मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता की नियुक्ति 29.04.2007 को प्रखंड पंचायत हरिया, जिला पूर्णिया के अंतर्गत पंचायत शिक्षक के रूप में की गई थी।
नियुक्ति के समय उसके पास मध्यम (Madhyama) प्रमाणपत्र था, जिसे मैट्रिक के समकक्ष माना जाता है। वह अनुसूचित जाति श्रेणी से संबंधित थी।
उसकी नियुक्ति बिहार पंचायत प्राथमिक शिक्षक (नियोजन एवं सेवा शर्तें) नियमावली, 2006 के नियम 4(iii) के तहत की गई थी। यह नियम इस बात की अनुमति देता है कि जब कोई भी अनुसूचित जाति का अभ्यर्थी इंटरमीडिएट अर्हता के साथ उपलब्ध न हो, तब मैट्रिक या समकक्ष अर्हता वाला अनुसूचित जाति का अभ्यर्थी पंचायत शिक्षक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।
हालांकि, यह शिथिलता एक स्पष्ट शर्त के साथ आती है। इस प्रकार नियुक्त अभ्यर्थी को नियुक्ति की तारीख से छह वर्ष की अवधि के भीतर निर्धारित इंटरमीडिएट की अर्हता प्राप्त करनी अनिवार्य है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, वह अस्वस्थता के कारण इस छह वर्ष की अवधि के भीतर इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर सकी।
बाद में, याचिकाकर्ता ने 08.07.2015 को पंचायत शिक्षक के पद से इस्तीफा दे दिया। उसका इस्तीफा 15.07.2015 को प्राधिकारियों द्वारा स्वीकार कर लिया गया।
याचिकाकर्ता ने तत्पश्चात 13.07.2015 की तिथि का एक आवेदन देकर अपने इस्तीफे को वापस लेने का अनुरोध किया, अर्थात् इस्तीफा स्वीकार होने से पहले। उसका कहना था कि इस्तीफा वापसी के इस अनुरोध पर समुचित विचार नहीं किया गया।
जिला शिक्षक नियोजन अपीलीय प्राधिकार, पूर्णिया ने उसकी अपील खारिज कर दी। राज्य अपीलीय प्राधिकार, शिक्षा विभाग, बिहार, पटना ने 15.01.2019 के आदेश द्वारा जिला प्राधिकार के निर्णय की पुष्टि की और उसकी अपील खारिज कर दी।
राज्य अपीलीय प्राधिकार के आदेश से आहत होकर, याचिकाकर्ता ने वर्तमान सिविल रिट क्षेत्राधिकार वाद संख्या 7196/2019 के माध्यम से पटना उच्च न्यायालय की शरण ली।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा की एकलपीठ के समक्ष 05.12.2023 को इस मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता उपस्थित हुए और राज्य की ओर से अधिवक्ता उपस्थित हुए।
न्यायालय के समक्ष मूल विवाद दो पहलुओं पर केंद्रित था। पहला, क्या मध्यम (मैट्रिक-समकक्ष) प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्त अनुसूचित जाति की पंचायत शिक्षक, जिसने छह वर्ष के भीतर इंटरमीडिएट की अर्हता प्राप्त नहीं की, पुनर्नियुक्ति (reinstatement) का दावा कर सकती है? दूसरा, क्या इस्तीफा स्वीकार किए जाने से पूर्व उसे वापस लेने का उसका प्रयास उसे पुनः सेवा में लिए जाने का अधिकार दे सकता है?
