मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पटना उच्च न्यायालय के समक्ष आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 65/2019 से उत्पन्न हुआ। यह वाद पति (याचिकाकर्ता) और उसकी पत्नी एवं अवयस्क पुत्री (प्रतिवादीगण) के बीच विवाद से संबंधित था, जिसमें परिवार न्यायालय द्वारा भरण-पोषण स्वीकृत किया गया था।
याचिकाकर्ता ने आपराधिक पुनरीक्षण दाखिल कर पटना उच्च न्यायालय का रुख किया। 12-09-2022 को सुनवाई के दौरान, उसके अधिवक्ता श्री नफ़ीसुज़्ज़ोहा ने पुनरीक्षण आवेदन वापस लेने की अनुमति मांगी। माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद की पीठ ने यह वापसी स्वीकार कर ली।
वापसी की अनुमति दिए जाने से पहले, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने न्यायालय का ध्यान एक व्यापक और गंभीर मुद्दे की ओर आकृष्ट किया। उन्होंने उन परित्यक्त महिलाओं और बच्चों की “दयनिय स्थिति” को रेखांकित किया जिन्हें परिवार न्यायालयों द्वारा भरण-पोषण प्रदान किया जा चुका था, परंतु वे कोई धनराशि प्राप्त नहीं कर रहे थे क्योंकि पतियों ने उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिकाएँ दायर कर दी थीं और उसके बाद भुगतान बंद कर दिया था।
अधिवक्ता ने एक और चिंताजनक तथ्य की ओर भी संकेत किया: जहाँ-जहाँ परिवार न्यायालयों ने भरण-पोषण की राशि वसूलने के लिए डिस्टे्रस वारंट जारी किए थे, वहां भी स्थानीय पुलिस द्वारा उन वारंटों का क्रियान्वयन नहीं किया जा रहा था।
राज्य की ओर से माननीय अपर लोक अभियोजक, श्री मुकेश्वर दयाल ने स्वीकार किया कि डिस्टे्रस वारंटों का निष्पादन संबंधित पुलिस अधिकारियों की ही जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी निवेदन किया कि यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो न्यायालय उपयुक्त निर्देश जारी करने पर विचार कर सकता है।
न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया
हालाँकि स्वयं आपराधिक पुनरीक्षण वापस ले लिया गया था और इसलिए गुण-दोष के आधार पर उस पर निर्णय नहीं हुआ, फिर भी पटना उच्च न्यायालय ने अधिवक्ता द्वारा उठाए गए व्यापक मुद्दों को गंभीर एवं तात्कालिक ध्यान देने योग्य माना। मूल चिंता यह थी कि परिवार न्यायालयों के स्पष्ट आदेशों के बावजूद महिलाओं और बच्चों को भरण-पोषण का भुगतान नहीं हो रहा था।
न्यायालय ने यह तथ्य दर्ज किया कि अनेक प्रकरणों में भरण-पोषण संबंधी आदेशों के विरुद्ध दायर पुनरीक्षण याचिकाएँ उच्च न्यायालय में 5–7 वर्षों से लंबित थीं। इस अवधि में, यह आरोप था कि पतियों ने पुनरीक्षण दाखिल करने के बाद भरण-पोषण देना बंद कर दिया, और साथ ही, परिवार न्यायालयों द्वारा जारी डिस्टे्रस वारंटों का भी क्रियान्वयन नहीं हो रहा था।
न्यायालय ने उल्लेख किया कि ये तथ्य न्यायालय की “न्यायिक अंतःचेतना को विचलित” कर रहे हैं। इसका अभिप्राय यह है कि न्यायालय को यह अत्यंत चिंताजनक लगा कि संवेदनशील वर्ग—परित्यक्त महिलाएँ और बच्चे—उन भरण-पोषण आदेशों का लाभ नहीं ले पा रहे थे जो पहले से ही उनके पक्ष में पारित हो चुके थे।
न्यायालय के हस्तक्षेप का केंद्र बिन्दु व्यक्तिगत भरण-पोषण आदेशों की सही-गलत जांच नहीं, बल्कि प्रवर्तन की व्यवस्था थी। समस्या दो स्तरों पर थी:
पहला, उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिकाओं के निस्तारण में देरी का व्यवहार में इस रूप में दुरुपयोग हो रहा था कि पति भरण-पोषण देना बंद कर देते थे। दूसरा, परिवार न्यायालयों के प्रधान न्यायाधीशों द्वारा बकाया भरण-पोषण वसूलने के उद्देश्य से जारी डिस्टे्रस वारंटों को भी स्थानीय पुलिस कथित रूप से क्रियान्वित नहीं कर रही थी।
राज्य के अधिवक्ता ने निष्कपट रूप से स्वीकार किया कि डिस्टे्रस वारंटों का निष्पादन वास्तव में पुलिस अधिकारियों का ही दायित्व है। इस स्वीकृति ने न्यायालय को अपने संवैधानिक दायित्व का प्रयोग करते हुए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करने की बुनियाद प्रदान की।
स्वयं को एक संवैधानिक न्यायालय के रूप में अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि वह इस तंत्रगत समस्या की अनदेखी नहीं करेगा। याचिकाकर्ता को आपराधिक पुनरीक्षण वापस लेने की अनुमति देते हुए भी न्यायालय ने बिहार राज्य में भरण-पोषण आदेशों के प्रवर्तन को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से विस्तृत आदेश पारित किया।
