निर्णय की सरल व्याख्या
पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक नाबालिग आरोपी को ज़मानत देने का आदेश दिया, जिसे पहले किशोर न्याय बोर्ड और विशेष बाल न्यायालय द्वारा ज़मानत से वंचित कर दिया गया था। यह मामला खाजेकला थाना, पटना के कांड संख्या 223/2022 से संबंधित है, जिसमें एक किशोर को हत्या में कथित रूप से शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
घटना के समय आरोपी की उम्र लगभग 14 साल 9 महीने थी। आरोप था कि मृतक युवक को फोन कर बुलाया गया और फिर गोली मार दी गई। प्राथमिकी में नाबालिग आरोपी और अन्य दोस्तों पर हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया गया था।
किशोर न्याय बोर्ड ने ज़मानत यह कहकर खारिज कर दी कि आरोपी गलत संगत में है और ज़मानत मिलने पर दोबारा अपराध कर सकता है या मानसिक, शारीरिक या भावनात्मक नुकसान हो सकता है। विशेष बाल न्यायालय ने भी इसी आधार पर अपील खारिज कर दी।
हाई कोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 12 का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि नाबालिग को ज़मानत देना सामान्य नियम है, न कि अपवाद। केवल इन तीन स्थितियों में ज़मानत रोकी जा सकती है:
- यदि यह विश्वास करने के लिए ठोस कारण हों कि वह ज़मानत पर छूटने के बाद अपराधियों के संपर्क में आ सकता है।
- यदि उसे मानसिक, शारीरिक या नैतिक नुकसान हो सकता है।
- यदि उसकी रिहाई से न्याय के उद्देश्य पर असर पड़े।
अदालत ने पाया कि सामाजिक अन्वेषण रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया है कि आरोपी का परिवार अपराधी प्रवृत्ति का है। आरोपी का परिवार स्थिर और शिक्षित है; पिता इंटरमीडिएट तक पढ़े हैं, बहन भी इंटर में पढ़ रही है और आरोपी खुद मैट्रिक पास है। उसकी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है और वह अपने माता-पिता का सम्मान करता है।
अदालत ने यह भी दोहराया कि नाबालिगों को सुधारगृह में रखना अंतिम उपाय होना चाहिए। परिवार ही बच्चे की परवरिश और सुधार के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। अतः आरोपी को ज़मानत दी गई, शर्त यह रही कि उसके पिता ₹10,000 का बेल बॉन्ड भरेंगे और शपथपत्र देंगे कि वे अपने बेटे को अपराधियों के संपर्क में नहीं आने देंगे तथा उसकी पढ़ाई और सुधार पर ध्यान देंगे।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला किशोर न्याय अधिनियम के उद्देश्य को बल देता है—बच्चों को दंडित करने के बजाय उनका सुधार और पुनर्वास करना। यह फैसला न्यायपालिका को याद दिलाता है कि नाबालिगों के मामलों में सहानुभूति और समझदारी से काम लिया जाना चाहिए।
आम जनता के लिए यह एक स्पष्ट संदेश है कि यदि किसी नाबालिग से गलती हो जाए, तो समाज का कर्तव्य है कि उसे सुधार का अवसर दे, न कि उसे स्थायी रूप से अपराधी बना दे। यह फैसला बिहार जैसे राज्यों में किशोर न्याय की सही दिशा तय करने में मदद करेगा।
कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)
- क्या किशोर न्याय अधिनियम की धारा 12 के तहत आरोपी को ज़मानत दी जा सकती है?
✔ हाँ, चूंकि ज़मानत रोकने के पर्याप्त कारण नहीं थे। - क्या आरोपी के अपराधियों के संपर्क में आने या मानसिक नुकसान की आशंका थी?
❌ नहीं, ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं था। - क्या यह कहना सही था कि उसकी रिहाई न्याय के उद्देश्य को नुकसान पहुँचाएगी?
❌ नहीं, क्योंकि परिवार का वातावरण सुधारात्मक है। - क्या धारा 14(3) और 15 के तहत जांच लंबित होना ज़मानत न देने का आधार है?
❌ नहीं, यह कोई वैध आधार नहीं है। - क्या सुधार की सिफारिश ज़मानत से रोक सकती है?
❌ नहीं, क्योंकि यह सिफारिश अंतिम निर्णय के बाद लागू होती है।
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Lalu Kumar @ Lal Babu v. State of Bihar, 2019 (6) BLJ 2016
- Abhishek v. State, 205 CriLJ (NOC) 115 (Delhi)
- Manoj v. State (NCT of Delhi), 2006 CriLJ 4759
मामले का शीर्षक
Biswajit Kumar Pandey @ Lalu Kumar बनाम बिहार राज्य
केस नंबर
Criminal Revision No. 617 of 2024
In Criminal Appeal (SJ) No. 1585 of 2024
उद्धरण (Citation)
2025 (1) PLJR 51
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- श्री रवीन्द्र प्रसाद सिंह, अधिवक्ता (अभियुक्त की ओर से)
- श्री चन्द्र सेन प्रसाद सिंह, APP (राज्य की ओर से)
निर्णय का लिंक
NyM2MTcjMjAyNCMxI04=-t–ak1–4LiXz4A5s=
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