विश्वविद्यालय कर्मचारियों के बकाया रद्द करने वाला राज्य सरकार का आदेश निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

Shubham Shivansh is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in civil disputes, service law, and GST matters. He represents clients in property disputes, contractual disagreements, service-related grievances, and tax compliance matters before the Patna High Court and other jurisdictions. His practice handles civil litigation, employment-related disputes, and regulatory matters for individuals and businesses across Bihar.

पटना उच्च न्यायालय ने एल.एन. मिथिला विश्वविद्यालय के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की याचिकाएँ सुनीं, जिन्हें बाद में नियमित किया गया था। उन्होंने राज्य सरकार के उस कदम को चुनौती दी, जिसमें विश्वविद्यालय की वह अधिसूचना रद्द कर दी गई थी जिसके तहत उनकी सेवा की गणना पहली नियुक्ति की तिथि से की जानी थी और बकाया देय नहीं किया गया था। न्यायालय ने राज्य का रद्दीकरण आदेश निरस्त कर दिया और विश्वविद्यालय के पूर्व निर्णय को बरकरार रखा। अब राज्य और विश्वविद्यालय को छह माह के भीतर लंबित वेतन बकाया की जाँच कर उसका भुगतान करना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह निर्णय तीन रिट याचिकाओं पर लागू होता है: CWJC No. 6316 of 2015, CWJC No. 6444 of 2015 और CWJC No. 12124 of 2015। सभी को एक साथ सुना गया क्योंकि याचीकाकर्ता एल.एन. मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के समान स्थिति वाले गैर-शैक्षणिक कर्मचारी हैं।

याचीकाकर्ताओं को प्रारंभ में विश्वविद्यालय के विभिन्न घटक महाविद्यालयों और विभागों में अलग‑अलग श्रेणी‑III तथा श्रेणी‑IV पदों पर दैनिक वेतन भोगी के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने निरंतर काम किया और अपनी ड्यूटी संतोषजनक ढंग से निभाई।

दिनांक 06.06.2004 को विश्वविद्यालय की सिंडिकेट ने ऐसे 199 कर्मियों, जिनमें वर्तमान याचीकाकर्ता भी शामिल थे, को श्रेणी‑III एवं IV पदों पर अस्थायी रूप से नियमित करने का निर्णय लिया। यह निर्णय कुलसचिव द्वारा जारी अधिसूचना के माध्यम से लागू किया गया, परंतु इसे राज्य सरकार की स्वीकृति के अधीन रखा गया।

राज्य सरकार ने अपना निर्णय देने में विलंब किया। इसके कारण उच्च न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिका (MJC No. 734 of 2001 एवं समरूप मामले) दायर की गई। 17.12.2004 को न्यायालय ने राज्य को निर्देश दिया कि वह विश्वविद्यालय की संस्तुति पर दो सप्ताह के भीतर कार्रवाई कर अंतिम आदेश पारित करे।

इस निर्देश के अनुपालन में बिहार सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग ने 05.01.2005 को ज्ञापन संख्या 31 जारी किया। इस ज्ञापन द्वारा राज्य ने एल.एन. मिथिला विश्वविद्यालय के गैर‑शैक्षणिक कर्मचारियों के नियमितीकरण को स्वीकृति प्रदान की।

इस स्वीकृति के आधार पर विश्वविद्यालय ने 24.02.2005 की अधिसूचना जारी की। इसके द्वारा 196 व्यक्तियों, जिनमें याचीकाकर्ता भी शामिल थे, की सेवाओं को 06.06.2004 से प्रभावी रूप से नियमित किया गया। अधिसूचना में प्रावधान था कि उन्हें स्वीकृत वेतनमान में वेतन जनवरी 2005 से मिलेगा और 06.06.2004 से दिसंबर 2004 की अवधि का बकाया, राज्य द्वारा धनराशि उपलब्ध कराने के बाद, अदा किया जाएगा।

इसी बीच अन्य कुछ दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी पहले से ही वाद कर रहे थे। LPA No. 835 of 1997 (Awadhesh Prasad Yadav & Others vs The State of Bihar & Others) में खंडपीठ ने 03.02.2004 को निर्देश दिया कि 11 कर्मचारियों को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से बकाया प्राप्त होगा। इस आदेश के विरुद्ध राज्य की चुनौती SLP No. 25732 of 2004 (Civil Appeal No. 987 of 2006) बाद में 18.09.2007 के आदेश से वापस ले ली गई।

