पटना हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में फैसला सुनाया, जिसमें एक निजी निर्माण कंपनी ने सरकारी टेंडर प्रक्रिया में अपनी तकनीकी बोली (Technical Bid) अस्वीकृत होने को चुनौती दी थी। यह मामला वर्ष 2016 में ग्रामीण कार्य विभाग, बिहार सरकार की ओर से जारी दो अलग-अलग टेंडरों से जुड़ा था। याचिकाकर्ता का कहना था कि 2 अगस्त 2016 को उसके मोबाइल पर दो एसएमएस प्राप्त हुए, जिनमें बताया गया कि टेंडर संख्या 2016_ECBIH_40990_1 और टेंडर संख्या 2016_ECBIH_40985_1 की बोलियां तकनीकी मूल्यांकन के दौरान “एनआईटी (Notice Inviting Tender) के अनुसार” अस्वीकृत कर दी गई हैं।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि यदि अस्वीकृति का एकमात्र कारण उसका पूर्व प्रतिबंध (Debarment) था और कोई अन्य तकनीकी कमी नहीं थी, तो विभाग को उसकी तकनीकी बोली स्वीकार करनी चाहिए थी। इसी आधार पर उसने हाईकोर्ट में तीन प्रमुख राहतें मांगीं—(1) अस्वीकृति का आधिकारिक आदेश प्रस्तुत करने का निर्देश, (2) यदि कोई अन्य कमी न हो तो तकनीकी बोली स्वीकार करने का निर्देश, और (3) अदालत जो उचित समझे वह आदेश पारित करना।
सुनवाई के दिन याचिकाकर्ता की ओर से कोई भी अदालत में उपस्थित नहीं हुआ। अदालत ने यह भी देखा कि 2016 में याचिका दाखिल होने के बाद से कभी कोई अंतरिम आदेश (Stay Order) पारित नहीं हुआ, जिससे टेंडर प्रक्रिया पर रोक लग सके। वर्षों के लंबे अंतराल को देखते हुए अदालत ने यह मान लिया कि या तो टेंडर आवंटित कर दिए गए होंगे और उन पर कार्य भी हो चुका होगा, या फिर नए टेंडर जारी हो गए होंगे।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि अब इस याचिका पर सुनवाई करने का कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं बचा है। चूंकि टेंडर प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है, यह मामला निरर्थक (Infructuous) हो गया है। परिणामस्वरूप, रिट याचिका को खारिज कर दिया गया।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह निर्णय सरकारी टेंडरों से जुड़े मामलों में “समय पर कार्रवाई” की अहमियत को दोबारा रेखांकित करता है। टेंडर विवादों में देरी घातक साबित हो सकती है, क्योंकि सरकार विकास कार्यों को अदालत के फैसले का अनिश्चितकालीन इंतजार करते हुए नहीं रोक सकती। अगर याचिकाकर्ता को अंतरिम आदेश नहीं मिलता, तो टेंडर प्रक्रिया सामान्य रूप से आगे बढ़ती रहती है और एक बार अनुबंध आवंटित व निष्पादित हो जाने पर अदालतें हस्तक्षेप से बचती हैं।
ठेकेदारों के लिए सबक – टेंडर अस्वीकृति को चुनौती देने के लिए तुरंत कार्रवाई करनी होगी और अंतरिम आदेश प्राप्त करना होगा, ताकि अधिकार सुरक्षित रहें। अन्यथा, भले ही अस्वीकृति गलत हो, समय बीतने के कारण कानूनी राहत बेअसर हो सकती है।
सरकारी विभागों के लिए संदेश – एक बार टेंडर प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद अदालतें उसे दोबारा खोलने से बचेंगी, जिससे परियोजनाओं में देरी और लागत वृद्धि को रोका जा सके।
कानूनी मुद्दा और अदालत का निर्णय (संक्षेप में)
- मुद्दा – क्या तकनीकी बोली की अस्वीकृति को कई साल बाद चुनौती दी जा सकती है, जब टेंडर पहले ही निष्पादित हो चुका हो?
- निर्णय – रिट याचिका निरर्थक मानकर खारिज।
- कारण – याचिका के समय कोई अंतरिम आदेश नहीं मिला; कई साल बीत चुके हैं; टेंडर पर कार्रवाई पूरी हो चुकी है; अब हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है।
मामले का शीर्षक – Arpit Engicon Pvt. Ltd. बनाम The State of Bihar & Ors.
केस नंबर – Civil Writ Jurisdiction Case No. 14003 of 2016
न्यायमूर्ति गण का नाम – माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी, माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए – प्रतिवादी की ओर से: श्री अजय, जी.ए. 5; याचिकाकर्ता की ओर से: अंतिम सुनवाई में कोई उपस्थित नहीं हुआ
निर्णय का लिंक – https://www.patnahighcourt.gov.in/ShowPdf/web/viewer.html?file=../../TEMP/eb06261d-e51b-42dd-84c5-57f6aae9503e.pdf&search=Debarment
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