अमान्य डिप्लोमा के आधार पर शिक्षक सेवा समाप्ति बरकरार — पटना उच्च न्यायालय, 2024

यह मामला मुज़फ्फरपुर के चार प्रखण्ड शारीरिक शिक्षक (Block Physical Teachers) की सेवा समाप्ति को चुनौती देने से संबंधित था। उनका दावा था कि उनकी शारीरिक शिक्षा की प्रमाण–पत्र वैध हैं और उनकी बर्खास्तगी अवैध है। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि उनके प्रमाण–पत्र बिहार में मान्यता–प्राप्त संस्था से नहीं थे। न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी, जिसके परिणामस्वरूप सेवा समाप्ति के आदेश यथावत बने रहे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 2008 में शिक्षा विभाग के तहत प्रखण्ड शारीरिक शिक्षक तथा अन्य पदों के लिए जारी विज्ञापन के आधार पर की गई नियुक्तियों से उत्पन्न हुआ। विज्ञापन में अभ्यर्थियों के पास शारीरिक शिक्षा में प्रमाण–पत्र (C.P.Ed.) होना अनिवार्य बताया गया था।

याचिकाकर्ताओं ने अपनी शारीरिक शिक्षा की अर्हता Nav Bharat Shiksha Parishad (NSP), Orissa (India) से प्राप्त की थी। इन प्रमाण–पत्रों पर भरोसा करते हुए उन्होंने प्रखण्ड शारीरिक शिक्षक के पद के लिए आवेदन किया और चयनित हुए। उनकी नियुक्ति वर्ष 2010 में हुई और उन्हें मुज़फ्फरपुर ज़िले के सरैया प्रखण्ड के विभिन्न मध्य विद्यालयों में पदस्थापित किया गया।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने अपने कर्तव्यों का संतोषजनक निर्वहन किया और उनके कार्य के संबंध में कोई शिकायत नहीं थी। किंतु वर्ष 2013 में स्थिति बदल गई। प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, सरैया (प्रतिवादी सं. 6) ने 05.09.2013 की तिथि वाला ज्ञापन सं. 471 जारी किया, जिसके द्वारा याचिकाकर्ताओं की सेवाएँ प्रखण्ड शिक्षक के रूप में समाप्त कर दी गईं।

सेवा समाप्ति के आदेश में शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव (प्रतिवादी सं. 2) द्वारा उन अन्य अभ्यर्थियों के संबंध में पारित अस्वीकृति आदेश का उल्लेख था, जिन्होंने भी Nav Bharat Shiksha Parishad, Orissa से प्राप्त अर्हता का दावा किया था। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उनकी सेवाएँ बिना पूर्व सूचना या व्यक्तिगत सुनवाई के समाप्त कर दी गईं।

इसके पश्चात याचिकाकर्ता ज़िला शिक्षक नियोजन अपील प्राधिकरण, मुज़फ्फरपुर (प्रतिवादी सं. 5) के समक्ष गए। दिनांक 13.12.2013 के आदेश, ज्ञापन सं. 151/2012, द्वारा प्राधिकरण ने उनकी अपील खारिज करते हुए सेवा समाप्ति के आदेशों को बरकरार रखा।

असंतुष्ट होकर, याचिकाकर्ताओं ने पटना उच्च न्यायालय में CWJC No.7365 of 2014 दायर किया। न्यायालय ने उन्हें निर्देश दिया कि वे 30 दिनों के भीतर राज्य अपीलीय प्राधिकरण, पटना (प्रतिवादी सं. 9) के समक्ष जाएँ, तथा यह भी कहा कि अपील का निपटारा वैधानिक अवधि के भीतर किया जाए। याचिकाकर्ताओं ने नियमानुसार अपील दायर की, परंतु राज्य अपीलीय प्राधिकरण ने भी ज़िला अपीलीय प्राधिकरण से सहमति प्रकट करते हुए उनका दावा अस्वीकार कर दिया।

तत्पश्चात याचिकाकर्ताओं ने वर्तमान सिविल रिट अधिकारिता वाद सं. 3281/2020 दायर किया। इसमें उन्होंने राज्य अपीलीय प्राधिकरण के आदेश दिनांक 07.08.2019 (अपील सं. 401/2017) के साथ–साथ 2013 के मूल सेवा समाप्ति आदेशों को रद्द करने तथा सभी मौद्रिक लाभों के साथ पुनर्नियुक्ति की प्रार्थना की।

न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति अंजनी कुमार शरण ने मामले की सुनवाई की और याचिकाकर्ताओं की सेवा समाप्ति तथा ज़िला एवं राज्य अपीलीय प्राधिकरणों द्वारा पारित आदेशों को चुनौती की समीक्षा की।

