पटना उच्च न्यायालय: एसआईपीबी की मंजूरी से पहले उत्पादन शुरू करने पर भी उद्योग को प्रोत्साहन का अधिकार – 2023

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने बिहार औद्योगिक प्रोत्साहन नीति, 2011 से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न स्पष्ट किया है – यदि कोई उद्योग अपनी इकाई में वाणिज्यिक उत्पादन राज्य निवेश प्रोत्साहन बोर्ड (SIPB) की औपचारिक मंजूरी से पहले शुरू कर देता है, तो क्या उसे नीति के तहत दिए जाने वाले प्रोत्साहन से वंचित किया जा सकता है? न्यायालय ने कहा – नहीं, ऐसा नहीं किया जा सकता।
इस निर्णय ने कई औद्योगिक इकाइयों को राहत दी है, जिन्हें पहले सिर्फ इसलिए लाभ से वंचित कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने उत्पादन मंजूरी मिलने से पहले शुरू कर दिया था।

इस मामले में एक औद्योगिक इकाई (याचिकाकर्ता) ने बिहार सरकार के उस ईमेल (दिनांक 05.11.2022) को चुनौती दी थी जिसमें उसके प्रोत्साहन दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि SIPB की स्वीकृति उत्पादन शुरू होने के बाद दी गई थी। याचिकाकर्ता ने पहले की एक सरकारी चिट्ठी (दिनांक 23.11.2017, मेमो संख्या 3573) को भी चुनौती दी, जिसमें वैट, एंट्री टैक्स और SGST जैसे पुनर्भरण लाभ देने से इनकार किया गया था।

याचिकाकर्ता का कहना था कि 2011 की नीति में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो कहे कि उद्योग को SIPB की मंजूरी मिलने से पहले उत्पादन शुरू नहीं करना चाहिए। यदि कोई उद्योग निवेश करता है और उत्पादन शुरू करता है, तो केवल मंजूरी की तारीख बाद में आने के कारण उसे वंचित करना नीति के उद्देश्य के खिलाफ है।
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि नीति के अनुसार मंजूरी के बिना उत्पादन शुरू करना गलत है और इससे उद्योग प्रोत्साहन पाने का हक खो देता है।

माननीय न्यायमूर्ति ए. अभिषेक रेड्डी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि नीति में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि SIPB की मंजूरी से पहले उत्पादन शुरू करने वाला उद्योग लाभ पाने से वंचित होगा। अदालत ने पाया कि SIPB की स्वीकृति 30.06.2015 को दी गई थी, जबकि उद्योग ने उत्पादन 08.08.2014 को शुरू किया था। यानी, उत्पादन पहले शुरू हुआ लेकिन मंजूरी बाद में मिली।

न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि नीति का उद्देश्य निवेश को बढ़ावा देना है, न कि निवेशकों को तकनीकी कारणों से हतोत्साहित करना। राज्य का यह कहना कि मंजूरी से पहले उत्पादन करने पर लाभ नहीं मिलेगा, “मनमाना और अनुचित” है।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि सरकार चाहे तो लाभ की गणना SIPB की मंजूरी की तारीख से कर सकती है, लेकिन पूरा लाभ न देना या दावा ही खारिज कर देना उचित नहीं है। इस तरह से अदालत ने निवेशक और सरकार दोनों के हितों में संतुलन बनाया — निवेशक को उसका वैधानिक अधिकार मिला और सरकार को यह सुविधा मिली कि भुगतान की गणना मंजूरी की तारीख से हो।

अंततः अदालत ने 05.11.2022 के ईमेल और उसके साथ जुड़ी अस्वीकृति को रद्द कर दिया और आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को 2011 की नीति के तहत 30.06.2015 से प्रोत्साहन लाभ दिए जाएं और भुगतान तीन माह के भीतर किया जाए।

यह फैसला बिहार के औद्योगिक माहौल के लिए अहम है क्योंकि इससे निवेशकों को यह भरोसा मिला है कि वे अपनी इकाइयों को जल्द शुरू कर सकते हैं और केवल मंजूरी की औपचारिक प्रक्रिया में देरी होने से उनके अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

व्यवसायों के लिए:

  • अब निवेशक यह जान पाएंगे कि यदि उन्होंने SIPB की मंजूरी से पहले उत्पादन शुरू किया है, तो भी वे नीति के लाभ से वंचित नहीं होंगे।
  • यह निर्णय निवेश योजना, नकदी प्रवाह और नीति अनुपालन में स्पष्टता लाता है।
  • इससे उद्योगों को यह भरोसा मिलेगा कि राज्य सरकार की नीतियाँ निवेशक हितैषी हैं।

सरकार और विभागों के लिए:

  • यह निर्णय सरकार को याद दिलाता है कि नीति में जो लिखा है, वही लागू किया जा सकता है। कोई अतिरिक्त शर्त अपने स्तर से नहीं जोड़ी जा सकती।
  • इससे पारदर्शिता और समानता सुनिश्चित होगी, और निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।

आम जनता के लिए:

  • इस तरह के स्पष्ट निर्णय से निवेश को बढ़ावा मिलेगा, जिससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और बिहार की अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।
  • न्यायालय ने तीन महीने में भुगतान का निर्देश देकर सरकारी जवाबदेही को भी मजबूत किया है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या SIPB की मंजूरी उत्पादन शुरू करने से पहले आवश्यक है?
    — न्यायालय का निर्णय: नहीं। नीति में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। केवल मंजूरी बाद में मिलने के कारण लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
  • क्या मंजूरी से पहले उत्पादन शुरू करने पर पूरा लाभ रोका जा सकता है?
    — न्यायालय का निर्णय: नहीं। अधिकतम, लाभ मंजूरी की तारीख से दिया जाएगा, पर दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
  • क्या राज्य सरकार द्वारा भेजे गए अस्वीकृति पत्र वैध थे?
    — न्यायालय का निर्णय: नहीं। 05.11.2022 का ईमेल और संबंधित अस्वीकृति पत्र रद्द किए गए। अदालत ने निर्देश दिया कि नीति के अनुसार तीन महीने में भुगतान किया जाए।

मामले का शीर्षक

M/s Ace Infra and Security Pvt. Ltd. बनाम बिहार राज्य एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case (CWJC) No. 7240 of 2023

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति ए. अभिषेक रेड्डी (मौखिक निर्णय, दिनांक 10.11.2023)

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री मदन कुमार, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: श्री धीरद्युति कुमार वर्मा, सहायक अधिवक्ता (SC-11)

निर्णय का लिंक

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