न्यायालय ने पाया कि प्राधिकारियों ने जांच पदाधिकारी द्वारा दिया गया क्लीन चिट अस्वीकार करते समय उसे उचित उत्तर देने का अवसर दिए बिना ही दंडित कर दिया।
दंडादेश और अपील खारिज करने दोनों आदेशों को निरस्त कर दिया गया।
मामले को पुनः कानून के अनुसार निस्तारण के लिए प्राधिकारियों के समक्ष भेजा गया है, यदि वे ऐसा करना चाहें।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता की नियुक्ति वर्ष 2009 में पुलिस अवर निरीक्षक के रूप में हुई थी। सितंबर 2020 में, उनकी पदस्थापना वैशाली जिले के गंगा ब्रिज थाना में प्रभारी थानाध्यक्ष (SHO) के रूप में की गई।
उनके अनुसार, वे अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से तथा अपने वरिष्ठ अधिकारियों की संतुष्टि के साथ निर्वहन कर रहे थे। दिनांक 25.11.2020 को उन्हें सूचना मिली कि कुछ असामाजिक तत्व अवैध शराब का निर्माण कर रहे हैं तथा उसके बड़े पैमाने पर भंडारण कर रखे हैं, जो उनके थाना क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता है।
उन्होंने सर्वप्रथम इस सूचना के संबंध में संहां क्रमांक 645 दर्ज की। इसके बाद उन्होंने अपने पुलिस दल के साथ घटना स्थल पर छापेमारी करने की तैयारी शुरू की।
वे आगे बढ़ पाते उससे पूर्व ही एंटी-लिकर टास्क फोर्स (ALTF) गंगा ब्रिज थाना पर पहुंच गई। उनके पहुंचने के बाद एक अन्य संहां प्रविष्टि क्रमांक 646 दर्ज की गई। तत्पश्चात स्थानीय पुलिस एवं ALTF द्वारा संयुक्त निरीक्षण/छापेमारी की गई।
इस संयुक्त छापेमारी के दौरान भारी मात्रा में देशी अवैध शराब, अवैध शराब निर्माण की भट्ठी तथा लगभग दस हजार लीटर कच्चा “जावा महुआ” मिश्रण बरामद किया गया।
चार दिन बाद, आदेश दिनांक 29.11.2020 द्वारा पुलिस महानिदेशक, बिहार ने याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया। 30.11.2020 की स्मरण-पत्र (मेमो) के माध्यम से विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गई, जिसमें प्रपत्र “क” में आरोप-पत्र संलग्न था।
आरोप-पत्र में बिहार पुलिस मुख्यालय (आबकारी एवं निषेध विभाग), पटना के पत्र दिनांक 24.11.2020 पर भरोसा किया गया था। इस पत्र में कहा गया था कि यदि ALTF किसी थाना क्षेत्र के अंतर्गत अवैध शराब बरामद करती है तो उस थाना के प्रभारी अधिकारी को दोषी माना जाएगा और उसके विरुद्ध कठोर विधिक एवं प्रशासी कार्रवाई की जाएगी।
इसी आधार पर, याचिकाकर्ता पर यह आरोप लगाया गया कि गंगा ब्रिज थाना क्षेत्राधिकार में, जब वे SHO थे, ALTF द्वारा भारी मात्रा में अवैध शराब एवं कच्चा माल बरामद किए जाने के कारण वे घोर लापरवाही तथा कर्तव्यच्युतता के दोषी हैं।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
विभागीय जांच अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा नियुक्त जांच पदाधिकारी के माध्यम से कराई गई। अभिलेखों/सामग्री का परीक्षण करने के उपरांत जांच पदाधिकारी ने अपनी रिपोर्ट 24.02.2021 को प्रस्तुत की।
इस रिपोर्ट में जांच पदाधिकारी ने याचिकाकर्ता को आरोपों से दोषमुक्त पाया। अन्य शब्दों में, जांच संचालित करने वाले अधिकारी को याचिकाकर्ता के विरुद्ध लापरवाही या कर्तव्यच्युतता सिद्ध करने हेतु पर्याप्त सामग्री नहीं मिली।