याचिकाकर्ताओं का मूल तर्क यह था कि Nav Bharat Shiksha Parishad, Orissa द्वारा जारी प्रमाण–पत्र वैध हैं और इन्हें पहले शिक्षा विभाग तथा न्यायालयों द्वारा स्वीकार किया जा चुका है। उनका कहना था कि उनकी सेवा समाप्ति केवल शंका के आधार पर, बिना समुचित जाँच या सूचना के की गई और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

उन्होंने इंगित किया कि 2008 में प्रखण्ड शारीरिक शिक्षक के लिए जारी विज्ञापन में C.P.Ed. अर्हता की माँग की गई थी और उन्होंने यह अर्हता अन्य अभ्यर्थियों से बेहतर अंकों के साथ पूरी की। नियुक्ति के बाद उन्होंने सरैया प्रखण्ड के अंतर्गत विभिन्न विद्यालयों में कार्य किया और उनके कार्य पर कोई संदेह नहीं जताया गया।

उनके अनुसार, प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, सरैया को उन्हें बर्खास्त करने का अधिकार ही नहीं था और उन्होंने केवल शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव द्वारा अन्य कर्मचारियों के संदर्भ में जारी पत्र पर भरोसा किया। यह पत्र ज्ञापन सं. 617 दिनांक 17.05.2013 था, जो CWJC No.14819 of 2012 में उच्च न्यायालय के एक पूर्व आदेश के अनुपालन में जारी किया गया था।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनकी प्रमाण–पत्रों की स्वतंत्र जाँच कराने या कोई अनुशासनिक जाँच करने के बजाय प्राधिकारियों ने यह मान लिया कि उनकी अर्हताएँ जाली या अवैध हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि ज़िला अपीलीय प्राधिकरण, मुज़फ्फरपुर ने एक अन्य मामले में पहले यह माना था कि Nav Bharat Shiksha Parishad द्वारा जारी प्रमाण–पत्र वैध हैं, जैसा कि ज्ञापन सं. 463 दिनांक 26.12.2011 में प्रतिबिंबित है।

याचिकाकर्ताओं ने विभागीय पत्राचार पर भी भरोसा किया। उन्होंने शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव द्वारा Nav Bharat Shiksha Parishad, Orissa के प्रशासनिक अधिकारी को भेजे गए पत्र सं. 562 दिनांक 26.05.2009 का संदर्भ दिया। उस पत्र में विभाग ने उल्लेख किया था कि कुछ मामलों में जाली संस्थानों के आधार पर नियुक्तियाँ हुई हो सकती हैं, अतः निर्देश दिया गया कि NSP से जारी प्रमाण–पत्रों का सत्यापन विभागीय प्रतिनिधियों द्वारा कराया जाए। पत्र के साथ सत्यापन हेतु ग्यारह प्रमाण–पत्र संलग्न किए गए थे और अनुरोध किया गया था कि सत्यापन के लिए कोई अतिरिक्त राशि न ली जाए।

उन्होंने आगे कहा कि राज्य सरकार ने अभ्यर्थियों की सूचियाँ तथा उनके प्रमाण–पत्र NSP को सत्यापन हेतु भेजे थे। इसके उत्तर में NSP ने 27.07.2009 को प्रधान सचिव को 323 सत्यापित प्रमाण–पत्रों की सूची भेजी। राज्य प्रमाण–पत्र सत्यापन प्रकोष्ठ ने भी समय–समय पर अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से NSP के प्रमाण–पत्रों का सत्यापन जारी रखा।

याचिकाकर्ताओं ने प्रस्तुत किया कि 34,540 शिक्षकों की नियुक्ति से पहले, माननीय श्री न्यायमूर्ति एस.के. चट्टोपाध्याय (सेवानिवृत्त) के पर्यवेक्षण में अभ्यर्थियों की एक पैनल सूची तैयार की गई थी। उस प्रक्रिया के दौरान NSP सहित विभिन्न प्रमाण–पत्रों का सत्यापन और स्वीकृति हुई। इसी आधार पर राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह कहा कि पैनल और प्रमाण–पत्र वैध एवं वास्तविक हैं, जिसके परिणामस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने उसी पैनल से नियुक्तियाँ करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ताओं ने बल दिया कि NSP प्रमाण–पत्र वाले कई अभ्यर्थियों की नियुक्ति की गई।

इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि एक बार जब प्रधान सचिव ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष हलफनामे पर यह कहा कि NSP तथा उसके प्रमाण–पत्र वैध हैं, तो वही प्राधिकारी अब उनके मामले में विपरीत रुख नहीं अपना सकता। उन्होंने यह भी कहा कि जब समान अर्हता वाले अन्य लोगों को सेवा में बने रहने दिया गया, तो उनके साथ भेदभाव किया गया।

उन्होंने पूर्व रिट याचिकाओं CWJC No.6753 of 2013 तथा CWJC No.17365 of 2014 का भी हवाला दिया, जिनमें NSP प्रमाण–पत्रों पर संदेह के आधार पर सहायक शिक्षकों की सेवा समाप्ति को उच्च न्यायालय ने रद्द कर, उन्हें पुनर्नियुक्त करने का आदेश दिया था।

राज्य ने अपने प्रतिवाद हलफनामे में याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध सख्त रुख अपनाया। राज्य ने इंगित किया कि CWJC No.14819 of 2012 में न्यायालय ने मानव संसाधन विकास विभाग के प्रधान सचिव को NSP प्रमाण–पत्रों से संबंधित दावे की जाँच करने का निर्देश दिया था। इसके पश्चात LPA No.921 of 2012 में पटना उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने यह निर्णय दिया कि उस मामले के अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि Nav Bharat Shiksha Parishad, Orissa को बिहार राज्य द्वारा पंचायती शिक्षक के पद पर नियुक्ति के लिए मान्यता प्राप्त है।

इन निर्देशों के अनुपालन में शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव ने ज्ञापन सं. 617 दिनांक 17.05.2013 जारी किया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि Nav Bharat Shiksha Parishad, Orissa को National Council for Teacher Education (NCTE), University Grants Commission (UGC) या किसी भी राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। राज्य का तर्क था कि याचिकाकर्ताओं के C.P.Ed. प्रमाण–पत्र चूँकि एक अमान्य संस्था से थे, वे नियुक्ति के लिए बुनियादी अर्हता ही पूरी नहीं करते थे।

इसी आधार पर राज्य ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियाँ प्रारंभ से ही अनियमित और अवैध थीं। अतः प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, सरैया द्वारा ज्ञापन सं. 471 दिनांक 05.09.2013 के माध्यम से उनकी सेवाएँ समाप्त करना उचित था। राज्य ने सेवा समाप्ति को वैध तथा सद्भावनापूर्ण बताया।

राज्य ने याचिकाकर्ताओं द्वारा Special Leave Petition No.22882 of 2024 (Nand Kishore Ojha vs. The State of Bihar & Ors.) पर की गई निर्भरता को भी अस्वीकार करते हुए कहा कि वह मामला तुलनीय नहीं है और उनके मामले पर लागू नहीं होता।

दोनों पक्षों की विस्तृत सुनवाई के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने एक निर्णायक प्रश्न पर ध्यान केंद्रित किया: क्या याचिकाकर्ता यह सिद्ध कर पाए कि जिस संस्था से उन्होंने अपने C.P.Ed. प्रमाण–पत्र प्राप्त किए, अर्थात Nav Bharat Shiksha Parishad, Orissa, उसे राज्य सरकार द्वारा शिक्षकों की नियुक्ति के लिए मान्यता प्राप्त है?

न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता यह स्थापित करने में विफल रहे कि NSP को मान्यता प्राप्त है। न्यायालय ने LPA No.921 of 2012 के पूर्व निर्णय का उल्लेख किया, जिसमें खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वहाँ के अपीलकर्ता यह सिद्ध नहीं कर पाए कि NSP को बिहार राज्य द्वारा पंचायती शिक्षक पद पर नियुक्ति के लिए मान्यता प्राप्त है।

वर्तमान मामले में न्यायालय को ऐसा कोई सामग्री नहीं मिली, जिसके आधार पर याचिकाकर्ताओं के पक्ष में कोई भिन्न निष्कर्ष निकाला जा सके या पूर्व निष्कर्ष का खंडन हो सके। अतः न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि NSP से प्राप्त याचिकाकर्ताओं के प्रमाण–पत्रों को बिहार राज्य के अधीन Block Physical Teacher के पद पर नियुक्ति के लिए वैध अर्हता नहीं माना जा सकता।

चूँकि यह मूलभूत पात्रता ही अनुपस्थित थी, न्यायालय ने माना कि उनकी सेवा समाप्ति को चुनौती देने में कोई दम नहीं है। आदेश में दर्ज है:

“It is clear that the petitioners have failed to establish that the certificate procured by them from the institution i.e. Nav Bharat Shiksha Parisad, Orrisa (NSP) is recognized by the State of Bihar. It is also clear from the order passed in L.P.A. No.921 of 2012 that the petitioner has failed to prove or establish that the institution in question is recognized by the State of Bihar for appointment to the post of Panchayat Teacher.”

