निर्णय की सरल व्याख्या
पटना हाई कोर्ट ने 11 दिसम्बर 2024 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें तीनों अपीलकर्ताओं को नाबालिग से दुष्कर्म और पोक्सो (POCSO) अधिनियम की गंभीर धाराओं में दोषी ठहराए जाने के निचली अदालत के फैसले को पलट दिया गया। पहले, गया जिले की विशेष पोक्सो अदालत ने उन्हें दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा दी थी। लेकिन हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) अपने आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।
यह मामला 30 नवम्बर 2022 को दर्ज एक शिकायत से जुड़ा था। शिकायत में कहा गया था कि एक नाबालिग लड़की को मोटरसाइकिल पर बैठाकर एक कब्रिस्तान के पास ले जाया गया और वहाँ खड़े कंटेनर में तीन लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया। इस घटना की एफआईआर छह दिन बाद यानी 6 दिसम्बर 2022 को महिला थाना, गया में दर्ज हुई। पुलिस ने जाँच कर आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल किया और विशेष पोक्सो अदालत ने दोषसिद्धि कर दी।
लेकिन जब मामला अपील में पटना हाई कोर्ट पहुँचा तो अदालत ने गवाहों के बयान, मेडिकल सबूत, पहचान परेड (Test Identification Parade – TIP) और जाँच की कमियों का बारीकी से अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि पूरे केस में कई गंभीर खामियाँ हैं, जिसके कारण अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं होगा।
सबसे अहम बात यह रही कि पीड़िता (Victim) ने अदालत में गवाही देते हुए खुद कहा कि जिन लोगों को पुलिस ने पकड़ा और जिन्हें अदालत में पेश किया गया, वे वही लोग नहीं हैं जिन्होंने घटना को अंजाम दिया था। उसने यहाँ तक कहा कि उसने थाने में लिखित शिकायत नहीं दी थी। जब पीड़िता ही स्पष्ट रूप से अभियुक्तों की पहचान करने से इनकार कर रही है, तो ऐसे में दोषसिद्धि को बरकरार रखना मुश्किल हो गया।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
इस फैसले से कई महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं:
- पहचान की विश्वसनीयता जरूरी है – यदि पीड़िता अदालत में अभियुक्तों को पहचानने से इनकार कर दे और पहचान परेड भी संदेहास्पद हो, तो केवल एफआईआर के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
- गवाहों का समर्थन अनिवार्य है – जब परिवार के सदस्य और खुद पीड़िता अदालत में पहले के बयान से पलट जाएँ, तो अभियोजन को अन्य ठोस सबूत देने होते हैं। ऐसे सबूत यहाँ मौजूद नहीं थे।
- जाँच में लापरवाही – पुलिस ने न तो अभियुक्तों का मेडिकल परीक्षण करवाया, न ही जब्त कपड़ों की फॉरेंसिक रिपोर्ट पेश की। ऐसे में वैज्ञानिक प्रमाण की कमी रही।
- मेडिकल रिपोर्ट का महत्व – मेडिकल जाँच में बलात्कार के हालिया प्रमाण नहीं मिले। यह अकेले दोषमुक्ति का आधार नहीं होता, लेकिन जब बाकी सबूत भी कमजोर हों तो अदालत इसका असर ज़रूर देखती है।
- सरकार और जाँच एजेंसियों के लिए सबक – यह मामला याद दिलाता है कि पोक्सो जैसे संवेदनशील मामलों में जाँच बेहद सावधानी और कानूनी प्रावधानों के अनुसार करनी चाहिए। अन्यथा दोषी बच सकते हैं और निर्दोष फँस सकते हैं।
साधारण नागरिकों के लिए यह फैसला बताता है कि भारतीय न्यायपालिका अभियुक्तों को तभी सजा देती है जब अभियोजन अपने आरोपों को संदेह से परे साबित कर दे। अन्यथा, संदेह का लाभ अभियुक्त को दिया जाता है।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या अभियोजन ने अभियुक्तों की पहचान पुख्ता की?
✦ नहीं। पीड़िता ने कहा कि अदालत में मौजूद लोग अपराधी नहीं थे। पहचान परेड भी संदिग्ध थी। - क्या मेडिकल और फॉरेंसिक सबूत आरोप की पुष्टि करते हैं?
✦ नहीं। मेडिकल रिपोर्ट में बलात्कार का हालिया प्रमाण नहीं मिला और फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत में पेश ही नहीं हुई। - क्या गवाहों का बयान अभियोजन का समर्थन करता है?
✦ नहीं। पीड़िता और परिवार के अन्य सदस्य अदालत में मुकर गए। - क्या पीड़िता की उम्र साबित करने का तरीका सही था?
✦ अदालत ने पाया कि उम्र का प्रमाण केवल सांख्यिकी विभाग के जन्म प्रमाणपत्र पर आधारित था, जबकि पोक्सो मामलों में स्कूल रिकॉर्ड या अन्य प्रमाण का इस्तेमाल अपेक्षित है।
मामले का शीर्षक
तीन अपीलकर्ता बनाम बिहार राज्य (Mahila P.S. Case No. 113/2022, जिला गया से संबंधित)।
केस नंबर
- Criminal Appeal (DB) No. 1018 of 2023
- Criminal Appeal (DB) No. 1085 of 2023
- Criminal Appeal (DB) No. 1141 of 2023
उद्धरण (Citation)
2025 (1) PLJR 295
न्यायमूर्ति गण का नाम
- माननीय न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार
- माननीय न्यायमूर्ति राजेश कुमार वर्मा
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- अपीलकर्ता (Cr. Appeal (DB) Nos. 1018/2023 एवं 1085/2023): अधिवक्ता अजय ठाकुर, इम्तेयाज़ अहमद, वैष्णवी सिंह, ऋतिक ठाकुर
- अपीलकर्ता (Cr. Appeal (DB) No. 1141/2023): अधिवक्ता मनीष कुमार (No. II), आर्यन सिंह, गजेन्द्र कुमार सिंह
- राज्य पक्ष: अधिवक्ता परमेश्वर मेहता (ए.पी.पी.)
निर्णय का लिंक
NSMxMDE4IzIwMjMjMSNO-eik–ak1–GOA–ak1–sOY=
यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।


