पटना उच्च न्यायालय का फैसला : POCSO मामले में प्रक्रिया का उल्लंघन — अवैध संज्ञान आदेश रद्द, विशेष न्यायालय को नए सिरे से निर्णय का निर्देश (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय POCSO अधिनियम से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की अनिवार्यता को रेखांकित करने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बाल यौन अपराध जैसे संवेदनशील मामलों में भी कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है, और किसी भी अदालत को शॉर्टकट अपनाने की अनुमति नहीं है।

यह मामला उस स्थिति से जुड़ा था, जहाँ पुलिस जांच के बाद आरोपित के विरुद्ध साक्ष्य के अभाव में अंतिम रिपोर्ट (Final Report) दाखिल की गई थी। इसके बावजूद, विशेष POCSO न्यायालय ने एक प्रोटेस्ट पिटीशन, प्राथमिकी (FIR) और धारा 164 Cr.P.C. के बयान को मिलाकर (composite manner) आरोपित के विरुद्ध संज्ञान ले लिया।

आरोपित ने इस संज्ञान आदेश को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने यह पाया कि संज्ञान लेने की यह विधि कानूनन गलत थी, और इससे आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है।

इस मामले का निर्णय माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा द्वारा 30 सितंबर 2022 को दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह आपराधिक मामला कोतवाली थाना कांड संख्या 983/2019 से उत्पन्न हुआ था। आरोप यह था कि—

  • आरोपित, जो कि पीड़िता का पड़ोसी था,
  • माता-पिता की अनुपस्थिति में घर में घुसा,
  • नाबालिग पीड़िता के साथ अशोभनीय हरकत की,
  • और उसे धमकाया।

घटना की प्राथमिकी कुछ विलंब से दर्ज हुई, जिसका कारण पीड़िता द्वारा मानसिक आघात बताया गया। जाँच के दौरान—

  • पीड़िता का बयान धारा 164 Cr.P.C. के तहत दर्ज किया गया,
  • लेकिन समस्त साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद पुलिस ने यह निष्कर्ष निकाला कि
    👉 मुकदमा चलाने हेतु पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं,
  • और इसलिए Final Form (अंतिम रिपोर्ट) दाखिल कर दी गई।

इस अंतिम रिपोर्ट से असंतुष्ट होकर पीड़िता के पिता ने प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की।

विशेष POCSO न्यायालय द्वारा की गई त्रुटि

विशेष POCSO न्यायालय ने—

  • पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को स्वीकार या अस्वीकार करने के बजाय,
  • प्रोटेस्ट पिटीशन, FIR और 164 Cr.P.C. के बयान को एक साथ देखकर,
  • आरोपित के विरुद्ध संज्ञान ले लिया।

महत्वपूर्ण बात यह रही कि—

  • प्रोटेस्ट पिटीशन को शिकायत (Complaint Case) के रूप में परिवर्तित नहीं किया गया,
  • धारा 200 Cr.P.C. के तहत न तो शिकायतकर्ता का बयान लिया गया,
  • और न ही किसी गवाह का परीक्षण हुआ।

इसी संज्ञान आदेश दिनांक 03.04.2021 को आरोपित ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

उच्च न्यायालय के समक्ष तर्क

आरोपित की ओर से

  • प्रोटेस्ट पिटीशन पर संज्ञान लेने के लिए Cr.P.C. की प्रक्रिया का पालन अनिवार्य था।
  • न्यायालय ने अलग-अलग स्रोतों की सामग्री को मिलाकर संज्ञान लिया, जो कानूनन गलत है।
  • यह Composite Cognizance का मामला है, जो मान्य नहीं है।

राज्य और सूचक की ओर से

  • पीड़िता के बयान विश्वसनीय हैं।
  • FIR में देरी का उचित कारण है।
  • POCSO मामलों में न्यायालय को तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए।