CWJC No. 3274 of 2001 एवं समरूप मामलों में, जिनका निर्णय 10.05.2006 को हुआ, इस न्यायालय ने निर्देश दिया कि 18 कर्मचारियों की सेवाओं को, जिनमें से कुछ की सेवाएँ पहले से 06.06.2004 की अधिसूचना द्वारा नियमित की जा चुकी थीं, पेंशन संबंधी लाभों के लिए उनकी प्रारंभिक ज्वाइनिंग तिथि से नियमित माना जाए। अन्य आनुषंगिक लाभ, जिनमें वेतन बकाया भी शामिल हैं, उपरोक्त SLP में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर निर्भर रहेंगे। SLP वापस लेने के बाद बकाया के संबंध में स्थिति स्पष्ट हो गई।

इन घटनाक्रमों के आधार पर विश्वविद्यालय ने 26.12.2009 की एक अन्य अधिसूचना जारी की। इसने 24.02.2005 की अधिसूचना में आंशिक संशोधन करते हुए शेष 185 कर्मचारियों (पूर्व के 196 में से) की नियमितीकरण तिथि 06.06.2004 से बदलकर उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथियों पर स्थानांतरित कर दी। यह इस न्यायालय, खंडपीठ, सर्वोच्च न्यायालय, एचआरडी के अतिरिक्त आयुक्त, तथा 17.10.2006 की सिंडिकेट संकल्प के आदेशों/निर्णयों पर विचार करने के बाद किया गया।

बाद में, 07.01.2012 की अधिसूचना द्वारा विश्वविद्यालय ने 26.12.2009 की अधिसूचना को वापस लेने का प्रयास किया। इसमें कहा गया कि संबंधित कर्मचारियों को 06.06.2004 से ही वेतन मिलेगा, सेवानिवृत्ति लाभों को छोड़कर। किन्तु CWJC No. 3274 of 2001 एवं समरूप मामलों में इस न्यायालय के आदेशों के बाद, विश्वविद्यालय ने 02.05.2012 की अधिसूचना जारी कर 26.12.2009 की अधिसूचना को पुनर्जीवित कर दिया। 08.05.2012 के एक परिशिष्ट द्वारा यह शर्त हटा दी गई कि इसका क्रियान्वयन CWJC No. 19473 of 2010 के परिणाम पर निर्भर होगा। इस प्रकार 26.12.2009 की अधिसूचना पूर्णतः प्रभावी हो गई।

इसके बावजूद, अनेक कर्मचारियों, जिनमें वर्तमान याचीकाकर्ता भी शामिल हैं, को वास्तव में उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से लेकर दिसंबर 2004 तक का बकाया प्राप्त नहीं हुआ। जबकि समान स्थिति वाले कुछ अन्य व्यक्तियों को ऐसा बकाया मिल चुका था।

इसी बीच, अन्य कर्मचारियों के एक समूह ने CWJC No. 19473 of 2010 एवं समरूप मामले दायर किए, जिनमें उन्होंने उन कर्मचारियों के समान लाभ की माँग की जिन्हें पहले से उनकी वास्तविक नियुक्ति तिथि से नियमितीकरण के लाभ दिए जा चुके थे। 03.01.2019 को, 2018(2) PLJR 929 (Amresh Kumar Singh vs The State of Bihar & Anr.) में पूर्ण पीठ के निर्णय और 2018(2) PLJR 737 में खंडपीठ के निर्णय पर भरोसा करते हुए, समन्वय पीठ ने निर्देश दिया कि उन्हें समान स्थिति वाले कर्मचारियों के समकक्ष माना जाए।

पूर्ण पीठ ने यह माना था कि बिहार राज्य वाद नीति, 2011 के अनुरूप, जब किसी न्यायालय के आदेश को कुछ कर्मचारियों के लिए लागू कर दिया जाता है, तो समान रूप से स्थित अन्य सभी व्यक्तियों को भी वही लाभ दिया जाना चाहिए, उन्हें अलग‑अलग मुकदमे दायर करने के लिए बाध्य किए बिना।

