अप्रमाणित आरोपों पर पेंशन कटौती रद्द — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

Shubham Shivansh is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in civil disputes, service law, and GST matters. He represents clients in property disputes, contractual disagreements, service-related grievances, and tax compliance matters before the Patna High Court and other jurisdictions. His practice handles civil litigation, employment-related disputes, and regulatory matters for individuals and businesses across Bihar.

पटना उच्च न्यायालय ने एक सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक की पेंशन में 5% स्थायी कटौती को चुनौती देने वाली याचिका की समीक्षा की। न्यायालय ने पाया कि विभागीय जाँच में लगाए गए किसी भी आरोप को सिद्ध नहीं किया गया था। यह भी माना गया कि शिक्षा विभाग ने जाँच प्रतिवेदन से असहमति जताते समय कोई कारण नहीं दिया। दंडादेश को रद्द कर दिया गया और कटौती की गई पेंशन वापस करने का निर्देश दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता बांका जिला स्थित सीएनडी हाई स्कूल, बांउसी के प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यरत थे। वे 30.09.2007 को सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए।

सेवानिवृत्ति के बाद, बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43B के अंतर्गत उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गई। यह नियम सरकार को सेवानिवृत्त कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई करने, जिसमें पेंशन में कटौती भी शामिल है, की अनुमति देता है, यदि गंभीर कदाचार सिद्ध हो जाए।

07.10.2009 को याचिकाकर्ता को पांच आरोपों वाला आरोपपत्र (चार्जशीट) दिया गया। उनसे अपना बचाव प्रस्तुत करने को कहा गया। याचिकाकर्ता ने 25.01.2010 को बिंदुवार उत्तर दाखिल किया।

जाँच चलती रही और जाँच पदाधिकारी ने 15.02.2012 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस बीच, 2007 में सेवानिवृत्ति के बावजूद, याचिकाकर्ता के पूर्ण सेवानिवृत्ति एवं पेंशन संबंधी लाभों का निपटारा नहीं किया गया। इस देरी के कारण, याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में सीडब्ल्यूजेसी सं. 18441/2008 दायर की।

उस पूर्व रिट याचिका का निपटारा 21.11.2013 के आदेश द्वारा किया गया। पटना उच्च न्यायालय ने प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे नियम 43B की कार्यवाही को यथासंभव छह माह के भीतर, एक युक्तिसंगत अवधि में, निष्पादित करें। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि यदि जाँच में याचिकाकर्ता को आरोपमुक्त पाया जाता है, तो प्राधिकारीगण पर यह दायित्व होगा कि वे सभी सेवानिवृत्ति लाभों का त्वरित भुगतान सुनिश्चित करें।

बाद में, 15.09.2014 को याचिकाकर्ता को शिक्षा विभाग की ओर से द्वितीय कारण बताओ सूचना (सेकंड शो कॉज नोटिस) प्राप्त हुई। उन्होंने 23.09.2014 को अपना उत्तर प्रस्तुत किया। तत्पश्चात, निदेशक, माध्यमिक शिक्षा द्वारा दिनांक 13.02.2015 के मेमो सं. 408 के माध्यम से याचिकाकर्ता की पेंशन से 5% की स्थायी कटौती का दंड लगाया गया।

इस दंड से आक्रोशित होकर, याचिकाकर्ता ने वर्तमान रिट याचिका, सीडब्ल्यूजेससी सं. 8434/2015, पटना उच्च न्यायालय में दायर की। उन्होंने दंडादेश को रद्द करने और उनकी पेंशन से कटौती रोके जाने का निर्देश देने की माँग की।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

माननीय न्यायमूर्ति पार्थ सारथी ने याचिकाकर्ता तथा राज्य के अधिवक्ता की दलीलें सुनीं। मुख्य प्रश्न यह था कि क्या नियम 43B के अंतर्गत पेंशन में 5% स्थायी कटौती कानून एवं तथ्यों की दृष्टि से उचित थी।

