मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता को 2009 में बिहार में पुलिस अवर निरीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। प्रासंगिक समय पर वहबौंसी थाना में थाना प्रभारी (एस.एच.ओ.) के रूप में पदस्थापित था।
रिकॉर्ड के अनुसार, एक व्यक्ति, मुकेश मुखिया, को नशे की हालत में थाने लाया गया था। यह आरोप था कि याचिकाकर्ता ने उसे राज कुमार नामक चौकीदार के माध्यम से 8,000 रुपये की रिश्वत लेकर छोड़ दिया।
उसी तारीख को, एक अन्य व्यक्ति, असफाक, को कथित रूप से अपनी मोटरसाइकिल पर कोरेक्स खांसी की दवा की पांच बोतलों के साथ गिरफ्तार किया गया। याचिकाकर्ता द्वारा ही दायर की गई लिखित शिकायत के आधार पर एक प्राथमिकी दर्ज की गई।
सहायक अवर निरीक्षक (ए.एस.आई.) सुरेंद्र पासवान को उस मामले में अनुसंधान अधिकारी नियुक्त किया गया। निर्णय में दर्ज है कि उन्होंने प्रारंभ में उस मामले की जांच लेने से इंकार कर दिया था। इससे उनके और याचिकाकर्ता के बीच गाली-गलौज से भरी गरमागरम बहस हो गई।
इसके बाद ए.एस.आई. सुरेंद्र पासवान ने पुलिस अधीक्षक (एस.पी.), अररिया को एक लिखित शिकायत दी। उन्होंने उन गवाहों के नाम बताए जिन्होंने कथित रूप से घटनाओं को देखा था। आगे यह भी आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता ने अभियुक्त असफाक के परिवार के सदस्यों से 15,000 रुपये की रिश्वत ली और फिर जब्त की गई मोटरसाइकिल को अवैध रूप से छोड़ दिया।
शिकायत प्राप्त होने पर एस.पी., अररिया ने सार्जेंट मेजर को 01.07.2019 दिनांकित स्मारपत्र संख्या 19481 के माध्यम से जांच कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया। सार्जेंट मेजर ने अपनी पहली रिपोर्ट 05.07.2019 को प्रस्तुत की।
एस.पी. संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने 07.07.2019 दिनांकित स्मारपत्र संख्या 20234 जारी कर कुछ विशेष बिंदुओं पर केंद्रित एक नई जांच कराने को कहा। 12.07.2019 को दूसरी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, परन्तु एस.पी. फिर भी असंतुष्ट रहे।
एस.पी. ने एक और जांच का आदेश दिया, जिसके परिणामस्वरूप 19.07.2019 को तीसरी रिपोर्ट आई। इससे भी वे संतुष्ट नहीं हुए, इसलिए उन्होंने 20.07.2019 दिनांकित स्मारपत्र संख्या 30470 जारी कर एक और रिपोर्ट मांगी। 26.07.2019 को चौथी रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। तब भी एस.पी. ने एक और जांच का निर्देश दिया और अंततः 07.08.2019 को पांचवीं रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।
इन बार-बार की गई प्रारंभिक जांचों के बाद, एस.पी. ने याचिकाकर्ता से स्पष्टीकरण मांगा। याचिकाकर्ता ने अपना प्रतिरक्षा-पत्र दाखिल किया, लेकिन एस.पी. ने उसे असंतोषजनक पाया।
इसके बाद एस.पी. ने 11.10.2019 दिनांकित स्मारपत्र संख्या 3038 तथा 07.12.2019 दिनांकित स्मारपत्र संख्या 3788 के माध्यम से प्रपत्र ‘ड’ में आरोप-पत्र तैयार कर याचिकाकर्ता को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। तत्पश्चात 18.12.2019 दिनांकित स्मारपत्र संख्या 3922 द्वारा एक नया आरोप-पत्र जारी किया गया, जिसके माध्यम से याचिकाकर्ता के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही संख्या 30/2019 औपचारिक रूप से दर्ज की गई।
