पटना उच्च न्यायालय का फैसला : रेलवे दुर्घटना मुआवजा तुरंत जारी करने का निर्देश, मामूली सिर की चोट पर अधिक मुआवजे की मांग खारिज (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय का यह फैसला रेलवे दुर्घटना से जुड़े मुआवजा मामलों में आम यात्रियों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। इस निर्णय में अदालत ने दो अहम बातों को स्पष्ट किया—
पहली, क्या मामूली सिर की चोट के आधार पर अधिक मुआवजे की मांग की जा सकती है, और
दूसरी, क्या रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल मुआवजा राशि को वर्षों तक किस्तों में देने का आदेश दे सकता है

इस मामले में याचिकाकर्ता एक रेलवे यात्री था, जिसे ट्रेन से संबंधित एक दुर्घटना में चोटें आई थीं। उसने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल, पटना पीठ के समक्ष मुआवजे का दावा किया था। ट्रिब्यूनल ने यह माना कि यात्री को दुर्घटना में पैर (leg) में चोट आई है और इस आधार पर उसे ₹2,40,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया।

हालाँकि, ट्रिब्यूनल के आदेश से दो बातें विवादित रहीं—

  • यात्री का यह दावा कि उसे सिर (head) में भी चोट आई थी, इसलिए उसे अधिक मुआवजा मिलना चाहिए, और
  • ट्रिब्यूनल का यह निर्देश कि मुआवजा राशि एक साथ न देकर 72 मासिक किस्तों (₹3,000 प्रति माह) में दी जाए।

इन दोनों बातों से असंतुष्ट होकर यात्री ने पटना उच्च न्यायालय में Miscellaneous Appeal No. 1055 of 2019 दायर की। इस अपील का निर्णय माननीय न्यायमूर्ति राजीव रॉय द्वारा 15 दिसंबर 2022 को दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह एक रेलवे दुर्घटना में घायल हुआ था और रेलवे अधिनियम, 1989 के अंतर्गत उसे मुआवजा मिलना चाहिए।

रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने साक्ष्यों की जाँच के बाद पाया कि—

  • याचिकाकर्ता कोई वैध यात्रा टिकट प्रस्तुत नहीं कर सका,
  • लेकिन उसके हलफनामे और परिस्थितियों के आधार पर उसे बोनाफाइड यात्री माना गया,
  • यह स्वीकार किया गया कि दुर्घटना में उसे पैर में चोट आई थी, जिसके लिए वैधानिक मुआवजा देय है।

इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने ₹2,40,000 मुआवजा तय किया। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि—

  • यह राशि पहले ट्रिब्यूनल में जमा होगी, और
  • बाद में इसे 72 मासिक किस्तों में याचिकाकर्ता को दिया जाएगा।

याचिकाकर्ता ने मुआवजा पाने के अधिकार को नहीं, बल्कि मुआवजे की राशि और भुगतान के तरीके को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

सिर की चोट और अधिक मुआवजे की मांग

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल ने यह मानने में गलती की कि उसे केवल पैर में चोट आई थी। उसके अनुसार, उसे सिर में भी चोट आई थी, इसलिए अधिक मुआवजा दिया जाना चाहिए था।

इसके समर्थन में GSVM मेडिकल कॉलेज, कानपुर का एक डिस्चार्ज स्लिप प्रस्तुत किया गया।

उच्च न्यायालय ने इस मेडिकल दस्तावेज़ की बारीकी से जाँच की और पाया कि—

  • याचिकाकर्ता को 10.07.2011 को भर्ती किया गया और 12.07.2011 को छुट्टी दे दी गई,
  • इलाज केवल साधारण (conservative) था, जैसे IV फ्लूड, दवाइयाँ और दर्द निवारक,
  • मेडिकल रिपोर्ट में कहीं भी गंभीर या स्थायी सिर की चोट का उल्लेख नहीं था।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल सिर की चोट का उल्लेख होना, बिना उसकी गंभीरता या स्थायी प्रभाव के प्रमाण के, अधिक मुआवजे का आधार नहीं बन सकता

