मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक लिखित आवेदन से शुरू हुआ, जो 22.07.2021 को औरंगाबाद महिला थाना में ‘X’ नाम से उल्लेखित एक लड़की की सौतेली मां द्वारा दिया गया था।
इस लिखित शिकायत (प्रदर्श 2 के रूप में अंकित) में सूचनाकर्ता ने कहा कि उसकी सौतेली बेटी ‘X’, जिसकी उम्र लगभग दस वर्ष बताई गई, गांव बन्तारा में अपने मामा, यानी अपीलकर्ता (जो उस समय लगभग 55 वर्ष के थे) के साथ रह रही थी।
सूचनाकर्ता ने आरोप लगाया कि यह मामा कई महीनों से लड़की का यौन शोषण कर रहा था। उसके अनुसार, बच्ची ने पहले ये कृत्य इसीलिए नहीं बताए क्योंकि वह उससे डरती थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि जब उसे अपनी बेटी से इस बारे में पता चला, तो अपीलकर्ता ने दोनों को जान से मारने की धमकी देना शुरू कर दिया।
इस लिखित शिकायत के आधार पर, औरंगाबाद (महिला) थाना कांड सं. 25/2021 दिनांक 22.07.2021 धारा 376AB एवं 506 भारतीय दंड संहिता तथा POCSO अधिनियम की धारा 4 के अंतर्गत दर्ज किया गया।
जांच के बाद पुलिस ने अपीलकर्ता के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 376AB/506 और POCSO अधिनियम की धारा 4 के अंतर्गत आरोपपत्र सं. 30/2021 दायर किया। विशेष POCSO न्यायाधीश, औरंगाबाद ने 29.09.2021 को संज्ञान लिया।
दिनांक 17.11.2021 को अपीलकर्ता के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 376 एवं 506 तथा POCSO अधिनियम की धारा 4 के तहत आरोप तय किए गए। उसने दोष स्वीकार नहीं किया और विचारण की मांग की।
G.R. POCSO एवं CIS सं. 45/2021 के विचारण के दौरान अभियोजन ने छह साक्षियों की गवाही कराई — पीड़िता (PW-1), उसकी मां/सौतेली मां (PW-2), दो मामा (PW-3 और PW-4), डॉक्टर (PW-5) तथा अन्वेषण अधिकारी (PW-6)। कई दस्तावेज, जैसे लिखित शिकायत, FIR, चिकित्सीय रिपोर्ट और पहचान संबंधी दस्तावेज भी प्रदर्शित किए गए।
इसके बाद अपीलकर्ता का बयान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत दर्ज किया गया। उसने स्वयं को निर्दोष बताया और भूमि विवाद तथा 30,000 रुपये के पैसों के विवाद के कारण झूठा फंसाए जाने का आरोप लगाया। बचाव पक्ष ने दो साक्षी (DW-1 और DW-2) की गवाही कराई, जिनमें अपीलकर्ता का बेटा और एक सह-ग्रामवासी शामिल थे, परन्तु उनके माध्यम से कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
विचारण न्यायालय ने अभियोजन साक्ष्य के मूल्यांकन के बाद माना कि अपीलकर्ता ने पीड़िता के साथ बलात्कार किया और उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376AB तथा POCSO अधिनियम की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया। उसे POCSO अधिनियम की धारा 4 के अंतर्गत 20 वर्ष के कठोर कारावास और 10,000 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया गया, अर्थदंड न देने पर 12 माह के साधारण कारावास की डिफॉल्ट सजा निर्धारित की गई।
इस दोषसिद्धि और सजा के विरुद्ध अपीलकर्ता ने वर्तमान आपराधिक अपील (DB) सं. 23/2023 पटना उच्च न्यायालय में दाखिल की। सूचनाकर्ता (प्रतिवादी सं. 2) को नोटिस की तामील हुई, लेकिन वह किसी अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित नहीं हुई।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय की खंडपीठ (माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडेय) ने अपीलकर्ता के अधिवक्ता तथा राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक की दलीलें सुनीं।