फोर्ब्सगंज के अनुमंडलीय पुलिस पदाधिकारी को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया और गोपाल जी सिंह को प्रस्तुतिकरण पदाधिकारी बनाया गया। याचिकाकर्ता ने सभी आरोपों के विरुद्ध अपना लिखित प्रतिरक्षा-पत्र दाखिल किया।
जांच पूरी होने के बाद संचालन पदाधिकारी ने एक जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें याचिकाकर्ता को आरोपों का दोषी ठहराया गया। इस रिपोर्ट के आधार पर एस.पी., अररिया ने 04.08.2020 दिनांकित स्मारपत्र संख्या 2120 द्वारा दूसरा कारण बताओ नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता ने पुनः अपना स्पष्टीकरण दाखिल किया।
एस.पी. अब भी संतुष्ट नहीं हुए और 18.08.2020 दिनांकित स्मारपत्र संख्या 2267 के माध्यम से पुलिस महानिरीक्षक (आई.जी.पी.), पूर्णिया प्रक्षेत्र को सिफारिश भेजी, जिसमें याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त/हटाने/अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का सुझाव दिया गया। याचिकाकर्ता से यह भी कहा गया कि वह आई.जी.पी. के समक्ष अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करे, जो उसने किया।
अंततः 08.12.2020 दिनांकित स्मारपत्र संख्या 1108 के द्वारा आई.जी.पी., पूर्णिया प्रक्षेत्र ने याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त करने का आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता की विभागीय अपील को अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून और व्यवस्था), पटना ने 02.03.2021 दिनांकित पत्र संख्या 106 द्वारा खारिज कर दिया। उसकी स्मारकीय अपील को गृह सचिव (पुलिस), गृह विभाग, बिहार ने भी 23.06.2022 दिनांकित स्मारपत्र संख्या 6101 द्वारा अस्वीकृत कर दिया।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष दायर रिट याचिका में तीन बातों को चुनौती दी गई थी: 08.12.2020 दिनांकित बर्खास्तगी आदेश (स्मारपत्र संख्या 1108), 02.03.2021 दिनांकित अपीलीय आदेश (पत्र संख्या 106), और 23.06.2022 दिनांकित स्मारकीय अपील की अस्वीकृति (स्मारपत्र संख्या 6101)।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने मुख्य रूप से यह तर्क दिया कि पुलिस अवर निरीक्षक के रूप में उसके लिए बिहार पुलिस नियमावली तथा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (सी.सी.ए. नियम, 2005) के तहत उसकी अनुशासनिक प्राधिकारी पुलिस उपमहानिरीक्षक/पुलिस महानिरीक्षक है, न कि पुलिस अधीक्षक।
सी.सी.ए. नियम, 2005 के नियम 16(1)(क) का संदर्भ देते हुए यह प्रस्तुत किया गया कि केवल नियुक्ति प्राधिकारी या अनुशासनिक प्राधिकारी ही विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ कर सकता है और आरोप-पत्र तैयार कर सकता है। इस मामले में एस.पी., अररिया ने न केवल स्पष्टीकरण मांगा और आरोप-पत्र तैयार किया, बल्कि बर्खास्तगी की सिफारिश भी की, जो याचिकाकर्ता के अनुसार अधिकार क्षेत्र से बाहर था।