इसलिए न्यायालय ने माना कि ट्रिब्यूनल द्वारा सिर की चोट के लिए अतिरिक्त मुआवजा न देना पूरी तरह सही था।

किस्तों में मुआवजा देने का प्रश्न

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मुआवजे के भुगतान के तरीके से जुड़ा है।

उच्च न्यायालय ने यह देखा कि—

  • ट्रिब्यूनल का आदेश अक्टूबर 2019 का था,
  • इसके बावजूद, याचिकाकर्ता को एक भी रुपया अब तक नहीं मिला था,
  • 72 महीनों तक किस्तों में भुगतान करने का आदेश मुआवजा कानून के उद्देश्य के विपरीत है।

अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के प्रसिद्ध फैसले Anju & Others v. Union of India का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि—

  • मुआवजा एक कल्याणकारी राहत है,
  • इसका उद्देश्य पीड़ित को तत्काल आर्थिक सहायता देना है,
  • वर्षों तक FDR या किस्तों में राशि रोकना अनुचित है।

अदालत ने यह भी नोट किया कि इस फैसले के खिलाफ दायर सुप्रीम कोर्ट की SLP खारिज हो चुकी है, यानी यह सिद्धांत अब अंतिम है।

पटना उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश

उपरोक्त कारणों से उच्च न्यायालय ने निम्नलिखित आदेश पारित किए—

  • सिर की चोट के आधार पर अधिक मुआवजे की मांग खारिज की जाती है,
  • ट्रिब्यूनल द्वारा तय किया गया ₹2,40,000 का मुआवजा बरकरार रखा जाता है,
  • रेलवे को निर्देश दिया गया कि वह पूरी मुआवजा राशि सीधे याचिकाकर्ता के बैंक खाते में RTGS के माध्यम से जमा करे,
  • यह भुगतान 60 दिनों के भीतर किया जाए,
  • यदि समय सीमा का पालन नहीं किया गया, तो रेलवे को ₹50,000 अतिरिक्त लागत (cost) भी चुकानी होगी।

इस प्रकार, अपील का निपटारा कर दिया गया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता पर

यह फैसला रेलवे यात्रियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है—

  • यह स्पष्ट करता है कि अधिक मुआवजे के लिए ठोस मेडिकल प्रमाण आवश्यक है,
  • मामूली चोटों के आधार पर बढ़ा हुआ दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा,
  • मुआवजा मिलने में अनावश्यक देरी या किश्तों की शर्त लगाना गलत है,
  • अदालतें यह सुनिश्चित करेंगी कि पीड़ित को समय पर राहत मिले।

रेलवे प्रशासन के लिए यह निर्णय एक चेतावनी है कि मुआवजा आदेशों का पालन न करने पर अतिरिक्त आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)

  • क्या मामूली सिर की चोट पर अधिक मुआवजा मिल सकता है?
    ➤ नहीं, जब तक गंभीरता का मेडिकल प्रमाण न हो।
  • क्या मुआवजा किश्तों में दिया जा सकता है?
    ➤ नहीं, मुआवजा तुरंत जारी किया जाना चाहिए।
  • क्या देरी करने पर दंड लगाया जा सकता है?
    ➤ हाँ, ₹50,000 तक का अतिरिक्त खर्च लगाया जा सकता है।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Anju & Others v. Union of India (Punjab & Haryana High Court)
  • Union of India v. Anju (Supreme Court, SLP खारिज)

मामले का शीर्षक

यात्री (अपीलकर्ता) बनाम भारत संघ (रेलवे)

केस नंबर

Miscellaneous Appeal No. 1055 of 2019

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 557

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति राजीव रॉय

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • अपीलकर्ता की ओर से: श्री कृष्ण मोहन मुरारी, अधिवक्ता
  • प्रतिवादी (रेलवे) की ओर से: सुश्री कनक वर्मा, CGC

निर्णय का लिंक

MiMxMDU1IzIwMTkjMSNO-kd8I9OVYQec=

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News