मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता बिहार सरकार के भवन निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंता थे। सेवा के दौरान उनके विरुद्ध एक सतर्कता (विजिलेंस) मामला दर्ज किया गया। सतर्कता प्रतिवेदन के आधार पर उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही शुरू की गई और भवन निर्माण विभाग द्वारा जारी आदेश दिनांक 11.11.2014 से उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
इस बर्खास्तगी आदेश को, जांच प्रतिवेदन के साथ, पटना उच्च न्यायालय में C.W.J.C. No. 2015 of 2015 में चुनौती दी गई। 06.02.2017 को उच्च न्यायालय ने जांच प्रतिवेदन और बर्खास्तगी आदेश, दोनों को रद्द कर दिया। न्यायालय ने पाया कि जांच बिना किसी साक्ष्य प्रस्तुत किए संचालित की गई थी और अनुशासनिक प्राधिकारी ने यांत्रिक एवं बिना कारण वाला आदेश पारित किया था।
उस निर्णय द्वारा, न्यायालय ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता दी कि वह यह तय करे कि क्या वह बिहार पेंशन नियम, 1950 के तहत याचिकाकर्ता के विरुद्ध कार्यवाही जारी रखना चाहती है। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया कि यदि ऐसा निर्णय लिया जाता है तो कार्यवाही को छह माह के भीतर समाप्त कर अंतिम आदेश पारित किया जाए, जो आदेश की प्राप्ति या प्रस्तुति की तारीख से गिना जाएगा, अन्यथा, जब तक विलंब याचिकाकर्ता के कारण न हो, यह स्वतंत्रता स्वतः समाप्त हो जाएगी।
याचिकाकर्ता प्रथम रिट याचिका के लंबित रहने के दौरान 31.03.2016 को सेवा से सेवानिवृत्त हो गए। उन्होंने 06.02.2017 की उच्च न्यायालय की आदेश प्रतिलिपि 28.02.2017 को भवन निर्माण विभाग के प्रधान सचिव को प्रेषित की। अतः न्यायालय द्वारा निर्धारित समय सीमा के अनुसार पेंशन नियमों के अंतर्गत कोई भी कार्यवाही 28.08.2017 तक पूरी कर ली जानी थी।
इसके बावजूद, विभाग ने बिहार पेंशन नियम, 1950 के अंतर्गत कार्यवाही को केवल 15.05.2017 को पुनर्जीवित कर रूपांतरित किया। प्रतिवादियों ने बाद में, द्वितीय पूरक प्रतिरूप-शपथपत्र में, यह स्वीकार किया कि M.J.C. No. 2863 of 2017 दायर की गई थी, जिसमें पेंशन नियमों के तहत कार्यवाही पूर्ण करने के लिए समयविस्तार मांगा गया था, परन्तु इसे 16.05.2018 को वापस ले लिया गया। उच्च न्यायालय द्वारा कभी कोई समयविस्तार प्रदान नहीं किया गया।
फिर भी, 03.08.2018 को राज्य सरकार ने न्यायालय द्वारा निर्धारित छह माह की अवधि से बहुत बाद में, याचिकाकर्ता की 100% पेंशन ज़ब्त करने का आदेश पारित किया। यह आदेश, जो ज्ञापन संख्या 8308 में निहित था और अवर सचिव के हस्ताक्षर से जारी हुआ था, को C.W.J.C. No. 10754 of 2018 में चुनौती दी गई।
14.05.2019 को, उस रिट याचिका में पटना उच्च न्यायालय ने समयबद्ध पूर्व निर्देशों का अनुपालन न होने के कारण पेंशन ज़ब्ती आदेश को रद्द कर दिया। न्यायालय ने भवन निर्माण विभाग के प्रधान सचिव को तीन माह के भीतर सभी सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान करने का निर्देश दिया, याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति तिथि 31.03.2016 मानते हुए, ऐसे जैसे वे उस तिथि तक सेवा में रहे हों। यह आदेश 21.05.2019 को प्रतिवादियों को तामील कराया गया।
C.W.J.C. No. 10754 of 2018 में याचिकाकर्ता के सफल होने के बाद, प्रतिवादियों ने पहले से निरसित एक अन्य विभागीय कार्यवाही को पुनर्जीवित कर जारी रखा, जो ज्ञापन संख्या 3941 दिनांक 11.05.2017 के संकल्प द्वारा किया गया था। यह कार्यवाही बिहार पेंशन नियम, 1950 के नियम 43(b) के अंतर्गत, कथित अनुपातहीन संपत्ति से संबंधित उसी आरोपसमूह के लिए थी।