अधिवक्ता ने आगे तर्क दिया कि एस.पी. की “संतुष्टि” तक कई-कई बार प्रारंभिक जांच कराना और बार-बार आरोप-पत्र जारी करना दुर्भावनापूर्ण आचरण को दर्शाता है। यह कहा गया कि एक ही कार्यवाही के लिए तीन अलग-अलग आरोप-पत्र जारी किए गए, जिनके आरोप अस्पष्ट थे, और कि सी.सी.ए. नियम, 2005 के नियम 17 तथा बिहार चार्जशीट नियम, 2017 का उल्लंघन किया गया।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि आरोपों में वास्तविक कथित कदाचार को स्पष्ट रूप से नहीं समझाया गया, बल्कि केवल प्रारंभिक जांच रिपोर्टों, तथ्य-संग्रह रिपोर्टों, गवाहों के बयान और एस.पी. के आंतरिक आदेशों को पुनरुत्पादित कर दिया गया। यह भी आरोप था कि कथित जब्ती और मोटरसाइकिल की रिहाई के मुख्य प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को विभागीय जांच में गवाह ही नहीं बनाया गया, जबकि पुलिस मुख्यालय से इस संबंध में निर्देश दिए गए थे।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बर्खास्तगी आदेश को भी अत्यंत संक्षिप्त और यांत्रिक बताते हुए उस पर प्रहार किया, यह कहते हुए कि उसे वास्तविक कारणों के बिना तथा याचिकाकर्ता के स्पष्टीकरण पर समुचित विचार किए बिना पारित किया गया। इसी प्रकार की आलोचना अपीलीय और स्मारकीय आदेशों के संबंध में भी की गई, जिनमें कथित तौर पर प्रक्रियात्मक और कानूनी दोषों पर ध्यान नहीं दिया गया।
दूसरी ओर, राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता ने पूरी प्रक्रिया का बचाव किया। उन्होंने कहा कि पहली प्रारंभिक जांच ठीक से नहीं की गई थी, इसीलिए नई प्रारंभिक जांचों का आदेश दिया गया। उनके अनुसार शिकायत में किए गए आरोप प्रारंभिक जांच में पुष्ट हुए, जिससे आरोप-पत्र जारी करना उचित था।
उन्होंने प्रस्तुत किया कि दूसरा आरोप-पत्र इसलिए जारी किया गया क्योंकि पहले आरोप-पत्र में संचालन पदाधिकारी या प्रस्तुतिकरण पदाधिकारी का उल्लेख नहीं था। उनका तर्क था कि यह दोष पूरी कार्यवाही को निरस्त करने के लिए पर्याप्त नहीं था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आरोप-पत्र में दस्तावेजों और गवाहों की सूची दी गई थी, जांच में गवाहों की जिरह हुई और उन्होंने आरोपों का समर्थन किया।
राज्य ने यह दलील दी कि संचालन पदाधिकारी ने याचिकाकर्ता की प्रतिरक्षा पर विचार किया, आरोपों को सिद्ध पाया और उसके बाद विधिवत दूसरा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। एस.पी. की सिफारिश एक विस्तृत जांच के आधार पर थी और अनुशासनिक प्राधिकारी के रूप में आई.जी.पी. ने बर्खास्तगी लगाने से पहले स्वतंत्र रूप से मामले पर विचार किया। यह भी कहा गया कि विभागीय जांचों पर न्यायिक पुनरावलोकन का दायरा सीमित है और साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन करने की अनुमति नहीं देता।
न्यायालय ने पहले इस बात पर कड़ी असहमति व्यक्त की कि किस प्रकार बार-बार प्रारंभिक जांचें कराई गईं और एक ही विभागीय कार्यवाही के लिए तीन अलग-अलग आरोप-पत्र जारी किए गए। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित विधि सिद्धांतों को याद किया कि प्रारंभिक जांच केवल यह तय करने के लिए होती है कि क्या नियमित विभागीय कार्यवाही आवश्यक है, और प्रारंभिक जांच में दर्ज साक्ष्य, जहां अभियुक्त अधिकारी को शामिल नहीं किया जाता या उसे जिरह का अवसर नहीं दिया जाता, नियमित जांच में साक्ष्य के रूप में उपयोग नहीं किए जा सकते।
