पटना उच्च न्यायालय का फैसला: 2016 से पहले रिटायर शिक्षकों को 7वें वेतन आयोग की इन्क्रीमेंट सुविधा नहीं मिलेगी (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 23 दिसंबर 2022 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें 2016 से पहले सेवानिवृत्त शिक्षकों की याचिकाएं खारिज कर दी गईं। ये याचिकाएं उन शिक्षकों द्वारा दायर की गई थीं जो राज्य सरकार से अपनी पेंशन में बढ़ोतरी और 7वें वेतन आयोग के लाभ की मांग कर रहे थे।

यह फैसला माननीय न्यायमूर्ति हरीश कुमार की एकल पीठ ने सुनाया। इसमें पांच याचिकाएं एक साथ सुनी गईं — क्योंकि सभी मामलों में मुद्दा एक ही था।

सभी याचिकाकर्ता प्राथमिक और मध्य विद्यालयों के सेवानिवृत्त शिक्षक थे, जो 1 जनवरी 2016 से पहले रिटायर हो चुके थे। उन्होंने यह मांग की थी कि उनकी पेंशन का पुनर्निर्धारण (revision) 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार किया जाए और उनकी “notional increment” (काल्पनिक वेतन वृद्धि) को भी जोड़ा जाए।

सरकार ने यह दावा ठुकरा दिया था, जिसके खिलाफ शिक्षकों ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

मामला क्या था

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि —

  • उनकी पेंशन पुरानी वेतनमान के आधार पर तय की गई है, जिससे उन्हें कम पेंशन मिल रही है।
  • सरकार ने उनके वरिष्ठता (seniority) और पूर्व सेवा की लंबाई को नजरअंदाज किया है।
  • 7वें वेतन आयोग के अनुसार, उन्हें “notional pay fixation” और “increment” का लाभ मिलना चाहिए था।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ (AIR 1983 SC 130) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि सिर्फ सेवानिवृत्ति की तारीख के आधार पर पेंशन में भेदभाव करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।

बिहार सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि—

  • इस विषय पर पहले भी न्यायालय के निर्देशों के पालन में निर्णय लिया जा चुका है।
  • बिहार वित्त विभाग ने रिज़ॉल्यूशन संख्या 755, दिनांक 20 अक्टूबर 2017 के तहत 7वें वेतन आयोग को लागू किया है।
  • इस नीति के अनुसार, 1 जनवरी 2016 से पहले रिटायर होने वाले कर्मचारियों की पेंशन “आखिरी वेतन” (last pay drawn) के आधार पर तय होगी।
  • केवल वही कर्मचारी इन्क्रीमेंट (वेतन वृद्धि) के हकदार हैं, जो उस तारीख तक सेवा में थे।

सरकार ने यह भी कहा कि यह भेदभाव नहीं बल्कि तार्किक वर्गीकरण है, क्योंकि इन्क्रीमेंट केवल सेवा अवधि में किए गए कार्य और प्रदर्शन के आधार पर दिया जाता है।

न्यायालय की टिप्पणियाँ और निर्णय

पटना उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के तर्कों से सहमति जताई और कहा—

  • रिटायर्ड कर्मचारी और वर्तमान में कार्यरत कर्मचारी समान श्रेणी में नहीं रखे जा सकते।
  • इन्क्रीमेंट केवल उन कर्मचारियों को दिया जा सकता है जो 1 जनवरी 2016 को सेवा में थे, क्योंकि यह “प्रदर्शन आधारित लाभ” है।
  • 2017 के केंद्रीय आदेश (No. 38/37/2016-P&PW(A), दिनांक 12 मई 2017) में भी पेंशन के पुनर्निर्धारण में इन्क्रीमेंट जोड़ने का कोई प्रावधान नहीं है।

कोर्ट ने डी.एस. नकारा के फैसले का हवाला तो माना, लेकिन कहा कि वह मामला अलग परिस्थिति में था। वहां पेंशनरों के बीच केवल कट-ऑफ डेट के आधार पर भेदभाव किया गया था। जबकि इस मामले में वर्गीकरण “सेवा की स्थिति” पर आधारित है — जो पूरी तरह से उचित और तर्कसंगत है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को सरकार की 2017 की नीति से शिकायत थी, तो उन्हें उस नीति को ही चुनौती देनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

इसलिए, अदालत ने पाया कि सभी याचिकाएं निर्थक और बिना मेरिट की हैं और उन्हें खारिज कर दिया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

यह फैसला बिहार सरकार और अन्य राज्यों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

इससे स्पष्ट हुआ कि—

  • 7वें वेतन आयोग के अनुसार पेंशन संशोधन (pension revision) केवल “last pay drawn” पर आधारित होगा।
  • सेवानिवृत्त कर्मचारियों को notional increment का लाभ नहीं मिलेगा।
  • सरकार का यह कदम संवैधानिक और उचित वर्गीकरण पर आधारित है, इसलिए इसमें कोई भेदभाव नहीं माना जाएगा।

आम रिटायर्ड सरकारी कर्मियों के लिए यह संदेश है कि पेंशन में बढ़ोतरी का अधिकार सीमित है और यह उस नीति पर निर्भर करता है जो सरकार समय-समय पर तय करती है।

कानूनी मुद्दे और न्यायालय का निर्णय

  • मुद्दा 1: क्या 2016 से पहले रिटायर कर्मचारियों को 7वें वेतन आयोग के तहत “notional increment” का लाभ मिल सकता है?
    निर्णय: नहीं। केवल वे कर्मचारी, जो 1 जनवरी 2016 तक सेवा में थे, इन्क्रीमेंट के पात्र हैं।
  • मुद्दा 2: क्या सेवारत और सेवानिवृत्त कर्मचारियों को समान लाभ न देना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है?
    निर्णय: नहीं। यह वर्गीकरण तार्किक है क्योंकि इन्क्रीमेंट सेवा में कार्य के प्रदर्शन पर निर्भर है।
  • मुद्दा 3: क्या डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ का निर्णय इस मामले में लागू होता है?
    निर्णय: नहीं। वह मामला कट-ऑफ डेट पर आधारित भेदभाव से जुड़ा था, जबकि यहां मामला सेवा स्थिति से संबंधित है।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • D.S. Nakara v. Union of India, AIR 1983 SC 130

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय / दस्तावेज़

  • D.S. Nakara (विभेद सिद्धांत पर चर्चा)
  • वित्त विभाग का संकल्प संख्या 755 दिनांक 20.10.2017
  • भारत सरकार का आदेश संख्या 38/37/2016-P&PW(A) दिनांक 12.05.2017

मामले का शीर्षक

Ramdev Prasad Yadav & Others v. State of Bihar & Others

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Cases Nos. 1525, 699, 1671, 1823 & 3017 of 2021

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 651

न्यायमूर्ति गण

माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री माधव कुमार, अधिवक्ता
  • प्रतिवादियों की ओर से:
    • श्री राघवेन्द्र कुमार (SC-22)
    • सुश्री बंधना सिंह (AC to SC-21)
    • सुश्री नम्रता सिंह (AC to GA-12)
    • श्री अनिल कुमार सिंह (GP-26)

निर्णय का लिंक

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