पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: पत्नी और बेटी को गुज़ारा भत्ता आवेदन की तारीख़ से मिलेगा (2025)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए यह स्पष्ट किया है कि पत्नी और नाबालिग बेटी को गुज़ारा भत्ता (maintenance) उस तारीख़ से दिया जाएगा, जिस दिन उन्होंने न्यायालय में आवेदन दायर किया था, न कि निर्णय की तारीख़ से।

यह मामला नालंदा परिवार न्यायालय के आदेश के ख़िलाफ़ दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा है। परिवार न्यायालय ने पहले पति को पत्नी और बेटी को हर महीने ₹10,000 देने का आदेश दिया था, लेकिन यह रकम आवेदन की तारीख़ से नहीं, बल्कि आदेश की तारीख़ (17.05.2019) से देनी थी। इस आदेश को पत्नी ने पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

पत्नी का कहना था कि उसकी शादी वर्ष 2010 में हुई थी और वर्ष 2012 में एक बेटी का जन्म हुआ। लेकिन शादी के बाद उसे दहेज की माँग को लेकर प्रताड़ित किया गया और अंततः उसे मायके लौटना पड़ा। उसने 2014 में पति और उसके परिवार के ख़िलाफ़ दहेज प्रताड़ना (धारा 498A) और अन्य धाराओं के तहत केस दर्ज कराया। पति ने उसे और बेटी को आर्थिक रूप से सहारा नहीं दिया, जिसके कारण उसने 2015 में परिवार न्यायालय में गुज़ारा भत्ता का दावा किया।

पत्नी ने दावा किया कि उसका पति पेट्रोलियम विभाग में नौकरी करता है और लगभग ₹25,000 प्रतिमाह कमाता है। साथ ही, उसके पास दो ट्रक और खेती की ज़मीन भी है। इसलिए उसने ₹15,000 प्रतिमाह गुज़ारा भत्ता (₹8,000 अपने लिए और ₹7,000 बेटी के लिए) माँगा।

पति ने अदालत में हाज़िर होकर यह माना कि वह नौकरी करता है और दो ट्रक उसके नाम पर हैं, लेकिन उसने कहा कि उसकी आमदनी कम है और उसके माता-पिता भी उसके ऊपर निर्भर हैं। उसने अपनी सैलरी की कोई पर्ची या प्रमाणपत्र पेश नहीं किया।

परिवार न्यायालय ने माना कि पत्नी बिना वजह नहीं, बल्कि मजबूरी में अलग रह रही है और पति की आमदनी पर्याप्त है। इसलिए न्यायालय ने उसे ₹6,000 पत्नी के लिए और ₹4,000 बेटी के लिए यानी कुल ₹10,000 प्रतिमाह देने का आदेश दिया। लेकिन अदालत ने यह रकम आदेश की तारीख़ से देने को कहा, न कि आवेदन की तारीख़ (2015) से।

पत्नी ने इस निर्णय को गलत बताते हुए कहा कि धारा 125(2) दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) के अनुसार, गुज़ारा भत्ता आवेदन की तारीख़ से मिलना चाहिए, क्योंकि उसी समय से उसे पति द्वारा छोड़ दिया गया था।

उच्च न्यायालय ने मामले की सारी परिस्थितियाँ देखकर यह माना कि—

  • पति ने शादी और बेटी को स्वीकार किया।
  • वह पेट्रोलियम विभाग में नौकरी करता है।
  • उसने अपनी सैलरी का कोई प्रमाण नहीं दिया।
  • दो ट्रक उसके नाम पर हैं।
  • पत्नी मजबूरी में मायके में रह रही है।

इन तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने कहा कि परिवार न्यायालय ने राशि का निर्धारण (₹10,000 प्रति माह) ठीक किया है, लेकिन भुगतान की तारीख़ तय करने में गलती की है। पत्नी और बेटी को पहले ही छोड़ दिया गया था, इसलिए उन्हें आवेदन की तारीख़ से ही गुज़ारा भत्ता मिलना चाहिए था।

इसलिए पटना उच्च न्यायालय ने आदेश में संशोधन करते हुए यह तय किया कि पति को 2015 से गुज़ारा भत्ता देना होगा। साथ ही, जो पिछली राशि (arrears) बनती है, वह तीन महीने में तीन किस्तों में अदा करनी होगी। यदि भुगतान नहीं किया गया, तो परिवार न्यायालय को सख्त कार्रवाई का अधिकार रहेगा।

न्यायालय ने यह भी कहा कि भविष्य में यदि पति की आमदनी बढ़ती है, तो पत्नी धारा 127 Cr.P.C. के तहत गुज़ारा भत्ता बढ़ाने के लिए आवेदन दे सकती है।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

  • यह फैसला इस बात की पुष्टि करता है कि यदि पत्नी और बच्चे को पति ने पहले ही छोड़ दिया है, तो गुज़ारा भत्ता आवेदन की तारीख़ से मिलना चाहिए, न कि अदालत के आदेश की तारीख़ से।
  • पति को अपनी आमदनी छिपाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यदि वह सैलरी स्लिप नहीं देता, तो अदालत पत्नी के कथन पर भरोसा कर सकती है।
  • यह फैसला बताता है कि पति के माता-पिता पर निर्भरता का मतलब यह नहीं है कि वह पत्नी और बच्चे की जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है।
  • अदालत ने arrears की अदायगी के लिए निश्चित समयसीमा तय कर न्यायिक सख्ती दिखाई है।
  • यह निर्णय उन सभी महिलाओं के लिए राहतकारी है जो वर्षों से अदालतों में न्याय की प्रतीक्षा कर रही हैं।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या ₹10,000 प्रति माह की राशि उचित है?
    ✅ हाँ। पति की नौकरी और ट्रक के स्वामित्व को देखते हुए राशि उचित है।
  • क्या गुज़ारा भत्ता आवेदन की तारीख़ से मिलना चाहिए या आदेश की तारीख़ से?
    ✅ आवेदन की तारीख़ से।
    📘 कारण: धारा 125(2) Cr.P.C. के अनुसार, यदि पत्नी को पहले से छोड़ा गया है, तो भत्ता आवेदन की तारीख़ से ही मिलना चाहिए।
  • क्या पति द्वारा सैलरी स्लिप न देना उसके पक्ष को कमजोर करता है?
    ✅ हाँ। अदालत ने माना कि आय के प्रमाण न देने पर पत्नी का दावा सही माना जाएगा।
  • क्या पत्नी का मायके में रहना उचित कारण था?
    ✅ हाँ। क्योंकि उसके साथ दहेज प्रताड़ना और उत्पीड़न हुआ था, और उसने 498A के तहत मामला भी दर्ज किया था।

मामले का शीर्षक

राज लक्ष्मी @ राज लक्ष्मी कुमारी बनाम बिहार राज्य

केस नंबर

Criminal Revision No. 815 of 2019
(Arising out of Maintenance Case No. 109M of 2015, Family Court, Nalanda at Bihar Sharif)

उद्धरण (Citation)

2025 (2) PLJR 148

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • आवेदिका (पत्नी) की ओर से: श्री रुदल सिंह, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: श्री उपेन्द्र कुमार, एपीपी
  • प्रतिवादी (पति) की ओर से: श्री सुधीश कुमार और श्री बीरेन्द्र प्रसाद चौधरी, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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