न्यायालय ने संविधान पीठ के निर्णय अमलेन्दु घोष बनाम नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे, AIR 1960 SC 992 का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि प्रारंभिक जांच केवल prima facie संतुष्टि के लिए होती है और सीधे दंड का आधार नहीं बन सकती। न्यायालय ने चम्पकलाल चिमनलाल शाह बनाम भारत संघ, AIR 1964 SC 1854 का भी उल्लेख किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि प्रारंभिक जांच केवल सरकार की संतुष्टि के लिए होती है और वह अनुच्छेद 311(2) के सुरक्षा प्रावधानों के अधीन नहीं होती।
न्यायालय ने आगे नारायण दत्तात्रेय रामतीर्थखर बनाम महाराष्ट्र राज्य, (1997) 1 SCC 299 का हवाला देते हुए पुनः दोहराया कि एक बार आरोप-पत्र के बाद नियमित जांच शुरू हो जाए तो प्रारंभिक जांच का महत्व समाप्त हो जाता है और उसके प्रक्रियात्मक दोष अप्रासंगिक हो जाते हैं। हालांकि, वर्तमान मामले में न्यायालय ने यह नोट किया कि स्वयं आरोप-पत्र और जांच प्रतिवेदन प्रारंभिक जांच रिपोर्टों तथा एस.पी. के निर्देशों के उल्लेखों से भरे हुए थे, और प्रारंभिक जांच की सामग्री को ऐसे तरीके से नियमित जांच में पिरोया गया कि उसने निष्पक्षता को प्रभावित किया।
न्यायालय ने माना कि बिना अभियुक्त की भागीदारी और बिना जिरह के, इस तरीके से प्रारंभिक जांच के साक्ष्य का उपयोग करना प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
इसके बाद न्यायालय ने अनुशासनिक कार्यवाही प्रारम्भ करने और संचालित करने के अधिकार क्षेत्र के महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर रुख किया। इस संदर्भ में उसने अपने पूर्ववर्ती निर्णय उदय प्रताप सिंह बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, 2017 (4) PLJR 195 पर भरोसा किया। उस मामले में सी.सी.ए. नियम, 2005 के नियम 2(फ), 2(ज) और 16 का परीक्षण करने के बाद न्यायालय ने यह माना था कि केवल नियुक्ति प्राधिकारी, उसके द्वारा अधिकृत प्राधिकारी, या किसी विशेष या सामान्य आदेश द्वारा अधिकृत प्राधिकारी ही किसी सरकारी सेवक के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ कर सकता है।
पुलिस अवर निरीक्षक के लिए नियुक्ति और अनुशासनिक प्राधिकारी पुलिस महानिरीक्षक या पुलिस उपमहानिरीक्षक होता है। न्यायालय ने उदय प्रताप सिंह के पैराग्राफ 31 का उद्धरण किया, जिसमें यह निर्णय दिया गया था कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा बिना सक्षम प्राधिकारी की किसी अनुमति के विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ करना अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय सेक्रेटरी, मिनिस्ट्री ऑफ डिफेन्स बनाम प्रभाष चंद्र मिर्धा, AIR 2012 SC 2250 का भी संदर्भ दिया, ताकि यह सिद्धांत पुष्ट किया जा सके कि केवल सक्षम प्राधिकारी ही विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ कर सकता है।
वर्तमान मामले में न्यायालय ने नोट किया कि याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से यह दलील दी थी कि एस.पी. को आरोप-पत्र जारी करने या कार्यवाही प्रारम्भ करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था। राज्य ने अपने प्रतिकाउंटर हलफनामे में ऐसा कोई प्राधिकार नहीं दिखाया जो एस.पी. को सक्षम बनाता हो। रिकॉर्ड पर एस.पी. को अधिकृत करने वाला कोई आदेश या अधिसूचना प्रस्तुत नहीं की गई। अतः उदय प्रताप सिंह तथा धर्मेंद्र कुमार बनाम बिहार राज्य एवं अन्य (C.W.J.C. संख्या 470 ऑफ 2018) का अनुसरण करते हुए न्यायालय ने माना कि एस.पी. द्वारा आरोप-पत्र के माध्यम से विभागीय कार्यवाही का प्रारम्भ पूरी तरह अवैध था।
