भूमि विवाद में धोखाधड़ी के मामले को रद्द करना — पटना उच्च न्यायालय, 2025

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष भूमि विक्रय विवाद से उत्पन्न एक आपराधिक मामले को रद्द करने का अनुरोध किया गया। न्यायालय ने पाया कि एक ही तथ्यों के आधार पर धोखाधड़ी और आपराधिक न्यासभंग के आपराधिक आरोप साथ‑साथ टिक नहीं सकते। न्यायालय ने यह माना कि विवाद मूल रूप से भूमि और धन से संबंधित एक दीवानी प्रकृति का विवाद है। आपराधिक मामला रद्द कर दिया गया, जिससे पक्षकारों को आपसी समझौते या दीवानी न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए छोड़ दिया गया।

प्रकरण की पृष्ठभूमि

यह मामला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत दायर एक आपराधिक अनुमाद आवेदन के माध्यम से पटना उच्च न्यायालय के समक्ष आया। याचिकाकर्ताओं ने 18.12.2015 की वह संज्ञान आदेश चुनौती दी, जो न्यायिक मजिस्ट्रेट, सहरसा द्वारा सौर बाजार थाना कांड संख्या 60/2015 में पारित की गई थी।

आपराधिक मामला 12.03.2015 को थाना सौर बाजार, जिला सहरसा में दर्ज एक प्राथमिकी से प्रारंभ हुआ। सूचनादाता, विपक्षी पक्ष संख्या 2, ने आरोप लगाया कि उसने एक कठ्ठा जमीन खरीदने के लिए याचिकाकर्त्री संख्या 1 से बातचीत की थी। उसके अनुसार, उसने याचिकाकर्त्री संख्या 3 को 80,000 रुपये का भुगतान किया और विक्रय के लिए एक अनुबंध (जरबैयनामा) तैयार किया गया। यह सहमति हुई कि शेष 10,000 रुपये के भुगतान के बाद, याचिकाकर्त्री संख्या 1 उसके पक्ष में बिक्री विलेख निष्पादित करेगी।

सूचनादाता का दावा था कि बार‑बार अनुरोध करने तथा अधिवक्ता के नोटिस भेजने के बावजूद, याचिकाकर्त्रियों ने बिक्री विलेख निष्पादित करने से इंकार कर दिया। उसका यह भी आरोप था कि बाद में विवादित भूमि की खाता सरकार बिहार के नाम से खोल दी गई। कहा गया कि इस विवाद को लेकर पंचायत बैठी, किंतु याचिकाकर्त्रियों ने पंचायत के फैसले का अनुपालन नहीं किया।

सूचनादाता ने आगे आरोप लगाया कि 22.09.2014 को वह अपने पति और पुत्र के साथ बिक्री विलेख निष्पादित कराने का अनुरोध करने हेतु याचिकाकर्त्री संख्या 1 के घर गई। उस समय, उसके अनुसार, सभी आरोपी व्यक्तियों ने उन्हें गाली‑गलौज की और मारपीट की। उसका आरोप था कि याचिकाकर्त्री संख्या 2 ने उस पर “थ्री नॉट” तान दी और याचिकाकर्त्री संख्या 4 ने उसे जमीन पर पटक दिया तथा उसकी गर्दन से चांदी का लॉकेट छीन लिया।

इन आरोपों पर, सौर बाजार थाना कांड संख्या 60/2015 भारतीय दंड संहिता की धारा 341, 323, 354, 379, 406, 504, 506, 34 तथा शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के अंतर्गत दर्ज किया गया। अन्वेषण के बाद पुलिस ने केवल भारतीय दंड संहिता की धारा 406 और 420 के अंतर्गत आरोपपत्र प्रस्तुत किया। उसी के आधार पर, माननीय न्यायिक मजिस्ट्रेट, सहरसा ने 18.12.2015 के आदेश द्वारा धारा 406 और 420 भा.दं.सं. के अंतर्गत संज्ञान लिया।

इसके बाद याचिकाकर्त्रियों ने आपराधिक अनुमाद संख्या 42486/2016 दायर कर संज्ञान आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए पटना उच्च न्यायालय की शरण ली। आवेदन की सुनवाई 04.09.2025 को हुई और याचिकाकर्त्रियों को अंतरिम संरक्षण प्रदान किया गया। मामले का अंतिम निपटारा 03.11.2025 की मौखिक न्यायादेश द्वारा किया गया।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

