मामले की पृष्ठभूमि
विवाद इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS), शेखपुरा, पटना में एक बड़े निर्माण परियोजना से उत्पन्न हुआ। IGIMS ने अपने परिसर में 500 बिस्तरों वाले अस्पताल भवन के निर्माण के लिए निविदा आमंत्रण सूचना जारी की।
याचिकाकर्ता, जो एक संयुक्त उपक्रम निर्माण कंपनी थी, ने स्वयं को पात्र पाया और अपनी बोली दायर की। टेंडर प्रक्रिया के भाग के रूप में, बोलीदाताओं को निर्धारित प्रारूप में एक शपथपत्र दाखिल करना था। इस शपथपत्र में, उन्हें स्पष्ट रूप से यह बताना था कि क्या उनकी फर्म को भारत में किसी भी सरकारी विभाग में कभी ब्लैकलिस्ट, डिबार किया गया है, या किसी कार्य को छोड़ दिया गया है, या क्या ऐसे किसी अनुबंध को समाप्त (रेसिशन) किया गया है।
याचिकाकर्ता ने यह शपथपत्र 05.04.2018 को दाखिल किया, जिसमें यह घोषणा की कि उसे कभी ब्लैकलिस्ट या डिबार नहीं किया गया और उसने भारत में कोई भी सरकारी कार्य नहीं छोड़ा है।
तकनीकी बोलियों के खुलने के बाद, केवल दो बोलीदाता, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल था, तकनीकी रूप से योग्य पाए गए। इक्कीस दिन बाद, 22.05.2018 को, वित्तीय बोलियां खोली गईं। IGIMS ने याचिकाकर्ता को सूचित किया कि उसकी बोली सबसे कम (L-1) है। टेंडर समिति ने याचिकाकर्ता को उसके उद्धृत दरों को उचित ठहराने के लिए बुलाया।
याचिकाकर्ता ने विस्तृत दर विश्लेषण प्रस्तुत किया। 23.05.2018 को एक बातचीत बैठक आयोजित की गई। इसके बाद, 24.05.2018 को, याचिकाकर्ता ने IGIMS को पत्र लिखकर अपनी उद्धृत कीमत पर 55 लाख रुपये की समग्र (लंप सम) छूट देने की पेशकश की।
इसी चरण पर, ईमेल के माध्यम से IGIMS को एक शिकायत प्राप्त हुई। शिकायत में कहा गया कि झारखंड सरकार के सड़क निर्माण विभाग ने याचिकाकर्ता को एक विशेष सड़क कार्य के पूरा होने तक उस विभाग की किसी भी आगे की निविदा में भाग लेने से डिबार कर दिया है। यह डिबारमेंट आदेश 28.02.2018 का था।
IGIMS ने इस शिकायत को गंभीरता से लिया क्योंकि, कुछ ही सप्ताह बाद, 05.04.2018 को, याचिकाकर्ता ने शपथपत्र में भारत के किसी भी सरकारी विभाग द्वारा किसी भी प्रकार के डिबारमेंट से इंकार किया था। इसलिए IGIMS के अधीक्षण अभियंता ने एक पत्र (अनुलग्नक-8 श्रृंखला) जारी कर याचिकाकर्ता से झारखंड सड़क निर्माण विभाग द्वारा किए गए डिबारमेंट के संबंध में स्थिति स्पष्ट करने को कहा।
याचिकाकर्ता ने 28.05.2018 दिनांकित पत्र (अनुलग्नक-9) द्वारा उत्तर दिया। उसने 28.02.2018 दिनांकित झारखंड पत्र के अस्तित्व को स्वीकार किया, लेकिन यह समझाने का प्रयास किया कि यह केवल उस विशेष विभाग की भविष्य की निविदाओं में भाग लेने पर एक प्रतिबंध है, जो चल रहे कार्य के पूरा होने तक था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ऐसे प्रतिबंध को IGIMS के शपथपत्र प्रारूप में प्रयुक्त अर्थ में “ब्लैकलिस्टिंग” या “डिबारमेंट” नहीं माना जा सकता और अन्य प्राधिकारी इसे अपनी निविदाओं से उसे अयोग्य घोषित करने के आधार के रूप में उपयोग नहीं कर सकते।
इस बीच, IGIMS ने महाधिवक्ता से विधिक राय मांगी और मामले को अपने बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के समक्ष रखा। 01.06.2018 को हुई इसकी 100वीं (अत्यावश्यक – विशेष) बैठक में बोर्ड ने परियोजना के लिए पुनः-निविदा (री-टेंडर) करने का निर्णय लिया।
08.06.2018 को, IGIMS ने एक कार्यालय आदेश जारी कर पूर्ववर्ती पुनः-निविदा को रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता L-1 के रूप में उभरा था। शीघ्र ही, 13.06.2018 दिनांकित एक नई पुनः-निविदा सूचना उसी 500 बिस्तरों वाले अस्पताल परियोजना के लिए जारी की गई।