सबसे पहले, न्यायालय ने निर्देश दिया कि बिहार के सभी परिवार न्यायालयों के माननीय प्रधान न्यायाधीश अपने अभिलेखों की समीक्षा करें। विशेष रूप से, उन्हें उन सभी प्रकरणों की पहचान करने के लिए कहा गया जिनमें भरण-पोषण की राशि की प्राप्ति हेतु डिस्टे्रस वारंट जारी किए गए थे, किंतु अब तक उनका निष्पादन नहीं हुआ था।
दूसरे, न्यायालय ने यह अनिवार्य किया कि इस उच्च न्यायालय के आदेश की सूचना प्राप्त होने की तिथि से 30 दिनों के भीतर प्रत्येक प्रधान न्यायाधीश ऐसे लंबित मामलों की सूची संबंधित जिले के वरीय पुलिस अधीक्षक या पुलिस अधीक्षक को प्रेषित करें। इस सूची में प्रत्येक डिस्टे्रस वारंट की जारी होने की तिथि का भी उल्लेख होना आवश्यक है।
तीसरे, न्यायालय ने जिला पुलिस प्रमुखों पर स्पष्ट जिम्मेदारी आरोपित की। न्यायालय ने कहा कि “वरीय पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक की जिम्मेदारी” होगी कि परिवार न्यायालय से सूचना प्राप्त होने की तिथि से 30 दिनों के भीतर ऐसे सभी डिस्टे्रस वारंटों का विधिवत निष्पादन सुनिश्चित करें, जब तक कि किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उनके निष्पादन पर स्थगनादेश पारित नहीं किया गया हो।
चौथे, न्यायालय ने यह निर्देश दिया कि 30 दिनों की यह निष्पादन अवधि समाप्त होने के बाद, संबंधित परिवार न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश को पुलिस द्वारा 15 दिनों के भीतर निष्पादन प्रतिवेदन (execution report) प्रस्तुत किया जाए। इससे एक सुदृढ़ प्रतिवेदन संरचना और जवाबदेही की समय-सीमा स्थापित हुई।
न्यायालय ने अनुपालन न होने की दशा में अनुवर्ती तंत्र भी उपलब्ध कराया। यदि कोई डिस्टे्रस वारंट निष्पादित नहीं होता, और यदि वरीय पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक के कार्यालय द्वारा प्रधान न्यायाधीश की संतुष्टि हेतु कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया जाता, तो प्रधान न्यायाधीश संबंधित अधिकारी को शपथ-पत्र (affidavit) दाखिल करने के लिए बाध्य करेंगे।
इस शपथ-पत्र में डिस्टे्रस वारंट का निष्पादन न होने के कारणों तथा समय पर प्रतिवेदन प्रस्तुत न करने के कारणों का उल्लेख किया जाएगा। इसे 30 दिनों के भीतर दाखिल करना होगा। यह आवश्यकता सुनिश्चित करती है कि उत्तरदायी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अपनी निष्क्रियता के लिए जवाबदेह होना पड़े।
भरण-पोषण आदेशों के प्रवर्तन को और अधिक मजबूत करने हेतु उच्च न्यायालय ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए यह व्यवस्था की कि ऐसे शपथ-पत्र प्राप्त होने पर, यदि प्रधान न्यायाधीश पाते हैं कि उनके आदेश की “जानबूझकर अवमानना की गई है और उसका पालन नहीं हुआ है”, तो प्रकरण दुराचारी अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना कार्यवाही आरंभ करने के लिए पटना उच्च न्यायालय को संदर्भित किया जाएगा।
न्यायालय की अवमानना एक गंभीर परिणाम है। अवमानना कार्यवाही शुरू किए जाने की संभावना को स्पष्ट रूप से दर्ज करके, उच्च न्यायालय ने संकेत दिया कि भरण-पोषण मामलों में डिस्टे्रस वारंटों का निष्पादन न होना किसी भी तरह से हल्के में नहीं लिया जाएगा।
अंत में, न्यायालय ने निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति पुलिस महानिदेशक, पटना को “उचित निर्देश” देने के लिए प्रेषित की जाए। साथ ही यह भी निर्देश दिया गया कि इसकी प्रतियाँ बिहार राज्य के सभी जिला न्यायालयों को “प्रसारण एवं क्रियान्वयन” हेतु भेजी जाएँ।
इन निर्देशों के माध्यम से न्यायालय का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जिन महिलाओं और बच्चों को भरण-पोषण पाने का अधिकार है, वे केवल नौकरशाही देरी या पुलिस की निष्क्रियता के कारण असहाय न रह जाएँ। आदेश ने परिवार न्यायालयों और पुलिस अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित करने का लक्ष्य रखा, ताकि डिस्टे्रस वारंटों को गंभीरता से लिया जाए और निश्चित समय-सीमा के भीतर निष्पादित किया जाए।