अभियोजन की मुख्य कहानी प्रदर्श 2, अर्थात PW-3 (PW-2 की बड़ी बहन के पति) द्वारा लिखित शिकायत पर आधारित थी। उस दस्तावेज में पीड़िता की उम्र दस वर्ष बताई गई थी और मामा द्वारा बार-बार यौन शोषण तथा बाद में धमकी दिए जाने का आरोप था।
न्यायालय ने पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अंतर्गत दर्ज पीड़िता के बयान पर दृष्टि डाली। बयान स्वयं अभिलेख पर था, परंतु औपचारिक रूप से केवल पीड़िता के हस्ताक्षर को (प्रदर्श 1) के रूप में प्रदर्शित किया गया था। महत्वपूर्ण यह कि बयान दर्ज करने वाले मजिस्ट्रेट की गवाही विचारण में नहीं कराई गई।
मजिस्ट्रेट ने यह उल्लेख किया था कि उन्होंने बच्चे की मानसिक क्षमता और स्वेच्छा जांचने हेतु “कुछ बुनियादी सवाल” पूछे, परंतु उन्होंने वे सवाल क्या थे, यह अभिलेखित नहीं किया। उच्च न्यायालय ने इस कमी पर ध्यान दिया।
धारा 164 दप्रसं के बयान में पीड़िता ने कुछ नए विवरण बताए जो मूल शिकायत में नहीं थे। पहली बार उसने “गौशाला” को वह स्थान बताया, जहां अभियुक्त उसे ले जाकर “गलत काम” करता था, और कभी-कभी बगीचे में भी। उसने यह भी कहा कि इस कृत्य के बाद वह उसे 10–20 रुपये देता था और एक बार उसे गया ले जाकर वहां एक घर में पूरी रात रखा।
जब आयु सिद्ध करने की बात आई, तो न्यायालय ने गंभीर कमियां पाईं। पीड़िता (PW-1) ने कहा कि वह कक्षा 5 में पढ़ती थी, पर वह अपनी जन्मतिथि नहीं जानती थी और न ही यह याद था कि स्कूल में भर्ती के समय क्या उम्र दर्ज हुई थी। अन्वेषण अधिकारी (PW-6) ने कोई स्कूल प्रमाणपत्र या आयु का अन्य प्रमाण नहीं संकलित किया। उसने पीड़िता के भाई-बहनों के बयान भी दर्ज नहीं किए, जबकि PW-2 के अनुसार वे सभी एक ही घर में रहते थे।
इस प्रकार आयु संबंधी एकमात्र सामग्री चिकित्सीय परीक्षण रिपोर्ट (प्रदर्श 3 और 3/1) थी, जिसे PW-5, डॉ. अंशु प्रिया, सदर अस्पताल, औरंगाबाद की मेडिकल बोर्ड की सदस्य, ने सिद्ध किया। बोर्ड ने सामान्य एवं स्थानीय परीक्षण तथा दंत परीक्षण (28 दांत, 14/14) के बाद पीड़िता की उम्र लगभग 16–17 वर्ष आँकी।
PW-5 ने यह भी लिखा कि पीड़िता औसत कद-काठी की थी, परीक्षण के समय डरी हुई थी और सभी सवालों के सही उत्तर नहीं दे रही थी। पीठ, होंठ, हाथ या जांघों पर कोई चोट नहीं थी। लेबिया मैजोरा और माइनोरा अक्षत थे, मूत्रमार्ग या गुदा में कोई चोट नहीं मिली, परंतु हाइमन फटा हुआ था और इंट्रोइटस में दो ढीली उंगलियां प्रवेश कर रही थीं।
जिरह में PW-5 ने स्पष्ट कहा कि हाइमन हाल में नहीं फटा था, हाल के यौन संभोग का कोई संकेत नहीं था और हाइमन फटना विभिन्न प्रकार की चोटों के कारण भी हो सकता है। उसने जोड़ा कि 28 दांत वाला दंत-विन्यास लगभग 19–20 वर्ष के व्यक्ति में भी देखा जा सकता है।
उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि विचारण न्यायालय ने पीड़िता की आयु का निर्धारण किया ही नहीं। Court on its own Motion बनाम State of NCT of Delhi (Crl. Ref. 2/2024, 2024 SCC OnLine Delhi 4484) तथा Rajak Mohammad बनाम State of H.P. (2018) 9 SCC 248 के निर्णयों पर भरोसा करते हुए बचाव ने तर्क दिया कि चिकित्सीय आयु-आकलन में दो वर्ष ऊपर-नीचे की गुंजाइश मानी जाती है। इसे लागू करने पर पीड़िता की ऊपरी आयु-सीमा लगभग 19 वर्ष या उससे अधिक तक जा सकती थी, जो 28 दांत के संबंध में PW-5 की स्वयं की स्वीकारोक्ति से भी मेल खाती थी।
