निर्णय की सरल व्याख्या
यह मामला एक ऐसे ठेकेदार से जुड़ा था, जिसे बिहार सरकार के सड़क निर्माण विभाग द्वारा भविष्य की निविदाओं (टेंडर) में भाग लेने से रोक दिया गया था। यह रोक एक पत्र के माध्यम से लगाई गई थी, जिसे विभाग के कार्यपालक अभियंता (Executive Engineer) ने जारी किया था।
ठेकेदार का कहना था कि उसने सड़क निर्माण का कार्य विभाग के साथ हुए समझौते के तहत किया था। काम के दौरान कुछ प्रशासनिक कारणों से देरी हुई, जिसके लिए ठेकेदार जिम्मेदार नहीं था। इसी बीच विभाग ने न केवल भुगतान और अन्य लाभ रोके, बल्कि एक आदेश जारी कर ठेकेदार को भविष्य के सभी टेंडरों से बाहर कर दिया।
ठेकेदार ने इस आदेश को पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी। याचिका में कई माँगें रखी गई थीं, जैसे—
- ब्लैकलिस्ट करने के आदेश को रद्द करना
- मूल्य वृद्धि (rate escalation) का लाभ
- जीएसटी की बकाया राशि का भुगतान
लेकिन सुनवाई के समय ठेकेदार ने अपनी याचिका को सिर्फ ब्लैकलिस्टिंग के मुद्दे तक सीमित कर दिया।
ठेकेदार की मुख्य दलील यह थी कि कार्यपालक अभियंता को कानूनन किसी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार ही नहीं है। बिहार ठेकेदार पंजीकरण नियमावली, 2007 के अनुसार यह अधिकार केवल इंजीनियर-इन-चीफ या कम से कम मुख्य अभियंता स्तर के अधिकारी को ही है।
ठेकेदार ने यह भी कहा कि उसे न तो सही तरीके से नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर। यानी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि जब यह मामला कोर्ट में लंबित था, उसी दौरान ठेकेदार ने 28 फरवरी 2023 को पूरा निर्माण कार्य समाप्त कर दिया। इसके बावजूद ब्लैकलिस्टिंग का आदेश प्रभावी बना रहा।
पटना हाई कोर्ट ने इन सभी बातों पर गंभीरता से विचार किया। कोर्ट ने पहले के अपने ही फैसलों का हवाला देते हुए साफ कहा कि कार्यपालक अभियंता सक्षम प्राधिकारी नहीं है और उसके द्वारा पारित ब्लैकलिस्टिंग आदेश कानूनन गलत है।
अंत में कोर्ट ने ब्लैकलिस्टिंग के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि यदि विभाग कोई निर्णय लेना चाहता है, तो वह सक्षम अधिकारी द्वारा और कानून के अनुसार लिया जाए, साथ ही यह भी देखा जाए कि ठेकेदार ने अब काम पूरा कर दिया है।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला कई दृष्टि से महत्वपूर्ण है:
- ठेकेदारों को मनमाने प्रशासनिक फैसलों से सुरक्षा मिलती है
- सरकार के अधिकारियों को यह संदेश जाता है कि वे अपनी कानूनी सीमा में रहकर ही कार्रवाई करें
- ब्लैकलिस्टिंग जैसे गंभीर निर्णय सोच-समझकर और सही स्तर से लिए जाएँ
- सरकारी कामों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है
आम जनता के लिए यह फैसला भरोसा पैदा करता है कि न्यायालय प्रशासनिक मनमानी पर रोक लगाता है। वहीं सरकार के लिए यह चेतावनी है कि गलत प्रक्रिया अपनाने से मुकदमेबाज़ी बढ़ती है।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या कार्यपालक अभियंता ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट कर सकता है?
→ नहीं। कोर्ट ने कहा कि यह अधिकार केवल इंजीनियर-इन-चीफ या उससे ऊपर के अधिकारी को है। - क्या ब्लैकलिस्टिंग आदेश वैध था?
→ नहीं। आदेश असक्षम अधिकारी द्वारा पारित किया गया था। - काम पूरा हो जाने का क्या प्रभाव पड़ा?
→ कोर्ट ने कहा कि सक्षम अधिकारी नए सिरे से निर्णय लेते समय इस तथ्य को ध्यान में रखे। - अंतिम आदेश
→ ब्लैकलिस्टिंग का आदेश रद्द किया गया और याचिका निस्तारित की गई।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- CWJC No. 3683 of 2019, निर्णय दिनांक 19.11.2019, पटना हाई कोर्ट
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- CWJC No. 3683 of 2019, निर्णय दिनांक 19.11.2019, पटना हाई कोर्ट
मामले का शीर्षक
M/s Deo Construction Office Vs. The State of Bihar
केस नंबर
Civil Writ Jurisdiction Case No. 10597 of 2021
न्यायमूर्ति गण का नाम
- माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी
- माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री अक्षांश अंकित, अधिवक्ता
- राज्य की ओर से: श्री पी. के. शाही, महाधिवक्ता
निर्णय का लिंक
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