पटना उच्च न्यायालय का कानूनी विश्लेषण

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—

प्रोटेस्ट पिटीशन का सीमित उपयोग

जब पुलिस अंतिम रिपोर्ट दाखिल करती है और प्रोटेस्ट पिटीशन आती है, तब न्यायालय के पास केवल ये विकल्प होते हैं—

  • अंतिम रिपोर्ट स्वीकार करना,
  • पुलिस सामग्री के आधार पर असहमति जताकर संज्ञान लेना, या
  • प्रोटेस्ट पिटीशन को शिकायत मानकर धारा 200–202 Cr.P.C. की प्रक्रिया अपनाना।

इनके अतिरिक्त कोई चौथा रास्ता नहीं है।

Composite Cognizance अवैध

अदालत ने साफ कहा कि—
👉 FIR + प्रोटेस्ट पिटीशन + 164 Cr.P.C. बयान को मिलाकर संज्ञान लेना कानूनन अनुमत नहीं है।

धारा 200 Cr.P.C. का उल्लंघन

यदि प्रोटेस्ट पिटीशन को शिकायत माना जाता, तो—

  • शिकायतकर्ता का बयान,
  • और गवाहों का परीक्षण
    अनिवार्य था, जो इस मामले में नहीं किया गया।

न्यायालय ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—
👉 वह आरोपों की सच्चाई या असत्यता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा,
👉 हस्तक्षेप केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि के आधार पर किया गया है।

पटना उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय

इन सभी कारणों से उच्च न्यायालय ने—

  • दिनांक 03.04.2021 के संज्ञान आदेश को रद्द (quash) कर दिया।
  • मामला पुनः विशेष POCSO न्यायालय को भेज दिया।
  • निर्देश दिया कि न्यायालय
    👉 कानून के अनुसार उचित विकल्प चुनकर,
    👉 नए सिरे से निर्णय करे।

इस प्रकार, आपराधिक याचिका स्वीकार कर ली गई।

निर्णय का महत्व और प्रभाव

यह फैसला कई महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है—

  • POCSO जैसे संवेदनशील मामलों में भी न्यायिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
  • प्रोटेस्ट पिटीशन पर संज्ञान लेने के लिए Cr.P.C. का पालन आवश्यक है।
  • आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की रक्षा की गई।
  • विशेष न्यायालयों को यह संदेश गया कि
    👉 संवेदनशीलता के नाम पर प्रक्रिया की अनदेखी नहीं की जा सकती।

कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)

  • क्या प्रोटेस्ट पिटीशन और पुलिस सामग्री को मिलाकर संज्ञान लिया जा सकता है?
    ➤ नहीं।
  • क्या POCSO मामलों में Cr.P.C. की प्रक्रिया छोड़ी जा सकती है?
    ➤ नहीं।
  • क्या धारा 200 Cr.P.C. का पालन अनिवार्य है?
    ➤ हाँ, यदि प्रोटेस्ट पिटीशन को शिकायत माना जाए।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • State of Haryana बनाम Bhajan Lal, AIR 1992 SC 604
  • Harbans Kaur बनाम State of Haryana, (2005) 9 SCC 195

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • State of Haryana बनाम Bhajan Lal, AIR 1992 SC 604
  • Nagawwa बनाम Veeranna, AIR 1976 SC 1947
  • Madhavrao Scindia बनाम Sambhajirao, AIR 1988 SC 709

मामले का शीर्षक

आरोपित व्यक्ति बनाम बिहार राज्य एवं अन्य

केस नंबर

Criminal Miscellaneous No. 61636 of 2021
(उत्पन्न : कोतवाली थाना कांड संख्या 983/2019)

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 604

न्यायमूर्ति का नाम

माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से:
    श्री पी.एन. शाही (वरिष्ठ अधिवक्ता);
    सुश्री अर्चना सिन्हा, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से:
    श्री प्रणव कुमार, APP
  • सूचक की ओर से:
    श्री संजीव कुमार, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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