पटना हाईकोर्ट का फैसला: टेन्योर-ट्रैक शिक्षक की सेवा विस्तार व लंबित बकाया पर आदेश — 2024

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश दिया जिसमें एक टेन्योर-ट्रैक (tenure-track) सहायक प्रोफेसर की सेवा समाप्ति और बकाया वेतन-भत्तों को लेकर विवाद था। यह मामला उस समय सामने आया जब एक नए अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में शुरुआती फैकल्टी के रूप में जुड़े शिक्षक की सेवा बिना तयशुदा टेन्योर समीक्षा (tenure review) के समाप्त कर दी गई।

शिक्षक ने जनवरी 2015 में विश्वविद्यालय ज्वाइन किया था। नियुक्ति पत्र और अनुबंध में साफ लिखा गया था कि तीन साल की सेवा के बाद 2017–2018 में उनकी टेन्योर समीक्षा होगी। लेकिन वह समीक्षा समय पर नहीं हुई। इसके बजाय, विश्वविद्यालय ने उनकी सेवा 1 जनवरी 2018 से 31 दिसंबर 2018 तक एक साल के लिए बढ़ा दी और कहा कि समीक्षा बाद में होगी।

इसी बीच, शिक्षक को अमेरिका में एक प्रतिष्ठित फैलोशिप का मौका मिला। उन्होंने विश्वविद्यालय से अनुमति मांगी और लिखित अनुमति भी प्राप्त की। विश्वविद्यालय ने सार्वजनिक रूप से इस फैलोशिप की सराहना भी की।

लेकिन जब 2018 के अंत में सेवा अवधि पूरी हुई, तो फरवरी 2019 में एक ऑफिस ऑर्डर जारी कर दिया गया कि शिक्षक की सेवा 31 दिसंबर 2018 को खत्म हो गई है और उन्हें आवास खाली कर देना चाहिए। न तो कोई समीक्षा हुई और न ही किसी सक्षम प्राधिकरण द्वारा कोई कारण दर्ज किया गया।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि टेन्योर-ट्रैक केवल अस्थायी अनुबंध नहीं होता, बल्कि इसमें समीक्षा प्रक्रिया जरूरी होती है। यदि समीक्षा ही नहीं की गई तो यह अनुबंध का उल्लंघन है। साथ ही, फैलोशिप पर जाने की अनुमति विश्वविद्यालय ने दी थी, इसलिए इसे “अनधिकृत अनुपस्थिति” बताना गलत है।

विश्वविद्यालय की ओर से कहा गया कि नियुक्ति अनुबंध आधारित और प्रोबेशन पर थी, और लंबी अनुपस्थिति का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए सेवा बढ़ाने का कोई अधिकार नहीं बनता।

हाईकोर्ट ने मामले को संतुलित तरीके से देखा। कोर्ट ने पाया कि:

  • समीक्षा का वादा किया गया था लेकिन की नहीं गई।
  • फैलोशिप पर जाने की अनुमति खुद विश्वविद्यालय ने दी थी।
  • सेवा समाप्त करने का निर्णय बिना किसी कारण और सक्षम प्राधिकरण के आदेश के हुआ।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा 33 के तहत मध्यस्थता (arbitration) तभी होती है जब कर्मचारी खुद चाहे। इसलिए याचिका सीधे हाईकोर्ट में सुनवाई योग्य थी।

अदालत का आदेश

  • शिक्षक के सेवा विस्तार पर अंतिम निर्णय कुलपति (Vice-Chancellor) को करना है। कुलपति को आदेश दिया गया कि यदि याचिकाकर्ता दोबारा जुड़ने के लिए आवेदन करते हैं, तो उनकी पूरी कार्यप्रणाली देखकर निष्पक्ष निर्णय 2 महीने के भीतर लिया जाए।
  • लंबित वेतन, डीए (महंगाई भत्ता), और अन्य बकाया राशि 3 महीने के भीतर भुगतान की जाए। यदि भुगतान में देरी हुई तो 10% वार्षिक ब्याज लगेगा।

