निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने 11 अक्टूबर 2022 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसमें पूरे बिहार राज्य में प्रधानमंत्री पोषण योजना (पूर्व में मध्याह्न भोजन योजना) के अंतर्गत ठेकेदार चयन को एक साथ रद्द करने की सरकारी कार्रवाई को मनमानी और गैरकानूनी घोषित किया गया।
यह निर्णय माननीय न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार सिंह और माननीय न्यायमूर्ति शैलेन्द्र सिंह की खंडपीठ ने दिया। यह मामला कई जिलों – मुँगेर, कैमूर, गया, वैशाली, पूर्णिया, समस्तीपुर, कटिहार, जमुई, पश्चिम चंपारण आदि – के ठेकेदारों द्वारा दायर लगभग 14 याचिकाओं का संयुक्त फैसला था।
इन ठेकेदारों ने जिला स्तर की चयन समितियों द्वारा जारी टेंडर में भाग लिया था। ये समितियाँ शिक्षा विभाग और बिहार राज्य परियोजना शिक्षा परिषद के अधीन काम करती थीं। चयन की प्रक्रिया पूरी कर ठेकेदारों को कार्यादेश (work order) या स्वीकृति पत्र मिल चुका था। कुछ ठेकेदारों ने आपूर्ति की तैयारी भी शुरू कर दी थी।
लेकिन इसके बाद राज्य शिक्षा विभाग ने एक “सामान्य आदेश” जारी करके सभी जिलों के चयन रद्द कर दिए। कारण बताया गया कि “प्रक्रिया में अनियमितताएँ” हुई थीं और “पारदर्शिता के लिए” चयन फिर से किया जाएगा।
ठेकेदारों ने इस आदेश को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उनका कहना था कि—
- उन्हें रद्दीकरण से पहले कोई नोटिस या सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया,
- सभी जिलों में एक साथ चयन रद्द करना अनुचित है,
- कोई ठोस जांच रिपोर्ट या प्रमाण नहीं दिया गया, और
- यह कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन करती है।
राज्य सरकार ने यह दलील दी कि विभागीय जांच में चयन प्रक्रिया में गड़बड़ियाँ मिलीं, इसलिए सभी चयन रद्द कर नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करना आवश्यक था।
न्यायालय की मुख्य टिप्पणियाँ
उच्च न्यायालय ने विस्तृत सुनवाई के बाद पाया कि जिला स्तर की चयन समितियों ने नियमों के अनुसार निविदा प्रक्रिया पूरी की थी। राज्य सरकार किसी विशेष ठेकेदार के खिलाफ ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी।
अदालत ने कहा कि केवल “अनियमितता” या “पारदर्शिता की आवश्यकता” जैसे अस्पष्ट कारण देकर पूरे राज्य की चयन प्रक्रिया को रद्द नहीं किया जा सकता। जब किसी प्रशासनिक आदेश से नागरिक के अधिकार या रोजगार प्रभावित होते हैं, तो उस आदेश में स्पष्ट और युक्तिसंगत कारण होना आवश्यक है।
न्यायालय ने यह भी माना कि ठेकेदारों को कार्यादेश मिल जाने के बाद उनके पास एक वैध अपेक्षा (legitimate expectation) उत्पन्न हो जाती है कि उन्हें कार्य करने का अवसर मिलेगा। इस अपेक्षा को बिना ठोस कारण तोड़ा नहीं जा सकता।
खंडपीठ ने कहा कि राज्य की शक्ति असीम नहीं है। प्रशासनिक निर्णयों में निष्पक्षता, पारदर्शिता और न्यायसंगत प्रक्रिया आवश्यक है। यदि सरकार सभी जिलों के चयन को एक साथ रद्द कर देती है, तो यह सामूहिक दंड (collective punishment) जैसा है, जो कानून के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।
अदालत ने यह भी पाया कि किसी भी ठेकेदार को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था, जो कि धरमपाल सत्यपाल लिमिटेड बनाम उपकर आयुक्त (2015) 8 SCC 519 के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन था।
न्यायालय का निर्णय
उच्च न्यायालय ने सभी याचिकाओं को स्वीकृत करते हुए राज्य सरकार द्वारा ठेकेदार चयन रद्द करने के आदेश को रद्द कर दिया।
मुख्य निर्देश निम्नलिखित दिए गए:
- सभी जिलों की चयन समितियों द्वारा किए गए ठेकेदार चयन को वैध माना जाएगा।