मौजूदा रिट वाद की प्रारंभिक अवस्था में, 24.11.2023 को न्यायालय ने राज्य को विभागीय कार्यवाही के मूल अभिलेख प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। किन्तु प्राधिकारीगण मूल अभिलेख प्रस्तुत करने में विफल रहे।

इसके बाद, उप निदेशक, माध्यमिक शिक्षा द्वारा 13.12.2023 को एक अतिरिक्त प्रति-शपथपत्र दाखिल किया गया। उसमें उल्लेख था कि विभागीय कार्यवाही के मूल अभिलेख गुम हो गए हैं। उन अभिलेखों के अभिरक्षक संबंधित लिपिक को कारण बताओ सूचना जारी की गई है।

तत्पश्चात, न्यायालय ने अभिलेख पर उपलब्ध सामग्रियों का सूक्ष्म परीक्षण किया, विशेष रूप से 15.02.2012 की जाँच रिपोर्ट और 29.10.2012 की द्वितीय कारण बताओ सूचना का।

जाँच पदाधिकारी के निष्कर्ष

07.10.2009 को दी गई चार्जशीट में पाँच पृथक-पृथक आरोप थे। याचिकाकर्ता ने 25.01.2010 को बिंदुवार उत्तर दिया। इसे विचार में लेते हुए, जाँच पदाधिकारी, क्षेत्रीय उप निदेशक, शिक्षा, भागलपुर प्रमंडल ने 15.02.2012 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

न्यायालय ने प्रत्येक आरोप के संबंध में जाँच निष्कर्षों का सार इस प्रकार प्रस्तुत किया:

आरोप सं. 1 के संबंध में, जाँच पदाधिकारी ने कहा कि आवश्यक अभिलेखों के अभाव में उनके लिए कोई राय देना कठिन है।

आरोप सं. 2 के लिए, उन्होंने दर्ज किया कि आवश्यक अभिलेखों को चार्जशीट के साथ संलग्न नहीं किया गया था और इस कारण आरोप की पुष्टि नहीं की जा सकती।

आरोप सं. 3 के लिए, उन्होंने उल्लेख किया कि ऐसा कोई साक्ष्य या अभिलेख उपलब्ध नहीं है जिससे यह दर्शाया जा सके कि याचिकाकर्ता ने किस कार्य को सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना किया था। अतः उनके लिए किसी प्रकार की राय व्यक्त करना उचित नहीं है।

आरोप सं. 4 के लिए, उन्होंने पाया कि किसी भी अभिलेख के अभाव में आरोप सिद्ध नहीं है।

आरोप सं. 5 के लिए, उन्होंने माना कि विभाग द्वारा आवश्यक अभिलेख उपलब्ध न कराए जाने के कारण यह आरोप सिद्ध नहीं है।

सरल शब्दों में, जाँच पदाधिकारी ने निष्कर्ष निकाला कि पाँचों में से कोई भी आरोप सिद्ध नहीं हुआ। विभाग द्वारा अभिलेख और साक्ष्य उपलब्ध न कराए जाने के कारण आरोपों की पुष्टि संभव नहीं हो सकी।

दंडाधिकारी की कार्रवाइयाँ

इस स्पष्ट जाँच रिपोर्ट के बावजूद, विभाग ने उस पर समय पर कार्रवाई नहीं की। रिपोर्ट 15.02.2012 को प्रस्तुत की गई थी, फिर भी मामला लंबे समय तक लंबित रखा गया।

इसी बीच, विभाग ने 29.10.2012 की दिनांकित द्वितीय कारण बताओ सूचना याचिकाकर्ता को भेजी। बाद में 27.09.2013, 13.03.2014 और 15.09.2014 को अनुस्मारक भेजे गए और उत्तर देने को कहा गया। याचिकाकर्ता ने 23.09.2014 को द्वितीय कारण बताओ सूचना का उत्तर प्रस्तुत किया।