राज्य ने 03.01.2019 के आदेश को LPA No. 782 of 2019 (CWJC No. 2687 of 2012 से उत्पन्न) में चुनौती दी। LPA खारिज कर दी गई, हालांकि पुनर्विचार याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी गई। तदनुसार राज्य ने Civil Review No. 199 of 2023 दायर की, जो अब भी लंबित है।

अलग से, एक कर्मचारी, नंद किशोर मेहरा ने अपनी प्रारंभिक ज्वाइनिंग तिथि से वेतन हेतु CWJC No. 13833 of 2004 दायर की। 08.03.2011 को इस न्यायालय ने उन्हें कुलपति के समक्ष प्रस्तुतीकरण करने का निर्देश दिया, जिन्हें भुगतान के लिए आदेश पारित करना था और आवश्यकता होने पर राज्य से धन की माँग करनी थी। अंततः विश्वविद्यालय ने 04.03.2015 को उनके बकाया के भुगतान का निर्णय लिया और राज्य ने राशि जारी की (ज्ञापन संख्या 90/15)।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

वर्तमान तीनों रिट मामलों के याचीकाकर्ताओं ने पटना उच्च न्यायालय से दो मुख्य राहतें माँगीं। पहली, उन्होंने विश्वविद्यालय और राज्य प्राधिकारियों को निर्देश देने की माँग की कि वे विश्वविद्यालय की 26.12.2009 की अधिसूचना के अनुसार उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से दिसंबर 2004 तक का वेतन बकाया उन्हें अदा करें। दूसरी, उन्होंने 29.01.2019 की राज्य सरकार की चिट्ठी (पत्र संख्या 201) को रद्द करने की माँग की, जिसके द्वारा शिक्षा विभाग ने विश्वविद्यालय की 26.12.2009 की अधिसूचना को रद्द कर दिया था।

याचीकाकर्ताओं का तर्क था कि उनकी नियुक्ति और नियमितीकरण, उन अन्य कर्मचारियों के समान ढंग से हुई थी जिन्हें उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से बकाया पहले ही मिल चुका है। LPA No. 835 of 1997 में निर्णयित 11 कर्मचारियों को यह लाभ मिला था और सर्वोच्च न्यायालय ने उसमें हस्तक्षेप नहीं किया। 17 अन्य श्रेणी‑III और IV कर्मचारियों को भी उनकी प्रारंभिक नियुक्ति से दिसंबर 2004 तक का बकाया दे दिया गया था। अन्य कई व्यक्तियों को, जिनके क्रमांक 26.12.2009 की अधिसूचना में याचीकाकर्ताओं द्वारा सूचीबद्ध किए गए थे, को भी इसी प्रकार बकाया प्राप्त हुआ था।

याचीकाकर्ताओं के अनुसार, जब इस न्यायालय ने CWJC No. 3274 of 2001 में बकाया को राज्य की SLP के परिणाम से जोड़ दिया था, और बाद में वह SLP वापस ले ली गई, तो उन्हें वही लाभ न देने का कोई विधिक आधार शेष नहीं रह गया। उनका कहना था कि कुछ को बकाया देना, जबकि समान प्रकार की नियुक्ति और नियमितीकरण वाले अन्य को इनकार करना, संविधान के अनुच्छेद 14 तथा बिहार राज्य वाद नीति, 2011 का उल्लंघन है। वे यह भी मानते थे कि शिक्षा विभाग को बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 के तहत जारी विश्वविद्यालय की अधिसूचना को रद्द करने का कोई अधिकार नहीं था।

राज्य ने रिट याचिकाओं का विरोध किया। इसका कहना था कि याचीकाकर्ताओं ने 2004–2005 में 06.06.2004 से अपने नियमितीकरण को स्वीकार कर लिया था और अब वे लंबे विलंब के बाद नियमितीकरण आदेश के एक हिस्से को चुनौती नहीं दे सकते। राज्य ने कहा कि विश्वविद्यालय नियमितीकरण की तिथि बदलकर तथा प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से बकाया देने का निर्णय बिना राज्य की स्वीकृति के नहीं कर सकता था, क्योंकि इससे राज्य कोष पर वित्तीय दायित्व उत्पन्न होता है। राज्य के अनुसार विश्वविद्यालय ने 26.12.2009 की अधिसूचना जारी करते समय LPA No. 835 of 1997 और CWJC No. 3274 of 2001 के आदेशों को गलत समझा और उनका गलत अनुप्रयोग किया, अतः 29.01.2019 की चिट्ठी द्वारा उस अधिसूचना को रद्द करना न्यायसंगत था।