उच्च न्यायालय ने सहमति व्यक्त की कि दस्तावेजी आयु-प्रमाण के अभाव और इस चिकित्सीय साक्ष्य की रोशनी में अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहा कि पीड़िता बच्ची थी ताकि POCSO अधिनियम लागू हो सके। केवल इसी आधार पर न्यायालय ने माना कि POCSO लागू करने के लिए जो बुनियादी तथ्य आवश्यक हैं, वे सिद्ध नहीं हुए और अभिलेख के आधार पर पीड़िता वयस्क प्रतीत होती है।
इसके बाद न्यायालय ने घटना-स्थल संबंधी असंगतियों पर ध्यान दिया। प्रदर्श 2 में किसी विशेष स्थान का उल्लेख नहीं था। धारा 164 के बयान में लड़की ने गौशाला और बगीचे की बात की। जबकि विचारण में मुख्य परीक्षण के दौरान उसने एक ऐसी घटना का वर्णन किया, जब वह बगीचे में आम तोड़ने की कोशिश कर रही थी और वहां कृत्य किया गया, पर उसने गौशाला या अपीलकर्ता के घर की बात नहीं की।
उसने आगे कहा कि अपीलकर्ता एक बार उसे गया ले गया था, पर इसके अलावा कोई अन्य घटना नहीं हुई। जिरह में उसने कहा कि अपीलकर्ता रोज दोपहर में बगीचे में उसके साथ गलत काम करता था और कहीं और नहीं।
दूसरी ओर PW-2, सौतेली मां, ने गवाही दी कि अपीलकर्ता गौशाला में गलत काम करता था। जब अन्वेषण अधिकारी (PW-6) ने घटना-स्थल का सत्यापन किया, तो उसने उस स्थान का वर्णन अपीलकर्ता के घर के रूप में किया। अपने बयान के अनुच्छेद 5 में PW-6 ने कहा कि घटना-स्थल अपीलकर्ता का घर था।
उच्च न्यायालय ने इन बदलती हुई बातों — गौशाला, बगीचा, घर — पर प्रकाश डालते हुए माना कि घटना-स्थल के संबंध में अभियोजन साक्ष्य डगमगाते और असंगत हैं।
एक अन्य गंभीर चिंता यह थी कि बाल साक्षी के रूप में पीड़िता की गवाही का रिकॉर्ड और मूल्यांकन कैसे किया गया। विचारण के समय उसकी उम्र दस वर्ष दर्ज की गई थी, फिर भी विचारण न्यायालय ने उसकी क्षमता की कोई जांच नहीं की और न ही उसका कोई परीक्षण अभिलेखित किया, जबकि बाल साक्षी की जिरह से पहले यह आवश्यक है।
उच्च न्यायालय ने विस्तार से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय P. Ramesh बनाम State represented by Inspector of Police (2019) 20 SCC 593 का उल्लेख किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि न्यायाधीश को उपयुक्त प्रश्नों के माध्यम से बच्चे की क्षमता और समझ की जांच करनी चाहिए, तभी उसे सक्षम साक्षी माना जा सकता है। अभिलेख में ऐसी कोई प्रक्रिया परिलक्षित नहीं हुई।
न्यायालय ने PW-2 की गवाही से यह भी नोट किया कि पीड़िता को “मानसिक रूप से कमजोर” बताया गया था। विचारण न्यायालय ने स्वयं पीड़िता के बयान के अनुच्छेद 31 में उल्लेख किया था कि वह अदालत में बच्चे की तरह हंसती थी और कभी-कभी असामान्य हरकतें करती थी। इसके बावजूद उसकी मानसिक अवस्था का कोई चिकित्सीय परीक्षण गवाही दर्ज करने से पहले नहीं कराया गया। उच्च न्यायालय ने इसे उसकी असंगत और अप्रमाणित गवाही पर अकेले भरोसा न करने का अतिरिक्त कारण माना।
एक महत्वपूर्ण पहलू देवकुंड थाना में पहले दी गई एक अर्जी का अस्तित्व था। PW-2 ने स्वीकार किया कि वह पहले अपने भाई PW-4 के साथ देवकुंड थाना गई थी, जहां एक अर्जी लिखी गई और उस पर दोनों ने हस्ताक्षर किए। फिर एक महिला कांस्टेबल उन्हें महिला थाना लेकर गई। PW-2 ने आगे कहा कि महिला थाना में “दूसरी अर्जी” उसके देवर PW-3 ने लिखी (जो प्रदर्श 2 बनी)। उसने कहा कि वह पहली अर्जी प्रस्तुत कर सकती है, पर उसने ऐसा नहीं किया।
जिरह में बचाव पक्ष ने यह सुझाव दिया कि पहली अर्जी में अपीलकर्ता का नाम या बलात्कार का कोई आरोप नहीं था और इसी कारण उसे दबाया गया। उच्च न्यायालय ने पाया कि पहली संस्करण के दमन को मूल रूप से स्वीकार कर लिया गया था और माना कि पहली अर्जी को रोक कर रखना अभियोजन के लिए घातक है, जिससे अंततः दर्ज हुई FIR की प्रामाणिकता और वास्तविकता पर गंभीर संदेह उत्पन्न होता है।
