मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता के पास बिहार टार्गेटेड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (कंट्रोल) आदेश, 2016 के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की दुकान चलाने का लाइसेंस था। यह कंट्रोल आदेश उचित मूल्य की दुकानों के संचालन और नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द करने के नियमों को निर्धारित करता है।
14.06.2012 को, अनुमंडल पदाधिकारी, पीरो, जो लाइसेंसिंग प्राधिकारी के रूप में कार्य कर रहे थे, ने याचिकाकर्ता का PDS लाइसेंस रद्द करने का आदेश पारित किया। यह निरस्तीकरण दुकान पर किए गए निरीक्षण और याचिकाकर्ता को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस के बाद किया गया।
याचिकाकर्ता ने इस निरस्तीकरण को जिला पदाधिकारी, भोजपुर, आरा, के समक्ष अपील के माध्यम से चुनौती दी। 31.07.2019 को जिला पदाधिकारी ने अपील खारिज कर दी और अनुमंडल पदाधिकारी के आदेश की पुष्टि की।
इसके बाद, याचिकाकर्ता ने संभागीय आयुक्त, पटना, के समक्ष पुनरीक्षण आवेदन दाखिल किया, जिसमें फिर से लाइसेंस निरस्तीकरण को चुनौती दी गई। 05.08.2021 को संभागीय आयुक्त ने पुनरीक्षण भी खारिज कर दिया।
14.06.2012, 31.07.2019 और 05.08.2021 दिनांकित इन तीनों आदेशों से आहत होकर, याचिकाकर्ता ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सिविल रिट जुरिस्डिक्शन केस संख्या 18194/2021 दाखिल कर पटना उच्च न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
COVID-19 प्रतिबंधों के कारण वीडियो-कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सुनवाई करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई एक मुख्य शिकायत पर ध्यान केंद्रित किया। उसका कहना था कि उसका PDS लाइसेंस रद्द करने वाला आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है, क्योंकि जिस निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, उसकी प्रति उसे कभी उपलब्ध ही नहीं कराई गई।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि निरीक्षण रिपोर्ट ही उसके विरुद्ध प्रस्तावित कार्रवाई की बुनियाद थी। चूंकि उसे उसकी प्रति नहीं दी गई, इसलिए कथित रूप से उसे आरोपों का वास्तविक आधार पता ही नहीं था। इस आधार पर यह दलील दी गई कि पूरी निरस्तीकरण कार्यवाही अवैध है और पटना उच्च न्यायालय की रिट जुरिस्डिक्शन में इसे निरस्त किया जाना चाहिए।
इसके बाद न्यायालय ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता से सीधा प्रश्न किया। पीठ ने पूछा कि क्या मूल कारण बताओ नोटिस का जवाब देते समय याचिकाकर्ता ने कभी निरीक्षण रिपोर्ट न मिलने के संबंध में कोई आपत्ति उठाई थी?
निर्णय में दर्ज उत्तर नकारात्मक था। याचिकाकर्ता ने कारण बताओ नोटिस के उत्तर में ऐसा कोई आग्रह नहीं लिया था।
न्यायालय ने रिट याचिका के परिशिष्ट-2 को देखा, जिसमें कारण बताओ नोटिस के प्रति याचिकाकर्ता का लिखित उत्तर संलग्न था। उस दस्तावेज़ से न्यायालय ने पाया कि निरीक्षण रिपोर्ट न दिए जाने के संबंध में याचिकाकर्ता द्वारा कोई आपत्ति या मांग नहीं की गई थी।
इसके विपरीत, उत्तर से कुछ और बात सामने आई। याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि निरीक्षण के समय वह दुकान पर मौजूद नहीं था। यह उसके विरुद्ध आरोपों में से एक था। अपनी अनुपस्थिति को सही ठहराने के लिए उसने यह दलील की कि वह अस्वस्थ था और डॉक्टर के उपचाराधीन था।
