मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति लगभग 1999 में बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से, सड़क निर्माण विभाग के अधिदेश पर, कनिष्ठ अभियंता के रूप में हुई थी। कुछ याचिकाकर्ता तो इससे पहले ही सेवा में शामिल हो गए थे।
22.07.1998 को, बिहार सरकार, सड़क निर्माण विभाग ने एक संकल्प (स्मारक संख्या 5008 (श)) जारी किया, जिसके द्वारा ए.एम.आई.ई. या समकक्ष डिग्री धारक कनिष्ठ अभियंताओं के लिए कनिष्ठ अभियंता से सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति कोटा को 3% से बढ़ाकर 10% कर दिया गया। इस संकल्प में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि:
(क) 10% कोटा उन कनिष्ठ अभियंताओं को कवर करेगा, जो सेवा में आने से पहले ही ए.एम.आई.ई. या समकक्ष डिग्री रखते थे, और उन लोगों को भी, जिन्होंने सेवा के दौरान यह डिग्री प्राप्त की; और
(ख) वे केवल तभी पात्र होंगे, जब वे कनिष्ठ अभियंता के रूप में पाँच वर्ष की सेवा पूरी कर चुके हों, तथा वर्षवार गणना की गई रिक्तियों की उपलब्धता के अधीन।
1998 के संकल्प की धारा 4 (ङ) में बाद में संशोधन स्मारक संख्या 2475 (श) दिनांक 21.02.2008 के माध्यम से किया गया। संशोधन के द्वारा उन लोगों के बीच किया गया किसी भी प्रकार का भेदभाव समाप्त कर दिया गया, जिन्होंने सेवा में आने से पहले ए.एम.आई.ई. प्राप्त की थी, और जिन्होंने सेवा के दौरान यह डिग्री प्राप्त की। सभी ए.एम.आई.ई. या समकक्ष डिग्री धारक और पाँच वर्ष की सेवा पूरी कर चुके कनिष्ठ अभियंता 10% कोटा के तहत समान रूप से प्रोन्नति के लिए पात्र हो गए।
याचिकाकर्ताओं ने 2005 से 2012 के बीच ए.एम.आई.ई. या समकक्ष डिग्री प्राप्त की। 2011–2012 तक, अनेक याचिकाकर्ताओं ने डिग्री के साथ-साथ आवश्यक पाँच वर्ष की सेवा भी पूरी कर ली थी। उनके अनुसार, इस प्रकार वे 10% कोटा के अंतर्गत सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति के लिए, रिक्तियों की उपलब्धता के अधीन, पात्र हो गए थे।
2012–2013 में, सड़क निर्माण विभाग में कनिष्ठ अभियंताओं और सहायक अभियंताओं के कैडर का द्विभाजन किया गया और कुछ पद ग्रामीण कार्य विभाग को स्थानांतरित कर दिए गए। याचिकाकर्ताओं का कैडर 2012–2013 में ग्रामीण कार्य विभाग को स्थानांतरित हो गया। उस समय ग्रामीण कार्य विभाग में सहायक अभियंता के 909 स्वीकृत पद थे। इनमें से दस प्रतिशत पद ए.एम.आई.ई. कोटा प्रोन्नति के लिए आरक्षित थे। याचिकाकर्ताओं द्वारा प्राप्त सूचना के अनुसार, 2012 में ए.एम.आई.ई. कोटा की 13 रिक्तियाँ और 2013 में 32 रिक्तियाँ उपलब्ध थीं।
हालाँकि, 1998 और 2008 के संकल्पों में विभाग को प्रत्येक वर्ष 10% कोटा की रिक्तियाँ गणना कर उन्हें भरने के लिए बाध्य करने के बावजूद, ग्रामीण कार्य विभाग ने इन प्रोन्नति रिक्तियों की समय पर गणना या पूर्ति नहीं की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय लिया
याचिकाकर्ताओं की मूल शिकायत यह थी कि 10% ए.एम.आई.ई. कोटा के अंतर्गत सहायक अभियंता के पद पर उनकी प्रोन्नति, जो स्मारक संख्या 4739 दिनांक 14.05.2018 के द्वारा दी गई, को केवल उसी अधिसूचना की तिथि से प्रभावी माना गया। उनका तर्क था कि वे विधिसम्मत रूप से उस तिथि से विचार किए जाने के हकदार थे, जब वे पात्र हो गए थे (ए.एम.आई.ई. + पाँच वर्ष की सेवा) और 2012–2013 में रिक्तियाँ विद्यमान थीं।