विश्वविद्यालय का रुख कुछ अलग था। उसने न्यायालय को सूचित किया कि 2017 में राज्य ने उसे निर्देश दिया कि वह 185 कर्मचारियों के लिए नियमितीकरण की तिथि को पीछे ले जाने वाली कार्रवाई को रद्द करे। कुलपति ने इस मुद्दे की जाँच के लिए पाँच सदस्यीय समिति गठित की और राज्य को पुनर्विचार के लिए लिखा। विश्वविद्यालय ने उच्च शिक्षा निदेशक का 16.02.2020 का पत्र अभिलेख पर रखा, जिसमें कहा गया था कि LPA No. 835 of 1997 का निर्णय in personem (व्यक्तिगत) प्रकार का था और उसका लाभ स्वतः अन्य पर नहीं बढ़ाया जा सकता। विश्वविद्यालय ने तर्क दिया कि 26.12.2009 की अधिसूचना, जिसे न्यायिक आदेश के नाम पर जारी किया गया था, गलत तथ्यों और बाह्य विचारों पर आधारित थी और यदि इसे लागू किया जाए तो यह राज्य पर अनावश्यक वित्तीय बोझ डालेगी।

न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने तथ्यात्मक अभिलेख का सावधानीपूर्वक अवलोकन किया। उन्होंने नोट किया कि जिन पदों पर याचीकाकर्ता कार्यरत थे, उनके स्वीकृत (संक्शन) पद होने पर कोई विवाद नहीं था। 185 कर्मचारियों और 11 कर्मचारियों, दोनों की नियुक्तियाँ इन्हीं स्वीकृत पदों के विरुद्ध की गई थीं।

न्यायालय ने विश्वविद्यालय द्वारा प्रस्तुत 16.09.2019 के पत्र (संलग्नक‑R/1) पर विचार किया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि CWJC No. 4252 of 1997 में 21.03.1997 के आदेश के अनुपालन में विश्वविद्यालय ने श्रेणी‑III और IV पदों के लिए विज्ञापन जारी किया, आवेदनों की जाँच की और साक्षात्कार कराए। चयन समिति ने 274 उम्मीदवारों, जिनमें याचीकाकर्ता भी शामिल थे, को सूचीबद्ध किया। उनमें से सिंडिकेट ने 199 अभ्यर्थियों (185+11) को चुना तथा 196 को वास्तव में स्वीकृत पदों पर नियुक्त किया गया।

LPA No. 835 of 1997 में खंडपीठ ने विशेष रूप से निर्देश दिया था कि 11 अपीलकर्ताओं को उनकी नियुक्ति की तिथि से बकाया देय होगा। इस आदेश के विरुद्ध राज्य की SLP वापस होने के बाद, इन 11 कर्मचारियों को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से नियमितीकरण और बकाया दोनों दे दिए गए। बाद में, 26.12.2009 की अधिसूचना और उसके पश्चात की कार्रवाइयों के माध्यम से, समान रूप से स्थित अनेक अन्य कर्मचारियों तक भी यही लाभ पहुँचाया गया।

न्यायालय ने संज्ञान लिया कि अन्य समान स्थिति वाले कर्मचारियों के एक समूह को CWJC No. 2836 of 2012, CWJC No. 2687 of 2012 और CWJC No. 19473 of 2010 में राहत मिली, जहाँ समन्वय पीठ ने 03.01.2019 को 2018(2) PLJR 929 में पूर्ण पीठ के निर्णय का अनुसरण करते हुए उनकी रिट याचिकाएँ स्वीकार कीं। वहाँ पूर्ण पीठ ने इस बात पर बल दिया था कि बिहार राज्य वाद नीति, 2011 के तहत, जिन वादियों के लिए पहले से लाभ लागू कर दिया गया है, वही लाभ समान रूप से स्थित अन्य सभी व्यक्तियों तक भी विस्तृत किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने नंद किशोर मेहरा के व्यक्तिगत मामले का भी उल्लेख किया। उनके प्रकरण में इस न्यायालय ने बकाया पर विचार करने का निर्देश दिया था और उसी के आधार पर अंततः उन्हें प्रारंभिक ज्वाइनिंग तिथि से वेतन बकाया अदा किया गया, जब राज्य ने आवश्यक धनराशि जारी कर दी।

