न्यायालय ने यह माना कि बिहार पुलिस में एसीपी/एमएसीपी प्राप्त करने के लिए बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा उत्तीर्ण करना कोई शर्त नहीं है।
न्यायालय ने यह भी निर्णय दिया कि कथित अतिरिक्त भुगतान की वसूली उसके पेंशन से नहीं की जा सकती।
अब राज्य को चार सप्ताह के भीतर देय तिथियों से सभी एसीपी/एमएसीपी लाभ बहाल करने होंगे।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता को 06.03.1983 को रोहतास जिला पुलिस बल में सामान्य कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया था। बाद में, उसे जमुई जिला बल में ड्राइवर कांस्टेबल के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया।
उसने 26.11.1984 को बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा दी। वह विधि (लॉ) पेपर में असफल हो गया, लेकिन बाद में परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। इस पहले की असफलता के बावजूद, सक्षम प्राधिकारी ने उसे 09.08.1999 को प्रथम एसीपी, 12.03.2009 को द्वितीय एमएसीपी और 12.03.2019 को तृतीय एमएसीपी प्रदान किया।
22.07.2021 को, पुलिस अधीक्षक, जमुई ने एक मेमो जारी कर याचिकाकर्ता सहित उन अन्य कर्मियों को, जिन्होंने बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी, प्राथमिक विद्यालय, नाथ नगर में पूरक प्रशिक्षण परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए भेजा। याचिकाकर्ता उपस्थित हुआ और 08.02.2022 को पूरक परीक्षा उत्तीर्ण घोषित किया गया।
याचिकाकर्ता 31.01.2023 को सेवा से सुपरएन्नुएट (सेवानिवृत्त) हो गया।
उसकी सेवानिवृत्ति के बाद, पुलिस उप महानिरीक्षक, मुंगेर रेंज ने मेमो संख्या 2470 दिनांक 24.04.2023 जारी किया। इस मेमो द्वारा डीआईजी ने याचिकाकर्ता का पूर्व प्रदत्त प्रथम एसीपी, द्वितीय एमएसीपी और तृतीय एमएसीपी रद्द कर दिया और कहा कि वह केवल 08.02.2022 से प्रथम एसीपी का ही हकदार होगा, अर्थात जिस दिन उसने पूरक बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा उत्तीर्ण की।
इसके बाद, पुलिस अधीक्षक, जमुई ने 28.04.2023 (जमुई जिलादेश संख्या 508/2023) दिनांकित परिणामी आदेश पारित कर औपचारिक रूप से तीनों लाभ वापस ले लिए और निरस्त कर दिए तथा उसका हक 08.02.2022 से पुनर्निर्धारित कर दिया।
याचिकाकर्ता ने सिविल रिट जूरिस्डिक्शन केस संख्या 8063/2023 में पटना उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। उसने डीआईजी के 24.04.2023 दिनांकित मेमो तथा एसपी के 28.04.2023 दिनांकित आदेश दोनों को चुनौती दी। उसने अपनी पुष्टिकरण (कनफर्मेशन) की तिथि 08.02.2022 निर्धारित किए जाने को भी चुनौती दी और उसे 06.03.1983 में संशोधित करने की मांग की। इसके अतिरिक्त, उसने यह घोषणा चाही कि उससे कोई वसूली न की जाए, क्योंकि पूरक परीक्षा देर से उत्तीर्ण होने के लिए वह स्वयं जिम्मेदार नहीं था।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
मामले की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह द्वारा की गई। न्यायालय ने पहले याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहतों को दर्ज किया। याचिकाकर्ता ने सेवानिवृत्ति के बाद पारित एसीपी और एमएसीपी लाभ रद्द करने वाले आदेशों को रद्द करने, अपनी पुष्टिकरण की तिथि में संशोधन तथा किसी भी वसूली से संरक्षण की मांग की थी।
याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि बिहार पुलिस में कोई ऐसा नियम या विनियम नहीं है जो बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा उत्तीर्ण करना एसीपी/एमएसीपी लाभ दिए जाने की पूर्व-शर्त बनाता हो। एसीपी (Assured Career Progression) और एमएसीपी (Modified Assured Career Progression) उन कर्मचारियों को दी जाने वाली वित्तीय उन्नति (फाइनेंशियल अपग्रेडेशन) हैं जिन्हें एक निश्चित अवधि के भीतर नियमित पदोन्नति नहीं मिलती। ये समयबद्ध लाभ हैं, न कि वास्तव में उच्च पद पर पदोन्नति।
