किशोर की दोषसिद्धि रद्द, पीड़िता को मुआवज़े का आदेश — पटना उच्च न्यायालय, 2025

इस मामले में दुष्कर्म के लिए एक किशोर की दोषसिद्धि को पटना उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी। न्यायालय ने पाया कि आरोप को संदेह से परे सिद्ध करने के लिए साक्ष्य पर्याप्त रूप से मज़बूत नहीं थे और दोषसिद्धि व सज़ा को निरस्त कर दिया। साथ ही, न्यायालय ने यह माना कि लड़की के साथ यौन अपराध हुआ था और उसे पीड़िता के रूप में ही देखा जाना चाहिए। न्यायालय ने निर्देश दिया कि उसे बिहार पीड़ित प्रतिकर योजना, 2014 के तहत मुआवज़ा दिया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह आपराधिक पुनरीक्षण 03.03.2011 की एक घटना से उत्पन्न हुआ, जो गाँव मुजरी चकमाही, थाना खानपुर, जिला समस्तीपुर में हुई थी। 03.03.2011 को दर्ज नाबालिग लड़की के फर्दबयान के आधार पर, खानपुर थाना कांड संख्या 36/2011 भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(g) के तहत, याचिकाकर्ता तथा एक सह-अभियुक्त के विरुद्ध दर्ज किया गया।

जाँच के दौरान, दोनों अभियुक्तों ने स्वयं को किशोर बताया। अतः उनके अभिलेख किशोर न्याय बोर्ड, समस्तीपुर को भेजे गए। जाँच के उपरांत, केवल याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोप-पत्र दाखिल किया गया। सह-अभियुक्त को उस चरण पर निर्दोष पाया गया, यद्यपि बाद में उसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत तलब किया गया और उसका अभिलेख याचिकाकर्ता से अलग कर दिया गया।

किशोर जाँच में, जो जे.जे. बोर्ड के समक्ष हुई, अभियोजन की बारह गवाहियाँ दर्ज हुईं, जिनमें पीड़िता, उसके परिजन, ग्रामवासी, अन्वेषण अधिकारी तथा चिकित्सक शामिल थे। चिकित्सकीय-कानूनी अभिलेख भी प्रदर्शित किए गए। याचिकाकर्ता ने न तो कोई प्रतिरक्षा साक्षी प्रस्तुत की और न ही कोई दस्तावेज़ दाखिल किया।

जे.जे. बोर्ड ने याचिकाकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के अपराध का दोषी ठहराया और निर्देश दिया कि उसे किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2000 की धारा 15(1)(g) के तहत विशेष गृह में रखा जाए। आदेश से आहत होकर, याचिकाकर्ता ने सत्र न्यायालय के समक्ष आपराधिक अपील सं. 46/2016/152/2017 दायर की। अपीलीय न्यायालय ने दोषसिद्धि और सज़ा दोनों की पुष्टि कर दी, जिसके परिणामस्वरूप पटना उच्च न्यायालय के समक्ष वर्तमान आपराधिक पुनरीक्षण सं. 819/2019 दायर किया गया।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार की पीठ ने, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता, अमीकस क्यूरी, राज्य एवं पीड़िता के अधिवक्ता की दलीलें सुनीं।

याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि जे.जे. बोर्ड और अपीलीय न्यायालय – दोनों ने साक्ष्यों का गलत मूल्यांकन किया। बचाव के अनुसार, अभियोजन पक्ष, आरोप को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा, फिर भी याचिकाकर्ता को तीन वर्ष के लिए विशेष गृह भेज दिया गया। यह भी कहा गया कि दिए गए आदेश किशोर न्याय अधिनियम के उद्देश्य और भाव के विपरीत हैं।

राज्य तथा पीड़िता के अधिवक्ता ने निचली अदालतों के निर्णयों का समर्थन किया। उनका कहना था कि साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया गया और धारा 376 भा.दं.सं. के तहत दोषसिद्धि तथा दी गई सज़ा में कोई अवैधता नहीं है।

राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पुनरीक्षणाधिकार के तहत उच्च न्यायालय साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन ऐसे नहीं कर सकता, मानो वह अपील सुन रहा हो, अतः समानान्तर निष्कर्षों में दखल नहीं देना चाहिए। दूसरी ओर, पीड़िता के अधिवक्ता और अमीकस क्यूरी ने रेखांकित किया कि न तो जे.जे. बोर्ड और न ही चिल्ड्रेन कोर्ट ने, यह पाए जाने के बावजूद कि पीड़िता के साथ संसर्गात्मक यौन हमले (penetrative sexual assault) हुआ था, उसे मुआवज़ा देने के संबंध में कोई आदेश पारित किया।

राज्य ने यह भी दलील दी कि दोषसिद्ध व्यक्ति द्वारा दायर याचिका में पुनरीक्षण न्यायालय मुआवज़ा नहीं दे सकता, और यह कि बिहार पीड़ित प्रतिकर योजना, 2014 लागू नहीं हो सकती क्योंकि घटना 2011 में हुई थी, जो योजना की अधिसूचना से पूर्व की है।

पुनरीक्षणाधिकार का दायरा

न्यायालय ने पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 397 और 401 के तहत अपने पुनरीक्षणाधिकार की सीमाएँ स्पष्ट कीं। उसने कहा कि पुनरीक्षण एक पर्यवेक्षी शक्ति है, जिसका उद्देश्य निचली अदालतों के निष्कर्षों, आदेशों या कार्यवाही में हुई भूल के कारण न्याय के विफल होने को ठीक करना है। परंतु यह शक्ति विवेकाधीन है और इसे अपील की भाँति साक्ष्यों के पुनः, पूर्ण पुनर्मूल्यांकन के लिए प्रयुक्त नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों (जैसे Akalu Ahir, K. Chinnaswami Reddy, Duli Chand, Janta Dal, Vimal Singh, State of Kerala बनाम Puttumana Namboodiri, Jagannath Chaudhary, Bindeshwari Prasad Singh, Manju Ram Kalita, Amit Kapoor, Ganesha, Shlok Bhardwaj, Sanjaysinh R. Chavan और Malkeet Singh Gill) का उल्लेख करते हुए असाधारण परिस्थितियों की सूची दी, जिनमें पुनरीक्षण में हस्तक्षेप उचित होता है। इनमें अधिकार-क्षेत्र का अभाव, घोर अवैधता, महत्त्वपूर्ण साक्ष्य को बाहर कर देना, ग्राह्य न होने योग्य साक्ष्य पर निर्भरता, निर्णायक सामग्री की अवहेलना, बिना साक्ष्य के निष्कर्ष, विकृत/विरूपित (perverse) मूल्यांकन, विवेक का मनमाना प्रयोग, या अवैध समझौता आदि शामिल हैं।

इस विधिक ढाँचे के साथ, न्यायालय ने यह परखा कि क्या वर्तमान मामला इन अपवाद श्रेणियों में आता है।

वर्तमान मामले में साक्ष्यों का मूल्यांकन

फर्दबयान में आरोप यह था कि लगभग सुबह 8 बजे, जब पीड़िता अकेली घर में रसोई में काम कर रही थी, तब याचिकाकर्ता और सह-अभियुक्त अंदर आए, उसे “गमछा” से मुँह बन्द कर और आँखों पर बाँधकर, मक्का के खेत में ले गए और उसके साथ संसर्गात्मक यौन हमला किया, जिससे उसकी निजी अंग पर चोट आई। वापस आने पर पीड़िता ने यह बात अपनी माँ को बताई।

जे.जे. बोर्ड के समक्ष मुख्य परीक्षा में, पीड़िता ने broadly अपने पूर्व कथन का समर्थन किया। किंतु जिरह में उसने स्वीकार किया कि उसके परिवार और याचिकाकर्ता के परिवार के बीच दुश्मनी थी। उसने यह भी कहा कि उसके खून से सने कपड़े पुलिस को “दिखाए” गए थे, पर उसने यह नहीं बताया कि उसने वे कपड़े पुलिस को सौंपे। उसने दुश्मनी के कारण झूठा आरोप लगाने के सुझाव से इन्कार किया।