याचिकाकर्त्रियों का मुख्य तर्क यह था कि यह मामला मूल रूप से भूमि से संबंधित लेन‑देन और कथित विक्रय अनुबंध से उत्पन्न दीवानी विवाद है। उनका कहना था कि सूचनादाता ने अपने पुत्र के साथ मिलीभगत कर धोखाधड़ी की। याचिकाकर्त्रियों के अनुसार, याचिकाकर्त्री संख्या 1 ने केवल सूचनादाता से ऋण लिया था, जिसके लिए सूचनादाता ने साधारण कागज पर उसकी अंगूठे की छाप ली और बाद में उसी कागज पर जाली जरबैयनामा (विक्रय अनुबंध) तैयार कर लिया गया।

उन्होंने यह प्रस्तुत किया कि वास्तविक पीड़ित वे स्वयं हैं और उनके विरुद्ध कोई आपराधिक अपराध बनता ही नहीं है। याचिकाकर्त्रियों का तर्क था कि लंबित दीवानी विवाद का निपटारा करवाने के उद्देश्य से मात्र दबाव बनाने के लिए सूचनादाता ने आपराधिक मामला दर्ज कराया, जो विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। उन्होंने आगे कहा कि माननीय मजिस्ट्रेट ने यह देखते हुए कि विवाद प्रत्यक्षतः दीवानी प्रकृति का है, न्यायिक मस्तिष्क का समुचित प्रयोग किए बिना केवल आरोपपत्र के आधार पर यांत्रिक रूप से धारा 406 और 420 भा.दं.सं. के अंतर्गत संज्ञान ले लिया।

दूसरी ओर, विपक्षी पक्ष संख्या 2 के अधिवक्ता का तर्क था कि प्राथमिकी में लगे आरोप विशिष्ट हैं और धारा 406 तथा 420 भा.दं.सं. के सभी अवयवों को पूरा करते हैं। उनका कहना था कि याचिकाकर्त्रियों ने भूमि बेचने के बहाने पैसे लिए, परंतु बिक्री विलेख निष्पादित नहीं किया, जिससे उन्होंने आपराधिक न्यासभंग और धोखाधड़ी का अपराध किया। अतः उनके मत में, रद्द करने संबंधी आवेदन खारिज किया जाना चाहिए।

दोनों पक्षों तथा राज्य के ए.पी.पी. की दलीलें सुनने के बाद, न्यायालय ने आरोपित अपराधों के स्वरूप और दीवानी प्रकृति के विवादों में आपराधिक कानून के उपयोग पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित विधि का परीक्षण किया।

न्यायालय ने पहले धारा 406 और 420 भा.दं.सं. के अंतर्गत अपराधों के बुनियादी अंतर का विश्लेषण किया। न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि धारा 406 के तहत आपराधिक न्यासभंग सिद्ध करने के लिए, छल या कपट संपत्ति के सुपुर्द किए जाने के बाद या अभियुक्त के द्वारा उस संपत्ति पर आधिपत्य प्राप्त कर लेने के बाद उत्पन्न होना चाहिए, और उसके पश्चात बेईमानी से उस संपत्ति का अपहरण, रूपांतरण या निपटान, सुपुर्दगी की शर्तों के उल्लंघन में किया जाना चाहिए।

इसके विपरीत, धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के लिए, लेन‑देन के प्रारंभ से ही छल आवश्यक है। बेईमानी का इरादा शुरू से ही विद्यमान होना चाहिए, जो उस प्रलोभन का आधार बनता है जिसके कारण पीड़ित व्यक्ति संपत्ति देता है या कोई कार्य करता है। दूसरे शब्दों में, धोखाधड़ी के लिए अभियुक्त के पास शुरू से ही धोखा देने का इरादा होना चाहिए।

न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि एक स्थापित विधि सिद्धांत के रूप में, यदि किसी विशेष लेन‑देन के संबंध में कथित तथ्यों से धारा 406 भा.दं.सं. के अंतर्गत अपराध का गठन होता है, तो उन्हीं तथ्यों और आरोपों के आधार पर एक ही समय पर अभियुक्त को धारा 420 भा.दं.सं. के अंतर्गत धोखाधड़ी के अपराध के लिए भी उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, और इसके विपरीत भी। दोनों अपराध मूल रूप से भिन्न विधिक नींव पर आधारित हैं और समान तथ्यों पर एक साथ सह‑अस्तित्व नहीं रख सकते।