उसके अधिवक्ता ने कहा कि इस मुद्दे पर विधि पहले से ही स्पष्ट है। उन्होंने कई निर्णयों पर भरोसा किया। पटना उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने State of Bihar & Ors. vs. Ram Subhag Singh (LPA No. 4 of 2021), रिपोर्टेड इन 2022 (2) PLJR 773 में यह माना था कि विभागीय परीक्षा उत्तीर्ण न होना समयबद्ध पदोन्नति/एसीपी/एमएसीपी पाने में बाधा नहीं हो सकता।
उन्होंने आगे State of Bihar & Ors. vs. Anjani Kumar, रिपोर्टेड इन 2013 (2) PLJR 643 की ओर संकेत किया, जिसमें इस न्यायालय ने वही दृष्टिकोण अपनाया था। उस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय ने 10.03.2014 को SLP (C) No. 19182 of 2013 में पारित आदेश द्वारा बरकरार रखा था।
याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय की एक अन्य खंडपीठ के निर्णय State of Bihar & Ors. vs. Smt. Jivachi Devi, रिपोर्टेड इन 2020 (2) BLJ 471 पर भरोसा किया। राज्य की विशेष अनुमति याचिका सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज किए जाने से उस निर्णय को भी प्रभावी स्वीकृति मिली।
उसने The State of Bihar & Ors. vs. Shri Krishna Singh & Anr. (L.P.A. No. 372 of 2019) तथा विशेष रूप से हाल के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Amresh Kumar Singh & Ors. vs. The State of Bihar & Ors., रिपोर्टेड इन 2023(2) PLJR (SC) 423 का भी हवाला दिया।
Amresh Kumar Singh में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि एसीपी का लाभ, जो पूर्णत: मौद्रिक है और जिसके द्वारा किसी कर्मचारी को वास्तव में उच्च पद पर पदोन्नत नहीं किया जाता, अतिरिक्त शैक्षणिक योग्यताओं के अभाव में भी वंचित नहीं किया जा सकता। एसीपी/एमएसीपी के लिए किसी परीक्षा को उत्तीर्ण करना आवश्यक नहीं है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यही सिद्धांत विभागीय या बेसिक ट्रेनिंग परीक्षाओं पर भी लागू होता है।
वसूली के मुद्दे पर, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वह सेवानिवृत्त कर्मचारी है। किसी भी प्रकार का अतिरिक्त भुगतान उसकी किसी गलत बयानी या धोखाधड़ी के कारण नहीं हुआ। अतः उसके पेंशन या सेवानोपरांत देयकों से कोई वसूली नहीं की जा सकती। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के दो निर्णयों का हवाला दिया: State of Punjab & Ors. vs. Rafiq Masih & Ors., रिपोर्टेड इन (2015) 4 SCC 334, तथा Thomas Daniel vs. State of Kerala & Ors., रिपोर्टेड इन 2022 SCC Online SC 536। दोनों निर्णय उन सेवानिवृत्त या अल्पवेतनभोगी कर्मचारियों को संरक्षण देते हैं, जिनसे नियोक्ता की अपनी गलती से गलत भुगतान हो जाने पर भी वसूली नहीं की जा सकती।
दूसरी ओर, राज्य ने एक अतिरिक्त प्रति-शपथपत्र (सप्लीमेंट्री काउंटर एफिडेविट) दाखिल किया। राज्य ने पुलिस आदेश संख्या 268/99 पर भरोसा किया। इस आदेश के आंतरिक पृष्ठ 6 पर यह उल्लेख था कि पुलिस कर्मियों के लिए कुछ विषयों का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। इसी आधार पर राज्य ने तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता ने बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी, उसे प्रारंभ से ही एसीपी/एमएसीपी योजना के अंतर्गत लाभ नहीं दिया जाना चाहिए था। अतः सेवानिवृत्ति के बाद किया गया निरस्तीकरण उचित है।
पूर्व में, 28.11.2023 को न्यायालय ने राज्य को यह समय दिया था कि वह ऐसा कोई भी प्रावधान अभिलेख पर लाए जो स्पष्ट रूप से दर्शाए कि बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा, विशेषकर विधि (लॉ) पेपर, उत्तीर्ण करना एसीपी/एमएसीपी के लिए शर्त है। न्यायालय अत्यंत विशिष्ट था: वह ऐसा नियम देखना चाहता था जो प्रत्यक्ष रूप से यह कहे कि बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा उत्तीर्ण न करने से कोई व्यक्ति एसीपी/एमएसीपी लाभ पाने से वंचित हो जाएगा।
