा 323 और 341 IPC के अंतर्गत पुराने एवं लघु आपराधिक मामलों में फँसे अभियुक्तों और उनके परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रथम, यह दर्शाता है कि भले ही विचारण न्यायालय और अपीलीय न्यायालय ने दोषसिद्धि की पुष्टि कर दी हो, फिर भी पटना उच्च न्यायालय पुनरीक्षण में सज़ा की अवधि की समीक्षा कर सकता है। उपयुक्त मामलों में न्यायालय दोषसिद्धि को बदले बिना सज़ा कम कर सकता है।

द्वितीय, निर्णय यह रेखांकित करता है कि अपराध के समय की कम आयु, पहली बार अपराध में संलिप्तता और पहले से बिताई गई हिरासत जैसी परिस्थितियाँ न्यायालय को कारावास की अवधि घटाने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। यह विशेष रूप से उन मामलों में प्रासंगिक है जहाँ अपराध अधिक गंभीर नहीं है और चोट पहुँचाने एवं अवैध अवरोध से संबंधित है।

तृतीय, यह मामला इस तथ्य को उभारता है कि यदि परिस्थितियाँ अधिक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण को न्यायसंगत ठहराती हैं, तो राज्य के अधिवक्ता भी निष्पक्ष रूप से सज़ा में कमी का समर्थन कर सकते हैं। इससे लम्बित मामलों के संतुलित समाधान में सहायता मिल सकती है।

ऐसे ही लघु आरोपों का सामना कर रहे सामान्य व्यक्तियों के लिए यह निर्णय यह दर्शाता है कि:

  • जब विवाद का मुख्य प्रश्न केवल सज़ा की अवधि से संबंधित हो, न कि दोषी या निर्दोष होने से, तब आपराधिक पुनरीक्षण एक संभावित उपाय हो सकता है।
  • न्यायालय वास्तव में पहले से भुगती गई हिरासत, अभियुक्त की आयु और पृष्ठभूमि पर ध्यान देते हैं, विशेषकर तब जब मामला बहुत पुराना हो।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: जब याचिकाकर्ता अपनी दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दे रहे थे, तब क्या धारा 323 IPC के अंतर्गत तीन माह के कठोर कारावास और धारा 341 IPC के अंतर्गत एक माह के कारावास की सज़ा, जिसकी पुष्टि अपीलीय न्यायालय ने भी की थी, में पटना उच्च न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण में हस्तक्षेप आवश्यक था?
    उत्तर: हाँ। पटना उच्च न्यायालय ने यह देखते हुए कि अपराध के समय याचिकाकर्ता युवा थे, यह उनका प्रथम अपराध था और वे पहले ही दो माह से अधिक की हिरासत भुगत चुके थे, धारा 323 और 341 IPC के अंतर्गत सज़ा को घटाकर पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया, जबकि दोषसिद्धि को बनाए रखा।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • इस निर्णय के पाठ में किसी पूर्व निर्णय (case law) का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 172 वर्ष 2019 (उत्पन्न पी.एस. केस नंबर 75 वर्ष 1991, खजौली, जिला मधुबनी; जी.आर. केस नंबर 869 वर्ष 1991 / ट्रायल नंबर 420 वर्ष 1999)

मामले का शीर्षक: Harendra Jha & Anr. बनाम The State of Bihar & Anr.

पीठ (Coram): माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार

उद्धरण (Citation): 2025(3) PLJR 444

अधिवक्ता:
याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री शैलेन्द्र कुमार झा, अधिवक्ता
राज्य की ओर से: श्री मितलेश कुमार खरे, अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP)

मामले का प्रकार: धारा 323 और 341 IPC के अंतर्गत दोषसिद्धि एवं सज़ा की पुष्टि करने वाले अपीलीय निर्णय के विरुद्ध आपराधिक पुनरीक्षण

उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 31.01.2025

निर्णय का लिंक:https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NyMxNzIjMjAxOSMxI04=-QE–am1–edtYlnGc=

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