इसके बाद न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के हाल के निर्णय Arshad Neyaz Khan v. State of Jharkhand & Anr., (2025) SCC OnLine SC 2058 का संदर्भ दिया। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 406 और 420 भा.दं.सं. का विस्तार से विश्लेषण करते हुए निष्कर्ष निकाला था कि ये अपराध एक ही तथ्यों के आधार पर साथ‑साथ नहीं रह सकते, क्योंकि वे एक‑दूसरे के प्रतिकूल स्वरूप के हैं।

पटना उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय की उस तर्क‑पद्धति के अंश उद्धृत किए, जिनमें यह अवलोकन शामिल था कि प्रत्येक न्यासभंग आवश्यक रूप से आपराधिक अपराध नहीं होता। आपराधिक न्यासभंग के लिए यह आवश्यक है कि अभियुक्त को सुपुर्द की गई संपत्ति का कपटपूर्ण दुरुपयोग सिद्ध हो। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आपराधिक न्यासभंग के मामले में व्यक्ति प्रारंभ में विधिपूर्वक संपत्ति प्राप्त कर सकता है, किंतु बाद में अनुबंध की शर्तों के विपरीत उसे अवैध रूप से अपने पास रख सकता है या रूपांतरित कर सकता है। यह कि ऐसी परिसंरक्षण आपराधिक अपराध है या मात्र दीवानी उत्तरदायित्व, यह तथ्यपरक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

Arshad Neyaz Khan के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना कि यदि आपराधिक न्यासभंग के अपराध का आरोप लगाया गया है, तो उन्हीं तथ्यों पर एक साथ धारा 420 भा.दं.सं. के अंतर्गत धोखाधड़ी का अपराध नहीं टिक सकता, क्योंकि धोखाधड़ी में बेईमानी का इरादा लेन‑देन के आरंभ से ही होना चाहिए। इसी तर्क के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक ही तथ्यों पर आधारित शिकायत में दोनों अपराधों को एक साथ नहीं रखा जा सकता।

पटना उच्च न्यायालय ने दीवानी विवादों में आपराधिक कार्यवाही की सीमा संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णयों का भी संदर्भ दिया। Paramjeet Batra v. State of Uttarakhand, (2013) 11 SCC 673 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया था कि यद्यपि धारा 482 दं.प्र.सं. के तहत उच्च न्यायालय की निहित शक्तियों का प्रयोग संयमपूर्वक होना चाहिए, फिर भी जहां आपराधिक कार्यवाही मूलतः दीवानी प्रकृति की हो, वहां न्यायालय को उसे रद्द करने में संकोच नहीं करना चाहिए। न्यायालय ने उस निर्णय के पैरा 12 का उल्लेख किया, जिसमें यह रेखांकित किया गया था कि उच्च न्यायालय को यह देखना चाहिए कि कहीं मूलतः दीवानी विवाद को आपराधिक रंग तो नहीं दिया जा रहा, विशेषकर तब, जब दीवानी उपाय उपलब्ध और प्रयुक्त हों।

Paramjeet Batra पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने Randheer Singh v. State of U.P., (2021) 14 SCC 626 का भी उल्लेख किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही को उत्पीड़न के औजार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार, Usha Chakraborty & Anr. v. State of West Bengal & Anr., 2023 SCC OnLine SC 90 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि जहां मूलतः दीवानी प्रकृति के विवाद को आपराधिक रंग दिया गया हो, वहां उच्च न्यायालय धारा 482 दं.प्र.सं. के अंतर्गत ऐसी कार्यवाही को रद्द कर सकता है।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि S.N. Vijayalakshmi & Ors. v. State of Karnataka & Anr., (2025) SCC OnLine SC 1575 में सर्वोच्च न्यायालय ने दीवानी विवादों में आपराधिक कानून के दुरुपयोग संबंधी इसी विधिक सिद्धांत की पुनरावृत्ति की है।

प्राथमिकी, शिकायत, संज्ञान आदेश तथा उपर्युक्त सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर विचार करने के बाद, पटना उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मजिस्ट्रेट यह समझने में विफल रहे कि धारा 406 और 420 भा.दं.सं. समान तथ्यों पर एक साथ लागू नहीं की जा सकतीं। इस मामले के आरोपों के आलोक में, विवाद की प्रकृति को शुद्ध रूप से दीवानी माना गया, जो भूमि की विक्रय संधि और कथित बिक्री विलेख निष्पादन न होने से संबंधित है।