इसके बावजूद अनुशासनिक प्राधिकारी, पुलिस अधीक्षक, वैशाली ने जांच पदाधिकारी की निष्कर्षात्मक रिपोर्ट को स्वीकार न करने का निर्णय लिया। किंतु अपने असहमति के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज करने के बजाय उन्होंने मात्र दिनांक 28.02.2021 का एक पत्र याचिकाकर्ता को जारी कर दिया।
इस पत्र के साथ जांच रिपोर्ट की प्रति संलग्न थी और याचिकाकर्ता से केवल प्रस्तावित दंड के प्रश्न पर अपना प्रतिरक्षा-व्याख्यान प्रस्तुत करने को कहा गया। पत्र में जांच पदाधिकारी द्वारा दिए गए क्लीन चिट से असहमति के कोई कारण स्पष्ट नहीं किए गए थे।
याचिकाकर्ता ने 05.03.2021 को अपना उत्तर दाखिल किया। इस उत्तर में उन्होंने गंगा ब्रिज थाना में SHO के रूप में लगभग दो माह की अल्प अवधि के दौरान अपने कार्यों को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि इस अवधि में उन्होंने बिहार मद्य निषेध एवं शराबबंदी अधिनियम, 2016/2018 के तहत नौ एफआईआर दर्ज कीं और 4584.63 लीटर देशी तथा विदेशी शराब बरामद की। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने विधान सभा चुनाव तथा दशहरा, दीपावली और छठ पर्व के दौरान क्षेत्र में शांति व्यवस्था एवं विधि-व्यवस्था बनाए रखी।
याचिकाकर्ता ने आगे स्पष्ट किया कि 25.11.2020 को ALTF के थाना पर पहुंचने से पहले ही उन्होंने अवैध शराब गतिविधियों के संबंध में संहां क्रमांक 645 दर्ज कर ली थी और छापेमारी की तैयारी कर रहे थे। बीच में ALTF के पहुंच जाने के कारण छापेमारी संयुक्त अभियान बन गई और अवैध शराब की बरामदगी संयुक्त रूप से हुई।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इससे यह सिद्ध होता है कि वे लापरवाह नहीं बल्कि सक्रिय (प्रो-एक्टिव) थे।
इस उत्तर के बावजूद अनुशासनिक प्राधिकारी ने दिनांक 21.03.2021 का दंडादेश पारित कर दिया। इस आदेश द्वारा पुलिस अधीक्षक, वैशाली ने निम्न दंड लगाए:
- दो वार्षिक वेतन-वृद्धियों की सेवा-परिव्याप्त (क्यूम्युलेटिव) प्रभाव के साथ कटौती; तथा
- याचिकाकर्ता को किसी भी थाना में दस वर्ष तक प्रभारी थानाध्यक्ष या ओपी प्रभारी के रूप में पदस्थापित किए जाने से वंचित करना।
याचिकाकर्ता ने इस आदेश के विरुद्ध पुलिस महानिरीक्षक, तिरहुत रेंज, मुजफ्फरपुर के समक्ष अपील दायर की। अपील दिनांक 26.07.2021 के आदेश द्वारा खारिज कर दी गई और दंड बरकरार रखा गया।
उक्त आदेशों से आहत होकर याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की, जिसमें दंडादेश तथा अपीलीय आदेश दोनों को चुनौती दी गई।
उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने एक संकीर्ण किंतु महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न उठाया। उनका तर्क था कि एक बार जांच पदाधिकारी ने याचिकाकर्ता को दोषमुक्त कर दिया, तो अनुशासनिक प्राधिकारी बिना निम्नलिखित कदम उठाए सीधे दंड नहीं दे सकता था:
(क) जांच रिपोर्ट से असहमति के संभावित (टेन्टेटिव) कारणों को दर्ज करना, और
(ख) दोषसिद्धि का अंतिम निष्कर्ष रिकॉर्ड करने से पहले, उन कारणों पर याचिकाकर्ता को उत्तर देने का अवसर देना।
उन्होंने प्रस्तुत किया कि इस मामले में न तो ऐसे कोई कारण दर्ज किए गए और न ही ऐसा कोई अवसर दिया गया। दिनांक 28.02.2021 का दूसरा कारण बताओ नोटिस मात्र प्रस्तावित दंड के संबंध में उत्तर मांगता था, जिसमें याचिकाकर्ता को दोषी मानकर चला गया था और जांच पदाधिकारी से भिन्न मत रखने का कोई आधार उजागर नहीं किया गया था।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह आचरण पूर्वनिर्धारित दंडित करने की मानसिकता को दर्शाता है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Lav Nigam v. Chairman & MD, ITI Ltd. & Anr., (2006) 9 SCC 440 पर भरोसा किया।