ज्ञापन संख्या 1478 दिनांक 11.10.2017 के तहत, याचिकाकर्ता को अतिरिक्त विभागीय जांच आयुक्त-कम-प्रधान सचिव, श्रम संसाधन विभाग के समक्ष अपना पक्ष (शो-कॉज) दाखिल करने हेतु कहा गया। उन्होंने 02.11.2017 को अपना शो-कॉज दाखिल किया। तथापि, याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्हें 26.09.2018 के ज्ञापन संख्या 41 के अनुसार उनके शो-कॉज पर विभाग की राय की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई। 12.10.2018 के बाद कोई अगली सुनवाई की तारीख निर्धारित नहीं की गई।
इसके बावजूद, अतिरिक्त विभागीय जांच आयुक्त ने 12.10.2018 को याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति में कार्यवाही का समापन कर दिया, 22.10.2018 को अपना जांच प्रतिवेदन तैयार किया और 20.11.2018 को इसे विभाग को अग्रसारित कर दिया।
इस प्रतिवेदन की प्राप्ति पर, याचिकाकर्ता को 03.01.2019 के पत्र संख्या 58 द्वारा द्वितीय शो-कॉज नोटिस जारी की गई, जिसमें उनसे जांच प्रतिवेदन पर उत्तर देने को कहा गया। याचिकाकर्ता द्वारा उत्तर देने के बाद, आगे एक और द्वितीय शो-कॉज नोटिस 07.06.2019 के पत्र संख्या 5126 द्वारा दी गई, जिसमें बिहार पेंशन नियम, 1950 के तहत पूर्ण पेंशन रोके जाने की सजा का प्रस्ताव रखा गया।
याचिकाकर्ता ने 27.06.2019 को पुनः विस्तृत शो-कॉज दाखिल कर विभागीय जांच में की गई गैरकानूनीताओं की ओर संकेत किया। तथापि, अनुशासनिक प्राधिकारी ने आदेश दिनांक 15.10.2019 (जो 17.10.2019 के ज्ञापन संख्या 9267 में निहित है) द्वारा उनकी पूर्ण पेंशन रोकने का निर्देश दिया। यही आदेश वर्तमान रिट याचिका C.W.J.C. No. 23625 of 2019 में याचिकाकर्ता द्वारा चुनौती दी गई।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पुर्णेन्दु सिंह ने याचिकाकर्ता, राज्य तथा महालेखा परीक्षक, बिहार की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं की दलीलें सुनीं। न्यायालय ने विभिन्न विभागीय एवं पेंशन संबंधी कार्यवाहियों का इतिहास, तथा पूर्व रिट याचिकाओं व आदेशों की कड़ी को बारीकी से देखा।
न्यायालय ने पहले C.W.J.C. No. 2015 of 2015 में 06.02.2017 के अपने पूर्व निर्णय को पुनः देखा। उस पहले मामले में, याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोप सतर्कता प्रतिवेदन पर आधारित थे, जो कथित पूर्वदिनांकित प्रविष्टियों एवं रिश्वत की रकम की ट्रैप रिकवरी से संबंधित था। किंतु विभागीय जांच बिना किसी गवाह की जांच किए संचालित की गई।
अतिरिक्त विभागीय जांच आयुक्त ने पहले गवाहों की जांच हेतु कार्यवाही स्थगित की थी, परंतु बाद की तारीखों पर केवल दस्तावेजों एवं सतर्कता प्रतिवेदन के आधार पर, बिना कोई मौखिक या प्रासंगिक दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत कराए, जांच समाप्त कर दी। याचिकाकर्ता का यह स्पष्ट कथन कि किसी भी गवाह की जांच नहीं की गई, अनुत्तरित रहा।
2017 में न्यायालय ने माना था कि जांच अधिकारी का निष्कर्ष “कोई साक्ष्य न होने” पर आधारित था और अनुशासनिक प्राधिकारी की अनुमोदन भी यांत्रिक एवं बिना कारण के थी। न्यायालय ने अपने ही पूर्व निर्णय Anil Kumar v. State of Bihar (C.W.J.C. No. 280 of 2016) तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Roop Singh Negi v. Punjab National Bank, (2009) 2 SCC 570 पर भरोसा किया था।
Roop Singh Negi में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विभागीय कार्यवाही अर्द्धन्यायिक (क्वाज़ी-ज्यूडिशियल) प्रक्रिया है, जिसमें आरोपों को विधिसम्मत स्वीकार्य सामग्री से सिद्ध किया जाना आवश्यक है। सतर्कता एफआईआर या अन्वेषण सामग्री, जब तक गवाहों द्वारा सिद्ध न की जाए, स्वयं में साक्ष्य नहीं मानी जा सकती। न्यायालय ने रेखांकित किया कि निर्णय कुछ साक्ष्य पर आधारित होना चाहिए, मात्र संदेह, स्वइच्छा (ipse dixit) या अनुमान पर नहीं।
