मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता बिहार ठेकेदारों के पंजीयन नियमावली, 2007 के अंतर्गत पंजीकृत सड़क निर्माण ठेकेदार है। उसका पंजीकरण संख्या v0 iz0/ Js.kh-01 (izFke) – 533/2014 अंकित की गई थी।
राज्य बिहार के सड़क निर्माण विभाग द्वारा याचिकाकर्ता को कुछ कार्य आवंटित किए गए थे। इन कार्यों के निष्पादन के दौरान बिहार में खनन गतिविधियां रोक दी गईं। इसके कारण कथित रूप से बालू उपलब्ध नहीं थी और याचिकाकर्ता का कहना है कि वह मूल अवधि के भीतर कार्य पूरा नहीं कर पाया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उसने समझौते की शर्तों का पालन करते हुए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष समय-विस्तार हेतु आवेदन किया। समय-विस्तार के इस आवेदन के साथ विभिन्न प्राधिकारियों द्वारा दी गई विभागीय अनुशंसाएं, रिट याचिका के परिशिष्ट-P-13 शृंखला का हिस्सा थीं। अधीक्षण अभियंता, सड़क निर्माण विभाग, मगध पथ मंडल, गया ने भी पत्र सं० 1858 दिनांक 28.11.2018 के माध्यम से उच्च प्राधिकारियों को समय-विस्तार की अनुशंसा की और आवश्यक आदेश के लिए इसे मुख्य अभियंता (यांत्रिक), दक्षिण बिहार उप-भाग, सड़क निर्माण विभाग, बिहार, पटना को अग्रेषित किया।
इसी बीच, याचिकाकर्ता का कहना है कि उसने फरवरी 2018 में कार्य पूरा कर दिया। विलंब की अवधि के दौरान विभाग ने अनुबंध के तहत निर्धारित दंडात्मक क्षतिपूर्ति (liquidated damages) अधिकतम 2% अनुबंध मूल्य की सीमा तक काट ली। लगभग 1 करोड़ रुपये की देनदारी विभाग के पास लंबित रही, जो याचिकाकर्ता के अनुसार समय-विस्तार के अंतिम अनुमोदन के बाद ही भुगतान की जानी थी।
जबकि समय-विस्तार के लिए याचिका अभी भी लंबित थी, इसी दौरान सड़क निर्माण विभाग के मुख अभियंता ने दिनांक 11.09.2017 (परिशिष्ट-P-6) का कारण बताओ नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता से सात दिनों के भीतर यह स्पष्ट करने को कहा गया कि कार्य पूर्ण करने में विलंब के लिए बिहार ठेकेदारों के पंजीयन नियमावली, 2007 के अंतर्गत उसके विरुद्ध कार्रवाई क्यों न की जाए।
याचिकाकर्ता ने दिनांक 19.09.2017 और 11.10.2017 के उत्तर दायर किए, जो रिट याचिका में परिशिष्ट-P-7 और परिशिष्ट-P-8 के रूप में अंकित हैं। इसके बावजूद मुख अभियंता ने दिनांक 15.12.2017 (कार्यालय आदेश‑217, पत्र सं० Pra-7/vividh-97/2015(Ansh)/7142 द्वारा सूचित) का आदेश पारित कर, बिहार ठेकेदारों के पंजीयन नियमावली, 2007 के नियम 11(का) के उपखंड (ii) तथा विभागीय पत्र सं० 4104(E) दिनांक 28.10.2009 के साथ पठनीय के अधीन, याचिकाकर्ता का पंजीकरण दो वर्ष के लिए निलंबित कर दिया।
उक्त विवादित आदेश में मुख अभियंता ने यह अभिलिखित किया कि याचिकाकर्ता ने कारण बताओ नोटिस का कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया। इस त्रुटि को इंगित करने तथा यह दिखाने के लिए कि उत्तर दायर किए गए थे, याचिकाकर्ता ने मुख अभियंता के समक्ष दिनांक 23.01.2018 (परिशिष्ट‑P‑11) का एक और प्रतिवेदन दायर किया। तथापि, दिनांक 27.02.2018 (परिशिष्ट‑P‑12) के आदेश द्वारा मुख अभियंता ने उस पर कार्यवाही करने से इंकार कर दिया और यह सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता को उनके आदेश के विरुद्ध विभाग के प्रधान सचिव के समक्ष जाना चाहिए था।