पटना उच्च न्यायालय ने इस निर्णय के प्रमुख अंशों को उद्धृत किया। सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि जब अनुशासनिक प्राधिकारी जांच पदाधिकारी द्वारा दिए गए दोषमुक्तिकरण से असहमत होता है, तो उसे असहमति के अपने संभावित कारणों सहित पृथक नोटिस जारी कर कर्मचारी को उत्तर देने का अवसर देना आवश्यक है।
केवल उस उत्तर पर विचार करने के बाद ही प्राधिकारी दोषसिद्धि का अंतिम निष्कर्ष निकाल सकता है। उसके पश्चात प्रस्तावित दंड के संबंध में नया नोटिस देना आवश्यक होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पूर्व के निर्णय Punjab National Bank v. Kunj Behari Misra का भी उल्लेख किया, जिसमें समान सिद्धांत प्रतिपादित किए गए थे।
वर्तमान मामले में, राज्य की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने दंडादेशों का समर्थन किया और कहा कि वे किसी विधिक दोष से ग्रस्त नहीं हैं। हालांकि, वे अभिलेख पर ऐसा कोई सामग्री प्रस्तुत नहीं कर सके जिससे यह सिद्ध हो कि जांच पदाधिकारी के निष्कर्षों से असहमति के कारणों को अभिव्यक्त करते हुए कोई कारण बताओ नोटिस याचिकाकर्ता को जारी किया गया था।
पटना उच्च न्यायालय ने अभिलेख का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया। उसने नोट किया कि:
- याचिकाकर्ता को 24.02.2021 को जांच पदाधिकारी द्वारा दोषमुक्त कर दिया गया था।
- अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा इस निष्कर्ष से असहमति के कारणों को स्पष्ट करते हुए कोई पृथक नोटिस जारी नहीं किया गया।
- दिनांक 28.02.2021 का पत्र केवल दंड के प्रश्न पर नोटिस था और उसमें असहमति के कोई कारण व्यक्त नहीं थे।
न्यायालय ने माना कि यह चूक प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है। कर्मचारी को यह जानने का अधिकार है कि प्राधिकारी जांच रिपोर्ट, जो उसके पक्ष में है, को क्यों निरस्त कर रहा है, और अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व उसे उन कारणों का प्रतिवाद करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
न्यायालय ने आगे माना कि वर्तमान मामले के तथ्य सर्वोच्च न्यायालय के Lav Nigam निर्णय द्वारा पूर्णतः आच्छादित हैं। वहां भी अनुशासनिक प्राधिकारी ने असहमति का उचित नोटिस नहीं दिया था और केवल प्रस्तावित दंड के संबंध में नोटिस जारी किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी कार्यवाही को निरस्त कर दिया था।
उस नज़ीर को लागू करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि पुलिस अधीक्षक, वैशाली द्वारा पारित आदेश दिनांक 23.03.2021 तथा पुलिस महानिरीक्षक, तिरहुत रेंज, मुजफ्फरपुर द्वारा पारित अपीलीय आदेश दिनांक 26.07.2021 “अनुचित, अन्यायपूर्ण और अवैध” हैं और इस प्रकार विधि की दृष्टि में दोषपूर्ण (विषाक्त) हो गए हैं।
तदनुसार, न्यायालय ने दोनों आदेश निरस्त कर दिए और रिट याचिका स्वीकार कर ली।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय सभी सरकारी कर्मचारियों, विशेषतः पुलिसकर्मियों, के लिए महत्वपूर्ण है, जो विभागीय जांच का सामना करते हैं।
