निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने 12 दिसंबर 2022 को एक महत्वपूर्ण निर्णय में बिहार सरकार की अपील को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को “पोस्टिंग की प्रतीक्षा अवधि” (waiting for posting period) के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, यदि उस अवधि में गलती विभाग की हो, न कि कर्मचारी की।
यह मामला सिंचाई विभाग (अब जल संसाधन विभाग) के एक सहायक अभियंता (Assistant Engineer) से जुड़ा था, जिन्हें 1 जून 1982 को सेवा में नियुक्त किया गया था। शुरुआत में उनकी पोस्टिंग सीवान (Siwan) में की गई, लेकिन वहां उस पद पर कोई रिक्ति उपलब्ध नहीं थी। इस कारण वे 1 जून 1982 से 31 दिसंबर 1986 तक बिना किसी नियमित पद के रहे।
बाद में, विभाग ने 20 अक्टूबर 1982 को रांची स्थित Waterways Circle में उनकी पोस्टिंग का आदेश दिया, लेकिन यह आदेश न तो उन्हें सही ढंग से सूचित किया गया और न ही क्रियान्वित हुआ। अंततः 29 दिसंबर 1986 को एक नया आदेश जारी कर उन्हें पटना के “Chief Engineer, Planning and Monitoring Division” में पदस्थापित किया गया।
कर्मचारी ने इस स्थिति में न्यायालय की शरण ली (C.W.J.C. No. 8913 of 2008) और मांग की कि 1 जून 1982 से 31 दिसंबर 1986 तक की पूरी अवधि को “पोस्टिंग की प्रतीक्षा अवधि” के रूप में गिना जाए, न कि “अवकाश अवधि” के रूप में। साथ ही, उस अवधि के वेतन, इंक्रीमेंट और ACP स्कीम के लाभ दिए जाएं।
एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने 24 अप्रैल 2018 को कर्मचारी की याचिका स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि उक्त अवधि को सेवा अवधि माना जाए और सभी वित्तीय लाभ दिए जाएं।
राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ Letters Patent Appeal (LPA No. 1381 of 2018) दायर की, जिसमें कहा गया कि कर्मचारी ने उस अवधि में कार्य नहीं किया, इसलिए उसे वेतन और सेवा लाभ नहीं दिए जा सकते।
राज्य की इस दलील को खारिज करते हुए माननीय न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी और माननीय न्यायमूर्ति पुर्नेंदु सिंह की खंडपीठ ने कहा कि विभाग ने समय पर पोस्टिंग आदेश जारी करने में गंभीर लापरवाही की और यह भी नहीं बताया कि आदेश कर्मचारी को कब और कैसे दिया गया था।
न्यायालय ने कहा:
“यहां तक कि अगर पोस्टिंग आदेश 20.10.1982 को जारी किया गया था, तब भी विभाग ने कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की, न ही कर्मचारी को निलंबित किया। यह विभाग की गंभीर गलती है, जिसका खामियाजा कर्मचारी को नहीं भुगतना चाहिए।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विभाग किसी कर्मचारी को “अनधिकृत अनुपस्थिति” का दोषी मानता है, तो उसके खिलाफ जांच या निलंबन जैसी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। चूंकि ऐसा नहीं किया गया, इसलिए बाद में उस अवधि को अवकाश मानना अनुचित है।
अंततः अदालत ने एकल न्यायाधीश के आदेश को सही ठहराते हुए राज्य सरकार की अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत है, विशेषकर उन लोगों के लिए जिन्हें “पोस्टिंग” या “ट्रांसफर” के दौरान विभागीय देरी का सामना करना पड़ता है।
मुख्य प्रभाव और महत्व:
- विभागीय देरी का दंड कर्मचारी को नहीं: यदि विभाग समय पर पोस्टिंग नहीं करता या आदेश की सूचना देने में चूक करता है, तो कर्मचारी को “अनुपस्थित” या “दोषी” नहीं ठहराया जा सकता।
- “प्रतीक्षा अवधि” को सेवा अवधि माना जाएगा: जब कर्मचारी पोस्टिंग आदेश की प्रतीक्षा में है, तब भी उसे सेवा में माना जाएगा और वह वेतन, इंक्रीमेंट तथा पेंशन लाभ पाने का अधिकारी रहेगा।
- अनुशासनात्मक कार्रवाई आवश्यक: यदि विभाग को लगता है कि कर्मचारी ने आदेश का पालन नहीं किया, तो उसे नियमों के अनुसार जांच करनी होगी। केवल मौन रहना और बाद में दंड देना अवैध है।
- निष्पक्ष प्रशासन की आवश्यकता: अदालत ने विभागों को आगाह किया कि वे समय पर आदेश जारी करें, रिकॉर्ड रखें और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करें।
- कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा: यह फैसला बिहार के जल संसाधन, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विभागों के हजारों कर्मचारियों के लिए मिसाल है, जो अक्सर पोस्टिंग में देरी या अस्पष्ट आदेशों के कारण नुकसान झेलते हैं।
कानूनी मुद्दे और न्यायालय का निर्णय (Legal Issues and Findings)
- क्या बिना पोस्टिंग वाले समय को अवकाश के रूप में माना जा सकता है?
❖ नहीं। वह अवधि “पोस्टिंग की प्रतीक्षा” (waiting for posting) मानी जाएगी। गलती विभाग की थी, न कि कर्मचारी की। - क्या उस अवधि के लिए वेतन और इंक्रीमेंट मिल सकते हैं?
❖ हाँ। जब विभाग ने कोई अनुशासनिक कार्रवाई नहीं की, तो कर्मचारी को पूरा वेतन और सेवा लाभ मिलेंगे। - क्या एकल न्यायाधीश का आदेश सही था?
❖ हाँ। न्यायालय ने पाया कि विभागीय त्रुटि स्पष्ट थी और आदेश पूरी तरह न्यायसंगत था। - क्या राज्य सरकार की अपील उचित थी?
❖ नहीं। अपील में कोई ठोस आधार नहीं था। केवल विभागीय लापरवाही को छिपाने के लिए अपील की गई थी।
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय (Judgments Relied Upon by Court)
किसी विशेष निर्णय का उल्लेख नहीं, परंतु तर्क न्याय और निष्पक्षता (Principles of Equity and Fairness) पर आधारित था।
मामले का शीर्षक (Case Title)
The State of Bihar & Ors. v. Kripa Shankar Singh
केस नंबर (Case Number)
Letters Patent Appeal No. 1381 of 2018
(संबंधित C.W.J.C. No. 8913 of 2008 से)
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 205
न्यायमूर्ति गण का नाम (Coram and Judges)
माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी
माननीय श्री न्यायमूर्ति पुर्नेंदु सिंह
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए (Advocates)
- श्री सुधीश कुमार, AC to PAAG 2 — राज्य सरकार की ओर से
- श्री अजीत कुमार, GA 9 — राज्य सरकार की ओर से
- श्री रंजय कुमार पटेल — कर्मचारी की ओर से
- श्री प्रभाकर सिंह — कर्मचारी की ओर से
निर्णय का लिंक (Link to Judgment)
MyMxMzgxIzIwMTgjMSNO-naQ2rb–am1–X9aY=
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