अतएव उच्च न्यायालय ने सौर बाजार थाना कांड संख्या 60/2015 में 18.12.2015 की संज्ञान आदेश को निरस्त और रद्द कर दिया। न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि पक्षकार आपसी सहमति से विवाद सुलझाने या विधि के अनुसार उपयुक्त दीवानी उपाय अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं। इस प्रकार, रद्द करने संबंधी अनुमाद आवेदन का निपटारा कर दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय भूमि और धन संबंधी विवादों में उलझे लोगों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है। अक्सर ऐसा होता है कि जब भूमि विक्रय समझौते विफल हो जाते हैं या धन वापस नहीं किया जाता, तो पक्षकार धोखाधड़ी या न्यासभंग के आपराधिक मामले दर्ज करने के लिए दौड़ पड़ते हैं।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जहां वास्तविकता में विवाद दीवानी है, वहां दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने के लिए आपराधिक कानून का उपयोग नहीं किया जा सकता। यदि मुख्य मुद्दा किसी समझौते, बिक्री विलेख के प्रवर्तन या धन वापसी से संबंधित है, तो सामान्यतः उचित उपाय दीवानी न्यायालय में होता है, न कि उन्हीं तथ्यों पर धोखाधड़ी और आपराधिक न्यासभंग की प्राथमिकी दर्ज कराकर।

न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के उस स्पष्ट मत का भी अनुसरण किया है कि धारा 406 और 420 भा.दं.सं. को एक ही तथ्यों पर साथ‑साथ लागू नहीं किया जा सकता। इससे आम नागरिकों को ऐसे मामलों में overlapping और अन्यायपूर्ण आपराधिक आरोपों से सुरक्षा मिलती है, जो मूलतः अनुबंध और संपत्ति से जुड़े विवाद होते हैं।

भूमि के क्रेता और विक्रेता, दोनों के लिए यह निर्णय इस बात पर बल देता है कि वे उचित लिखित दस्तावेजों का प्रयोग करें और जब सौदा टूट जाए तो आपराधिक शिकायतों का दुरुपयोग करने की बजाय दीवानी न्यायालयों की शरण लें।

विधिक प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: क्या एक ही भूमि लेन‑देन पर आधारित, मूलतः दीवानी स्वरूप के विवाद में, धारा 406 और 420 भा.दं.सं. के तहत चल रहे आपराधिक कार्यवाही को कायम रखा जा सकता है?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 406 और 420 भा.दं.सं. एक ही तथ्यों पर एक साथ सह‑अस्तित्व नहीं रख सकतीं और लगाए गए आरोप पूर्णतः दीवानी प्रकृति के हैं। अतः संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया गया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Arshad Neyaz Khan v. State of Jharkhand & Anr., (2025) SCC OnLine SC 2058
  • Delhi Race Club (1940) Limited v. State of Uttar Pradesh, (2024) 10 SCC 690 (उद्धृत सर्वोच्च न्यायालयी अंश के भीतर संदर्भित)
  • Paramjeet Batra v. State of Uttarakhand, (2013) 11 SCC 673
  • Randheer Singh v. State of U.P., (2021) 14 SCC 626
  • Usha Chakraborty & Anr. v. State of West Bengal & Anr., 2023 SCC OnLine SC 90
  • S.N. Vijayalakshmi & Ors. v. State of Karnataka & Anr., (2025) SCC OnLine SC 1575

मामले का विवरण

मामला संख्या: आपराधिक अनुमाद संख्या 42486/2016

उत्पन्न हुआ: थाना सौर बाजार कांड संख्या 60/2015, जिला सहरसा

मामले का शीर्षक: Kaushalya Devi and Ors v. State of Bihar and Rajbindi Devi

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति पुरनेंदु सिंह

उद्धरण: 2025(4) PLJR 670

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्त्रियों की ओर से: श्री सतीश कुमार सिंह, अधिवक्ता; श्री दिनेश महाराज, अधिवक्ता
  • विपक्षी पक्ष संख्या 2 की ओर से: श्री जीशान कलीम, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: श्री राणा रंधीर सिंह, अधिवक्ता

मामले की प्रकृति: धारा 482 दं.प्र.सं. के अंतर्गत दायर आपराधिक अनुमाद आवेदन, जिसमें धारा 406 और 420 भा.दं.सं. के तहत संज्ञान लेने के आदेश को रद्द करने की प्रार्थना की गई

निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment


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