अन्य कोई गवाह कथित घटना का प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। पीड़िता के अतिरिक्त, गवाह प्रायः उसके पिता, माँ, दादी तथा अन्य सह-ग्रामवासी थे, जो सभी सुनी-सुनाई बात के गवाह थे। अन्वेषण अधिकारी (PW-8) और डॉक्टर (PW-11) सरकारी गवाह थे।

डॉक्टर PW-11 डॉ. ललिता सिंह ने कहा कि उन्होंने पीड़िता की जाँच उसी दिन, अर्थात 03.03.2011 को की और उसके निजी अंग पर चोटें पाईं। लेकिन योनि स्वैब में कोई शुक्राणु (spermatozoa) नहीं पाया गया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे यह नहीं कह सकतीं कि बलात्कार हुआ था या नहीं।

अन्वेषण अधिकारी PW-8 ने बयान दिया कि उसने घटनास्थल पर ज़मीन पर खून देखा। परंतु जिरह में उसने स्वीकार किया कि उसने खून से सनी मिट्टी जब्त नहीं की और न ही कोई जब्ती सूची तैयार की। उसने यह भी कहा कि उसे पीड़िता के खून से सने कपड़े देखने का अवसर नहीं मिला, इसलिए उसने उन्हें भी जब्त नहीं किया।

न्यायालय ने माना कि अभियुक्त को कथित अपराध से वैज्ञानिक रूप से जोड़ने के लिए कोई वैज्ञानिक जाँच, जैसे डीएनए परीक्षण या समान फॉरेंसिक कदम, नहीं उठाए गए।

इन सभी पहलुओं को समग्र रूप से देखते हुए, न्यायालय ने माना कि दोषसिद्धि को बरकरार रखना असुरक्षित और अन्यायपूर्ण होगा। अभियोजन पक्ष, याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोप को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा। इससे दोषसिद्धि, साक्ष्यों के विकृत मूल्यांकन का मामला बन गई, जो पुनरीक्षण में हस्तक्षेप के अपवादों के अंतर्गत आती है।

किशोर न्याय अधिनियम के तहत सज़ा

इसके बाद न्यायालय ने सजा के प्रश्न पर विचार किया। उसने कहा कि, मान भी लिया जाए कि अपराध सिद्ध हो, तब भी जे.जे. बोर्ड और अपीलीय न्यायालय द्वारा किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 15 को लागू करने का तरीका, अधिनियम के उद्देश्य, भावना और प्रावधानों के अनुरूप नहीं था।

चूँकि घटना 03.03.2011 को हुई थी, इसलिए किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2000 (जैसा कि 2006 में संशोधित) लागू था, न कि 2015 का अधिनियम; यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 25 के मद्देनज़र है, जो लंबित कार्यवाहियों को पुराने अधिनियम के अधीन सुरक्षित रखती है।

न्यायालय ने 2000 के अधिनियम की प्रस्तावना पर चर्चा करते हुए बल दिया कि यह विधि इस विश्वास पर आधारित है कि बच्चे समाज का भविष्य हैं और यदि वे कानून से संघर्ष में आते हैं तो उन्हें दंडित नहीं, बल्कि सुधारित और पुनर्वासित किया जाना चाहिए। अधिनियम बाल-हितैषी दृष्टिकोण अपनाता है, जिसका अंतिम लक्ष्य पुनर्वास है।

धारा 15 के तहत, जब किसी किशोर द्वारा अपराध किया जाना पाया जाता है, तो जे.जे. बोर्ड के पास कई विकल्प होते हैं: चेतावनी देना, समूह परामर्श, सामुदायिक सेवा, कुछ मामलों में जुर्माने का भुगतान, माता-पिता या उपयुक्त व्यक्ति/संस्था की निगरानी में प्रोबेशन पर रिहाई, अथवा किशोर को अधिकतम तीन वर्ष तक विशेष गृह भेजना—परंतु इसके लिए कारण दर्ज करना आवश्यक है। धारा 16 किशोरों के लिए मृत्यु-दंड या आजीवन कारावास पर रोक लगाती है और उन्हें उपयुक्त सुरक्षित स्थान पर रखने पर बल देती है।