इस प्रकार, अदालत ने सीधे बहाली का आदेश नहीं दिया लेकिन विश्वविद्यालय को अपने वादे के मुताबिक निष्पक्ष समीक्षा करने और बकाया चुकाने का निर्देश दिया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  • विश्वविद्यालयों के लिए सबक: यदि नियुक्ति टेन्योर-ट्रैक योजना पर की गई है, तो समीक्षा प्रक्रिया अनिवार्य है। इसे टालना या बिना कारण सेवा समाप्त करना अनुचित है।
  • शिक्षकों और शोधकर्ताओं के लिए: यदि विश्वविद्यालय ने किसी अंतरराष्ट्रीय अवसर पर जाने की अनुमति दी है, तो बाद में उसे बहाना बनाकर सेवा समाप्त नहीं की जा सकती।
  • शासन व्यवस्था के लिए: अदालत ने व्यावहारिक राहत दी है — सेवा विस्तार का अंतिम निर्णय विश्वविद्यालय पर छोड़ा लेकिन बकाया भुगतान सुनिश्चित किया। इससे संस्थानों पर जवाबदेही बढ़ती है।
  • नीतिगत संकेत: सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों को अपने HR नियम, टेन्योर प्रणाली और अवकाश/फैलोशिप नीतियों को स्पष्ट करना चाहिए ताकि विवाद न हो।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या टेन्योर-ट्रैक सेवा समीक्षा के बिना समाप्त की जा सकती है?
    ✦ अदालत का निर्णय: नहीं। समीक्षा करना अनिवार्य है। कुलपति को नए सिरे से विचार करना होगा।
  • क्या विश्वविद्यालय द्वारा अनुमति प्राप्त फैलोशिप को अनुबंध का उल्लंघन माना जा सकता है?
    ✦ अदालत का निर्णय: नहीं। अनुमति और सार्वजनिक सराहना के बाद इसे अवैध अनुपस्थिति नहीं माना जा सकता।
  • क्या मध्यस्थता (arbitration) क्लॉज होने पर हाईकोर्ट की याचिका सुनवाई योग्य नहीं है?
    ✦ अदालत का निर्णय: सुनवाई योग्य है। मध्यस्थता केवल तभी जब कर्मचारी खुद चाहे।
  • क्या शिक्षक लंबित वेतन और भत्तों के हकदार हैं?
    ✦ अदालत का निर्णय: हाँ। 3 महीने में भुगतान हो, अन्यथा 10% ब्याज लगेगा।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Deepali Gundu Surwase v. Kranti Junior Adhyapak Mahavidyalaya (D.Ed.) & Ors., (2013) 10 SCC 324
  • Pradeep v. Manganese Ore (India) Ltd. & Ors., (2022) 3 SCC 683
  • Uttar Pradesh Power Transmission Corporation Ltd. & Anr. v. CG Power and Industrial Solutions Ltd. & Anr., (2021) 6 SCC 15
  • Subodh Kumar Singh Rathour v. Chief Executive Officer & Ors., 2024 SCC OnLine SC 1682

मामले का शीर्षक

सहायक प्रोफेसर, टेन्योर-ट्रैक बनाम नालंदा विश्वविद्यालय एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 3979 of 2020

उद्धरण (Citation)

2025 (1) PLJR 276

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति अंजनी कुमार शरण

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री मोहम्मद हारून कुरैशी, अधिवक्ता
  • विश्वविद्यालय की ओर से: श्री अंजनी कुमार, वरिष्ठ अधिवक्ता
  • भारत सरकार की ओर से: श्रीमती कनक वर्मा, केंद्रीय सरकारी वकील

निर्णय का लिंक

MTUjMzk3OSMyMDIwIzEjTg==-uLaUDGrhpw4=

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News