कोई अन्य प्रभावी उपाय उपलब्ध न पाकर, ठेकेदार ने निलंबन आदेश एवं संबंधित राहतों को रद्द कराने के लिए सिविल रिट अधिकारिता प्रकरण सं० 10385/2018 में पटना हाईकोर्ट की शरण ली।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
मामला माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद के समक्ष आया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता उपस्थित थे, परंतु सुनवाई के समय राज्य प्रतिवादियों की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ, यद्यपि उनका प्रति-शपथपत्र अभिलेख पर था। अतः न्यायालय ने रिट याचिका, प्रति-शपथपत्र तथा प्रत्युत्तर-पत्र को साथ‑साथ विचार किया।
याचिकाकर्ता का मूल तर्क यह था कि दिनांक 15.12.2017 (परिशिष्ट‑9) का आदेश, जिसके द्वारा उसका पंजीकरण दो वर्ष के लिए निलंबित किया गया, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के कारण अवैध है। मुख्य तर्क इस प्रकार थे:
प्रथम, जब दिनांक 11.09.2017 का कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, तब याचिकाकर्ता ने वस्तुतः 19.09.2017 और 11.10.2017 (परिशिष्ट‑P‑7 और P‑8) को विस्तृत उत्तर दायर किए थे। इन उत्तरों में स्पष्ट किया गया था कि बिहार में खनन गतिविधियों के रुकने के बाद बालू की अनुपलब्धता के कारण विलंब हुआ तथा समझौते के अनुसार समय‑विस्तार के लिए आवेदन पहले ही किया जा चुका था। विभिन्न प्राधिकारियों, जिनमें कार्यपालक अभियंता और अधीक्षण अभियंता शामिल थे, द्वारा समय‑विस्तार की अनुशंसा दिखाने वाले विभागीय पत्राचार भी प्रस्तुत किए गए और यह दर्शाया गया कि प्रकरण उच्च प्राधिकारियों के समक्ष विचाराधीन था।
द्वितीय, इन उत्तरों तथा समय‑विस्तार के लंबित प्रस्ताव के बावजूद मुख अभियंता ने याचिकाकर्ता का पंजीकरण निलंबित कर दिया और आदेश में यह गलत अभिलिखित कर दिया कि कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि अभिलेखों पर विचार न करने तथा मस्तिष्क का समुचित उपयोग न करने का सूचक है।
तृतीय, जब बाद में याचिकाकर्ता ने दिनांक 23.01.2018 (परिशिष्ट‑P‑11) का प्रतिवेदन देकर यह इंगित किया कि वास्तव में स्पष्टीकरण दायर किए गए थे, तब मुख अभियंता ने उस पर विचार करने से इंकार कर दिया और दिनांक 27.02.2018 (परिशिष्ट‑P‑12) के आदेश द्वारा केवल यह कह दिया कि याचिकाकर्ता को प्रधान सचिव के समक्ष अपील करनी चाहिए थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह शक्ति का यंत्रवत् और मनमाना प्रयोग है।
न्यायालय ने राज्य द्वारा दायर प्रति‑शपथपत्र को ध्यानपूर्वक पढ़ा। उसमें प्रतिवादियों ने यह नहीं कहा कि याचिकाकर्ता ने (परिशिष्ट‑P‑8) के रूप में उत्तर तथा (परिशिष्ट‑P‑11) के रूप में बाद का प्रतिवेदन नहीं भेजा था। दूसरे शब्दों में, जब विवादित आदेश पारित हुआ, तब स्पष्टीकरण अभिलेख पर उपलब्ध होने के तथ्य का राज्य ने खंडन नहीं किया।
