पटना हाई कोर्ट का फैसला: अदालत ने स्पष्ट किया – लोक अदालत को भेजे गए मामले को वापस बुलाना संभव है (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

यह मामला पटना हाई कोर्ट में Civil Miscellaneous Jurisdiction No. 59 of 2018 के रूप में सुना गया। फैसला 1 सितंबर 2022 को माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने सुनाया। इस निर्णय में अदालत ने यह साफ़ कर दिया कि यदि किसी सिविल केस को गलती से लोक अदालत (Lok Adalat) में भेज दिया गया है, तो ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) के पास उसे वापस बुलाने (recall) का अधिकार है, खासकर जब उस केस में कोई जरूरी आवेदन लंबित हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद बेगूसराय जिले की एक ज़मीन से जुड़ा था। वहाँ Title Suit No. 482 of 2016 नामक एक मुकदमा चल रहा था, जिसे कुछ लोगों (वादी) ने दाखिल किया था। वादियों का कहना था कि उनके परिवार में पहले से ही एक मौखिक बंटवारा (Oral Partition) हो चुका था और अब वे उस ज़मीन के वैध मालिक हैं।

प्रतिवादी (Defendants) परिवार की ही दूसरी शाखा से थे। इसी बीच एक व्यक्ति (प्रतिवादी संख्या 10) ने कहा कि उसका नाम उस मुकदमे में शामिल नहीं किया गया है, जबकि वह भी उसी परिवार का सदस्य है और ज़मीन में उसका हिस्सा है। इसलिए उसने Order I Rule 10(2) CPC के तहत एक आवेदन दिया कि उसे भी उस मुकदमे में पक्षकार बनाया जाए।

इस आवेदन की सुनवाई 15 नवंबर 2017 को तय थी। लेकिन उसी दिन, कुछ प्रतिवादियों के अनुरोध पर, अदालत ने मुकदमे की फाइल लोक अदालत (Lok Adalat) को भेज दी ताकि सुलह-समझौता हो सके। इससे वह व्यक्ति (प्रतिवादी संख्या 10) असंतुष्ट हो गया और उसने कहा कि जब तक उसका आवेदन तय नहीं होता, मामला लोक अदालत नहीं भेजा जा सकता।

ट्रायल कोर्ट ने उसकी बात सही मानते हुए 25 नवंबर 2017 को पुराना आदेश (15.11.2017) वापस ले लिया और केस की फाइल लोक अदालत से वापस मंगा ली।

अब मूल प्रतिवादियों ने पटना हाई कोर्ट में यह कहते हुए अपील दायर की कि ट्रायल कोर्ट के पास ऐसा करने की कोई शक्ति नहीं थी।

दोनों पक्षों के तर्क

वादी पक्ष (याचिकाकर्ताओं) का तर्क:

  • एक बार जब केस लोक अदालत को भेज दिया गया, तो ट्रायल कोर्ट के पास उसे वापस लेने का कोई अधिकार नहीं बचता।
  • Legal Services Authorities Act, 1987 में ऐसी कोई शक्ति नहीं दी गई है कि अदालत लोक अदालत से फाइल वापस मंगा सके।
  • इसलिए 25 नवंबर 2017 का आदेश कानूनन गलत और अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

प्रतिवादी संख्या 10 (Intervenor) का तर्क:

  • अदालत ने 15 नवंबर को मेरा आवेदन सुनने के लिए तारीख तय की थी।
  • बिना मेरे आवेदन पर सुनवाई किए, केस को लोक अदालत भेजना एक गलती थी।
  • अदालत को अपने निहित अधिकार (inherent powers) Section 151 CPC के तहत उस गलती को सुधारने का हक़ है।
  • इसलिए आदेश को वापस लेकर फाइल मंगाना पूरी तरह वैध था।

पटना हाई कोर्ट का निर्णय

हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश सही ठहराया और याचिका खारिज कर दी।

माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने कहा —

  1. यह साबित है कि 15 नवंबर 2017 को मुकदमा impleadment petition (Order I Rule 10(2)) पर सुनवाई के लिए तय था।
  2. उस आवेदन पर निर्णय किए बिना केस को लोक अदालत भेज दिया गया, जिससे प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का उल्लंघन हुआ।
  3. अदालत अपने Section 151 CPC (निहित अधिकार) के तहत गलती सुधार सकती है।
  4. इसलिए लोक अदालत से फाइल मंगाना न तो अवैध है और न ही अधिकार क्षेत्र के बाहर।

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कोई मामला लोक अदालत को गलती से भेज दिया जाए और उसमें किसी व्यक्ति का अधिकार प्रभावित हो रहा हो, तो अदालत के पास उस आदेश को वापस लेने का पूरा अधिकार है।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  • यह फैसला बताता है कि लोक अदालत को भेजे गए हर केस को अंतिम नहीं माना जा सकता। अगर मामला गलती से भेजा गया हो या किसी जरूरी पक्षकार को शामिल किए बिना भेजा गया हो, तो अदालत उसे वापस बुला सकती है।
  • यह सुनिश्चित करता है कि न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता बनी रहे, और हर व्यक्ति जिसे संपत्ति या अधिकार से जुड़ी दावेदारी है, उसे सुनवाई का पूरा मौका मिले।
  • इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अदालतें केवल “तकनीकी नियमों” से बंधी नहीं हैं — वे न्याय करने के लिए आवश्यक सुधारात्मक कदम (corrective powers) उठा सकती हैं।
  • यह फैसला अदालतों और लोक अदालतों के बीच संतुलन बनाए रखने का उदाहरण है — लोक अदालत सुलह के लिए है, पर वहां जाने से पहले सभी पक्षों का प्रतिनिधित्व ज़रूरी है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या अदालत लोक अदालत को भेजे गए केस को वापस बुला सकती है?
    ✅ हाँ, यदि वह आदेश गलती से हुआ हो या किसी लंबित आवेदन पर निर्णय बाकी हो।
  • क्या ऐसा आदेश अदालत की शक्ति के बाहर है?
    ❌ नहीं, अदालत अपने Section 151 CPC के तहत ऐसा कर सकती है।
  • क्या किसी पक्षकार को जोड़े बिना केस लोक अदालत भेजना उचित है?
    ❌ नहीं, पहले सभी जरूरी पक्षकारों को जोड़ा जाना चाहिए।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Order I Rule 10(2) CPC
  • Section 151 CPC
  • Legal Services Authorities Act, 1987

मामले का शीर्षक

वादीगण बनाम प्रतिवादी संख्या 10 एवं अन्य

केस नंबर

Civil Miscellaneous Jurisdiction No. 59 of 2018

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 73

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री निखिल कुमार अग्रवाल, अधिवक्ता; सुश्री अदिति हंसरिया, अधिवक्ता
  • प्रतिवादी संख्या 10 की ओर से: श्री जे.एस. अरोड़ा (वरिष्ठ अधिवक्ता); श्री गौरव प्रताप, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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