- राज्य सरकार बिना नोटिस या सुनवाई के किसी चयन को रद्द नहीं कर सकती।
- यदि किसी जिले में कोई ठोस शिकायत या साक्ष्य हो, तो केवल उसी जिले की जांच की जा सकती है, पूरे राज्य की प्रक्रिया रद्द नहीं की जा सकती।
- भविष्य में सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि निविदा प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और न्यायसंगत हो।
न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा —
“सरकार के प्रत्येक निर्णय में निष्पक्षता प्रशासन की आत्मा है।”
निर्णय का महत्व और प्रभाव
- प्राकृतिक न्याय की रक्षा: यह फैसला बताता है कि बिना सुनवाई के किसी ठेकेदार का चयन रद्द नहीं किया जा सकता। सरकारी अनुबंधों में भी न्याय के सिद्धांत लागू होते हैं।
- मनमानी पर अंकुश: राज्य सरकार अब अस्पष्ट कारणों से टेंडर रद्द नहीं कर सकेगी। हर निर्णय ठोस साक्ष्य और कारणों पर आधारित होना चाहिए।
- स्थानीय ठेकेदारों को सुरक्षा: छोटे और मंझोले ठेकेदारों के लिए यह फैसला राहत का काम करेगा, क्योंकि अब उनकी मेहनत और निवेश मनमाने फैसलों से प्रभावित नहीं होंगे।
- प्रशासनिक जवाबदेही: यह निर्णय सरकारी विभागों को पारदर्शिता बनाए रखने और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाने की दिशा में बाध्य करता है।
- वेलफेयर योजनाओं की निगरानी: अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि प्रधानमंत्री पोषण योजना जैसी सामाजिक योजनाएँ बिना भेदभाव और राजनीतिक हस्तक्षेप के चलें।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या राज्य सरकार सभी जिलों के चयन रद्द कर सकती थी?
❖ नहीं। यह सामूहिक और मनमानी कार्रवाई थी। प्रत्येक मामले की अलग जांच होनी चाहिए थी। - क्या ठेकेदारों को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक था?
❖ हाँ। क्योंकि रद्दीकरण से उनके रोजगार और आर्थिक अधिकार प्रभावित हुए। - क्या ठेकेदारों को वैध अपेक्षा (legitimate expectation) का अधिकार था?
❖ हाँ। चयन के बाद उनका कार्य करने का अधिकार बन चुका था। - क्या यह आदेश अनुच्छेद 14 का उल्लंघन था?
❖ हाँ। समान परिस्थितियों में अलग-अलग जिलों के ठेकेदारों को बिना कारण अलग व्यवहार मिला।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Tata Cellular v. Union of India, (1994) 6 SCC 651
- Dharampal Satyapal Ltd. v. Deputy Commissioner of Central Excise, (2015) 8 SCC 519
- State of Bihar v. Project Uchcha Vidyalaya Shikshak Sangh, (2006) 2 SCC 545
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Tata Cellular v. Union of India, (1994) 6 SCC 651
- Dharampal Satyapal Ltd. v. Deputy Commissioner of Central Excise, (2015) 8 SCC 519
- Union of India v. Hindustan Development Corporation, (1993) 3 SCC 499
मामले का शीर्षक
Mithilesh Kumar Yadav & Ors. v. State of Bihar & Ors.
(सभी संयुक्त याचिकाएँ सम्मिलित)
केस नंबर
CWJC No. 8807 of 2022
(साथ में CWJC Nos. 6489, 7281, 8177, 8595, 8875, 8942, 8945, 8976, 9203, 9650, 9704, 9921 और 9972 of 2022)**
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 47
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार सिंह
माननीय न्यायमूर्ति शैलेन्द्र सिंह
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री वाई.वी. गिरी (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री प्रणव कुमार, सुश्री श्रिष्टि सिंह, श्री सुमित कुमार आदि।
- राज्य की ओर से: श्री विकास कुमार (SC-11), श्री मदनजीत कुमार (GP-20) और अन्य सरकारी अधिवक्ता।
निर्णय का लिंक
MTUjODgwNyMyMDIyIzEjTg==-lzDwEvV–am1–pw0=
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