इस आधार पर न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला: यदि स्पष्टीकरण निश्चित रूप से दायर किए जा चुके थे, तो निलंबन आदेश में यह दर्ज करना कि कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया, स्पष्ट रूप से गलत था। इसका अर्थ यह हुआ कि मुख अभियंता ने या तो अभिलेखों को देखा ही नहीं, या उनके विषय-वस्तु की अनदेखी की, और याचिकाकर्ता को उसके पक्ष पर विचार किए बिना दंडित कर दिया।
न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि बिहार ठेकेदारों के पंजीयन नियमावली, 2007 के तहत मुख अभियंता द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्ति अत्यंत गंभीर और “कठोर” (drastic) है, क्योंकि किसी ठेकेदार के पंजीकरण को निलंबित या रद्द करने से उसके नागरिक अधिकारों पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। जिसका पंजीकरण निलंबित हो जाता है, वह विभाग से कार्य प्राप्त नहीं कर सकता और उसे आर्थिक व प्रतिष्ठात्मक क्षति सहनी पड़ती है। इसलिए, ऐसी कार्रवाई से पहले प्राधिकारी को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करना तथा नियमों का अनुपालन करना अनिवार्य है।
न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। परंतु उसने यह निर्णय दिया कि केवल नोटिस जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। प्राधिकारी को ठेकेदार के उत्तर पर निष्पक्ष और न्यायोचित ढंग से विचार भी करना होता है। यदि उत्तर की अनदेखी कर दी जाए, तो सुनवाई की अनिवार्यता पूरी नहीं मानी जा सकती। न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि किसी पक्ष द्वारा प्रस्तुत प्रासंगिक सामग्री पर विचार न करना अपने‑आप में प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है, और इस मामले में यह उसी उल्लंघन का एक अन्य पहलू बनकर उभरता है।
न्यायालय ने आगे यह भी noted किया कि यह कोई एकाकी घटना नहीं थी। हाल ही में, कई मामलों में, जिनमें सिविल रिट अधिकारिता प्रकरण सं० 2398/2019 (निर्णीत दिनांक 29.03.2019) भी शामिल है, इसी प्रकार की शिकायतें पटना हाईकोर्ट के समक्ष आई थीं। उन प्रकरणों में भी सड़क निर्माण विभाग के मुख अभियंता ने बिना समुचित कारण बताओ नोटिस दिए अथवा उत्तरों पर विचार किए बिना, लाइसेंस निलंबित करने या ठेकेदारों को प्रतिबंधित करने के आदेश पारित किए थे। न्यायालय ने चिंता व्यक्त की कि ऐसी प्रवृत्ति अनावश्यक वाद-विवाद को जन्म देती है।
समग्र तथ्यों पर विचार करते हुए न्यायालय ने पाया कि मुख अभियंता ने “अत्यधिक जल्दबाजी” में यह समझे बिना कार्रवाई की कि परिशिष्ट‑P‑8 और संबंधित दस्तावेजों में याचिकाकर्ता की जो स्थिति ली गई है, उस पर विचार किया जाना आवश्यक था। यह आचरण दर्शाता है कि वे बिहार ठेकेदारों के पंजीयन नियमावली, 2007 के अंतर्गत प्रदत्त शक्ति का प्रयोग अनिवार्य प्रक्रिया का पालन किए बिना तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की उपेक्षा करते हुए कर रहे थे।
अतएव न्यायालय ने यह घोषित किया कि विवादित आदेश दो पृथक किंतु परस्पर संबद्ध आधारों पर रद्द किए जाने योग्य है:
पहला, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, क्योंकि याचिकाकर्ता के स्पष्टीकरण पर विचार नहीं किया गया, जबकि वह दायर किया जा चुका था, और इस प्रकार कारण बताओ की प्रक्रिया अधूरी रह गई। दूसरा, अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री, जैसे उत्तर तथा समय‑विस्तार की अनुशंसाएं, पर विचार न करना, जो अधिनियामिक शक्ति के मनमाने और अवैध प्रयोग के समान है।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसी प्रकार के आदेशों से जब नागरिक परिणाम उत्पन्न होते हैं, तब मुख अभियंता के लिए सावधानीपूर्वक कार्य करना अपेक्षित है। न्यायालय ने निर्देश दिया कि उसके निर्णय की प्रति सड़क निर्माण विभाग, बिहार सरकार के प्रधान सचिव को संप्रेषित की जाए, ताकि ऐसी प्रथाओं पर रोक लगाई जा सके और विभाग नियमों तथा प्राकृतिक न्याय के विपरीत जल्दबाजी में आदेश पारित न करे।
यद्यपि न्यायालय विभागीय आचरण के प्रति आलोचनात्मक था, उसने “फिलहाल” प्रतिवादियों पर लागत (costs) लगाने से परहेज किया। हालांकि, उसने स्पष्ट संकेत दिया कि भविष्य में ऐसे विवाद केवल नियमों के अनुपालन न होने के कारण ही उत्पन्न न हों, इसके लिए प्रधान सचिव द्वारा सुधारात्मक कदम उठाए जाने आवश्यक हैं।
फलस्वरूप, हाईकोर्ट ने परिशिष्ट‑9 में निहित विवादित निलंबन आदेश को रद्द कर दिया। इस प्रकार रिट याचिका स्वीकार कर ली गई। परिणाम यह हुआ कि याचिकाकर्ता के पंजीकरण पर दो वर्ष का निलंबन रद्द हो गया और उसका पंजीकरण पुनर्जीवित हो गया, बशर्ते कि भविष्य में विधि सम्मत तथा समुचित प्रक्रिया का पालन करते हुए कोई कार्रवाई की जाए।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार में सरकारी विभागों, विशेषकर सड़क निर्माण क्षेत्र के साथ काम करने वाले सभी ठेकेदारों के लिए महत्वपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभाग किसी ठेकेदार के पंजीकरण को नियमित या यंत्रवत् ढंग से निलंबित या प्रतिबंधित नहीं कर सकता।
जब भी विभाग इस प्रकार की कठोर कार्रवाई करना चाहे, तो उसे केवल कारण बताओ नोटिस ही नहीं भेजना है, बल्कि ठेकेदार के उत्तर को भी सावधानीपूर्वक पढ़कर उस पर विचार करना है। यदि वह उत्तर की अनदेखी करता है या यह गलत दर्ज करता है कि कोई उत्तर दायर नहीं हुआ, जबकि वस्तुतः उत्तर दायर हो चुका है, तो पटना हाईकोर्ट ऐसे आदेश को प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के कारण रद्द कर सकता है।
न्यायालय ने वरिष्ठ अधिकारियों को यह कड़ा संदेश भी दिया कि इस प्रकार की “कठोर शक्तियों” का दुरुपयोग अनावश्यक वाद-विवाद और आर्थिक कठिनाइयों को जन्म देता है। प्रधान सचिव को इस प्रथा पर रोक लगाने और मामले की जांच करने का निर्देश देकर, यह निर्णय विभाग को अधिक पारदर्शी और विधि-सम्मत निर्णय‑निर्माण की दिशा में अग्रसर करता है।
साधारण ठेकेदारों के लिए यह निर्णय यह दर्शाता है कि वे उन विभागीय कार्रवाइयों को चुनौती दे सकते हैं जो निष्पक्ष सुनवाई के बिना की गई हों, और जब नियमों का पालन नहीं किया जाता, तब हाईकोर्ट उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए तत्पर है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या मुख अभियंता, जब ठेकेदार पहले ही कारण बताओ नोटिस का उत्तर दे चुका हो और प्रासंगिक सामग्री अभिलेख पर रख चुका हो, उसके पंजीकरण को दो वर्ष के लिए विधिवत निलंबित कर सकते थे?