इसके अतिरिक्त, पूर्व निर्णय में Kranti Associates (P) Ltd. v. Masood Ahmed Khan, (2010) 9 SCC 496 पर भी भरोसा किया गया था। वहां सर्वोच्च न्यायालय ने उन सिद्धांतों का संक्षेप में उल्लेख किया था कि जिन न्यायिक, अर्द्धन्यायिक और प्रशासनिक निर्णयों से अधिकार प्रभावित होते हैं, उनमें कारणों का उल्लेख करना अनिवार्य है। ऐसे कारण स्पष्ट, तर्कसंगत और महज दिखावे के लिए नहीं होने चाहिए।
इन्हीं आधारों पर, उच्च न्यायालय ने 2017 में जांच प्रतिवेदन और बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिए थे, परंतु राज्य सरकार को बिहार पेंशन नियम, 1950 के अंतर्गत सख्ती से छह माह की अवधि के भीतर कार्रवाई करने की स्वतंत्रता छोड़ दी थी।
वर्तमान मामले में न्यायालय ने उल्लेख किया कि 2017 के आदेश की प्राप्ति/प्रस्तुति से छह माह की यह अवधि, राज्य को दी गई कार्यवाही जारी रखने की स्वतंत्रता पर स्पष्ट शर्त थी। आदेश में यह भी कहा गया था कि यदि याचिकाकर्ता के कारणों को छोड़कर, छह माह के भीतर निर्णय लेकर अंतिम आदेश पारित नहीं किया गया, तो यह स्वतंत्रता स्वतः निरस्त हो जाएगी।
विभाग ने M.J.C. No. 2863 of 2017 द्वारा इस समय सीमा को बढ़ाने का प्रयास किया, परंतु यह प्रार्थना 16.05.2018 को वापस ले ली गई। अतः कोई समयविस्तार कभी भी मंजूर नहीं हुआ। फिर भी, 03.08.2018 का आदेश, जिसमें याचिकाकर्ता की पूरी पेंशन ज़ब्त की गई, छह माह की सीमा से बहुत बाद में पारित किया गया। इसे पहले ही न्यायालय ने 14.05.2019 को C.W.J.C. No. 10754 of 2018 में अवैध ठहराकर रद्द कर दिया था।
विवादित आदेश दिनांक 15.10.2019 के संदर्भ में, न्यायालय ने देखा कि पूर्व न्यायालयीय आदेशों के बाद पुनर्जीवित जांच किस प्रकार संचालित की गई। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उन्हें अपने शो-कॉज पर विभाग की राय की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई और जांच को एकतरफा (एक्स-पार्टी) रूप से समाप्त करने से पहले उन्हें समुचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। एक निश्चित चरण के बाद उनकी भागीदारी के बिना ही जांच प्रतिवेदन तैयार कर विभाग को भेज दिया गया।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि भले ही अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार सीमित है और वह अपीलीय प्राधिकारी की तरह साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता, फिर भी जहां प्रक्रिया में अवैधता, नियमों का उल्लंघन, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हनन, या कारणों का अभाव हो, वहां वह हस्तक्षेप कर सकता है। इस संदर्भ में B.C. Chaturvedi v. Union of India, (1995) 6 SCC 749 तथा Union of India v. P. Gunasekaran, (2015) 2 SCC 610 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देकर न्यायिक पुनरीक्षण के इन सीमित दायरों का सार प्रस्तुत किया गया।
B.C. Chaturvedi में स्पष्ट किया गया कि जहां कुछ विधिसम्मत साक्ष्य उपलब्ध हों, वहां न्यायालय साक्ष्यों की पर्याप्तता का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता और न ही अपना मत अनुशासनिक प्राधिकारी के मत के स्थान पर रख सकता है। किंतु यदि निष्कर्ष विकृत (परवर्स) हों, किसी साक्ष्य पर आधारित न हों, या अभिलेख पर प्रत्यक्ष त्रुटि दिखाई दे, तो सर्टियोरारी जारी की जा सकती है। P. Gunasekaran में उच्च न्यायालयों द्वारा अनुच्छेद 226/227 के तहत क्या-क्या नहीं किया जा सकता, जैसे साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन या उसकी विश्वसनीयता पर जाना, यह सूचीबद्ध किया गया, साथ ही यह मान्यता भी दी गई कि जहां निष्कर्ष किसी विधिसम्मत साक्ष्य से समर्थित न हों या स्वयं प्रक्रिया ही अवैध हो, वहां हस्तक्षेप संभव है।