यह स्पष्ट करता है कि यदि जांच पदाधिकारी किसी कर्मचारी को आरोपों से मुक्त कर देता है, तो उच्च प्राधिकारी गुप्त रूप से असहमत होकर, कारण बताए बिना, उसे दंडित नहीं कर सकता। प्राधिकारी को पहले अपनी असहमति के संभावित कारण कर्मचारी के साथ साझा करने होंगे और उन कारणों पर उसकी सुनवाई करनी होगी।
निषेध लागू करने जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पदस्थ पुलिस अधिकारियों के लिए यह निर्णय यह संदेश देता है कि केवल इसलिए कि किसी अन्य एजेंसी ने उनके क्षेत्र में बरामदगी की है, उन्हें यांत्रिक रूप से दंडित नहीं किया जा सकता। विधिसम्मत प्रक्रिया और निष्पक्ष सुनवाई अनिवार्य हैं।
साधारण नागरिकों और सरकारी कर्मचारियों के लिए यह निर्णय इस बात को पुष्ट करता है कि “प्राकृतिक न्याय” — स्वयं का बचाव करने का निष्पक्ष अवसर — कोई खोखली औपचारिकता नहीं है। यदि प्राधिकारी इस चरण को छोड़ देते हैं, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर दंड को रद्द कर सकते हैं।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
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प्रश्न: क्या अनुशासनिक प्राधिकारी, जांच पदाधिकारी द्वारा कर्मचारी को दोषमुक्त किए जाने के बाद, असहमति के कारण दर्ज किए बिना और उन कारणों पर उत्तर देने का अवसर दिए बिना, उस पर दंड आरोपित कर सकता है?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि अनुशासनिक प्राधिकारी को जांच पदाधिकारी से असहमति के अपने संभावित कारण दर्ज करने तथा कर्मचारी को उन पर उत्तर देने का अवसर देना अनिवार्य है। ऐसा न करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है और दंड को विधिक रूप से दोषपूर्ण (विषाक्त) बना देता है। -
प्रश्न: क्या दंडादेश दिनांक 23.03.2021 और अपीलीय आदेश दिनांक 26.07.2021 विधिसम्मत रूप से टिकाऊ थे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि उचित असहमति-नोटिस (शो कॉज) जारी न किए जाने के कारण दोनों आदेश अनुचित, अन्यायपूर्ण, अवैध हैं और विधि की दृष्टि में दोषपूर्ण हो गए हैं। अतः दोनों आदेश निरस्त कर दिए गए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत वाद
- Lav Nigam v. Chairman & MD, ITI Ltd. & Anr., (2006) 9 SCC 440
- Punjab National Bank v. Kunj Behari Misra, (1998) 7 SCC 84 : 1998 SCC (L&S) 1783 (जिसका उल्लेख Lav Nigam के उद्धरण में किया गया)
मामले का विवरण
वाद संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 20370 of 2021
वाद शीर्षक: Santosh Kumar Pankaj v. The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2024(1) PLJR 638
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Mohit Kumar Shah
निर्णय की तिथि: 30.11.2023
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Vinay Ranjan, Advocate; Mr. Abhishek Teerthankar, Advocate
- प्रतिवादीगण (राज्य) की ओर से: Mr. Manish Kumar, GP-4; Mr. Ajay Kumar, AC to GP-4
मामले का स्वरूप: रिट याचिका (सेवा/अनुशासनिक मामला)
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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