निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने 24 नवम्बर 2022 को दिए अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि पति का यह पवित्र कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण का प्रबंध करे, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।
यह मामला मदनपुर जिला, मधेपुरा का था, जहाँ एक पति ने फैमिली कोर्ट, मधेपुरा द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी थी। उस आदेश में अदालत ने पत्नी और दो बच्चों के लिए ₹1500 प्रतिमाह का अंतरिम भरण-पोषण (interim maintenance) देने का निर्देश दिया था।
यह मामला नागरिक विविध अधिकारिता संख्या 718/2022 (Civil Misc. Jurisdiction No. 718 of 2022) के रूप में सुनवाई में आया, जो आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 1246/2018 से संबंधित था। मामले की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने की।
मामले की पृष्ठभूमि
पत्नी ने भरण-पोषण मामला संख्या 145/2014 के तहत दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के अंतर्गत याचिका दायर की थी। उसने कहा कि वह अपने पति की वैध पत्नी है, और उनके दो पुत्र हैं। पति के दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के कारण वह बच्चों के साथ अलग रहने को विवश हुई।
पत्नी का कहना था कि उसके पास कोई स्वतंत्र आय नहीं है और वह व बच्चों का पालन-पोषण करने में असमर्थ है। वहीं, पति एक सक्षम व्यक्ति है और उसकी आय के कई स्रोत हैं।
पति ने अपने बचाव में कहा कि वह एक मजदूर है, बहुत गरीब है, और अपनी पत्नी को सम्मानपूर्वक साथ रखने को तैयार है। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी पहले दो बार शादी कर चुकी है और “अनैतिक जीवन” जी रही है।
फैमिली कोर्ट ने इन दलीलों को देखते हुए ₹1500 प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण तय किया और मुकदमेबाजी का खर्च भी जोड़ा। इसके खिलाफ पति ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
न्यायालय की टिप्पणियाँ
उच्च न्यायालय ने जब केस का रिकॉर्ड देखा, तो पाया कि पति ने बार-बार अदालत में उपस्थित न होकर मुकदमे की प्रक्रिया को टालने की कोशिश की —
- पहले नोटिस मिलने के बावजूद अदालत में उपस्थित नहीं हुआ, जिससे मामला एकतरफा (ex-parte) चलने लगा।
- बाद में जब अदालत ने एकतरफा आदेश रद्द किया, तो उसने फिर से अनुपस्थित रहकर प्रक्रिया में देरी की।
- कई बार अदालत को उसे ₹200, ₹500 और ₹1000 के जुर्माने लगाकर कार्यवाही आगे बढ़ानी पड़ी।
न्यायालय ने कहा कि यह आचरण दर्शाता है कि पति ने जानबूझकर भरण-पोषण की कार्यवाही में विलंब किया और पत्नी को मानसिक व आर्थिक रूप से परेशान किया।
माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने कहा कि ₹1500 प्रति माह की राशि बहुत ही कम (meagre) है और इसे अत्यधिक नहीं कहा जा सकता। यह पत्नी और दो बच्चों के लिए न्यायसंगत है।
जहाँ तक पति द्वारा लगाए गए चरित्रहीनता (adultery) के आरोप की बात है, न्यायालय ने कहा कि यह आरोप साबित नहीं किया गया और केवल बहाना (bald defence) मात्र था ताकि वह अपनी जिम्मेदारी से बच सके।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख
पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले में दो महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लेख किया :
- Anju Garg & Another v. Deepak Kumar Garg (2022 SCC Online SC 1314)
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति का यह पवित्र दायित्व (sacrosanct duty) है कि वह अपनी पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करे।
- यदि पति सक्षम शरीर (able-bodied) है, तो उसे मजदूरी करके भी पत्नी और बच्चों के लिए कमाना होगा। गरीबी इसका बहाना नहीं बन सकती।
- Chaturbhuj v. Sita Bai [(2008) 2 SCC 316]
- अदालत ने कहा कि भरण-पोषण की कार्यवाही किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए नहीं होती, बल्कि इसका उद्देश्य है पत्नी और बच्चों को दरिद्रता और भूख से बचाना, ताकि उन्हें भोजन, वस्त्र और आश्रय मिल सके।
न्यायालय का अंतिम निर्णय
न्यायालय ने पाया कि :
- पति का व्यवहार अनुचित और जानबूझकर विलंबकारी (malafide) था।
- ₹1500 प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण बिल्कुल उचित है।
- इसलिए परिवार न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
अंततः, याचिका खारिज कर दी गई, और पत्नी व बच्चों को मिलने वाली अंतरिम राशि का आदेश यथावत रखा गया।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि भरण-पोषण देना पति का नैतिक और कानूनी दायित्व है। यदि पति अदालत में बार-बार अनुपस्थित रहकर प्रक्रिया को टालता है या झूठे आरोप लगाता है, तो अदालतें ऐसे व्यवहार को बर्दाश्त नहीं करेंगी।
यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि धारा 125, दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) का उद्देश्य दंड नहीं, बल्कि सुरक्षा और सम्मान के साथ जीवनयापन सुनिश्चित करना है।
गरीबी या मजदूरी करने की मजबूरी भी पति को इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकती।
यह निर्णय समाज को यह संदेश देता है कि परिवार और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी से भागने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई अवश्य होगी।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या ₹1500 प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण अधिक था?
➤ नहीं। यह राशि न्यायसंगत और उचित थी। - क्या बिना प्रमाण के पत्नी पर अनैतिक जीवन का आरोप लगाने से भरण-पोषण रोका जा सकता है?
➤ नहीं। ऐसे आरोपों को अदालत ने अस्वीकार किया। - क्या गरीब मजदूर पति अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है?
➤ नहीं। यदि शरीर सक्षम है, तो मेहनत कर पत्नी-बच्चों का भरण-पोषण करना ही होगा।
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Anju Garg & Another v. Deepak Kumar Garg, 2022 SCC Online SC 1314
- Chaturbhuj v. Sita Bai, (2008) 2 SCC 316
मामले का शीर्षक
मो. जहागीर @ शेख जहांगीर बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
केस नंबर
Civil Miscellaneous Jurisdiction No. 718 of 2022
(आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 1246/2018 से उत्पन्न)
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 514
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री शेखर कुमार सिंह, अधिवक्ता
- प्रतिवादी की ओर से: कोई उपस्थित नहीं हुआ
निर्णय का लिंक
NDQjNzE4IzIwMjIjMiNO-9jVexxnfAXY=
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