न्यायालय ने यह सिद्धांत भी दोहराया कि जिन आदेशों से अधिकार प्रभावित होते हैं, वे कारणयुक्त और बोलते हुए (स्पीकिंग) होने चाहिए। Kranti Associates के अतिरिक्त, न्यायालय ने Victoria Memorial Hall v. Howrah Ganatantrik Nagrik Samity, (2010) 3 SCC 732 का उल्लेख किया, जिसमें अर्द्धन्यायिक प्राधिकारियों द्वारा कारणयुक्त आदेशों की आवश्यकता पर बल दिया गया, तथा State of NCT of Delhi v. Sanjeev @ Bittoo, (2005) 5 SCC 181 का हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया कि प्रासंगिक तथ्यों पर विचार न करना, या अस्तित्वहीन अथवा प्रत्यक्ष रूप से गलत तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करना, अधिकार के प्रयोग को दूषित कर देता है।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, न्यायालय ने पाया कि अनुशासनिक प्राधिकारी ने विवादित आदेश दिनांक 15.10.2019 (ज्ञापन संख्या 9267 दिनांक 17.10.2019) पारित करते हुए कोई कारण निर्दिष्ट नहीं किया। आदेश को गैर-विस्तृत (नॉन-स्पीकिंग) और संक्षिप्त (क्रिप्टिक) बताते हुए कहा गया कि यह याचिकाकर्ता के शो-कॉज से समुचित रूप से निपटे बिना, बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 2005 के नियम 17 व नियम 18 के अनुपालन के बिना, और बिहार पेंशन नियम, 1950 के नियम 43 के प्रतिकूल होकर पारित किया गया।
न्यायालय ने माना कि यहां स्पष्ट रूप से मस्तिष्क का अनुप्रयोग न होना (नॉन-अप्लिकेशन ऑफ माइंड) दिखाई देता है। अनुशासनिक प्राधिकारी उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालने में विफल रहा। न्यायालय ने तीखे शब्दों में यह टिप्पणी की कि प्राधिकारी ने अधिकार-क्षेत्र संबंधी त्रुटि की, तथ्यों एवं विधि की उपेक्षा करते हुए कार्य किया, और निर्णय प्रक्रिया में रिक्तियां छोड़कर अनावश्यक वाद-विवाद उत्पन्न किया।
इन कारणों से, न्यायालय ने आदेश दिनांक 15.10.2019, जो 17.10.2019 के ज्ञापन संख्या 9267 में निहित है, को रद्द कर दिया। तथापि, आरोपों के गुण-दोषों पर अंतिम राहत देने के बजाय, न्यायालय ने मामले को नए आदेश के लिए अनुशासनिक प्राधिकारी के पास पुनः विचारार्थ भेज दिया।
न्यायालय ने निर्देश दिया कि अनुशासनिक प्राधिकारी, उस पर निर्णय की प्रति तामील होने की तिथि से तीन माह के भीतर, विधि के अनुरूप सख्ती से नया आदेश पारित करे। न्यायालय ने यह भी व्यक्त किया कि अनुशासनिक प्राधिकारी न्यायालय द्वारा उद्धृत सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में की गई टिप्पणियों का “पालन कर सकते हैं”।
अपने समापन टिप्पणी में न्यायालय ने सावधान किया कि कोई अनुशासनिक प्राधिकारी, जब वैधानिक विवेकाधिकार का प्रयोग कर रहा हो, तो उसे मनमौजी ढंग से कार्य करने से स्वयं को रोकना चाहिए। निर्णय अभिलेखों और विधि पर आधारित होने चाहिए, न कि मनमाने या सहज (कैज़ुअल)।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके विरुद्ध सेवा-निवृत्ति के बाद भी विभागीय या पेंशन संबंधी कार्यवाही चलती रहती है। पटना उच्च न्यायालय ने जोर देकर कहा कि जब वह सरकार को ऐसी कार्यवाही पूर्ण करने के लिए स्पष्ट समयसीमा तय कर देता है, तो उस समयसीमा का पालन अनिवार्य है। यदि राज्य उस निर्देश का पालन नहीं करता और समयविस्तार नहीं लेता, तो कार्यवाही जारी रखने की दी गई स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है।
कर्मचारियों के लिए इसका अर्थ यह है कि सरकार अनिश्चित काल तक विभागीय या पेंशन प्रकरणों को लंबित नहीं रख सकती, खासकर तब जब न्यायालय ने सख्त समयसीमा तय कर दी हो। इसका यह भी मतलब है कि पेंशन रोकने या अन्य कोई बड़ी सजा लगाने वाले आदेश कारणयुक्त और बोलते हुए होने चाहिए, जिनमें कर्मचारी के उत्तर और साक्ष्यों पर समुचित विचार दिखे।