उन्होंने पटना उच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती खंडपीठ के निर्णय, सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 16049 वर्ष 2016 (अरविंद कुमार एवं अन्य बनाम राज्य बिहार एवं अन्य), दिनांक 15.03.2017, पर प्रमुख रूप से भरोसा किया। उस मामले में सड़क निर्माण विभाग के कनिष्ठ अभियंताओं को इसी 10% ए.एम.आई.ई. कोटा के अंतर्गत प्रोन्नति में समान प्रकार की देरी का सामना करना पड़ा था।
सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 16049 वर्ष 2016 में खंडपीठ ने निर्देश दिया था कि प्रोन्नति की प्रभावी तिथि को प्रत्येक कनिष्ठ अभियंता की पात्रता प्राप्ति की तिथि (उस वर्ष के लिए निर्धारित रिक्तियों के अधीन) के साथ समरूप कर दिया जाए। इस निर्देश को प्रधान सचिव, सड़क निर्माण विभाग द्वारा स्मारक संख्या 11270 (श) दिनांक 07.12.2017 के माध्यम से क्रियान्वित किया गया, और उन याचिकाकर्ताओं के लिए प्रोन्नति की तिथि को 31.12.2008 तक पीछे खिसकाया गया।
वर्तमान मामले के याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि:
– 22.07.1998 और 21.02.2008 के वही संकल्प, उनके कैडर के ग्रामीण कार्य विभाग में स्थानांतरित हो जाने के बाद भी, उनकी प्रोन्नति को शासित करते रहे।
– उनके मामले में विधि संबंधी प्रश्न, सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 16049 वर्ष 2016 के मामले के समान ही है।
– ग्रामीण कार्य विभाग स्वयं सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 16049 वर्ष 2016 में पक्षकार था और अब वह समान लाभ देने से बच नहीं सकता।
उन्होंने यह भी प्रस्तुत किया कि सड़क निर्माण विभाग में समान स्थिति वाले अभियंताओं के लिए प्रोन्नति की तिथि को पीछे ले जाकर लाभ दिया गया है, जबकि उनके मामले में ऐसा करने से राज्य का इनकार, अनुच्छेद 14 तथा वैध अपेक्षा के सिद्धांत का उल्लंघन है। उन्होंने न्यायालय को यह भी सूचित किया कि सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 6773 वर्ष 2010 में, जो ग्रामीण कार्य विभाग के ही एक समान परिस्थिति वाले कनिष्ठ अभियंता से संबंधित था, समन्वय पीठ ने पहले ही पात्रता तिथियों और रिक्तियों की उत्पत्ति के आधार पर पिछली तिथि से प्रोन्नति पर विचार करने का निर्देश दिया था।
दूसरी ओर, राज्य का तर्क था कि:
– सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 16049 वर्ष 2016 में पारित आदेश केवल सड़क निर्माण विभाग तक सीमित था और उसे स्वतः ग्रामीण कार्य विभाग पर लागू नहीं किया जा सकता।
– केवल ए.एम.आई.ई. प्राप्त कर लेना और पाँच वर्ष की सेवा पूरी कर लेना, स्वयं में, पिछली तिथि से प्रोन्नति को उचित नहीं ठहराता। वास्तविक रिक्तियों का होना आवश्यक है।
– राज्य के अनुसार, 2017 तक ग्रामीण कार्य विभाग में ए.एम.आई.ई. कोटा की कोई रिक्ति उपलब्ध ही नहीं थी। वस्तुतः याचिकाकर्ताओं को 2018 में प्रोन्नत किया गया और वही तिथि मान्य मानी जानी चाहिए।