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि रिट याचिका की संपूर्ण दलीलों में याचिकाकर्ता ने यह स्पष्ट नहीं किया कि निरीक्षण रिपोर्ट न मिलने से वास्तव में उसे क्या ठोस हानि या पूर्वाग्रह हुआ। ऐसा कोई स्पष्ट कथन नहीं था कि यदि रिपोर्ट दी जाती तो वह अपने बचाव में कुछ भिन्न या अतिरिक्त बात कहता।
यह बिंदु न्यायालय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत किसी दस्तावेज़ की प्रति न देना गंभीर हो सकता है, परन्तु शिकायत करने वाले को यह दिखाना होता है कि इससे उसके बचाव पर वास्तविक रूप से प्रभाव पड़ा। यहां, याचिकाकर्ता ने तथ्यों पर उत्तर दिया, प्रमुख आरोपों को स्वीकार किया और उन्हें समझाने की कोशिश की, बिना यह कहे कि उस समय कोई रिपोर्ट उसे नहीं मिली थी।
इन तथ्यों को समग्र रूप से देखते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि इतने वर्षों बाद और क्रमिक कार्यवाहियों के पश्चात, याचिकाकर्ता द्वारा निरीक्षण रिपोर्ट न दिए जाने के नए आधार पर निरस्तीकरण आदेश को चुनौती देना उसके लिए खुला नहीं था।
पीठ ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ता को लाइसेंसिंग प्राधिकारी द्वारा सुनवाई का अवसर निःसंदेह दिया गया था। उसने कारण बताओ नोटिस का उत्तर दाखिल किया और उसके तर्कों पर विचार किया गया।
न्यायालय ने लाइसेंसिंग प्राधिकारी के आदेश को “स्पीकिंग और रीजनड” आदेश के रूप में वर्णित किया। इसका अर्थ है कि आदेश में केवल निष्कर्ष ही नहीं दिया गया, बल्कि निर्णय के समर्थन में सामग्री और कारणों पर चर्चा भी की गई। लाइसेंसिंग प्राधिकारी ने लाइसेंस रद्द करने से पूर्व याचिकाकर्ता द्वारा उत्तर में उठाए गए तर्कों और बिंदुओं पर विचार किया।
इसी प्रकार, अपीलीय प्राधिकारी (जिला पदाधिकारी, भोजपुर, आरा) और पुनरीक्षणीय प्राधिकारी (संभागीय आयुक्त, पटना) के आदेश भी अभिलेख पर थे। न्यायालय ने उल्लेख किया कि ये भी “रीजनड स्पीकिंग” आदेश थे, जिससे स्पष्ट होता है कि उन प्राधिकारियों ने भी मामले की जांच की और अपील व पुनरीक्षण खारिज करने के कारण दिए।
इस पृष्ठभूमि में, पटना उच्च न्यायालय ने यह दोहराया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत जो शक्ति वह प्रयोग करता है, वह “न्यायिक पुनर्विलोकन” (ज्यूडिशियल रिव्यू) की शक्ति है। ऐसी रिट याचिका में न्यायालय तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन कर अपनी राय स्थानापन्न करने वाला अपीलीय प्राधिकारी की भांति कार्य नहीं करता।
इसके बजाय, न्यायालय यह देखता है कि “निर्णय निर्माण की प्रक्रिया में कोई विधिक त्रुटि (लीगल इन्फर्मिटी) तो नहीं है।” इसमें यह जांच शामिल है कि क्या उचित प्रक्रिया का पालन किया गया, संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिला, और क्या प्राधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र में रहकर कारण सहित निर्णय दिया।
अभिलेख और तर्कों की जांच के बाद उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में ऐसी कोई त्रुटि नहीं पाई गई। याचिकाकर्ता को नोटिस दिया गया, उत्तर देने का अवसर मिला, उसके स्पष्टीकरण पर विचार किया गया, और तीनों प्राधिकारी—लाइसेंसिंग, अपीलीय एवं पुनरीक्षणीय—ने कारणयुक्त आदेश पारित किए।
क्योंकि याचिकाकर्ता ने पहले के चरणों पर कभी निरीक्षण रिपोर्ट न दिए जाने का मुद्दा नहीं उठाया, और न ही इससे हुई किसी वास्तविक क्षति को दर्शाया, न्यायालय ने वर्तमान चुनौती को इस आधार पर “असमर्थनीय” (अनटेनेबल) माना।
अतः न्यायालय ने माना कि PDS लाइसेंस के निरस्तीकरण में रिट जुरिस्डिक्शन के तहत हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं है। रिट याचिका खारिज कर दी गई।