द्वितीय कारण बताओ सूचना में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि 15.02.2012 की जाँच रिपोर्ट के अनुसार जाँच पदाधिकारी ने आरोपों को सिद्ध नहीं पाया है। तथापि, दंडाधिकारी प्राधिकारी ने कम-से-कम आरोप सं. 5 के संबंध में इस निष्कर्ष से असहमति जताने का निर्णय लिया।

सूचना में कहा गया कि पासबुक का संधारण और संकलित राशियों का जमा करना याचिकाकर्ता की जिम्मेदारी थी, और खाते को खोलने या संचालन करने में विफल रहने के संबंध में उनका स्पष्टीकरण, यद्यपि संप्रेषण किया गया था, स्वीकार्य नहीं है।

महत्त्वपूर्ण रूप से, जैसा कि न्यायालय ने देखा, आरोप सं. 5 के संदर्भ में भी, द्वितीय कारण बताओ सूचना में जाँच पदाधिकारी के निष्कर्ष से असहमति के कोई कारण दर्ज नहीं किए गए। उसमें किसी विशिष्ट अभिलेख, लेनदेन या अनुमानित राशि का भी उल्लेख नहीं था, जिसके बारे में कहा जा सके कि उसे बैंक खाते में जमा नहीं किया गया।

याचिकाकर्ता के उत्तर पर विचार करने के बाद, विभाग ने 13.02.2015 की दिनांकित दंडादेश जारी किया, जिसके द्वारा उनकी पेंशन से 5% की स्थायी कटौती थोप दी गई।

न्यायालय द्वारा लागू विधिक सिद्धांत

दंड की वैधता की परीक्षा हेतु पटना उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के दो महत्त्वपूर्ण निर्णयों का संदर्भ लिया।

पहले, न्यायालय ने Ram Kishan v. Union of India & others, (1995) 6 SCC 157 का हवाला दिया। उस मामले के अनुच्छेद 10 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह समझाया कि जब दंडाधिकारी प्राधिकारी जाँच पदाधिकारी से असहमति प्रकट करना चाहता है, तो कारण बताओ सूचना का उद्देश्य क्या होता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि दंडाधिकारी प्राधिकारी जाँच पदाधिकारी के निष्कर्षों से असहमत होकर दंड प्रस्तावित करना चाहता है, तो कारण बताओ सूचना में असहमति के कारण स्पष्ट रूप से दर्शाए जाने चाहिए। इससे कर्मचारी को सार्थक उत्तर देने और दंडाधिकारी को जाँच पदाधिकारी की उनके पक्ष में दी गई रिपोर्ट स्वीकार करने के लिए राजी करने का अवसर मिलता है।

यदि सूचना में कोई कारण नहीं दिए जाते, तो वह मात्र औपचारिकता बनकर रह जाती है और कर्मचारी को गंभीर क्षति पहुँचाती है। केवल अंतिम आदेश में कारण देने से यह दोष दूर नहीं होता।

दूसरे, न्यायालय ने Yoginath D. Bagde v. State of Maharashtra and another, (1999) 7 SCC 739 का संदर्भ दिया। वहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि कर्मचारी को सुनवाई का अधिकार केवल जाँच के दौरान ही नहीं, बल्कि उस चरण पर भी है जब दंडाधिकारी प्राधिकारी जाँच निष्कर्षों पर विचार कर रहा हो।

जहाँ जाँच पदाधिकारी की रिपोर्ट कर्मचारी के पक्ष में हो और यह कहती हो कि आरोप सिद्ध नहीं हैं, वहाँ यह “और भी अधिक आवश्यक” हो जाता है कि ऐसे अनुकूल निष्कर्षों को अस्वीकार करने से पूर्व दंडाधिकारी प्राधिकारी कर्मचारी को समुचित सुनवाई दे तथा असहमति के कारणों को भी बताये।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी दोहराया कि न्यायालय विभागीय निष्कर्षों में हस्तक्षेप कर सकते हैं यदि वे विकृत हों, साक्ष्य से समर्थित न हों, या ऐसे हों जिन पर कोई भी युक्तिसंगत व्यक्ति नहीं पहुँच सकता।