– पिछली तिथि से प्रोन्नति देने का कोई नियम नहीं है और पटना उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णय, जिनमें चंद्र मणि बैठा बनाम राज्य बिहार (सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 1945 वर्ष 2008, जिसकी पुष्टि एल.पी.ए. संख्या 688 वर्ष 2018 में की गई), Union of India vs Manpreet Singh Poonam (Civil Appeal Nos. 517–518 of 2017; (2022) 6 SCC 105), State of Uttaranchal vs Dinesh Kumar Sharma (2007) 1 SCC 683, तथा Bihar State Electricity Board vs Dharamdeo Das (2024 (3) SC PLJR 400; 2024 SCC Online SC 1768), यह स्थापित करते हैं कि:
• वरिष्ठता किसी पद पर वास्तविक प्रोन्नति की तिथि से प्रवाहित होती है, न कि रिक्ति उत्पन्न होने की तिथि से, और
• ऐसी पिछली तिथि से प्रोन्नति नहीं दी जानी चाहिए जिससे कैडर के अन्य सदस्यों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
हस्तक्षेपकर्ता-प्रतिवादी, जो प्रत्यक्ष रूप से नियुक्त सहायक अभियंता हैं और बाद में कार्यपालक अभियंता के पद पर प्रोन्नत हुए, ने अतिरिक्त आधारों पर रिट याचिका का विरोध किया:
– इस मामले के लंबित रहने के दौरान, अभियंता प्रमुख, ग्रामीण कार्य विभाग ने 19.06.2023 के आदेश द्वारा याचिकाकर्ताओं के प्रोन्नति तिथियों को पीछे खिसकाने के लिए किए गए प्रतिवेदन को पहले ही अस्वीकार कर दिया था, जिसे विशिष्ट रूप से चुनौती नहीं दी गई।
– सहायक अभियंताओं की एक अंतिम मेधा/सीनियरिटी सूची अधिसूचित की जा चुकी है और अनेक हस्तक्षेपकर्ताओं को 01.01.2024 से कार्यपालक अभियंता के पद पर प्रोन्नत किया जा चुका है। उनका तर्क था कि अब यदि याचिकाकर्ताओं की प्रोन्नति की तिथियाँ बदली जाती हैं, तो इससे वर्तमान वरिष्ठता और प्रोन्नति संरचना में बाधा उत्पन्न होगी।
न्यायमूर्ति हरीश कुमार ने सावधानीपूर्वक दो अवधारणाओं के मध्य अंतर स्पष्ट किया:
1. किसी कैडर में वरिष्ठता प्रभावी होने की तिथि; और
2. जब रिक्तियाँ उत्पन्न हों, तब नियोक्ता का यह दायित्व कि वह पात्र कर्मचारियों के प्रोन्नति के दावे पर समय से विचार करे।
न्यायालय ने स्वीकार किया कि:
– विधि की स्थिर स्थिति यह है कि सामान्यतः वरिष्ठता किसी विशेष कैडर में प्रविष्टि की तिथि से गिनी जाती है और अन्य कर्मचारियों की वरिष्ठता के साथ छेड़छाड़ करती हुई पिछली तिथि से प्रोन्नति देना अनुमन्य नहीं है।
हालाँकि, न्यायाधीश ने यह माना कि ये सिद्धांत राज्य को यह स्वतंत्रता नहीं देते कि वह प्रोन्नति पर विचार को अनिश्चित काल तक टालता रहे। सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 16049 वर्ष 2016 तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए न्यायालय ने बल देकर कहा:
– प्रोन्नति पर विचार किए जाने का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत प्रदत्त संवैधानिक गारंटी का हिस्सा है।
– प्रोन्नति के लिए विचार निष्पक्ष एवं समयबद्ध होना चाहिए। नियोक्ता यह नहीं कर सकता कि वह जब चाहें तब, अपने मनमुताबिक, रिक्तियों के उत्पन्न होने और कर्मचारियों के पात्र हो जाने के बाद भी प्रोन्नति पर विचार को टाले।
– एक कल्याणकारी राज्य को “आदर्श नियोक्ता” के रूप में कार्य करना चाहिए और उसके अधिकारी प्रोन्नति की प्रक्रिया में देरी या मनमानी अस्वीकृति के लिए जवाबदेह हैं।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि 1998 और 2008 के संकल्पों ने:
– स्पष्ट रूप से ए.एम.आई.ई./समकक्ष योग्यताधारी और पाँच वर्ष की सेवा पूरी कर चुके कनिष्ठ अभियंताओं के लिए 10% कोटा निर्मित किया।
– यह बाध्यता डाली कि इस कोटा की रिक्तियाँ प्रत्येक कैलेंडर वर्ष में गणना की जाएँ।
ये संकल्प अब भी लागू क्षेत्रीय नियम हैं। ग्रामीण कार्य विभाग इनसे आँख नहीं मूँद सकता था और न ही वह सभी ए.एम.आई.ई.-योग्य कनिष्ठ अभियंताओं को, यह देखे बिना कि कौन कब पात्र हुआ और रिक्तियाँ कब उपलब्ध हुईं, एक समरूप समूह की तरह ले सकता था। जैसा कि पहले सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 16049 वर्ष 2016 में माना गया था, ऐसा करना असमानों को समान रूप से बरतने के समान होगा।
न्यायमूर्ति हरीश कुमार ने निरपेक्षता-विरोध तथा वैध अपेक्षा के संवैधानिक सिद्धांतों का सहारा लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय के निम्नलिखित प्रमुख निर्णयों पर भरोसा किया:
– E.P. Royappa vs State of Tamil Nadu (AIR 1974 SC 555),
– Maneka Gandhi vs Union of India (AIR 1978 SC 597),
– Kumari Shrilekha Vidyarthi vs State of Uttar Pradesh (AIR 1991 SC 537),
– Haji T.M. Hassan Rawther vs Kerala Financial Corporation (AIR 1988 SC 157),
– State of Andhra Pradesh vs Nalla Raja Reddy (AIR 1967 SC 1458),
– State of Jharkhand vs Brahmputra Metallics Ltd. ((2023) 10 SCC 634), तथा
– Shivnandan C.T. vs High Court of Kerala ((2024) 3 SCC 799)।
इन निर्णयों में पुनः स्थापित किया गया है कि:
– राज्य की कार्यवाही निष्पक्ष, गैर-मनमानी और प्रासंगिक सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए।
– सार्वजनिक प्राधिकारी अपनी स्थापित नीतियों, व्यवहारों और वादों का पालन करने के लिए बाध्य हैं, जब तक कि उनसे हटने का कोई ठोस कारण न हो।
– जब कर्मचारी सेवा में इस भरोसे के साथ शामिल होते हैं कि विद्यमान प्रोन्नति नियम और संकल्प लागू रहेंगे, तो उनके पक्ष में वैध अपेक्षा जन्म लेती है।
न्यायालय ने बिहार राज्य वाद नीति, 2011, विशेष रूप से धारा 4(ग)(i) की ओर भी संकेत किया, जो यह अधिदेश देती है कि एक बार किसी मुद्दे का न्यायालय द्वारा निपटारा हो जाए और उसका लाभ कुछ कर्मचारियों को दे दिया जाए, तो समान स्थिति वाले अन्य कर्मचारियों को भी, उन्हें अलग-अलग मुकदमेबाजी के लिए मजबूर किए बिना, वही लाभ दिया जाना चाहिए।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायालय ने पाया:
– याचिकाकर्ताओं की स्थिति, सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 16049 वर्ष 2016 के याचिकाकर्ताओं के समान ही है।
– यह दलील कि पूर्व आदेश केवल सड़क निर्माण विभाग तक सीमित था और ग्रामीण कार्य विभाग पर लागू नहीं होता, विधि और तथ्य दोनों की दृष्टि से “पूरी तरह अस्थिर” है और इसे स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया गया।
महत्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसके समक्ष मुद्दा सीमित था: वह याचिकाकर्ताओं और अन्य कर्मचारियों के बीच आपसी वरिष्ठता का निर्णय नहीं कर रहा था और न ही किसी की वरिष्ठता को पिछली तिथि से स्थिर कर रहा था। न्यायालय केवल इतना निर्देश दे रहा था कि 10% ए.एम.आई.ई. कोटा के अंतर्गत, प्रचलित संकल्पों के अनुसार, याचिकाकर्ताओं के प्रोन्नति दावों पर उस तिथि से समयबद्ध और निष्पक्ष विचार किया जाए जब वे पात्र हो गए थे और जब रिक्तियाँ उपलब्ध थीं।