यद्यपि मूल आपराधिक पुनरीक्षण “वापस लेने के कारण निस्तारित” कर दिया गया, फिर भी पटना उच्च न्यायालय ने इस अवसर का उपयोग एक आवर्ती और तंत्रगत समस्या को संबोधित करने के लिए किया। यह आदेश दिखाता है कि न्यायालय विशेष रूप से उन मामलों में, जहाँ परित्यक्त महिलाएँ और बच्चे संलिप्त हैं, भरण-पोषण आदेशों के प्रभावी प्रवर्तन के प्रति चिंतित है।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन महिलाओं और बच्चों के लिए महत्वपूर्ण है जो बिहार में परिवार न्यायालयों से भरण-पोषण के आदेश तो प्राप्त कर चुके हैं, परंतु वास्तविक रूप से धनराशि प्राप्त करने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं।
वरीय पुलिस अधीक्षक और पुलिस अधीक्षक पर निश्चित समय-सीमा के भीतर डिस्टे्रस वारंटों का निष्पादन करने की स्पष्ट जिम्मेदारी डालकर, न्यायालय ने “कागज़ पर आदेश” और “हाथ में पैसा” के बीच की खाई पाटने का प्रयास किया है।
यह आदेश परिवार न्यायालयों के प्रधान न्यायाधीशों को भी एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया प्रदान करता है, जिसका पालन वे तब कर सकते हैं जब वारंटों का निष्पादन नहीं होता; इसमें पुलिस अधिकारियों से शपथ-पत्र की मांग करने और जानबूझकर अवज्ञा की स्थिति में मामलों को अवमानना हेतु उच्च न्यायालय को संदर्भित करने की शक्ति भी शामिल है।
विधि व्यवसायियों और वादकारियों के लिए, विशेषकर भरण-पोषण के मामलों में, यह आदेश डिस्टे्रस वारंटों के शीघ्र निष्पादन हेतु दबाव बनाने का एक साधन उपलब्ध कराता है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि पुनरीक्षण वादों की लंबितता अथवा पुलिस की निष्क्रियता भरण-पोषण पर आश्रित व्यक्तियों को उनके जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक धनराशि से वंचित रखने का बहाना नहीं बन सकती।
कानूनी प्रश्न और उत्तर
- प्रश्न: जब परिवार न्यायालयों द्वारा भरण-पोषण की राशि की वसूली के लिए जारी किए गए डिस्टे्रस वारंटों का स्थानीय पुलिस द्वारा निष्पादन नहीं किया जाता और इससे महिलाओं तथा बच्चों को कठिनाई होती है, तब क्या किया जाना चाहिए?
उत्तर: पटना उच्च न्यायालय ने सभी परिवार न्यायालयों के प्रधान न्यायाधीशों को ऐसे लंबित डिस्टे्रस वारंटों की पहचान करने, उनका विवरण वरीय पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक को भेजने, तथा पुलिस को वे वारंट 30 दिनों के भीतर निष्पादित करने, प्रतिवेदन प्रस्तुत करने, शपथ-पत्र आधारित जवाबदेही का सामना करने और जानबूझकर अवज्ञा की दशा में अवमानना कार्यवाही का जोखिम उठाने हेतु बाध्य करने के निर्देश दिए। - प्रश्न: क्या उच्च न्यायालय किसी आपराधिक पुनरीक्षण, जिसे वापस लिया जा रहा हो, में दलीलों के दौरान उजागर किए गए व्यापक तंत्रगत मुद्दे को संबोधित करने के लिए सामान्य दिशा-निर्देश जारी कर सकता है?
उत्तर: हाँ। एक संवैधानिक न्यायालय के रूप में कार्य करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने पुनरीक्षण याचिका की वापसी स्वीकार की, फिर भी पूरे राज्य में डिस्टे्रस वारंटों के निष्पादन तथा महिलाओं और बच्चों के भरण-पोषण के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने हेतु व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- इस आदेश के उपलब्ध पाठ में किसी पूर्ववर्ती निर्णय या प्रकरण विधि का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।
मामले का ब्योरा
मामला संख्या: Criminal Revision No. 65 of 2019
शीर्षक: Sarfaraz Alam @ Md. Sarfaraz Alam बनाम The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2023 (1) PLJR 756
पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Rajeev Ranjan Prasad
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Nafisuzzoha, Advocate
- राज्य की ओर से: Mr. Mukeshwar Dayal, Advocate (APP)
वाद का प्रकार: आपराधिक पुनरीक्षण (भरण-पोषण मामलों में डिस्टे्रस वारंटों के निष्पादन संबंधी सामान्य दिशा-निर्देशों सहित)
आदेश की तिथि: 12-09-2022
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
Judgement Link; https://patnahighcourt.gov.in/vieworder/NyM2NSMyMDE5IzMjTg==-JbLLFNShAYY=
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बिहार में कानूनी विकास आपके अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं,
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