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) नियम, 2007 के नियम 3 में “मौलिक सिद्धांत” दिए गए हैं, जिनमें सर्वोत्तम हित सिद्धांत, पारिवारिक उत्तरदायित्व, अंतिम उपाय (संस्थागतकरण केवल यथोचित जाँच के बाद और न्यूनतम अवधि के लिए) और नई शुरुआत (fresh start) शामिल हैं। नियमों में यह रेखांकित है कि प्रतिशोध जैसे आपराधिक न्याय के उद्देश्यों के स्थान पर पुनर्वासात्मक और पुनर्स्थापनात्मक उद्देश्य रखे जाने चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णयों – जैसे Salil Bali बनाम Union of India, Jitendra Singh @ Babloo Singh बनाम State of U.P. और Subramanian Swamy बनाम Raju – में भी यह रेखांकित किया गया है कि किशोर न्याय व्यवस्था का उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्समावेशन (reintegration) है, तथा किशोर जाँच वयस्क आपराधिक मुकदमों से भिन्न प्रकृति की होती है।

सामाजिक जाँच प्रतिवेदन पर विचार करने में विफलता

इस मामले में परिवीक्षा अधिकारी द्वारा तैयार सामाजिक जाँच प्रतिवेदन में यह दर्शाया गया कि याचिकाकर्ता का कोई आपराधिक पूर्ववृत्त नहीं था। सह-ग्रामवासी और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने उसे सहकारी बताया और उसके विरुद्ध कोई प्रतिकूल बात नहीं कही। उसका पारिवारिक पृष्ठभूमि आर्थिक रूप से कमजोर थी: पिता मज़दूर, माँ गृहिणी, एक मकान और दो कठ्ठा ज़मीन की छोटी सी जोत, साथ ही कई भाई-बहन, जिनमें नाबालिग बहनें भी शामिल थीं। एक भाई बिहार से बाहर मज़दूरी करता था, अन्य भाई-बहन विद्यार्थी थे, और स्वयं याचिकाकर्ता गाँव के विद्यालय में पढ़ रहा था।

उच्च न्यायालय ने पाया कि न तो जे.जे. बोर्ड और न ही अपीलीय न्यायालय ने इस प्रतिवेदन पर समुचित विचार किया, न ही यह विश्लेषण किया कि वास्तव में याचिकाकर्ता के सर्वोत्तम हित में क्या होता। उसे दो वर्ष के लिए विशेष गृह भेजकर, उन्होंने उसकी शिक्षा को प्रभावी रूप से बाधित कर दिया और प्रोबेशन या परामर्श जैसे कम प्रतिबंधात्मक विकल्पों की खोज नहीं की।

न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि प्राधिकारियों को, याचिकाकर्ता के परिवार की आर्थिक कठिनाइयों को देखते हुए, जिला प्रशासन को गरीबी उन्मूलन योजनाओं के लाभ उस परिवार तक पहुँचाने का निर्देश देने पर विचार करना चाहिए था।

दोष सिद्धि के साक्ष्यों की कमज़ोरी और किशोर न्याय अधिनियम की भावना तथा प्रक्रिया का पालन करने में विफलता को देखते हुए, उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि दोषसिद्धि और सज़ा – दोनों विधि की दृष्टि से टिकाऊ नहीं हैं।

फलस्वरूप आपराधिक पुनरीक्षण स्वीकार किया गया। जे.जे. बोर्ड द्वारा पारित दोषसिद्धि का निर्णय और सज़ा का आदेश, जिसे अपीलीय न्यायालय ने पुष्टि की थी, दोनों रद्द कर दिए गए और याचिकाकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