अंततः, न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता, सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 16049 वर्ष 2016 के मामले में दिए गए समान राहत के हकदार हैं। इसने प्रतिवादी संख्या 2 और 3 (ग्रामीण कार्य विभाग के सचिव और अतिरिक्त सचिव) को निम्न निर्देश देते हुए परिपत्र (मैंडेमस) जारी किया:
– प्रत्येक याचिकाकर्ता के 10% ए.एम.आई.ई. कोटा के अंतर्गत सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति के दावे पर विचार करें;
– उस तिथि से, जिस तिथि पर प्रत्येक याचिकाकर्ता को संकल्प दिनांक 22.07.1998 तथा उसके संशोधन स्मारक संख्या 2475 दिनांक 21.02.2008 की शर्तों के अनुसार प्रोन्नति के लिए उपयुक्त पाया गया हो;
– संबंधित वर्षों में रिक्तियों की उपलब्धता के अधीन; तथा
– न्यायालय के आदेश की प्राप्ति/उत्पादन की तिथि से चार माह के भीतर यह पूरा अभ्यास संपन्न करें।
रिट याचिका स्वीकार कर ली गई और सभी लंबित प्रार्थना-पत्रों का निपटारा कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय, विशेष रूप से उन कनिष्ठ अभियंताओं के लिए, जिन्होंने सेवा के दौरान अपनी योग्यता ए.एम.आई.ई. या समकक्ष डिग्री तक उन्नत की है, बिहार में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इससे यह स्पष्ट हो गया है कि:
– विभाग अधिसूचित प्रोन्नति नीतियों और कोटा संबंधी संकल्पों को न तो नज़रअंदाज़ कर सकते हैं और न ही उनके अनुप्रयोग में देरी कर सकते हैं।
– एक बार पटना उच्च न्यायालय किसी मुद्दे का निपटारा कर दे और राज्य सरकार उसे एक विभाग में लागू कर दे, तो उसी राज्य के अंतर्गत अन्य विभाग, समान रूप से स्थित कर्मचारियों को समान व्यवहार देने से इनकार नहीं कर सकते।
– कर्मचारियों को उस समय से, जब वे पात्र हो जाते हैं और रिक्तियाँ उपलब्ध हो जाती हैं, प्रोन्नति के लिए समयबद्ध विचार का अधिकार है, भले ही वरिष्ठता अंततः वास्तविक प्रोन्नति की तिथि से गिनी जाए।
बिहार के सरकारी कर्मचारियों के लिए यह निर्णय वैध अपेक्षा की रक्षा और राज्य पर एक निष्पक्ष एवं आदर्श नियोक्ता के रूप में कार्य करने के दायित्व को सुदृढ़ करता है। यह यह भी दर्शाता है कि बिहार राज्य वाद नीति, 2011 केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि समान व्यवहार की माँग करने के लिए, बार-बार मुकदमेबाजी से बचते हुए, एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में प्रयुक्त की जा सकती है।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
-