न्यायालय ने तत्पश्चात सी.सी.ए. नियम, 2005 के नियम 17 का परीक्षण किया, जो मुख्य दंड देने की प्रक्रिया निर्धारित करता है। नियम 17(3) में यह अपेक्षित है कि अनुशासनिक प्राधिकारी स्वयं आरोपों की धाराएं तैयार करे या उनके तैयार किए जाने का प्रबंध करे, जिसमें आरोपित कदाचार के स्पष्ट विवरण, दस्तावेजों की सूची और गवाहों की सूची शामिल हो।
नियम 17(4) यह अनिवार्य करता है कि आरोप-पत्र अनुशासनिक प्राधिकारी या विधिवत अधिकृत अधिकारी द्वारा दिया जाए और अनुशासनिक प्राधिकारी को स्पष्टीकरण पर अपना मन लगाकर यह निर्णय लेना होता है कि जांच आगे बढ़ाई जाए या मामला समाप्त कर दिया जाए। न्यायालय ने शंकर दयाल बनाम बिहार राज्य एवं अन्य (C.W.J.C. संख्या 7207 ऑफ 2016) का हवाला दिया, जिसमें यह निर्णय दिया गया था कि अनुशासनिक प्राधिकारी का यह दायित्व अप्रत्यायोज्य (non-delegable) है।
न्यायालय ने पाया कि इस मामले में नियम 17(4) की पूरी तरह अनदेखी की गई। एस.पी. ने स्वयं स्पष्टीकरण मांगने, जांच प्रतिवेदन का मूल्यांकन करने और फिर दंड की सिफारिश करने की भूमिका अपने ऊपर ले ली, जबकि आई.जी.पी. का अंतिम आदेश मुख्य रूप से एस.पी. की सिफारिश पर आधारित प्रतीत होता है, जिसमें स्वतंत्र तर्क नहीं दिए गए।
जांच प्रतिवेदन की जांच करते हुए न्यायालय ने देखा कि यद्यपि गवाहों की औपचारिक जिरह की गई थी, रिपोर्ट ने अधिकांशतः प्रारंभिक जांच की सामग्री और एस.पी. के निर्देशों को दोहराया था। रिपोर्ट अठारह पृष्ठों की थी, लेकिन जांच अधिकारी की वास्तविक राय केवल दो पंक्तियों में सिमटी थी, जिसमें मात्र यह कहा गया था कि आरोप सिद्ध हो गए। यह नहीं बताया गया कि याचिकाकर्ता की प्रतिरक्षा क्यों अस्वीकार की गई।
न्यायालय ने माना कि ऐसी जांच रिपोर्ट प्रतिरक्षा पर समुचित विचार को प्रदर्शित करने में विफल है और विधिक रूप से असंतोषजनक है।
न्यायालय ने आगे माना कि एस.पी. ने जांच प्रतिवेदन के बाद याचिकाकर्ता से स्पष्टीकरण मांगकर और फिर “कठोर दंड” के रूप में बर्खास्तगी की सिफारिश कर गंभीर गलती की। अनुशासनिक प्राधिकारी (आई.जी.पी.) ने भी केवल एस.पी. की सिफारिश के आधार पर बर्खास्तगी लगाकर “गंभीर अवैधता” की, जो “स्वतंत्र मन का पूर्णतः अभाव” दर्शाती है।
न्यायालय ने प्रशासनिक और अर्द्ध-न्यायिक आदेशों में कारण दर्ज करने के महत्व को रेखांकित किया, जिसके लिए उसने क्रांति एसोसिएट्स (प्रा.) लिमिटेड बनाम मसूद अहमद खान, (2010) 9 SCC 496 पर भरोसा किया। वहां सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि कारण दर्ज करना मनमाने ढंग से शक्ति प्रयोग पर अंकुश लगाता है और न्यायिक पुनरावलोकन को सुगम बनाता है।