इसका अर्थ है कि 14.06.2012 (अनुमंडल पदाधिकारी, पीरो), 31.07.2019 (जिला पदाधिकारी, भोजपुर, आरा) और 05.08.2021 (संभागीय आयुक्त, पटना) के आदेश वैध हैं और प्रभावी बने हुए हैं। याचिकाकर्ता का PDS लाइसेंस निरस्त ही बना रहता है।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के PDS डीलरों और अन्य लाइसेंस धारकों के लिए महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि केवल प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का आरोप लगा देना, बिना उचित समय पर आपत्ति उठाए या वास्तविक क्षति प्रदर्शित किए, उच्च न्यायालय में कारगर नहीं हो सकता।
पटना उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया है कि विशेषकर बिहार टार्गेटेड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (कंट्रोल) आदेश, 2016 के तहत लाइसेंसिंग मामलों में, किसी भी कारण बताओ नोटिस के उत्तर में व्यक्ति को सभी प्रासंगिक आपत्तियां अवश्य उठानी चाहिए।
यदि कोई डीलर कार्यवाही में भाग लेता है, तथ्यों पर उत्तर देता है और कथित रूप से गुम दस्तावेज़ों पर आपत्ति किए बिना मामले को निर्णय तक पहुंचने देता है, तो बाद में रिट जुरिस्डिक्शन में इन्हीं आधारों पर आदेश को चुनौती देना अत्यंत कठिन हो जाता है।
यह निर्णय यह भी पुष्ट करता है कि अनुच्छेद 226 के तहत अधिकारों का प्रयोग करते समय पटना उच्च न्यायालय मुख्यतः यह देखेगा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया विधिसम्मत है या नहीं, न कि एक अपीलीय न्यायालय की तरह तथ्यों की पुनः जांच करेगा। एक बार जब प्राधिकारी सुनवाई के बाद कारणयुक्त स्पीकिंग आदेश पारित कर चुके हों, तो न्यायालय उनके निर्णय में हस्तक्षेप करने में संयम बरतेगा।
विधिक प्रश्न और उत्तर
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प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता के PDS लाइसेंस का निरस्तीकरण, निरीक्षण रिपोर्ट की प्रति न देने के कारण, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन से दुष्प्रभावित (विटीएटेड) हो गया था?
उत्तर: नहीं। याचिकाकर्ता ने कारण बताओ नोटिस के उत्तर में निरीक्षण रिपोर्ट न दिए जाने के संबंध में कोई शिकायत नहीं की, और न ही किसी वास्तविक क्षति या पूर्वाग्रह की दलील दी। उसे सुनवाई का अवसर दिया गया था तथा लाइसेंसिंग, अपीलीय और पुनरीक्षणीय प्राधिकारियों ने कारणयुक्त स्पीकिंग आदेश पारित किए। पटना उच्च न्यायालय को निर्णय निर्माण प्रक्रिया में कोई विधिक त्रुटि नहीं मिली और उसने अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप से इंकार कर दिया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- इस निर्णय के पाठ में किसी पूर्ववर्ती निर्णय का उल्लेख या उस पर भरोसा नहीं किया गया है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 18194 of 2021
मामले का शीर्षक: Dilip Kumar Singh v. The State of Bihar and Others
कोरम: माननीय श्री न्यायमूर्ति Chakradhari Sharan Singh एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति Madhuresh Prasad
साइटेशन: 2022(1) PLJR 392
अधिवक्ता: याचिकाकर्ता की ओर से Ms. Manini Jaiswal, अधिवक्ता; प्रतिवादियों की ओर से Mr. S. Raza Ahmad, AAG-5
मामले का स्वरूप: भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका, जिसमें PDS लाइसेंस के निरस्तीकरण तथा बिहार टार्गेटेड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (कंट्रोल) आदेश, 2016 के तहत दायर अपील एवं पुनरीक्षण की खारिजी को चुनौती दी गई
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूरा निर्णय देखें
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