प्रश्न: क्या ग्रामीण कार्य विभाग के वे कनिष्ठ अभियंता, जिनके पास ए.एम.आई.ई. या समकक्ष योग्यता है और जिन्होंने पाँच वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, 10% कोटा के अंतर्गत सहायक अभियंता के पद पर अपनी प्रोन्नति के लिए उस तिथि से विचार किए जाने के हकदार हैं, जब वे पात्र हो गए और रिक्तियाँ उत्पन्न हुईं, न कि केवल 2018 की अधिसूचना की तिथि से?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि 1998 और 2008 के संकल्पों तथा सी.डब्ल्यू.जेे.सी. संख्या 16049 वर्ष 2016 के खंडपीठ निर्णय को लागू करते हुए, याचिकाकर्ताओं पर उनकी पात्रता प्राप्ति की तिथि से, वर्षवार रिक्तियों की उपलब्धता के अधीन, प्रोन्नति के लिए विचार किया जाना आवश्यक है, और अधिकारियों को चार माह के भीतर यह कार्य पूरा करने का निर्देश दिया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- CWJC No. 16049 of 2016, Arwind Kumar and Others vs The State of Bihar and Others (Patna High Court).
- CWJC No. 4547 of 2018 (Patna High Court) – referred in context of related challenge.
- CWJC No. 6773 of 2010 (Patna High Court) – involving a similarly situated Rural Works Department engineer.
- CWJC No. 1945 of 2008, Chandra Mani Baitha vs The State of Bihar (Patna High Court), affirmed in LPA No. 688 of 2018.
- Union of India vs Manpreet Singh Poonam, Civil Appeal Nos. 517–518 of 2017; (2022) 6 SCC 105.
- State of Uttaranchal vs Dinesh Kumar Sharma, (2007) 1 SCC 683.
- Bihar State Electricity Board vs Dharamdeo Das, 2024 (3) SC PLJR 400; 2024 SCC Online SC 1768.
- E.P. Royappa vs State of Tamil Nadu, AIR 1974 SC 555.
- Maneka Gandhi vs Union of India, AIR 1978 SC 597.
- Kumari Shrilekha Vidyarthi vs State of Uttar Pradesh, AIR 1991 SC 537.
- Haji T.M. Hassan Rawther vs Kerala Financial Corporation, AIR 1988 SC 157.
- State of Andhra Pradesh vs Nalla Raja Reddy, AIR 1967 SC 1458.
- C.O. Arumugam and Others vs The State of Tamil Nadu and Others, (1991) Supp (2) SCC 199.
- State of Jharkhand vs Brahmputra Metallics Ltd., (2023) 10 SCC 634.
- Shivnandan C.T. vs High Court of Kerala, (2024) 3 SCC 799.
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 2971 of 2020
मामला शीर्षक: Sameer Kumar Singh & Others vs The State of Bihar & Others
उद्धरण: 2025 (2) PLJR 434
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Harish Kumar
निर्णय की तिथि: 18-03-2025
अधिवक्ता:
याचिकाकर्ताओं की ओर से: Mr. Y.V. Giri, Senior Advocate; Mr. Rakesh Mohan Singh, Advocate; Mr. Rajni Kant Singh, Advocate.
राज्य की ओर से: Mr. Prem Ranjan Raj, Advocate.
हस्तक्षेपकर्ता-प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Lalit Kishore, Senior Advocate; Mr. Prabhu Nath Pathak, Advocate.
मामले की प्रकृति: 10% ए.एम.आई.ई. कोटा के अंतर्गत सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति की तिथि के संबंध में परिपत्र (मैंडेमस) की माँग के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत दायर रिट याचिका (सिविल)।
निर्णय का आधिकारिक लिंक: Patna High Court की वेबसाइट पर पूर्ण निर्णय देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानने के इच्छुक हों कि
बिहार में विधिक विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं,
तो आप आगे की अद्यतनों के लिए Samvida Law Associates को फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।