वर्तमान मामले पर इन सिद्धांतों का अनुप्रयोग

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने माना कि इस मामले में दंडाधिकारी प्राधिकारी की कार्रवाई विधि-सम्मत नहीं थी।

जाँच पदाधिकारी ने स्पष्ट रूप से पाया था कि विभाग द्वारा अभिलेखों और साक्ष्य की अनुपूर्ति न होने के कारण पाँचों में से कोई भी आरोप सिद्ध नहीं हुआ। इसके बावजूद, दंडाधिकारी प्राधिकारी ने कम-से-कम आरोप सं. 5 के संबंध में भिन्न मत अपनाने की चेष्टा की।

किन्तु 29.10.2012 की द्वितीय कारण बताओ सूचना में जाँच रिपोर्ट से असहमति के कोई कारण दर्ज नहीं किए गए और न ही किसी अभिलेख का उल्लेख किया गया जो इस असहमति को न्यायोचित ठहरा सके। उसमें केवल यह लिखा था कि याचिकाकर्ता पासबुक का संधारण और समय पर राशि जमा करने में असफल रहे तथा उनका स्पष्टीकरण अस्वीकार्य है।

न्यायालय ने रेखांकित किया कि सूचना में किसी विशिष्ट या अनुमानित राशि का उल्लेख नहीं था जिसके जमा न होने का आरोप हो, और न ही यह दर्शाया गया कि कोई अतिरिक्त अभिलेख उपलब्ध कराए गए हों। यह Ram Kishan और Yoginath D. Bagde में प्रतिपादित उस विधिक आवश्यकता का प्रत्यक्ष उल्लंघन था कि असहमति के कारण delinquent कर्मचारी को सूचित किए जाएँ।

जब संपूर्ण विभागीय मामला अप्रमाणित आरोपों पर टिका हो और विपरीत दृष्टिकोण के समर्थन में कोई नया सामग्री न दिखाई जाए, तो दंड को बनाए रखने के लिए कोई युक्तिसंगत आधार नहीं रह जाता, यह निष्कर्ष न्यायालय ने निकाला।

अंतिम निर्णय और निर्देश

अनुच्छेद 14 में न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि 15.02.2012 की जाँच रिपोर्ट (जिसमें सभी पाँचों आरोप असिद्ध पाए गए) और 29.10.2012 की त्रुटिपूर्ण द्वितीय कारण बताओ सूचना (जिसमें जाँच रिपोर्ट से भिन्न मत अपनाने के लिए कोई कारण या अभिलेख का उल्लेख नहीं था) को देखते हुए, पेंशन में 5% कटौती के लिए कोई युक्तिसंगत आधार नहीं था।

तदनुसार, अनुच्छेद 15 में न्यायालय ने यह घोषित किया कि निदेशक, माध्यमिक शिक्षा, बिहार, पटना द्वारा नियम 43B, बिहार पेंशन नियमावली के अंतर्गत जारी मेमो सं. 408 दिनांक 13.02.2015 में निहित दंडादेश, जिसके द्वारा 5% पेंशन की स्थायी कटौती की गई थी, विधिसम्मत नहीं है और उसे रद्द किया जाता है।

अनुच्छेद 16 में न्यायालय ने निर्देश दिया कि उक्त दंडादेश के आधार पर अब तक याचिकाकर्ता की पेंशन से की गई सभी कटौतियाँ निदेशक (माध्यमिक शिक्षा), बिहार, पटना (प्रतिवादी सं. 4) द्वारा, न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त होने या प्रस्तुत होने की तिथि से तीन माह के भीतर, उन्हें वापस की जाएँ।