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत पटना उच्च न्यायालय का रुख किया। उसने 08.06.2018 के कार्यालय आदेश को रद्द करने, IGIMS को उसे ही कार्य आवंटित करने के लिए बाध्य करने, और IGIMS को 13.06.2018 की नई पुनः-निविदा के साथ आगे बढ़ने से रोकने की मांग की।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद के माध्यम से, टेंडर की शर्तों, शपथपत्र के प्रारूप, झारखंड डिबारमेंट आदेश और याचिकाकर्ता के आचरण की सावधानीपूर्वक जांच की।
टेंडर आमंत्रण सूचना की धारा 7.6 (J) में बोलीदाताओं से निर्धारित प्रारूप में शपथपत्र देने की अपेक्षा की गई थी। इस धारा में कहा गया था कि शपथपत्र 1000 रुपये के नॉन-ज्यूडिशियल स्टांप पर प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के समक्ष होना चाहिए, “regarding black listed, debar or rescined of their work on the format annex with the Bid.”
न्यायालय ने शपथपत्र के सटीक प्रारूप को उद्धृत किया। इसका मुख्य भाग पैराग्राफ 2 था, जिसमें बोलीदाता को यह प्रमाणित करना था कि उसकी फर्म को न तो कभी ब्लैकलिस्ट/डिबार किया गया है और न ही उसने “in any government department, India” किसी भी कार्य को छोड़ा है, तथा ऐसे किसी भी कार्य के कोई अनुबंध आज तक रद्द (rescinded) नहीं किए गए हैं।
वास्तविक तथ्यों पर न्यायालय ने पाया कि झारखंड सरकार के सड़क निर्माण विभाग ने पहले ही 28.02.2018 को अपना आदेश जारी कर दिया था। उस आदेश द्वारा याचिकाकर्ता कंपनी को उस विभाग की नई निविदाओं में भाग लेने से तब तक डिबार कर दिया गया था, जब तक वह निर्दिष्ट सड़क कार्य को पूरा कर completion certificate प्राप्त नहीं कर लेती। तब तक याचिकाकर्ता को उस विभाग की निविदाओं के लिए अयोग्य या अनुपयुक्त माना जाना था।
इसका अर्थ यह था कि 05.04.2018 को, जब याचिकाकर्ता ने IGIMS के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष अपना शपथपत्र दिया, तब झारखंड का डिबारमेंट आदेश पूरी तरह प्रभावी था। इसके बावजूद, शपथपत्र में यह घोषित किया गया कि कंपनी को भारत के किसी भी सरकारी विभाग में कभी ब्लैकलिस्ट या डिबार नहीं किया गया है।
उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता का मुख्य बचाव दो भागों में था।
पहला, उसका तर्क था कि 28.02.2018 की झारखंड चिट्ठी वास्तव में विधिक अर्थ में डिबारमेंट या ब्लैकलिस्टिंग आदेश नहीं है, बल्कि केवल उस विशेष विभाग से संबंधित एक सीमित प्रतिबंध है। इसलिए, उसका कहना था कि उसने शपथपत्र में सही बयान दिया था।
दूसरा, उसका तर्क था कि IGIMS द्वारा प्रयुक्त शपथपत्र प्रारूप में “Government Department, India” शब्दावली का प्रयोग हुआ है, जिसे याचिकाकर्ता के अनुसार “Department of Government of India” (भारत संघ के विभाग) के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, न कि राज्य सरकार के विभागों के रूप में। इस व्याख्या के आधार पर, उसने कहा कि उसे झारखंड आदेश का खुलासा करने का दायित्व नहीं था।
याचिकाकर्ता ने झारखंड में बाद की प्रगति पर भी भरोसा किया। उसने यह इंगित किया कि झारखंड उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने W.P. (C) No. 2701 of 2018 में 07.06.2018 और 08.06.2018 के आदेशों द्वारा यह कहा था कि 28.02.2018 का आदेश केवल झारखंड के सड़क निर्माण विभाग पर लागू होगा। बाद में, एक खंडपीठ ने L.P.A. No. 312 of 2018 में 25.06.2018 के निर्णय द्वारा 28.02.2018 की उसी चिट्ठी को रद्द कर दिया और झारखंड राज्य पर लागत (कॉस्ट) भी लगाई। इस आधार पर, याचिकाकर्ता का कहना था कि IGIMS ने गलत तरीके से टेंडर रद्द कर दिया।