अंतिम सुनवाई के समय, न्यायालय ने राज्य द्वारा प्रस्तुत पुलिस आदेश संख्या 268/99 की जांच की। न्यायालय ने नोट किया कि यद्यपि उक्त आदेश कुछ विषयों के ज्ञान की आवश्यकता के बारे में कहता है, लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा, विशेषकर विधि पेपर, उत्तीर्ण करना एसीपी/एमएसीपी लाभ के लिए पूर्व-शर्त है।
इस आधार पर, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि राज्य यह दिखाने में विफल रहा कि कोई ऐसा नियम है जो एसीपी/एमएसीपी के लिए बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा को अनिवार्य बनाता हो। ऐसे नियम के अभाव में, मात्र इस कारण कि याचिकाकर्ता ने परीक्षा देर से पास की, प्राधिकार एसीपी/एमएसीपी लाभ देने से इनकार या उन्हें रद्द नहीं कर सकते थे।
इसके बाद न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत पूर्वनिर्णयों (प्रिसिडेंट्स) का संदर्भ लिया। न्यायालय ने माना कि यह मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Amresh Kumar Singh तथा खंडपीठों के निर्णय Ram Subhag Singh, Anjani Kumar, Smt. Jivachi Devi और Shri Krishna Singh & Anr. द्वारा पूर्णत: आच्छादित है, जिनमें से कुछ को सर्वोच्च न्यायालय ने अनुमोदित भी किया है। इन सभी निर्णयों से यह स्पष्ट होता है कि समयबद्ध वित्तीय उन्नतियां जैसे एसीपी/एमएसीपी विभागीय या शैक्षणिक परीक्षाएं उत्तीर्ण न करने के आधार पर रोकी नहीं जा सकतीं।
न्यायालय ने वसूली के प्रश्न पर भी विचार किया। उसने पुनः यह स्थापित सिद्धांत दोहराया कि जब अतिरिक्त भुगतान अधिकारियों की अपनी लापरवाही या देरी के कारण हुआ हो और उसमें कर्मचारी की किसी प्रकार की धोखाधड़ी या गलत बयानी न हो, तो पहले से सेवानिवृत्त व्यक्ति से कोई वसूली नहीं की जा सकती। न्यायालय ने माना कि वर्तमान मामले में न तो याचिकाकर्ता द्वारा कोई गलत बयानी हुई और न ही कोई धोखाधड़ी। यदि कोई अतिरिक्त वेतन दिया भी गया, तो वह केवल प्रतिवादी अधिकारियों की लापरवाही और त्रुटि के कारण था।
इस पहलू पर, न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय के Rafiq Masih और Thomas Daniel के निर्णयों द्वारा पूर्णतः आच्छादित है। दोनों निर्णय सरकार को इस प्रकार की राशि सेवानिवृत्त कर्मचारियों या सेवानिवृत्ति के कगार पर खड़े कर्मचारियों से वसूलने से रोकते हैं।
इन सभी कारकों पर विचार करने के बाद, न्यायालय ने माना कि 24.04.2023 (डीआईजी, मुंगेर रेंज द्वारा) और 28.04.2023 (एसपी, जमुई द्वारा) दिनांकित दोनों विवादित आदेश “विकृत (परवर्स) एवं विधि के प्रतिकूल” हैं। अतः न्यायालय ने दोनों आदेशों को निरस्त कर दिया।
न्यायालय ने प्रतिवादी अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को देय तिथियों से ही एसीपी/एमएसीपी के लाभ प्रदान करें, इस तथ्य से अप्रभावित रहकर कि उसने बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा समय पर उत्तीर्ण नहीं की थी। यह कार्यवाही न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त होने अथवा उसके उत्पादन की तिथि से चार सप्ताह के भीतर पूर्ण की जानी चाहिए।
इन निर्देशों के साथ, रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के अनेक पुलिस कर्मियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्होंने समय पर कुछ विभागीय या बेसिक ट्रेनिंग परीक्षाएं उत्तीर्ण नहीं की हैं, परंतु बिना पदोन्नति के लंबे समय तक सेवा की है।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि एसीपी और एमएसीपी सेवा के वर्षों से जुड़ी वित्तीय सुविधाएं हैं, न कि अकादमिक प्रदर्शन से। जब तक कोई स्पष्ट नियम न हो, सरकार कई वर्षों बाद अचानक यह नहीं कह सकती कि पुरानी ट्रेनिंग परीक्षा में असफलता पूरी सेवा अवधि के लाभों को समाप्त कर देगी।