अधिकार के प्रश्न पर न्यायालय ने माना कि बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 की धारा 4(1)(xiv) के तहत विश्वविद्यालयों को अपने कर्मचारियों के नियमितीकरण और समायोजन के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। जब कर्मचारी स्वीकृत पदों पर कार्यरत हों, तो राज्य सरकार को ऐसे निर्णयों में अपीली हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। अतः विश्वविद्यालय की 26.12.2009 की अधिसूचना को रद्द करने वाली शिक्षा विभाग की 29.01.2019 की चिट्ठी अधिकार‑क्षेत्र से परे और मनमानी थी।

न्यायालय ने आगे यह भी देखा कि विश्वविद्यालय बहस के दौरान अपनी ही 26.12.2009 की अधिसूचना की वैधता पर यह कहते हुए प्रश्न नहीं उठा सकता कि इससे वित्तीय बोझ पड़ता है या यह कथित रूप से बाह्य विचारों पर आधारित है। यह अधिसूचना इस न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के अनेक न्यायिक आदेशों, सिंडिकेट संकल्प तथा मानव संसाधन विकास विभाग के पत्र के बल पर जारी की गई थी और 02.05.2012 की अधिसूचना द्वारा विश्वविद्यालय ने स्वयं इसकी पुनः पुष्टि की थी।

न्यायमूर्ति सिन्हा ने स्पष्ट किया कि प्राधिकारी कुछ कर्मचारियों को पूर्व सेवा का लाभ दे कर, समान रूप से स्थित अन्य कर्मचारियों को वही लाभ नहीं दे सकते। इस प्रकार की “चुनिंदा” नीति भेदभावपूर्ण व्यवहार के समान है और स्वयं बिहार राज्य वाद नीति, 2011 का उल्लंघन करती है।

इन्हीं आधारों पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि 29.01.2019 की राज्य की रद्दीकरण चिट्ठी “टिक नहीं सकती” और इसे निरस्त कर दिया। तत्पश्चात न्यायालय ने प्रतिवादियों, जिनमें राज्य भी शामिल है, को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि याचीकाकर्ताओं को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथियों से लेकर दिसंबर 2004 तक का वेतन बकाया दे दिया जाए। यह, तथापि, इस बात की जाँच के अधीन रहेगा कि याचीकाकर्ताओं ने उस अवधि के दौरान वास्तव में कार्य किया था या नहीं।

न्यायालय ने समय सीमा भी निर्धारित की: बकाया भुगतान के लिए संपूर्ण प्रक्रिया, निर्णय की प्रति प्राप्त होने या प्रस्तुत किए जाने की तिथि से छह माह के भीतर पूरी की जानी होगी।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय एल.एन. मिथिला विश्वविद्यालय के गैर‑शैक्षणिक कर्मचारियों तथा व्यापक रूप से बिहार के राज्य विश्वविद्यालयों के उन कर्मचारियों के लिए महत्त्वपूर्ण है जिन्हें पहले दैनिक वेतन या अस्थायी आधार पर रखा गया और बाद में नियमित किया गया।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि एक बार विश्वविद्यालय ने स्वीकृत पदों पर कर्मचारियों का नियमितीकरण कर लिया और न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में यह निर्णय ले लिया कि उनकी सेवा की गणना पहली नियुक्ति की तिथि से होगी, तो राज्य केवल विभागीय पत्र के माध्यम से एकतरफा ढंग से उस निर्णय को रद्द नहीं कर सकता।

निर्णय यह भी पुष्ट करता है कि सरकार और विश्वविद्यालय प्राधिकारी भेदभावपूर्ण व्यवहार से बचें। यदि न्यायालयी आदेशों या नीतियों के तहत कुछ कर्मचारियों को बकाया और अन्य लाभ दिए जाते हैं, तो समान रूप से स्थित कर्मचारियों को किसी ठोस विधिक कारण के बिना वंचित नहीं रखा जा सकता।