इस तर्क के आधार पर न्यायालय ने रिट याचिका खारिज कर दी, जिससे सेवा समाप्ति के आदेश तथा अपीलीय आदेश अक्षुण्ण रहे।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन अभ्यर्थियों और शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण है जो निजी या राज्य से बाहर की संस्थाओं के प्रमाण–पत्रों पर निर्भर रहते हैं। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिहार में सरकारी शिक्षक नियुक्ति के लिए केवल प्रमाण–पत्र होना पर्याप्त नहीं है; प्रमाण–पत्र जारी करने वाली संस्था को सक्षम प्राधिकारियों द्वारा औपचारिक मान्यता प्राप्त होना अनिवार्य है।

यदि Nav Bharat Shiksha Parishad, Orissa जैसी किसी संस्था को NCTE, UGC या बिहार राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है, तो उसके प्रमाण–पत्रों के आधार पर नियुक्ति का अधिकार या सेवा में बने रहने का अधिकार दावा नहीं किया जा सकता। भले ही कोई व्यक्ति कई वर्षों तक कार्य कर चुका हो और उसका कार्य संतोषजनक रहा हो, यदि मूल अर्हता ही मान्यता–प्राप्त नहीं है तो नियुक्ति को अवैध माना जा सकता है।

निर्णय यह भी दर्शाता है कि केवल विभागीय पत्राचार या सत्यापन अभ्यास से किसी संस्था को मान्यता नहीं मिल जाती, जब तक कि विधि अथवा राज्य द्वारा स्पष्ट और औपचारिक मान्यता न दी गई हो। अतः अभ्यर्थियों को सार्वजनिक रोजगार के लिए ऐसी अर्हता पर निर्भर होने से पहले अपने प्रशिक्षण संस्थान की कानूनी स्थिति की जाँच कर लेनी चाहिए।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या याचिकाकर्ताओं के Nav Bharat Shiksha Parishad, Orissa से जारी C.P.Ed. प्रमाण–पत्रों को बिहार राज्य द्वारा प्रखण्ड शारीरिक शिक्षक के पद पर नियुक्ति हेतु मान्यता प्राप्त थी?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता यह सिद्ध करने में असफल रहे कि Nav Bharat Shiksha Parishad, Orissa को बिहार राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त है, और इस संबंध में पहले से दिए गए LPA No.921 of 2012 के निर्णय पर भरोसा किया।
  • प्रश्न: उनके प्रमाण–पत्रों की उपर्युक्त स्थिति को देखते हुए, क्या याचिकाकर्ता अपनी सेवा समाप्ति को रद्द कराने और सभी लाभों सहित पुनर्नियुक्ति के अधिकारी थे?
    उत्तर: नहीं। चूँकि उनके प्रमाण–पत्र अमान्य संस्था से थे, उनकी नियुक्तियाँ वैध नहीं थीं, और न्यायालय ने रिट याचिका में कोई मेरिट नहीं पाई तथा उसे खारिज कर दिया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • CWJC No.14819 of 2012 – इसमें न्यायालय ने पहले NSP प्रमाण–पत्रों के आधार पर किए गए दावों की जाँच का निर्देश दिया था।
  • LPA No.921 of 2012 – खंडपीठ ने माना कि Nav Bharat Shiksha Parishad, Orissa को पंचायती शिक्षक की नियुक्ति के लिए बिहार राज्य द्वारा मान्यता–प्राप्त सिद्ध नहीं किया जा सका; वर्तमान मामले में इसी निष्कर्ष पर भरोसा किया गया।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No.3281 of 2020

मामले का शीर्षक: Ramesh Kumar Trivedi & Ors. vs. The State of Bihar & Ors.

पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Anjani Kumar Sharan

निर्णय की तिथि: 17.09.2024

उद्धरण: 2024(4) PLJR 376

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: Mr. Shashi Bhushan Singh
  • प्रतिवादी/राज्य की ओर से: Mr. Madhaw Pd. Yadaw (GP 23)
  • प्रतिवादी/राज्य की ओर से: Mr. Arvind Kumar, AC to GP 23

मामले की प्रकृति: रिट याचिका (सेवा से संबंधित मामला, प्रखण्ड शारीरिक शिक्षकों की सेवा समाप्ति और अर्हता की वैधता)

निर्णय की प्रति का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के पूर्ण निर्णय को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें


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