याचिकाकर्ता की ओर से यह प्रस्तुत किया गया कि अस्वस्थता के कारण वह निर्धारित छह वर्ष की अवधि में इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर सकी। यह तर्क दिया गया कि उसकी इस व्यक्तिगत कठिनाई पर विचार किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि यद्यपि उसने 08.07.2015 को इस्तीफा दिया, उसने 13.07.2015 को उस इस्तीफे को वापस लेने हेतु आवेदन प्रस्तुत किया। चूंकि यह इस्तीफा वापसी का अनुरोध 15.07.2015 को इस्तीफा स्वीकार किए जाने से पूर्व किया गया था, इसलिए उसका दावा था कि उसके इस्तीफे को वापस लिया हुआ माना जाना चाहिए। उसका कहना था कि जिला अपीलीय प्राधिकार, पूर्णिया ने इस तथ्य पर समुचित विचार नहीं किया, तथा राज्य अपीलीय प्राधिकार ने भी जिला प्राधिकार के आदेश की अनुचित रूप से पुष्टि कर दी।
दूसरी ओर, राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता ने 2006 के नियमों के नियम 4(iii) में निहित मूलभूत शर्त को कभी पूरा ही नहीं किया। उसने नियुक्ति की तिथि से छह वर्ष की अवधि के भीतर भी इंटरमीडिएट उत्तीर्ण नहीं किया। राज्य के अनुसार यह विधिक (statutory) आवश्यकता अनिवार्य थी।
राज्य का कहना था कि ऐसी स्थिति में, भले ही उसका इस्तीफा स्वीकार किए जाने से पूर्व वापस ले लिया गया हो, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। कारण सरल था: उसके पास विधि द्वारा अपेक्षित शैक्षिक अर्हता का प्रमाणपत्र उपलब्ध ही नहीं था। अतः वह पंचायत शिक्षक के रूप में न तो सेवा जारी रख सकती थी और न ही पुनः नियुक्त की जा सकती थी।
न्यायालय ने बिहार पंचायत प्राथमिक शिक्षक (नियोजन एवं सेवा शर्तें) नियमावली, 2006 के नियम 4(iii) का परीक्षण किया। यह नियम शिक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए न्यूनतम शैक्षिक अर्हता के रूप में इंटरमीडिएट का प्रावधान करता है।
यह नियम अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों के लिए एक अपवाद प्रदान करता है। यदि इंटरमीडिएट प्रमाणपत्र वाला कोई अनुसूचित जाति का अभ्यर्थी उपलब्ध न हो, तो मैट्रिक या समकक्ष अर्हता वाला अभ्यर्थी नियुक्त किया जा सकता है। किंतु यह लाभ एक महत्वपूर्ण शर्त के साथ जुड़ा है: नियुक्त अभ्यर्थी को छह वर्ष की अवधि के भीतर इंटरमीडिएट प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा।
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि यह नियम छह वर्ष की अवधि में किसी प्रकार की शिथिलता का प्रावधान नहीं करता। इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो व्यक्तिगत कठिनाइयों, जिसमें अस्वस्थता भी शामिल है, के कारण अवधि बढ़ाने की अनुमति प्राधिकारियों या न्यायालय को देता हो।
न्यायालय ने आगे यह भी अवलोकन किया कि जब नियम स्वयं किसी शिथिलता का प्रावधान नहीं करता, तब व्यक्तिगत कठिनाई को विधिक आवश्यकता में छूट देने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
यह भी निर्विवाद था कि याचिकाकर्ता ने 29.04.2007 को अपनी नियुक्ति की तिथि से निर्धारित छह वर्ष की अवधि के भीतर इंटरमीडिएट की अर्हता प्राप्त नहीं की थी। अतः जुलाई 2015 में जब उसके इस्तीफे तथा उसके वापस लेने से संबंधित प्रश्न उत्पन्न हुए, तब तक वह नियमों के अंतर्गत आवश्यक मूलभूत अर्हता से ही वंचित थी।
इन तथ्यों पर विचार करने के बाद न्यायालय एक स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुंचा। भले ही याचिकाकर्ता का यह दावा सही मान लिया जाए कि उसका इस्तीफा स्वीकार किए जाने से पूर्व ही उसने इसे वापस ले लिया था, तब भी उसे पुनः नियुक्त नहीं किया जा सकता। कारण यह था कि उसने नियम 4(iii) के अंतर्गत अनिवार्य अवधि के भीतर मूलभूत शैक्षिक अर्हता प्राप्त करने में असफलता प्रदर्शित की थी।
दूसरे शब्दों में, इस्तीफे के विधिवत वापस लिए जाने का प्रश्न विधिक रूप से अप्रासंगिक हो गया। अधिक मौलिक मुद्दा यह था कि शैक्षिक अर्हता की पूर्ति न होने के कारण वह उस पद पर बने रहने के लिए ही अयोग्य थी।