निर्णय से सेवानिवृत्त कर्मचारियों को आर्थिक कठिनाई से भी संरक्षण मिलता है। जब नियोक्ता स्वयं गलती से लाभ दे देता है और फिर सेवानिवृत्ति के बाद धन की वसूली का प्रयास करता है, तो न्यायालय ने याद दिलाया है कि जब कर्मचारी की ओर से कोई धोखाधड़ी या कपट न हो, तो ऐसी वसूली अवैध है।
संक्षेप में, यह निर्णय लंबे समय तक सेवा करने वाले निचले पदों के कर्मचारियों की स्थिति को मज़बूत करता है, जो सेवानिवृत्ति के बाद अपने भरण-पोषण के लिए एसीपी/एमएसीपी की रकम और पेंशन पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं।
कानूनी प्रश्न और उत्तर
- प्रश्न: क्या बिहार पुलिस केवल इस आधार पर एसीपी/एमएसीपी लाभ रद्द कर सकती है और हक की तिथि पुनर्निर्धारित कर सकती है कि कर्मचारी ने बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा उत्तीर्ण की तिथि से ही उसे लाभ मिले?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि एसीपी/एमएसीपी के लिए बेसिक ट्रेनिंग परीक्षा उत्तीर्ण करना पूर्व-शर्त बनाने वाला कोई नियम नहीं है और बाध्यकारी पूर्वनिर्णयों के आलोक में विभागीय परीक्षाओं को समयबद्ध एसीपी/एमएसीपी लाभों में बाधा नहीं माना जा सकता। - प्रश्न: क्या राज्य, किसी सेवानिवृत्त पुलिस कांस्टेबल से, जिसने कोई गलत बयानी या धोखाधड़ी नहीं की, एसीपी/एमएसीपी के कथित अतिरिक्त भुगतान की वसूली कर सकता है?
उत्तर: नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने माना कि जब अतिरिक्त भुगतान नियोक्ता की अपनी लापरवाही के कारण हो और कर्मचारी की किसी गलती के कारण न हो, तो सेवानिवृत्त कर्मचारी से कोई वसूली नहीं की जा सकती। - प्रश्न: क्या 24.04.2023 और 28.04.2023 दिनांकित, एसीपी/एमएसीपी लाभ वापस लेने वाले, सेवानिवृत्ति पश्चात के आदेश वैध हैं?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने इन आदेशों को विकृत और विधि के प्रतिकूल पाया, उन्हें रद्द कर दिया और देय तिथियों से एसीपी/एमएसीपी लाभ बहाल करने का निर्देश दिया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- State of Bihar & Ors. vs. Ram Subhag Singh, 2022 (2) PLJR 773 (Patna High Court, Division Bench).
- State of Bihar & Ors. vs. Anjani Kumar, 2013 (2) PLJR 643, affirmed by Supreme Court order dated 10.03.2014 in SLP (C) No. 19182 of 2013.
- State of Bihar & Ors. vs. Smt. Jivachi Devi, 2020 (2) BLJ 471, with State’s SLP dismissed by the Supreme Court.
- The State of Bihar & Ors. vs. Shri Krishna Singh & Anr., L.P.A. No. 372 of 2019 (Patna High Court, Division Bench).
- Amresh Kumar Singh & Ors. vs. The State of Bihar & Ors., 2023(2) PLJR (SC) 423 (Supreme Court).
- State of Punjab & Ors. vs. Rafiq Masih & Ors., (2015) 4 SCC 334 (Supreme Court).
- Thomas Daniel vs. State of Kerala & Ors., 2022 SCC Online SC 536 (Supreme Court).
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 8063 of 2023
मामले का शीर्षक: Raj Kumar Jha vs. The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2024 (2) PLJR 427
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
कोरम: Hon’ble Mr. Justice Mohit Kumar Shah
निर्णय की तिथि: 01.04.2024
अधिवक्ता:
याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Prince Kumar Mishra, Advocate
प्रतिवादियों की ओर से: Mr. P. K. Verma (AAG-3); Mr. Saroj Kumar Sharma, AC to AAG-3
मामले का स्वरूप: सेवानिवृत्ति के बाद एसीपी/एमएसीपी लाभ रद्द करने वाले आदेशों को चुनौती देने तथा वसूली से संरक्षण की मांग करने वाली सिविल रिट अधिकारिता के अंतर्गत दायर रिट याचिका।
निर्णय की प्रति का लिंक: Patna High Court official judgment link
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