निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने 22 मार्च 2021 को एक अहम फैसला देते हुए एक नाबालिग अभियुक्त को जमानत देने का आदेश दिया, जो पिछले चार साल से अधिक समय से हिरासत में था। यह मामला एक चार वर्षीय बालिका के अपहरण, दुष्कर्म और हत्या से जुड़ा था। अदालत ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत जमानत ही नियम है, अस्वीकृति अपवाद।
चूँकि अभियुक्त के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था, उसका कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं था, और मुकदमे में लंबे समय से कोई प्रगति नहीं हुई थी, इसलिए अदालत ने माना कि नाबालिग को और हिरासत में रखना अन्यायपूर्ण होगा।
यह मामला भगवानपुर थाना कांड संख्या 130/2016 से संबंधित था। प्रारंभ में मामला धारा 363 (अपहरण) के तहत अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज हुआ था। कुछ दिन बाद मृतका का शव अभियुक्त के बथान (पशुशाला) के पीछे से मिला, जिसके बाद धारा 302 (हत्या), 376D (सामूहिक दुष्कर्म), 201 (सबूत मिटाना) और POCSO अधिनियम की धाराएँ जोड़ी गईं।
पुलिस ने जांच के दौरान अभियुक्त और एक अन्य व्यक्ति कुंदन कुमार को गिरफ्तार किया और दावा किया कि दोनों ने अपराध कबूल किया। अभियुक्त ने यह भी कहा कि वह नाबालिग है। जांच के बाद किशोर न्याय बोर्ड (JJB) ने उसकी उम्र 18 वर्ष से कम पाई, लेकिन अपराध की गंभीरता देखते हुए मामला बाल न्यायालय (Children’s Court) को भेज दिया गया।
4 सितंबर 2017 को किशोर न्याय बोर्ड ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी और 6 दिसंबर 2017 को अपीलीय अदालत ने भी वही आदेश कायम रखा। इसके बाद अभियुक्त ने पटना उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
अभियुक्त के वकील ने कहा कि उसके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, केवल पुलिस के समक्ष दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर उसे फँसाया गया है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि गांव की राजनीति और ज़मीन विवाद के कारण अभियुक्त को झूठा फँसाया गया है और वह अब तक चार साल सात महीने से अधिक समय से हिरासत में है।
राज्य पक्ष ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि मृतका का शव अभियुक्त के बथान के पीछे मिला था और स्निफर डॉग (खोजी कुत्ते) ने भी घटनास्थल से अभियुक्त के घर तक रास्ता दिखाया।
माननीय न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद केस डायरी का अवलोकन किया और पाया:
- कोई भी गवाह यह नहीं कहता कि उसने अभियुक्त को मृतका के साथ देखा था।
- पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं है।
- अभियुक्त चार साल से अधिक समय से बंद है, जबकि मुकदमे में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
- इसी मामले के सह-अभियुक्त कुंदन कुमार को पहले ही पटना उच्च न्यायालय ने 22 मई 2020 को जमानत दे दी थी।
अदालत ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 12 के अनुसार नाबालिग को जमानत दी जानी चाहिए, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि उसकी रिहाई से वह आपराधिक तत्वों के संपर्क में आ सकता है, या नैतिक, शारीरिक या मानसिक रूप से खतरे में पड़ सकता है।
अदालत ने माना कि अभियुक्त के खिलाफ ऐसी कोई स्थिति नहीं थी। उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं था और उसके परिवार ने निगरानी का आश्वासन दिया था।
इसके साथ ही, अदालत ने यह भी माना कि कोविड-19 महामारी के कारण निचली अदालतों में काम सीमित था और अब तक 16 में से केवल 5 गवाहों की गवाही ही दर्ज हुई थी।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए, उच्च न्यायालय ने किशोर न्याय बोर्ड और अपीलीय अदालत के पुराने आदेशों को रद्द करते हुए नाबालिग को 10,000 रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों (जिनमें से एक उसकी माँ होगी) पर रिहा करने का निर्देश दिया। माँ को यह लिखित आश्वासन देना होगा कि वह अपने पुत्र की गतिविधियों पर नजर रखेगी और ज़रूरत पड़ने पर अदालत में पेश करेगी।
अंत में, अदालत ने कहा कि गंभीर आरोप होने के बावजूद, नाबालिग को बिना मुकदमे की प्रगति के इतने वर्षों तक हिरासत में रखना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
- यह फैसला स्पष्ट करता है कि किशोर न्याय कानून का उद्देश्य दंड नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास है।
- अदालत ने दोहराया कि जमानत नाबालिग का अधिकार है, अस्वीकृति केवल विशेष कारणों पर हो सकती है।
- लंबे समय तक हिरासत में रखे जाने से नाबालिग का मानसिक और सामाजिक विकास प्रभावित होता है, जो कानून के उद्देश्य के विपरीत है।
- पुलिस और अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नाबालिग अभियुक्तों के मामलों की सुनवाई शीघ्र पूरी हो।
- यह फैसला यह भी याद दिलाता है कि पुलिस के सामने किया गया कबूलनामा अदालत में मान्य नहीं होता।
कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)
- क्या गंभीर अपराध में शामिल नाबालिग को जमानत दी जा सकती है?
— हाँ। किशोर न्याय अधिनियम की धारा 12 के अनुसार, जमानत ही नियम है, जब तक कोई विशेष कारण न हो। - क्या लंबे समय तक मुकदमे में देरी होने पर नाबालिग की हिरासत उचित है?
— नहीं। यह न्याय और पुनर्वास दोनों के उद्देश्य को विफल करता है। - क्या पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा साक्ष्य माना जा सकता है?
— नहीं। ऐसा कबूलनामा कानूनन अमान्य है। - क्या सह-अभियुक्त को जमानत मिलने पर दूसरे को भी समान राहत मिल सकती है?
— हाँ। समान परिस्थितियों में समान न्याय देना उचित है।
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- कुंदन कुमार बनाम राज्य बिहार, आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 1204/2018 (पटना उच्च न्यायालय, आदेश दिनांक 22.05.2020)
मामले का शीर्षक
Bishnu Kumar @ Bishnu Paswan v. The State of Bihar
केस नंबर
Criminal Revision No. 180 of 2021
उद्धरण (Citation)
2021(2) PLJR 394
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री रंजन कुमार सिंह, अधिवक्ता
- राज्य की ओर से: सुश्री पुष्पा सिन्हा, अपर लोक अभियोजक (APP)
निर्णय का लिंक
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