बरी होने के बावजूद पीड़िता को मुआवज़ा

याचिकाकर्ता के मामले से निपटने के बाद, न्यायालय ने पीड़िता के अधिकारों पर ध्यान केंद्रित किया। उसने देखा कि जे.जे. बोर्ड और चिल्ड्रेन कोर्ट – दोनों ने अपने निर्णयों में इस आधार पर कार्यवाही की कि पीड़िता के साथ संसर्गात्मक यौन हमला हुआ था, फिर भी उसके पक्ष में मुआवज़ा देने का कोई आदेश पारित नहीं किया गया।

न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(wa), 357 और 357A तथा बिहार पीड़ित प्रतिकर योजना, 2014 का उल्लेख किया। उसने स्पष्ट किया कि धारा 357 के तहत मुआवज़ा दोषसिद्ध व्यक्ति द्वारा दिया जाना होता है, जबकि धारा 357A के तहत मुआवज़ा राज्य के पीड़ित प्रतिकर कोष से दिया जाता है, जिसका संचालन विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से होता है।

न्यायालय ने यह भी इंगित किया कि योजना के तहत मुआवज़ा अनुशंसित करने के लिए न्यायालय पर कोई समय-सीमा लागू नहीं होती। योजना की धारा 8 में जो सीमा-निर्धारण है, वह केवल उन मामलों पर लागू होती है जहाँ अपराधी अज्ञात है या मुकदमा नहीं हो पाता और पीड़ित स्वयं सीधे आवेदन करता है; और उस स्थिति में भी विलंब को क्षम्य माना जा सकता है।

अपने पूर्ववर्ती खंडपीठीय निर्णय Sunil Kumar Jha बनाम State of Bihar का संदर्भ देते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि विचारण, अपील और पुनरीक्षण – सभी स्तरों के न्यायालय, दोषसिद्धि, बरी या आरोप मुक्त होने – किसी भी परिणति की स्थिति में, और भले ही पीड़ित द्वारा कोई आवेदन न दिया गया हो, धारा 357 और 357A के तहत पीड़ित मुआवज़े के प्रश्न पर कारणयुक्त आदेश पारित करने के लिए बाध्य हैं।

न्यायालय ने आगे कहा कि ये सिद्धांत किशोर न्याय बोर्डों और चिल्ड्रेन कोर्टों की कार्यवाहियों पर समान रूप से लागू होते हैं, क्योंकि किशोर न्याय अधिनियम मुआवज़े के लिए अलग व्यवस्था नहीं करता, और 2015 अधिनियम की धारा 103 केवल उन्हीं स्थितियों में दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों को निष्कासित करती है, जहाँ किशोर न्याय अधिनियम में परस्पर-विरोधी प्रावधान हो।

इसे वर्तमान मामले पर लागू करते हुए, न्यायालय ने कहा कि यद्यपि याचिकाकर्ता को संदेह से परे प्रमाण के अभाव में बरी किया गया, परंतु यह निर्विवाद है कि पीड़िता के साथ यौन अपराध हुआ था और वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(wa) के अंतर्गत “पीड़ित” की परिभाषा में आती है। अतः वह धारा 357A दं.प्र.सं. और बिहार पीड़ित प्रतिकर योजना, 2014 के तहत, बरी हो जाने के बावजूद, मुआवज़ा पाने की अधिकारी है।

न्यायालय ने अभिलेखित किया कि बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक पीड़िता को कोई मुआवज़ा प्राप्त नहीं हुआ है। इसलिए न्यायालय ने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह आदेश की प्रति प्राप्त होने के एक माह के भीतर, योजना के अनुसार पीड़िता/सूत्रधार (informant) को मुआवज़ा अदा करे।

न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि इस निर्णय की प्रति बिहार के सभी किशोर न्याय बोर्डों एवं चिल्ड्रेन कोर्ट के अध्यक्ष पदाधिकारियों के बीच प्रचलन में लाई जाए और बिहार न्यायिक अकादमी को प्रशिक्षण कार्यक्रमों में उपयोग के लिए भेजी जाए। अमीकस क्यूरी की सहायता को स्वीकार करते हुए, उसे मानदेय का भुगतान करने का निर्देश भी दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय दो स्तरों पर महत्त्व रखता है।