बचाव पक्ष ने DW-1 (नासिर खान), जो अपीलकर्ता का बड़ा बेटा है, के माध्यम से भी साक्ष्य दिया, जिसने भूमि विवाद तथा यह बात समर्थन की कि अपीलकर्ता के छोटे बेटे ने सूचनाकर्ता के बेटे को पढ़ाई के लिए कथित रूप से 30,000 रुपये उधार दिए थे। DW-1 ने कहा कि जब पैसे वापस मांगे गए और सूचनाकर्ता द्वारा पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग को देखते हुए, अपीलकर्ता को झूठा फंसा दिया गया। DW-2, जो पूर्व मुखिया है, ने भी इस पृष्ठभूमि की पुष्टि की। उच्च न्यायालय ने नोट किया कि विचारण न्यायालय ने इन बचाव साक्षियों पर समुचित विचार करना “छोड़” दिया था।
इन सभी तत्वों को एक साथ देखते हुए पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहा कि POCSO अधिनियम की धारा 29 के तहत प्रतिकल्पना (प्रेजम्प्शन) लागू करने के लिए आवश्यक बुनियादी तथ्य मौजूद हैं। असंगतियों, आयु सिद्ध न हो पाने, FIR की उत्पत्ति पर संदेह, तथा अनदेखी की गई बचाव साक्ष्य के कारण अपराध सिद्धांत संदेह से परे सिद्ध नहीं हुआ।
न्यायालय ने रेखांकित किया कि POCSO के तहत भी निर्दोषता की प्रतिकल्पना बनी रहती है और जहां अभियोजन का मामला कमजोर और डांवाडोल हो, वहां संदेह का लाभ अभियुक्त को दिया जाना चाहिए।
तदनुसार, उच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया, संदेह का लाभ देते हुए अपीलकर्ता को बरी किया और निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तो उसे तत्काल अभिरक्षा से मुक्त किया जाए। अपील स्वीकार की गई और विचारण न्यायालय के अभिलेख वापस भेजने का निर्देश दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय यौन अपराध के मामलों, विशेष रूप से POCSO से संबंधित मामलों में, अभियुक्तों और शिकायतकर्ताओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
पहला, यह स्पष्ट करता है कि अभियोजन को विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से दृढ़ता से सिद्ध करना होगा कि पीड़ित नाबालिग है। केवल शिकायत में उम्र का उल्लेख पर्याप्त नहीं है, खासकर जब चिकित्सीय साक्ष्य संदेह की गुंजाइश छोड़ता हो।
दूसरा, यह दिखाता है कि न्यायालय उन विसंगतियों को नज़रअंदाज़ नहीं करेंगे जो यह स्पष्ट न करें कि घटना कहां और कैसे हुई। घटना-स्थल के संबंध में बदलते हुए संस्करण, बिना समुचित स्पष्टीकरण के, पूरे मामले को कमजोर कर सकते हैं।
तीसरा, यह निर्णय रेखांकित करता है कि पुलिस के समक्ष की गई शिकायत का पहला संस्करण अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि वही पहली अर्जी दबा दी जाए, तो बाद में, भले ही अपराध संवेदनशील हो, पूरे मामले की विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
चौथा, न्यायालय ने दोहराया कि बाल साक्षियों की गवाही अत्यंत सावधानी से दर्ज की जानी चाहिए। उनकी मानसिक क्षमता और समझ को अभिलेख पर परीक्षण करना अनिवार्य है। यदि वे मानसिक रूप से कमजोर हों या असामान्य व्यवहार करते हों, तो न्यायालय को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए और जहां आवश्यक हो वहां चिकित्सीय मूल्यांकन कराना चाहिए।
अंततः, यह निर्णय पुष्टि करता है कि POCSO के तहत प्रतिकल्पना होने के बावजूद यह मूलभूत सिद्धांत बना रहता है कि अपराध संदेह से परे सिद्ध होना चाहिए। जब जांच में गंभीर विरोधाभास और कमियां हों, तो अभियुक्त बरी होने का हकदार है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