अतः न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि अर्हता के अभाव के कारण याचिकाकर्ता को पंचायत शिक्षक के रूप में पुनः सेवा में नहीं लिया जा सकता।
इसी आधार पर न्यायालय ने राज्य अपीलीय प्राधिकार के उस आदेश में कोई त्रुटि नहीं पाई, जिसमें जिला शिक्षक नियोजन अपीलीय प्राधिकार, पूर्णिया के निर्णय की पुष्टि की गई थी।
फलस्वरूप, पटना उच्च न्यायालय ने रिट याचिका को खारिज कर दिया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय पंचायत शिक्षकों तथा बिहार पंचायत प्राथमिक शिक्षक (नियोजन एवं सेवा शर्तें) नियमावली, 2006 के अंतर्गत नियुक्त अन्य स्थानीय निकाय शिक्षकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
यह इस बात को रेखांकित करता है कि मैट्रिक स्तर की अर्हता पर नियुक्त अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों के लिए इंटरमीडिएट प्राप्त करने की छह वर्ष की अवधि सख्त और अपरिवर्तनीय है।
न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि जब नियम स्वयं किसी शिथिलता की अनुमति नहीं देते, तब व्यक्तिगत समस्याओं, जिनमें अस्वस्थता भी शामिल है, का उपयोग इस विधिक समय-सीमा में ढील पाने के लिए नहीं किया जा सकता।
शर्तों के साथ नियुक्त शिक्षकों के लिए यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि शैक्षिक अर्हता का पालन न करने से पुनर्नियुक्ति पर रोक लग सकती है, भले ही इस्तीफे या अन्य सेवा-संबंधी विवाद क्यों न हों।
यह निर्णय नियुक्ति प्राधिकारियों और अपीलीय निकायों के लिए भी संकेत देता है कि उन्हें 2006 के नियमों के अंतर्गत अर्हता संबंधी प्रावधानों को सख्ती से लागू करना होगा। वे ऐसे शिक्षकों को न तो सेवा में बनाए रख सकते हैं और न ही पुनः नियुक्त कर सकते हैं, जो निर्धारित समय के भीतर इन अनिवार्य शर्तों को पूरा करने में विफल रहते हैं।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या 2006 के नियमों के नियम 4(iii) के अंतर्गत मैट्रिक-समकक्ष अर्हता पर नियुक्त अनुसूचित जाति की पंचायत शिक्षक, यदि वह छह वर्ष के भीतर इंटरमीडिएट प्राप्त करने में विफल रहती है लेकिन यह दावा करती है कि उसने अपना इस्तीफा स्वीकार होने से पहले ही वापस ले लिया था, पुनर्नियुक्त किए जाने की अधिकारी है?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता ने अनिवार्य छह वर्ष की अवधि के भीतर इंटरमीडिएट की अर्हता प्राप्त नहीं की, अतः उसके पास आवश्यक मूलभूत अर्हता का अभाव रहा। इसलिए, यह मान भी लिया जाए कि उसका इस्तीफा स्वीकार होने से पहले वापस ले लिया गया था, तब भी उसे पुनः सेवा में नहीं लिया जा सकता।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय में किसी अन्य पूर्व निर्णय का उल्लेख नहीं है और न ही उस पर भरोसा किया गया है।
मामले का विवरण
वाद संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 7196 of 2019
वाद का शीर्षक: Kaushalaya Devi v. The State of Bihar & Ors.
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Anil Kumar Sinha
उद्धरण: 2024 (1) PLJR 653
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री तेज बहादुर सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री अनिल कुमार औल, अधिवक्ता; श्री बिनोद कुमार सिन्हा, अधिवक्ता
- प्रतिवादीगण (राज्य) की ओर से: श्री सुभाष चन्द्र मिश्रा, SC16
मामले का स्वरूप: राज्य अपीलीय प्राधिकार द्वारा जिला शिक्षक नियोजन अपीलीय प्राधिकार के निर्णय की पुष्टि करने वाले आदेश को चुनौती देने वाली सिविल रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत रिट याचिका।
निर्णय की तिथि: 05.12.2023
निर्णय की प्रति का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर निर्णय का पूर्ण पाठ
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