पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: झूठे आरोपों और अपूर्ण सबूतों के कारण POCSO केस में अभियुक्त बरी (2021)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को यौन अपराध का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जब सबूतों में विरोधाभास हो और गवाही भरोसेमंद न हो, तो आरोपी को “संदेह का लाभ” मिलना चाहिए।

यह मामला क्रिमिनल अपील (एस.जे.) नंबर 812/2019 से जुड़ा था, जिसका निर्णय माननीय न्यायमूर्ति बिरेंद्र कुमार ने 7 अप्रैल 2021 को दिया।

मामले की शुरुआत एक शिकायत से हुई थी, जिसमें एक 15 वर्षीय किशोरी ने आरोप लगाया कि 15 दिसंबर 2016 की सुबह लगभग 6 बजे जब वह अपने पशुशाला (बथान) जा रही थी, तो गाँव का ही एक व्यक्ति (अभियुक्त) रास्ते में मिला और उसने उसे पकड़ लिया, उसके साथ छेड़छाड़ की, गाल पर दाँत से काटा और उसके कपड़े फाड़ दिए। जब उसने शोर मचाया, तो गाँव के लोग वहाँ पहुँच गए और आरोपी भाग गया।

पीड़िता के परिवार ने पहले पंचायत में मामला सुलझाने की कोशिश की, लेकिन आरोपी तैयार नहीं हुआ। इसके बाद मामला पुलिस में दर्ज किया गया — कुढ़नी थाना कांड संख्या 407/2016।

पुलिस जांच के बाद मामला POCSO अधिनियम, 2012 की धारा 8 तथा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 354A और 341 के तहत अदालत में चला। 21 जनवरी 2019 को निचली अदालत ने अभियुक्त को दोषी ठहराते हुए 4 साल की सजा सुनाई।

लेकिन अपील में बचाव पक्ष ने बताया कि यह मामला बदले की भावना से दर्ज कराया गया था। कारण यह था कि घटना से नौ दिन पहले — 6 दिसंबर 2016 को — आरोपी की भाभी (प्रमिला देवी) ने पीड़िता के परिवार पर छेड़खानी, घर में घुसपैठ और चोरी जैसे गंभीर आरोप लगाकर एक मुकदमा दर्ज कराया था (कुढ़नी थाना कांड संख्या 30/2017)। आरोपी पक्ष का कहना था कि उसी मामले को वापस लेने के दबाव में यह झूठा मामला रचा गया।

उच्च न्यायालय ने जब सबूतों की जांच की तो कई गंभीर खामियाँ सामने आईं:

  1. मेडिकल रिपोर्ट और बयान में अंतर:
    डॉक्टर ने केवल हल्की खरोंचें और सूजन जैसी साधारण चोटें बताईं। किसी भी जगह दाँत के निशान या खून का कोई प्रमाण नहीं मिला, जबकि लड़की ने कहा था कि आरोपी ने गाल पर काटा था।
  2. गवाही में विरोधाभास:
    पीड़िता ने अदालत में माना कि उसका शरीर और कपड़े कीचड़ से सने हुए थे — जिससे यह संभावना बनी कि वह पानी के पंप के पास गिर गई थी, न कि किसी ने हमला किया।
  3. पहले से चली आ रही रंजिश:
    अदालत ने पाया कि आरोपी की भाभी द्वारा पहले दर्ज कराए गए केस का उल्लेख जानबूझकर छुपाया गया था। इस तथ्य ने अभियोजन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया।
  4. रक्षा गवाहों की गवाही:
    दो गवाहों ने बताया कि वे घटना के समय उसी जगह खेत में काम कर रहे थे और उन्होंने कोई छेड़छाड़ की घटना नहीं देखी, बल्कि दोनों परिवारों के बीच झगड़ा हुआ था।

इन सब बातों के आधार पर अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि घटना वास्तव में हुई थी। संदेह की स्थिति में कानून आरोपी को लाभ देता है। इसलिए, अदालत ने अभियुक्त की सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  • यह फैसला न्याय के उस मूल सिद्धांत को दोहराता है कि किसी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं कहा जा सकता जब तक अपराध साबित न हो जाए।
  • यह भी स्पष्ट किया गया कि POCSO जैसे संवेदनशील मामलों में अदालतों को सबूतों की निष्पक्षता पर विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि निर्दोष व्यक्ति झूठे आरोपों में न फँसे।
  • यह मामला पुलिस और अभियोजन एजेंसियों के लिए भी चेतावनी है कि यदि किसी मामले में पारिवारिक विवाद या पुरानी रंजिश है, तो उसे गंभीरता से जांचा जाए।
  • अदालत ने कहा कि प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का पालन करना हर स्थिति में आवश्यक है — चाहे मामला कितना भी गंभीर क्यों न हो।

कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)

  • क्या अभियुक्त के खिलाफ सबूत पर्याप्त और भरोसेमंद थे?
    ➤ नहीं। मेडिकल रिपोर्ट और गवाही में स्पष्ट विरोधाभास था।
  • क्या परिवारों के बीच पहले से चली आ रही दुश्मनी का असर इस मामले पर पड़ा?
    ➤ हाँ। पहले दर्ज मामले को छुपाना अभियोजन की मंशा पर सवाल उठाता है।
  • क्या अभियुक्त को संदेह का लाभ दिया जा सकता है?
    ➤ हाँ। जब साक्ष्य स्पष्ट नहीं हों, तो कानून के अनुसार अभियुक्त को ही लाभ मिलना चाहिए।
  • अंतिम परिणाम:
    ➤ 21.01.2019 और 29.01.2019 के दोषसिद्धि व सजा आदेश को रद्द किया गया।
    ➤ अपील स्वीकार की गई।
    ➤ अभियुक्त को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया गया।

मामले का शीर्षक

अपीलकर्ता बनाम बिहार राज्य

केस नंबर

Criminal Appeal (SJ) No. 812 of 2019

उद्धरण (Citation)

2021(2) PLJR 365

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति बिरेंद्र कुमार

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

अपीलकर्ता की ओर से: श्री राम शंकर दास, अधिवक्ता
राज्य की ओर से: श्री बिनोद बिहारी सिंह, ए.पी.पी.

निर्णय का लिंक

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