साधारण कर्मचारियों के दृष्टिकोण से, इस निर्णय का अर्थ है कि राज्य द्वारा बाद में उठाई गई आपत्तियाँ या देरी, उन लाभों को आसानी से समाप्त नहीं कर सकती जो पहले से न्यायिक परीक्षण और औपचारिक विश्वविद्यालय निर्णय के बाद प्रदान किए जा चुके हैं।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या राज्य सरकार विश्वविद्यालय की 26.12.2009 की उस अधिसूचना को रद्द कर सकती थी, जिसके द्वारा कुछ कर्मचारियों के नियमितीकरण की तिथि उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथियों पर स्थानांतरित कर दी गई थी?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 की धारा 4(1)(xiv) के तहत स्वीकृत पदों पर अपने कर्मचारियों के नियमितीकरण और समायोजन का निर्णय लेने की शक्ति केवल विश्वविद्यालय को है और राज्य को ऐसे निर्णय को रद्द करने का कोई अधिकार‑क्षेत्र नहीं है।
  • प्रश्न: क्या याचीकाकर्ता समान रूप से स्थित अन्य कर्मचारियों के साथ समानता के सिद्धांत पर अपनी प्रारंभिक नियुक्ति तिथियों से दिसंबर 2004 तक वेतन बकाया पाने के हकदार थे?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने वास्तविक काम की जाँच के अधीन, प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से दिसंबर 2004 तक बकाया के भुगतान का निर्देश दिया और माना कि समान स्थिति वाले कर्मचारियों को दिया गया लाभ उन्हें न देना भेदभावपूर्ण है और बिहार राज्य वाद नीति, 2011 के विपरीत है।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • LPA No. 835 of 1997, Awadhesh Prasad Yadav & Ors. vs The State of Bihar & Ors., 2004(2) PLJR 689 में प्रकाशित।
  • Civil Appeal No. 987 of 2006 (SLP No. 25732 of 2004 से उत्पन्न), आदेश दिनांक 18.09.2007 (SLP वापस ली गई)।
  • CWJC No. 3274 of 2001 (Rajendra Kamti and others vs L.N. Mithila University & Ors.) एवं समरूप मामले, निर्णय दिनांक 10.05.2006।
  • पूर्ण पीठ का निर्णय, 2018(2) PLJR 929 (Amresh Kumar Singh vs The State of Bihar & Anr.) में प्रकाशित।
  • खंडपीठ का निर्णय, 2018(2) PLJR 737 में प्रकाशित।
  • CWJC No. 4252 of 1997, आदेश दिनांक 21.03.1997।
  • CWJC No. 19473 of 2010 एवं समरूप मामले, आदेश दिनांक 03.01.2019।
  • CWJC No. 2836 of 2012 और CWJC No. 2687 of 2012 (LPA No. 782 of 2019 से संबद्ध)।
  • CWJC No. 13833 of 2004, आदेश दिनांक 08.03.2011 (Nand Kishore Mehra)।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 6316 of 2015; Civil Writ Jurisdiction Case No. 6444 of 2015; Civil Writ Jurisdiction Case No. 12124 of 2015.

मामले का शीर्षक: Yogendra Paswan & Ors. vs The State of Bihar & Ors.; Umesh Prasad Singh & Ors. vs The State of Bihar & Ors.; Shree Mohan Jha vs The L.N. Mithila University, Darbhanga & Ors.

पीठ (कोरम): माननीय श्री न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा।

निर्णय की तिथि: 27.09.2024।

उद्धरण: 2024(4) PLJR 396।

अधिवक्ता:

  • CWJC No. 6316 of 2015 में याचीकाकर्ताओं की ओर से: Mr. Abhinav Srivastava.
  • CWJC No. 6316 of 2015 में प्रतिवादियों की ओर से: Mr. R.N. Dubey, AAG 12.
  • CWJC No. 6444 of 2015 में याचीकाकर्ताओं की ओर से: Mr. Abhinav Srivastava.
  • CWJC No. 6444 of 2015 में प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Ashok Kumar Keshari, AAG 11.
  • CWJC No. 12124 of 2015 में याचीकर्ता की ओर से: Mr. Purushottam Kumar Jha.
  • CWJC No. 12124 of 2015 में प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Md. Raisul Haque, SC 4.

मामले की प्रकृति: सिविल रिट अधिकार‑क्षेत्र के अंतर्गत वेतन बकाया के भुगतान के निर्देश तथा नियमितीकरण संबंधी विश्वविद्यालय अधिसूचना को रद्द करने वाली राज्य सरकार की चिट्ठी को निरस्त करने की माँग संबंधी रिट याचिकाएँ।

निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment – CWJC No. 6316 of 2015 and analogous cases

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