पहला, यह दर्शाता है कि पटना उच्च न्यायालय, उन मामलों में जहाँ साक्ष्य डगमगाते हों या निचली अदालतों द्वारा साक्ष्यों का मूल्यांकन एकतरफा प्रतीत हो, किशोरों की दोषसिद्धि की गहन जाँच करेगा। सीमित पुनरीक्षणाधिकार के बावजूद, न्यायालय ने हस्तक्षेप किया क्योंकि निष्कर्ष असुरक्षित थे और आपराधिक क़ानून की मूल सुरक्षा – जैसे संदेह से परे प्रमाण – का पालन नहीं हुआ था।

दूसरा, यह आपराधिक मामलों, विशेषकर किशोरों से जुड़े मामलों में, पीड़ित मुआवज़े पर स्पष्ट दिशानिर्देश देता है। न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि पीड़ित के मुआवज़े का अधिकार इस पर निर्भर नहीं करता कि अभियुक्त दोषसिद्ध हुआ या बरी। यदि न्यायालय संतुष्ट है कि किसी व्यक्ति को अपराध के कारण क्षति या चोट पहुँची है, तो उसे धारा 357A दं.प्र.सं. और राज्य की प्रतिकर योजना के तहत मुआवज़ा अनुशंसित करने पर विचार अवश्य करना चाहिए।

यौन अपराधों की पीड़िताओं के लिए, विशेष रूप से ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि की नाबालिग लड़कियों के लिए, यह निर्णय रेखांकित करता है कि कठोर प्रमाण के अभाव में आपराधिक मामला विफल हो जाने पर भी, वे मुआवज़े के ज़रिए सहायता और पुनर्वास प्राप्त कर सकती हैं।