प्रतिवादियों (IGIMS और उसके अभियंता) ने उत्तर दिया कि टेंडर शर्तों में यह अपेक्षा की गई थी कि किसी भी सरकारी विभाग में हुई किसी भी ब्लैकलिस्टिंग या डिबारमेंट का संपूर्ण और स्पष्ट खुलासा किया जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि “any government department, India” शब्द बहुत व्यापक हैं और स्पष्ट रूप से राज्य सरकार के विभागों को भी समाहित करते हैं।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने 28.05.2018 की अपनी लिखित स्पष्टीकरण पत्र में कहीं भी यह नहीं कहा कि वह शपथपत्र के शब्दों से भ्रमित था। इसके विपरीत, उसने केवल यह तर्क देने की कोशिश की कि झारखंड आदेश “Registering Authority” द्वारा की गई ब्लैकलिस्टिंग नहीं है और अन्य विभाग इसे आधार बनाकर उसका उपयोग नहीं कर सकते। इससे यह स्पष्ट हुआ कि याचिकाकर्ता प्रश्न को ठीक से समझता था, लेकिन उसने डिबारमेंट तथ्य को छिपाने का विकल्प चुना।
इसी आधार पर, IGIMS ने यह तर्क दिया कि शपथपत्र दाखिल करते समय याचिकाकर्ता ने एक महत्वपूर्ण तथ्य को दबा दिया था। जब यह दमन सामने आया और मैदान में केवल दो बोलीदाता रह गए, तो बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के पास टेंडर को रद्द कर पुनः-निविदा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था; अन्यथा यह स्थिति एकल बोलीदाता (single-bidder) की बन जाती।
प्रतिवादियों ने टेंडर मामलों में न्यायिक समीक्षा के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित न्यायनिधानों पर भी भरोसा किया। उन्होंने Air India Limited vs. Cochin International Airport Ltd. (2000) 2 SCC 617, Raunaq International Ltd. vs. IVR Construction Ltd. (1999) 1 SCC 492, Jagdish Mandal vs. State of Orissa (2007) 14 SCC 517 (जिसे निर्णय में (2001) 2 SCC 451 के रूप में उद्धृत किया गया), Michigan Rubber (India) Ltd. vs. State of Karnataka (2012) 8 SCC 216, और Siemens Public Communication Networks (P) Ltd. vs. Union of India (2008) 16 SCC 215 जैसे निर्णयों का हवाला दिया। इन मामलों में यह प्रतिपादित है कि न्यायालयों को टेंडर निर्णयों में केवल तभी दखल देना चाहिए जब वहां मनमानी, दुर्भावना या सार्वजनिक हित का उल्लंघन हो, न कि केवल इसलिए कि कोई बोलीदाता कानूनी तर्क उठाता है।
शपथपत्र और झारखंड आदेश का विश्लेषण करने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की व्याख्या को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने माना कि “any work in any Government Department, India” वाक्यांश स्पष्ट रूप से भारत के किसी भी सरकार के किसी भी विभाग को, केवल संघ सरकार को नहीं, अपने दायरे में शामिल करता है। इसमें कोई अस्पष्टता नहीं थी। यदि याचिकाकर्ता को कोई संदेह होता, तो वह 26.03.2018 को आयोजित प्री-बिड बैठक में स्पष्टीकरण मांग सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि अपने स्पष्टीकरण पत्र (अनुलग्नक-9) में याचिकाकर्ता ने कभी यह दावा नहीं किया कि उसने शपथपत्र के शब्दों को गलत समझा था। उसने केवल यह दिखाने की कोशिश की कि झारखंड आदेश औपचारिक ब्लैकलिस्टिंग नहीं है। इस प्रकार, भ्रम की दलील पहली बार पटना उच्च न्यायालय में मौखिक बहस के दौरान उठाई गई, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि जब याचिकाकर्ता की ओर से शपथदाता ने 05.04.2018 को शपथपत्र दिया, तो उसने जानबूझकर प्रचलित डिबारमेंट आदेश का खुलासा नहीं किया। यह गैर-प्रकटीकरण गंभीर मामला था क्योंकि शपथपत्र का मूल उद्देश्य ही IGIMS को बोलीदाता की पात्रता और विश्वसनीयता का आकलन करने देना था।
जहां तक झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा बाद में झारखंड डिबारमेंट आदेश के रद्द किए जाने का प्रश्न है, पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि यह बाद की घटना याचिकाकर्ता के शपथपत्र में हुई खामी को ठीक नहीं कर सकती या IGIMS के निर्णय को अमान्य नहीं कर सकती। शपथपत्र की तारीख को, और 01.06.2018 को जब बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने पुनः-निविदा का निर्णय लिया, उस समय डिबारमेंट आदेश प्रभावी था। कानून के अनुसार, निर्णय-निर्माण प्रक्रिया का मूल्यांकन उन्हीं तथ्यों के आधार पर किया जाता है जो उस समय विद्यमान हों, न कि बाद की घटनाओं के आधार पर।