उत्तर: नहीं। पटना हाईकोर्ट ने माना कि निलंबन आदेश प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन तथा ठेकेदार के स्पष्टीकरणों और अन्य अभिलेखीय सामग्रियों पर विचार न किए जाने के कारण दोषपूर्ण था और इसलिए उसे रद्द किया जाना आवश्यक था।
प्रश्न: क्या केवल कारण बताओ नोटिस जारी कर देना, बिहार ठेकेदारों के पंजीयन नियमावली, 2007 के तहत शक्ति का प्रयोग करते समय प्राकृतिक न्याय का पर्याप्त अनुपालन माना जाएगा?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कारण बताओ नोटिस देने के साथ‑साथ प्राधिकारी को ठेकेदार के उत्तर पर ईमानदारी से और गंभीरता से विचार भी करना होगा, तभी किसी ऐसे आदेश को पारित किया जा सकता है जिससे नागरिक परिणाम उत्पन्न हों।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- न्यायालय ने अपने ही हालिया निर्णय सिविल रिट अधिकारिता प्रकरण सं० 2398/2019 (निर्णीत दिनांक 29.03.2019) का संदर्भ दिया, जिसमें इसी प्रकार के मुद्दों पर विचार किया गया था, जहां मुख अभियंता द्वारा समुचित सुनवाई के बिना आदेश पारित किए जाने की बात नोट की गई थी।
मामले का विवरण
केस नंबर: सिविल रिट अधिकारिता प्रकरण सं० 10385/2018
केस शीर्षक: M/s Dhanpat Prasad बनाम The State of Bihar & Ors.
उद्धरण (Citation): 2019 (2) PLJR 1071
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
पीठ (Coram): माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद
निर्णय की तिथि: 01.04.2019
अधिवक्ता: याचिकाकर्ता की ओर से श्री मनीष सहाय, अधिवक्ता; प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता का नाम निर्णय में उल्लिखित नहीं है।
प्रतिवादी: बिहार राज्य, प्रधान सचिव, सड़क निर्माण विभाग के माध्यम से, तथा अन्य विभागीय अधिकारी, जिनमें प्रधान सचिव, मुख अभियंता‑cum‑अतिरिक्त आयुक्त‑cum‑विशेष सचिव, मुख्य अभियंता (कम्युनिकेशन) (दक्षिण बिहार विंग), अधीक्षण अभियंता (मगध पथ मंडल, गया) और कार्यपालक अभियंता (सड़क प्रखंड, नवादा) शामिल हैं।
मामले का प्रकार: बिहार ठेकेदारों के पंजीयन नियमावली, 2007 के तहत ठेकेदार पंजीकरण के निलंबन आदेश को चुनौती देने वाली सिविल रिट अधिकारिता के अंतर्गत दायर रिट याचिका।
विवादित आदेश: पत्र सं० Pra-7/vividh-97/2015(Ansh)/7142, जो कार्यालय आदेश‑217 दिनांक 15.12.2017 के साथ पठनीय है, मुख अभियंता‑cum‑अतिरिक्त आयुक्त‑cum‑विशेष सचिव, सड़क निर्माण विभाग, बिहार सरकार द्वारा जारी, जिसके द्वारा बिहार ठेकेदारों के पंजीयन नियमावली, 2007 के नियम 11(का) के उपखंड (ii) तथा विभागीय पत्र सं० 4104(E) दिनांक 28.10.2009 के साथ पठनीय के अधीन, याचिकाकर्ता का पंजीकरण दो वर्ष के लिए निलंबित किया गया।
परिणाम: रिट याचिका स्वीकार; विवादित निलंबन आदेश (परिशिष्ट‑9) रद्द।
निर्णय का लिंक:https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTAzODUjMjAxOCMxI04=—ak1–YtReGF–am1–NvM=
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