किशोर अभियुक्तों और उनके परिवारों के लिए, यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि किशोर न्याय व्यवस्था का उद्देश्य मात्र दंड देने के नाम पर कारावास नहीं, बल्कि सुधार एवं पुनर्समावेशन है। न्यायालयों और किशोर न्याय बोर्डों को सामाजिक जाँच प्रतिवेदन को गंभीरता से पढ़ना चाहिए, बच्चे की पृष्ठभूमि और शिक्षा पर विचार करना चाहिए, और संस्थागतकरण का सहारा केवल अंतिम उपाय के रूप में लेना चाहिए।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या जे.जे. बोर्ड द्वारा याचिकाकर्ता की दुष्कर्म संबंधी दोषसिद्धि और उसकी अपीलीय न्यायालय द्वारा पुष्टि, अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों के आलोक में, पुनरीक्षण में बरकरार रखी जा सकती थी?
    उत्तर: नहीं। उच्च न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोप को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा। पीड़िता के अतिरिक्त कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था, याचिकाकर्ता से अपराध को जोड़ने वाला कोई वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं था, खून से सनी मिट्टी और कपड़ों जैसी महत्त्वपूर्ण सामग्री जब्त नहीं की गई, और डॉक्टर दुष्कर्म की पुष्टि नहीं कर सकीं। दोषसिद्धि और सज़ा रद्द कर दी गई और याचिकाकर्ता को बरी कर दिया गया।
  • प्रश्न: क्या, किशोर को बरी करने के बावजूद, न्यायालय कथित यौन अपराध की पीड़िता के लिए मुआवज़े का आदेश दे सकता है और देना चाहिए था?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357A और बिहार पीड़ित प्रतिकर योजना, 2014 के तहत, पीड़ितों को दोषसिद्धि, बरी या आरोपमुक्ति – किसी भी परिणति से परे – मुआवज़े का अधिकार है। पुनरीक्षण न्यायालय उपयुक्त स्थिति में मुआवज़ा अनुशंसित करने के लिए बाध्य है। अतः न्यायालय ने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़िता को मुआवज़ा देने का निर्देश दिया।
  • प्रश्न: क्या किशोर न्याय बोर्डों और चिल्ड्रेन कोर्टों पर, उनकी कार्यवाहियों में, दंड प्रक्रिया संहिता की पीड़ित मुआवज़े संबंधी धाराओं को लागू करना बाध्यकारी है?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि किशोर न्याय अधिनियम में पीड़ित मुआवज़े के लिए पृथक प्रावधान नहीं हैं, अतः दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 और 357A तथा राज्य की प्रतिकर योजनाएँ, किशोर न्याय बोर्डों और चिल्ड्रेन कोर्टों की कार्यवाहियों पर समान रूप से लागू होती हैं। वे पीड़ितों को मुआवज़ा देने के लिए उपयुक्त आदेश पारित करने के दायित्व से बँधे हैं।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • न्यायालय ने पुनरीक्षणाधिकार और किशोर न्याय से संबंधित कई नज़ीरों का उल्लेख किया, जिनमें शामिल हैं:
    • Akalu Ahir and Others v. Ramdeo Ram, (1973) 2 SCC 583
    • K. Chinnaswami Reddy v. State of A.P., 1962 SCC Online SC 32
    • Duli Chand v. Delhi Administration, (1975) 4 SCC 649
    • Janta Dal v. H.S. Chowdhary & Others, (1992) 4 SCC 305
    • Vimal Singh v. Khuman Singh & Another, (1998) 7 SCC 323
    • State of Kerala v. Puttumana I. J. Namboodiri, (1999) 2 SCC 452
    • Jagannath Chaudhary v. Ramayan Singh, (2002) 5 SCC 659
    • Bindeshwari Prasad Singh @ B.P. Singh & Others v. State of Bihar (Now Jharkhand) & Another, (2002) 6 SCC 650
    • Manju Ram Kalita v. State of Assam, (2009) 13 SCC 330
    • Amit Kapoor v. Ramesh Chander, (2012) 9 SCC 460
    • Ganesha v. Sharanappa & Another, (2014) 1 SCC 87
    • Shlok Bhardwaj v. Runika Bhardwaj & Others, (2015) 2 SCC 721
    • Sanjaysinh R. Chavan v. D. G. Phalke, (2015) 3 SCC 123
    • Malkeet Singh Gill v. State of Chhattisgarh, (2022) 8 SCC 204
    • Salil Bali v. Union of India and Another, 2013 7 SCC 705
    • Jitendra Singh @ Babloo Singh v. State of U.P., (2013) 11 SCC 193
    • Subramanian Swamy & Others v. Raju, (2014) 8 SCC 390
    • Harendra Rai v. State of Bihar and Others, 2023 (9) SCC 702
    • Sunil Kumar Jha v. State of Bihar, 2024 SCC Online Pat 960

मामले का विवरण

मामला संख्या: आपराधिक पुनरीक्षण सं. 819/2019 (उत्पन्न खानपुर थाना कांड सं. 36/2011)

मामले का शीर्षक: Pandav Kumar बनाम The State of Bihar

उद्धरण: 2025 (3) PLJR 497

न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार

निर्णय की तिथि: 07.07.2025 (CAV; CAV दिनांक 30.06.2025)

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री पंकज कुमार झा, अधिवक्ता
  • अमीकस क्यूरी: सुश्री शशि प्रिया, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: श्री उपेन्द्र कुमार, ए.पी.पी.
  • पीड़िता की ओर से: श्री राजा राम मिश्र, अधिवक्ता

मामले का स्वरूप: किशोर न्याय बोर्ड द्वारा धारा 376 भा.दं.सं. के मामले में पारित दोषसिद्धि और सज़ा की पुष्टि करने वाले अपीलीय निर्णय के विरुद्ध आपराधिक पुनरीक्षण; साथ ही धारा 357A दं.प्र.सं. और बिहार पीड़ित प्रतिकर योजना, 2014 के तहत पीड़ित मुआवज़े पर दिशा-निर्देशों से संबंधित।

निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in Cr. Rev. No. 819 of 2019

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