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववृत्तों को लागू करते हुए, न्यायालय ने माना कि IGIMS का टेंडर रद्द कर पुनः-निविदा करने का निर्णय bona fide, सार्वजनिक हित में और टेंडर शर्तों के अनुरूप था। यह निर्णय प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने और ऐसे L-1 बोलीदाता के साथ आगे न बढ़ने के उद्देश्य से लिया गया था, जिसने किसी अन्य सरकारी विभाग द्वारा की गई डिबारमेंट के बारे में सच्चा खुलासा नहीं किया था।
अतः न्यायालय ने निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में कोई मनमानी, दुर्भावना या गैरकानूनीपन नहीं पाया। उसने माना कि केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ता डिबारमेंट के अर्थ या झारखंड आदेश के बाद में रद्द होने के बारे में कानूनी तर्क दे सकता है, अनुच्छेद 226 के तहत दखल देने का औचित्य नहीं बनता।
परिणामस्वरूप, रिट याचिका खारिज कर दी गई। अंतरिम आदेशों को समाप्त करने के लिए दायर संबद्ध अंतरिम आवेदन (I.A. No. 01 of 2019) को निष्प्रभावित (infructuous) माना गया।
समापन से पहले, न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उसने दर्ज किया कि इस वाद के कारण 500 बिस्तरों वाले अस्पताल का निर्माण पहले ही विलंबित हो चुका है। न्यायालय ने जोर दिया कि व्यापक सार्वजनिक हित की मांग है कि अस्पताल का निर्माण तुरंत प्रारंभ हो। उसने ऐसे अनुबंधों के इच्छुक व्यावसायिक संस्थाओं से अपील की कि वे अनावश्यक वाद-विवाद से बचें, जो अहम सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना में देरी का कारण बनता है, विशेषकर उन गंभीर रोगियों के लिए जो समय पर चिकित्सा सुविधा पर निर्भर हैं। न्यायालय ने यह याद दिलाया कि हर व्यावसायिक संस्था की कुछ सामाजिक जिम्मेदारियां भी होती हैं जिन्हें उसे निभाना चाहिए।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय ठेकेदारों और सार्वजनिक कार्यों में शामिल सरकारी निकायों, विशेषकर बिहार और झारखंड के लिए व्यावहारिक महत्व रखता है।
पहला, यह स्पष्ट करता है कि जब किसी निविदा में “in any government department, India” ब्लैकलिस्टिंग या डिबारमेंट के खुलासे की मांग की जाती है, तो बोलीदाताओं को केंद्र या राज्य, किसी भी सरकार के किसी भी विभाग द्वारा की गई सभी ऐसी कार्रवाइयों का खुलासा करना होगा। बाद में संकीर्ण या तकनीकी व्याख्याओं को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
दूसरा, यह दिखाता है कि डिबारमेंट का गैर-प्रकटीकरण या दमन, भले ही उसे बाद में किसी अन्य न्यायालय द्वारा रद्द कर दिया जाए, टेंडर निरस्तीकरण को उचित ठहरा सकता है। मुख्य प्रश्न यह है कि शपथपत्र देते समय और प्राधिकरण द्वारा निर्णय लेते समय वास्तविक तथ्य क्या थे, न कि बाद में क्या हुआ।
तीसरा, पटना उच्च न्यायालय ने दृढ़तापूर्वक पुनः प्रतिपादित किया कि टेंडर मामलों में न्यायिक समीक्षा सीमित है। न्यायालय निजी बोलीदाता के हितों की रक्षा सार्वजनिक हित की कीमत पर नहीं करेगा, विशेषकर जब बड़े अस्पताल जैसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक परियोजना दांव पर हो।
अंत में, यह निर्णय यह संदेश देता है कि टेंडर संबंधी वाद-विवाद से आवश्यक सार्वजनिक परियोजनाओं में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। ठेकेदारों को यह याद दिलाया गया है कि सार्वजनिक अवसंरचना कार्यों में भाग लेते समय उन पर भी सामाजिक उत्तरदायित्व का भार होता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या IGIMS इस आधार पर टेंडर रद्द कर पुनः-निविदा के लिए जाने में न्यायसंगत था कि सबसे कम बोलीदाता ने एक अन्य सरकारी विभाग द्वारा की गई डिबारमेंट के बावजूद अपने शपथपत्र में किसी भी डिबारमेंट से इंकार किया था?
