पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: 16 वर्ष बाद पुनर्नियुक्ति की मांग पर रोक – निर्णय वर्ष 2022

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने सिविल रिट याचिका संख्या 10518/2018 में, दिनांक 21 नवम्बर 2022 को यह निर्णय दिया कि यदि किसी कर्मचारी को सेवा से हटाए जाने के 16 वर्ष बाद वह पुनर्नियुक्ति की मांग करता है, तो ऐसी याचिका न्यायालय द्वारा स्वीकार नहीं की जा सकती।

इस मामले में याचिकाकर्ता को वर्ष 1997 में “विशेष परिस्थितियों” में बिहार पुलिस में कॉन्स्टेबल के पद पर नियुक्त किया गया था, परंतु यह नियुक्ति विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई थी। इसी कारण वर्ष 2002 में उसे सेवा से हटा दिया गया।

याचिकाकर्ता ने इस आदेश को 16 वर्षों तक कभी चुनौती नहीं दी। वर्ष 2013 में उसने गृह विभाग, बिहार सरकार को एक आवेदन देकर पुनः बहाल करने की मांग की, यह कहते हुए कि अन्य समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को पटना उच्च न्यायालय ने राहत दी है। जब उसका आवेदन 31 मार्च 2016 को अस्वीकार कर दिया गया, तो उसने वर्ष 2018 में यह रिट याचिका दाखिल की।

न्यायालय ने यह देखा कि क्या इतनी लंबी देरी के बाद दायर की गई याचिका स्वीकार की जा सकती है, और क्या आवेदन अस्वीकार होने से कोई “नया कारण-कार्यवाही” (fresh cause of action) उत्पन्न होता है।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि बिहार राज्य वाद नीति, 2011 (Bihar State Litigation Policy 2011) की धारा 4.C(1) के अनुसार उसका मामला “covered matter” के अंतर्गत आता है, और इसलिए उसे भी वही लाभ मिलना चाहिए जो अन्य समान मामलों में अदालत ने दिया। उसने कई पुराने निर्णयों का हवाला दिया।

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि यह याचिका अत्यधिक विलंब से दाखिल की गई है। 2002 में उसे बर्खास्त किया गया था, लेकिन उसने 2018 में कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। आवेदन अस्वीकृत होने से (2016 में) कोई नया अधिकार नहीं बनता। साथ ही, उसने मूल बर्खास्तगी आदेश को भी याचिका में संलग्न नहीं किया।

माननीय न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद ने राज्य सरकार की दलीलों से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि 18 मार्च 2002 का बर्खास्तगी आदेश ही इस मामले का मूल कारण-कार्यवाही था, और उसके बाद 11 वर्ष बाद (2013 में) दिया गया आवेदन नई कार्रवाई की शुरुआत नहीं कर सकता।

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय – यूनियन ऑफ इंडिया बनाम सी. गिरिजा एवं अन्य (2019) 15 एससीसी 633 – पर भरोसा किया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि “बहुत देर से दिया गया आवेदन” (belated representation) किसी व्यक्ति को नया कानूनी अधिकार नहीं देता।

चूंकि याचिकाकर्ता ने न तो समय पर आदेश को चुनौती दी और न ही पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत किए, इसलिए पटना उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका को विलंब और अपर्याप्त दलीलों के कारण खारिज कर दिया।

इस प्रकार, न्यायालय ने यह दोहराया कि पुराने मामलों को देर से उठाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और बिहार राज्य वाद नीति का उद्देश्य पुराने मामलों को पुनर्जीवित करना नहीं, बल्कि समान मामलों में अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचना है।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह फैसला बिहार सहित पूरे देश के सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि सेवा से हटाए जाने या बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई को लंबे समय बाद चुनौती नहीं दी जा सकती।

यदि कोई व्यक्ति 10-15 वर्ष बाद पुनः आवेदन देकर अपनी नौकरी या पेंशन का दावा करता है, तो अदालत उसे स्वीकार नहीं करेगी।

आम जनता के लिए यह संदेश है कि न्याय पाने के लिए समयसीमा का पालन अनिवार्य है। देर से उठाया गया दावा वैध नहीं माना जाएगा।

सरकारी विभागों के लिए भी यह निर्णय उपयोगी है, क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि पुरानी प्रशासनिक कार्रवाइयाँ बार-बार चुनौती का विषय न बनें। इससे प्रशासनिक स्थिरता बनी रहती है और न्यायिक संसाधनों की बचत होती है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या 16 वर्ष बाद बर्खास्त कर्मचारी पुनर्नियुक्ति की मांग कर सकता है?
    → नहीं। इतनी देर से की गई मांग “लैचेज़” (laches) के सिद्धांत के तहत अस्वीकृत की जाएगी।
  • क्या बिहार राज्य वाद नीति, 2011 के तहत आवेदन अस्वीकृति नया कारण-कार्यवाही देती है?
    → नहीं। आवेदन की अस्वीकृति से पुराने आदेश को फिर से चुनौती देने का अधिकार नहीं मिलता।
  • क्या मामला “covered matter” की श्रेणी में आता है?
    → नहीं। क्योंकि याचिकाकर्ता ने मूल आदेश को कभी चुनौती ही नहीं दी।
  • परिणाम:
    → याचिका विलंब और अपर्याप्त अभिलेखों के कारण खारिज की गई।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • एलपीए संख्या 1746/2010 — Deepak Kumar बनाम State of Bihar & Others (2011)
  • एलपीए संख्या 1167/2009 — State of Bihar & Others बनाम Md. Manzoor Alam (08.08.2011)
  • सीडब्ल्यूजेसी संख्या 3799/2006 — Satish Chandra Jha बनाम State of Bihar & Others (23.07.2012)
  • एलपीए संख्या 690/2006 — Mithilesh Kumar Singh बनाम State of Bihar & Others (23.05.2007)
  • एलपीए संख्या 1584/2017 — Umesh Kumar Verma & Another बनाम State of Bihar & Others (31.01.2018)

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Union of India & Others v. C. Girija & Others, (2019) 15 SCC 633

मामले का शीर्षक

Dinesh Prasad Yadav बनाम The State of Bihar & Others

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 10518 of 2018

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 504

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री अजय कुमार, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: श्री शिव शंकर प्रसाद, स्थायी अधिवक्ता (SC VIII)

निर्णय का लिंक

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