न्यायालय ने केम्स सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम बिहार राज्य, 2014 (1) PLJR 622 में प्रदत्त खंडपीठ के निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि केवल कारण बताओ नोटिस देकर और उत्तर प्राप्त कर लेने भर से प्राकृतिक न्याय की पूर्ति नहीं हो जाती। अंतिम आदेश में यह दिखना चाहिए कि प्राधिकारी ने प्रतिरक्षा पर मनन किया और क्यों वह स्वीकार्य नहीं है, इसके कारण दर्ज किए।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि संपूर्ण विभागीय कार्यवाही अवैध है और वैधानिक प्रक्रिया से परे (dehors) है। इसलिए न्यायालय ने आरोप-पत्र, 08.12.2020 दिनांकित बर्खास्तगी आदेश, 02.03.2021 दिनांकित अपीलीय आदेश और 23.06.2022 दिनांकित स्मारकीय आदेश को रद्द कर दिया।
इसके बाद न्यायालय ने विचार किया कि क्या याचिकाकर्ता को बकाया वेतन मिलना चाहिए। दीपली गुंडु सुरवसे बनाम क्रांति जूनियर अध्यापक महाविद्यालय, (2013) 10 SCC 324 का संदर्भ देते हुए न्यायालय ने उल्लेख किया कि गलत तरीके से सेवा समाप्ति के मामलों में सेवा की निरंतरता के साथ पुनर्नियुक्ति तथा बकाया वेतन देना सामान्य नियम है, यद्यपि सेवा की अवधि, कथित कदाचार की प्रकृति और नियोक्ता की वित्तीय स्थिति जैसे कारकों को भी ध्यान में रखा जाता है।
यहाँ न्यायालय ने पाया कि प्रतिवादीगण अपने कार्यों को उचित ठहराने में पूर्णतः विफल रहे हैं और उन्होंने वैधानिक प्रावधानों और/अथवा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन किया है। अतः न्यायालय ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को बकाया वेतन के साथ सभी परिणामी लाभों का भुगतान करें।
रिट याचिका तदनुसार स्वीकार कर ली गई।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के पुलिसकर्मियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए, जिनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही चलती है, महत्वपूर्ण है।
पहली बात, यह स्पष्ट कर देता है कि केवल विधिसम्मत अनुशासनिक प्राधिकारी या अधिकृत व्यक्ति ही विभागीय मामला शुरू कर सकता है और उसे नियंत्रित कर सकता है। यदि कोई अधीनस्थ अधिकारी, जैसे कि इस मामले में पुलिस अधीक्षक, बिना प्राधिकरण के ऐसी कार्यवाही शुरू करता है, तो संपूर्ण कार्रवाई निरस्त की जा सकती है।
दूसरी बात, पटना उच्च न्यायालय प्रारंभिक जांच रिपोर्टों के दुरुपयोग के विरुद्ध चेतावनी देता है। वे केवल पहली नजर के आकलन के लिए होती हैं, नियमित विभागीय जांच में सीधे साक्ष्य के रूप में उपयोग के लिए नहीं। यदि उन्हें इस रूप में माना जाए कि अभियुक्त अधिकारी को भाग लेने और जिरह करने का अवसर न मिले, तो यह प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन होगा।
तीसरी बात, निर्णय इस बात पर जोर देता है कि जांच रिपोर्टें और दंड आदेश कारणों से परिपूर्ण हों। प्राधिकारी केवल इतना कहकर नहीं बच सकता कि स्पष्टीकरण “असंतोषजनक” है, बल्कि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि क्यों। यह सुरक्षा निष्पक्षता सुनिश्चित करने में मदद करती है और मनमाने निर्णयों को रोकती है।