उत्तर: हां। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि शपथपत्र का प्रारूप भारत के किसी भी सरकारी विभाग में की गई किसी भी डिबारमेंट के खुलासे की स्पष्ट मांग करता था। याचिकाकर्ता ने प्रचलित झारखंड डिबारमेंट आदेश को दबा दिया था। इन परिस्थितियों में, और टेंडर मामलों में सीमित न्यायिक समीक्षा संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए, IGIMS का टेंडर रद्द कर पुनः-निविदा करने का निर्णय विधिसम्मत और सार्वजनिक हित में था। - प्रश्न: झारखंड सड़क निर्माण विभाग के डिबारमेंट आदेश को बाद में झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा रद्द किए जाने का, IGIMS द्वारा पहले लिए गए टेंडर निरस्तीकरण निर्णय की वैधता पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: कोई नहीं। न्यायालय ने माना कि निर्णय-निर्माण प्रक्रिया का मूल्यांकन उन तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए जो उस समय विद्यमान थे जब शपथपत्र दिया गया और जब बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने पुनः-निविदा का निर्णय लिया। उन दोनों तारीखों पर झारखंड डिबारमेंट आदेश प्रभावी था। उसका बाद में रद्द होना IGIMS के पूर्ववर्ती निर्णय को अवैध नहीं बनाता। - प्रश्न: क्या उच्च न्यायालय को इस मामले में अनुच्छेद 226 के तहत अपनी रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर टेंडर प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना चाहिए था?
उत्तर: नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववृत्तों पर भरोसा करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने माना कि न्यायालयों को टेंडर निर्णयों में केवल मनमानी, दुर्भावना या सार्वजनिक हित के उल्लंघन को रोकने के लिए ही हस्तक्षेप करना चाहिए। यहां निर्णय bona fide था और सार्वजनिक हित को आगे बढ़ाने वाला था, विशेषकर 500 बिस्तरों वाले अस्पताल के त्वरित निर्माण की आवश्यकता को देखते हुए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रकरण
- Raunaq International Ltd. vs. IVR Construction Ltd. and Others, (1999) 1 SCC 492
- Jagdish Mandal and Another vs. State of Orissa & Others, (2007) 14 SCC 517 (निर्णय में (2001) 2 SCC 451 के रूप में संदर्भित)
- Air India Limited vs. Cochin International Airport Ltd. & Others, (2000) 2 SCC 617
- Siemens Public Communication Networks (P) Ltd. vs. Union of India, (2008) 16 SCC 215
- Michigan Rubber (India) Ltd. vs. State of Karnataka & Others, (2012) 8 SCC 216 (Jharkhand High Court के निर्णय Chhatisgarh Distilleries Ltd. vs. State of Jharkhand & Others, W.P. (C) No. 5056 of 2014 के माध्यम से)
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 12330 of 2018
मामला शीर्षक: M/s N P C C – P S K – J V vs. The Indira Gandhi Institute of Medical Science & Anr.
कोरम: Hon’ble Mr. Justice Rajeev Ranjan Prasad
उद्धरण: 2019 (3) PLJR 69
निर्णय की तारीख: 14.03.2019
CAV तारीख: 08.03.2019
याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. P. K. Shahi, Senior Advocate; Mr. Vikas Kumar, Advocate
प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Sunil Kumar Singh, Advocate
मामले का स्वरूप: अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका, जिसमें IGIMS, पटना में 500 बिस्तरों वाले अस्पताल भवन के निर्माण हेतु टेंडर निरस्तीकरण और नई पुनः-निविदा सूचना जारी किए जाने को चुनौती दी गई।
निर्णय की लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
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