-
प्रश्न: क्या अभियोजन यह सिद्ध कर पाया कि पीड़िता बच्ची थी, ताकि POCSO अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धारा 376AB की धाराएं लागू हो सकें?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि दस्तावेजी आयु-प्रमाण के अभाव और 16–17 वर्ष की चिकित्सीय आयु-आकलन (स्वीकार्य त्रुटि-सीमा सहित) की स्थिति में अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर पाया कि पीड़िता नाबालिग थी, और अभिलेख के अनुसार उसे वयस्क माना जा सकता है। -
प्रश्न: जब घटना-स्थल के बारे में विरोधाभास, पहली शिकायत के दमन, और बाल साक्षी की गवाही के उपचार में कमियां थीं, तो क्या दोषसिद्धि टिकाऊ थी?
उत्तर: नहीं। उच्च न्यायालय ने घटना-स्थल और घटना की विधि के संबंध में गंभीर विरोधाभास, पुलिस को दी गई पहली अर्जी का प्रस्तुत न होना, बाल साक्षी की क्षमता और मानसिक स्थिति की जांच में विफलता तथा बचाव साक्ष्य की अनदेखी को पाया। इन सबने मिलकर उचित संदेह उत्पन्न किया, जिससे दोषसिद्धि अस्थिर हो गई। -
प्रश्न: क्या इन तथ्यों पर POCSO अधिनियम की धारा 29 के तहत अभियोजन के पक्ष में प्रतिकल्पना लागू की जा सकती थी?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि धारा 29 को सक्रिय करने के लिए आवश्यक बुनियादी तथ्य सिद्ध नहीं हुए, और वैसे भी बचाव पक्ष अभियोजन के मामले को हिलाने में सफल रहा। निर्दोषता की प्रतिकल्पना प्रबल रही और अपीलकर्ता संदेह का लाभ पाने का हकदार था।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- P. Ramesh v. State represented by Inspector of Police, (2019) 20 SCC 593
- Court on its own Motion v. State of NCT of Delhi, Crl. Ref. 2/2024, 2024 SCC OnLine Delhi 4484
- Rajak Mohammad v. State of H.P., (2018) 9 SCC 248
- Dattu Ramrao Sakhare v. State of Maharashtra, (1997) 5 SCC 341
- Ratansinh Dalsukhbhai Nayak v. State of Gujarat, (2004) 1 SCC 64
मामले का विवरण
मामला संख्या: आपराधिक अपील (DB) सं. 23/2023, जो औरंगाबाद महिला थाना कांड सं. 25/2021 से उत्पन्न
मामले का शीर्षक: Farid Khan v. The State of Bihar & Anr.
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद; माननीय श्री न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडेय
उद्धरण: 2025 (4) PLJR 542
अधिवक्ता:
अपीलकर्ता की ओर से: श्री अजय कुमार ठाकुर, अधिवक्ता; श्री प्रिंस कुमार मिश्रा, अधिवक्ता; सुश्री प्रियंका कुमारी, अधिवक्ता
राज्य की ओर से: श्री अभिमन्यु शर्मा, अतिरिक्त लोक अभियोजक
मामले का स्वरूप: भारतीय दंड संहिता की धारा 376AB तथा POCSO अधिनियम की धारा 4 के तहत अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश-सह-विशेष विशिष्ट न्यायाधीश, POCSO, औरंगाबाद, बिहार द्वारा पारित दोषसिद्धि और सजा के विरुद्ध आपराधिक अपील (खंडपीठ)।
पटना उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 07.10.2025
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर निर्णय देखें
यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानना चाहते हों कि
बिहार में विधिक विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं,
तो आप आगे की जानकारियों के लिए Samvida Law Associates को फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।