अंत में, न्यायालय ने बर्खास्तगी को निरस्त करने के बाद पूर्ण बकाया वेतन और परिणामी लाभों के भुगतान का निर्देश दिया है। इससे यह रेखांकित होता है कि जब राज्य कानूनी प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन करता है, तो प्रभावित कर्मचारी को केवल कागजों पर पुनर्स्थापन ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी बहाल किया जा सकता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या पुलिस अधीक्षक, अररिया, पुलिस अवर निरीक्षक के विरुद्ध आरोप-पत्र जारी करने सहित विभागीय कार्यवाही विधिवत रूप से प्रारम्भ और संचालित कर सकता था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि अवर निरीक्षक के लिए नियुक्ति और अनुशासनिक प्राधिकारी पुलिस महानिरीक्षक/पुलिस उपमहानिरीक्षक है, और एस.पी. को अधिकृत करने का कोई प्रमाण नहीं था। अतः एस.पी. द्वारा कार्यवाही का प्रारम्भ अधिकार क्षेत्र से बाहर था। - प्रश्न: क्या विभागीय जांच सी.सी.ए. नियम, 2005 के नियम 17 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप की गई थी?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि नियम 17(4) की अनदेखी की गई, प्रारंभिक जांच की सामग्री को अनुचित रूप से नियमित जांच में उपयोग किया गया, जांच अधिकारी ने कारणयुक्त निष्कर्ष नहीं दिए, और अनुशासनिक प्राधिकारी ने एस.पी. की सिफारिश पर यांत्रिक ढंग से कार्य किया। - प्रश्न: बर्खास्तगी को अवैध ठहराए जाने के बाद, क्या याचिकाकर्ता बकाया वेतन और परिणामी लाभों का हकदार था?
उत्तर: हाँ। गंभीर प्रक्रियात्मक उल्लंघनों और राज्य की ओर से औचित्य के अभाव को देखते हुए न्यायालय ने सेवा में पुनर्स्थापन के साथ बकाया वेतन और सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Amalendu Ghosh v. North Eastern Railway, AIR 1960 SC 992
- Champaklal Chimanlal Shah v. Union of India, AIR 1964 SC 1854
- Narayan Dattatraya Ramteerthakhar v. State of Maharashtra, (1997) 1 SCC 299
- Secretary, Ministry of Defence v. Prabhash Chandra Mirdha, AIR 2012 SC 2250
- Kranti Associates (P) Ltd. v. Masood Ahmed Khan, (2010) 9 SCC 496
- Deepali Gundu Surwase v. Kranti Junior Adhyapak Mahavidyalaya and Others, (2013) 10 SCC 324
- Uday Pratap Singh v. State of Bihar & Ors, 2017 (4) PLJR 195
- Kems Services Private Limited v. State of Bihar, 2014 (1) PLJR 622
- Dharmendra Kumar v. State of Bihar & Ors, C.W.J.C. No. 470 of 2018
- Shankar Dayal v. State of Bihar & Ors, C.W.J.C. No. 7207 of 2016
- Sanjay Kumar Singh v. State of Bihar & Ors, C.W.J.C. No. 6530 of 2017
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट न्यायाधिकार मामला संख्या 13380 ऑफ 2022
मामले का शीर्षक: सत्येंद्र कुमार गुप्ता बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
उद्धरण: 2025 (2) PLJR 537
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार
निर्णय की तारीख: 18.03.2025
अधिवक्ता:
याचिकाकर्ता की ओर से: श्री विनय रंजन, अधिवक्ता; श्री अभिषेक तीर्थंकर, अधिवक्ता; श्री अंकित कुमार, अधिवक्ता
प्रतिवादीगण (राज्य) की ओर से: श्री पी. के. वर्मा, AAG-3 (वरिष्ठ अधिवक्ता सह-अतिरिक्त महाधिवक्ता संख्या 3)
मामले की प्रकृति: सेवा से विभागीय बर्खास्तगी, अपीलीय आदेश तथा स्मारकीय अपील की अस्वीकृति को चुनौती देने वाली सिविल रिट न्यायाधिकार के अंतर्गत दायर रिट याचिका।
निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment – CWJC No. 13380 of 2022
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