निर्णय यह भी दोहराता है कि अनुशासनिक प्राधिकारी केवल सतर्कता प्रतिवेदन या पुराने आरोपों का हवाला देकर, बिना नए मस्तिष्क-प्रयोग के, कर्मचारी को दंडित नहीं कर सकते। उन्हें बिहार CCA नियम तथा बिहार पेंशन नियमों का पालन करना होगा, समुचित अवसर देना होगा, और स्पष्ट कारण दर्ज करने होंगे।
विभागों के लिए, यह निर्णय स्मरण कराता है कि अनुशासनिक अधिकारों का दुरुपयोग या उनका सहज/लापरवाह प्रयोग न्यायिक हस्तक्षेप को आमंत्रित करेगा। गैर-विस्तृत, संक्षिप्त आदेश, खासकर पेंशन ज़ब्ती जैसे संवेदनशील मामलों में, निरस्त किए जाने की प्रबल संभावना रखते हैं।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या अनुशासनिक प्राधिकारी, बिहार CCA नियम, 2005 और बिहार पेंशन नियम, 1950 के तहत निर्धारित प्रक्रिया तथा पूर्व उच्च न्यायालयीय निर्देशों के आलोक में, दिनांक 15.10.2019 (ज्ञापन संख्या 9267 दिनांक 17.10.2019) द्वारा वैध रूप से 100% पेंशन रोक सकता था?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि आदेश गैर-विस्तृत, संक्षिप्त, मस्तिष्क के अनुप्रयोग से रहित तथा प्रासंगिक नियमों के प्रतिकूल था। आदेश को रद्द कर दिया गया और मामले को तीन माह के भीतर नए निर्णय के लिए पुनः भेज दिया गया। - प्रश्न: विभागीय एवं पेंशन कार्यवाहियों की समीक्षा में उच्च न्यायालय की अनुच्छेद 226 के तहत शक्ति की सीमा क्या है?
उत्तर: न्यायालय ने दोहराया कि वह अपीलीय प्राधिकारी की तरह कार्य नहीं कर सकता या साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता, परंतु जहां विधि में त्रुटि, प्रक्रिया संबंधी अवैधता, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, या बिना साक्ष्य के निष्कर्ष, तथा जहां आदेश बिना कारण या मनमाने हों, वहां हस्तक्षेप कर सकता है।
न्यायालय द्वारा उद्धृत वाद
- Roop Singh Negi v. Punjab National Bank, (2009) 2 SCC 570
- Anil Kumar v. The State of Bihar (C.W.J.C. No. 280 of 2016)
- Kranti Associates (P) Ltd. v. Masood Ahmed Khan, (2010) 9 SCC 496
- B.C. Chaturvedi v. Union of India, (1995) 6 SCC 749 : 1996 SCC (L&S) 80 : (1996) 32 ATC 44
- Union of India v. P. Gunasekaran, (2015) 2 SCC 610
- Victoria Memorial Hall v. Howrah Ganatantrik Nagrik Samity, (2010) 3 SCC 732
- State of NCT of Delhi and another v. Sanjeev alias Bittoo, (2005) 5 SCC 181
- C.W.J.C. No. 2015 of 2015 (उसी याचिकाकर्ता द्वारा पूर्व रिट, पटना उच्च न्यायालय)
- C.W.J.C. No. 10754 of 2018 (उसी याचिकाकर्ता द्वारा रिट, पटना उच्च न्यायालय)
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 23625 of 2019
मामले का शीर्षक: Akhilesh Kumar Sharma v. The State of Bihar & Ors.
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Purnendu Singh
निर्णय दिनांक: 04.09.2023
उद्धरण: 2024 (2) PLJR 359
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. S. B. K. Manglam, Advocate; Mr. Awnish Kumar, Advocate
- राज्य बिहार की ओर से: Mr. Dinesh Maharaj, AC to AAG-11
- महालेखा परीक्षक, बिहार की ओर से: Mr. Bindhyachal Rai, Advocate
मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका, जिसमें बिहार पेंशन नियम, 1950 और बिहार CCA नियम, 2005 के तहत भवन निर्माण विभाग, बिहार सरकार द्वारा पारित पूर्ण पेंशन रोके जाने संबंधी विभागीय दंड आदेश को चुनौती दी गई।
निर्णय का लिंक: पूरे पटना उच्च न्यायालय के निर्णय को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
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