इस प्रकार रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय विशेष रूप से बिहार के सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के लिए, जो बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43B के अंतर्गत विभागीय कार्यवाही का सामना कर रहे हैं, महत्त्वपूर्ण है।

यह स्पष्ट करता है कि सरकार अप्रमाणित आरोपों के आधार पर पेंशन में कटौती या रोक नहीं लगा सकती। यदि जाँच पदाधिकारी यह पाता है कि अभिलेखों या साक्ष्य के अभाव में आरोप सिद्ध नहीं हैं, तो दंडाधिकारी प्राधिकारी उस रिपोर्ट की अनदेखी चुपचाप नहीं कर सकता।

यदि विभाग किसी अनुकूल जाँच रिपोर्ट से असहमति जताना चाहता है, तो उसे द्वितीय कारण बताओ सूचना में स्पष्ट, लिखित कारण देने होंगे। उसे यह भी बताना होगा कि वह किन नए तथ्यों या सामग्रियों पर निर्भर कर रहा है।

अन्यथा, जैसा कि पटना उच्च न्यायालय ने दिखाया है, दंडादेश निरस्त किया जा सकता है। पेंशन अनेक सेवानिवृत्त शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए जीवनरेखा है; यह निर्णय इस बात को पुष्ट करता है कि इसे मनमाने ढंग से या अस्पष्ट आरोपों के आधार पर कम नहीं किया जा सकता।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: जब जाँच पदाधिकारी ने सभी आरोपों को असिद्ध पाया हो और द्वितीय कारण बताओ सूचना में उस रिपोर्ट से असहमति के कोई कारण न दिए गए हों, तो क्या शिक्षा विभाग बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43B के अंतर्गत पेंशन में 5% स्थायी कटौती लगा सकता है?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि जाँच पदाधिकारी की आरोपमुक्त करने वाली रिपोर्ट को अस्वीकार करने के पीछे कोई कारण या सहायक सामग्री दर्शाए बिना दंड लगाने के लिए कोई युक्तिसंगत आधार नहीं था। अतः कटौती का आदेश रद्द कर दिया गया।
  • प्रश्न: जब दंडाधिकारी प्राधिकारी जाँच पदाधिकारी से असहमत होता है, तो द्वितीय कारण बताओ सूचना में क्या अपेक्षित है?
    उत्तर: सूचना में असहमति के विशिष्ट कारणों और आधारों को स्पष्ट रूप से दर्ज करना आवश्यक है, ताकि कर्मचारी सार्थक उत्तर दे सके। केवल यह कहना कि कर्मचारी का स्पष्टीकरण “अस्वीकार्य” है, बिना कारण या सहायक अभिलेखों के, पर्याप्त नहीं है और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लंघन है।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Ram Kishan v. Union of India & others, (1995) 6 SCC 157
  • Yoginath D. Bagde v. State of Maharashtra and another, (1999) 7 SCC 739
  • न्यायालय ने Kuldeep Singh v. Commissioner of Police तथा उसमें उद्धृत पूर्ववर्ती सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का भी संदर्भ दिया, जैसा कि Yoginath D. Bagde के अनुच्छेद 51 में संक्षेपित किया गया है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 8434 of 2015

मामले का शीर्षक: Naresh Mohan Jha v. The State of Bihar & others

उद्धरण: 2024 (2) PLJR 800

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Partha Sarthy

निर्णय की तिथि: 29.03.2024

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Arvind Kumar Sharma, Advocate
  • प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Santosh Kumar Jha, GP-3

मामले का स्वरूप: नियम 43B, बिहार पेंशन नियमावली के अंतर्गत दंडादेश को चुनौती देने वाली सिविल रिट याचिका, जिसमें पेंशन कटौती को रद्द करने और संबंधित राहतें देने का अनुरोध किया गया।

निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment – CWJC No. 8434 of 2015

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