पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: पर्यटन विभाग द्वारा होटल टेंडर की मनमानी रद्दीकरण पर टिप्पणी, 2022

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 17 अगस्त 2022 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम लिमिटेड द्वारा जारी होटल संचालन के टेंडर को अचानक रद्द किए जाने को अवैध ठहराया गया। यह मामला “होटल लिच्छवी विहार, मुजफ्फरपुर” के संचालन से जुड़ा था।

याचिकाकर्ता एक संयुक्त उद्यम कंपनी थी जिसने बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा निकाले गए टेंडर में भाग लिया था। निगम ने उसे होटल लिच्छवी विहार के संचालन और रखरखाव के लिए 10 वर्षों की अवधि का ठेका दे दिया था। निगम ने 23 फरवरी 2021 को एक पत्र जारी कर याचिकाकर्ता को सफल बोलीदाता घोषित किया और निर्देश दिया कि वह ₹1,23,96,550 (जीएसटी सहित) की पहली वर्ष की लाइसेंस फीस और ₹1,05,05,551 की सुरक्षा राशि एनएससी, एफडी या बैंक गारंटी के रूप में जमा करे।

याचिकाकर्ता ने सभी भुगतान 1 मार्च और 3 मार्च 2021 को कर दिए। इसके बाद अनुबंध पर हस्ताक्षर की उम्मीद थी, लेकिन निगम ने कोई कार्रवाई नहीं की। अचानक 19 जून 2021 को निगम ने एक पत्र जारी कर टेंडर को “अनिवार्य कारणों” (unavoidable reasons) के आधार पर रद्द कर दिया और पहले जारी स्वीकृति पत्र को भी निरस्त कर दिया।

याचिकाकर्ता ने इस आदेश को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

माननीय न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह ने कहा कि यह कार्रवाई कानून के अनुसार नहीं है। निगम का रद्दीकरण पत्र “गैर-कारणयुक्त” (non-speaking) था, क्योंकि उसमें कोई ठोस कारण नहीं बताया गया था। बाद में निगम ने अपने जवाबी हलफनामे में यह कहा कि याचिकाकर्ता ने “लेबर लाइसेंस” नहीं दिया था और “कोई लंबित वाद नहीं” वाले कॉलम को खाली छोड़ा था। लेकिन न्यायालय ने कहा कि किसी प्रशासनिक आदेश की वैधता उसी में लिखे कारणों पर तय होती है — बाद में दिए गए स्पष्टीकरणों से नहीं। इस सिद्धांत को सर्वोच्च न्यायालय ने मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त (1978) 1 SCC 405 में स्थापित किया है।

न्यायालय ने यह भी पाया कि पर्यटन विभाग के प्रधान सचिव ने “पारदर्शिता पर संदेह” दूर करने के नाम पर रद्दीकरण का निर्देश दिया था। परंतु टेंडर की शर्तों के अनुसार (क्लॉज 3.16), बोली को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार केवल निगम के पास था, न कि विभाग के किसी अधिकारी के पास। अतः प्रधान सचिव के निर्देश पर टेंडर रद्द करना अवैध था।

इसके अलावा, निगम ने इसी टेंडर नोटिस के अंतर्गत अन्य 13 संपत्तियों के अनुबंध पूरे कर लिए थे, केवल इस होटल का अनुबंध ही रद्द किया गया। न्यायालय ने कहा कि बिना कारण के अलग-अलग व्यवहार मनमाना (arbitrary) है।

जहाँ तक “लेबर लाइसेंस” और “कोई लंबित वाद नहीं” वाले कॉलम की बात है, न्यायालय ने माना कि ये शर्तें “अनिवार्य” नहीं बल्कि “निर्देशात्मक” (directory) थीं। याचिकाकर्ता एक नई संयुक्त कंपनी थी, और निगम ने पहले ही इन छोटी खामियों को नजरअंदाज कर दिया था। बाद में उन्हीं बिंदुओं को आधार बनाकर टेंडर रद्द करना अनुचित है। न्यायालय ने पोड्डार स्टील कॉर्पोरेशन बनाम गणेश इंजीनियरिंग वर्क्स (1991) 3 SCC 273 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि टेंडर की कुछ शर्तें आवश्यक होती हैं और कुछ को परिस्थितियों में शिथिल किया जा सकता है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि जब किसी ठेकेदार से बड़ी रकम जमा करा ली जाती है और अनुबंध पर हस्ताक्षर होने वाले होते हैं, तो ऐसे में टेंडर रद्द करना “सिविल परिणाम” (civil consequences) पैदा करता है। इसलिए ऐसी कार्रवाई से पहले सुनवाई (show cause notice) देना अनिवार्य है। यह धरमपाल सत्यपाल लिमिटेड बनाम उपकर आयुक्त, केंद्रीय उत्पाद शुल्क (2015) 8 SCC 519 के सिद्धांत के अनुरूप है।

अंततः न्यायालय ने 19 जून 2021 का रद्दीकरण पत्र रद्द कर दिया और कहा कि निगम की कार्रवाई मनमानी, गैर-कानूनी और प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध थी।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  1. व्यवसायिक विश्वास की रक्षा: यह फैसला बताता है कि सरकार या सरकारी उपक्रम किसी सफल बोलीदाता से पैसा लेकर टेंडर को मनमाने ढंग से रद्द नहीं कर सकते। इससे बिहार में सार्वजनिक निविदाओं पर निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।
  2. कारणयुक्त आदेश का महत्व: अदालत ने दोहराया कि जब भी सरकार किसी व्यक्ति या संस्था के अधिकार या उम्मीदों को प्रभावित करती है, उसे स्पष्ट कारण देने होंगे। “अनिवार्य कारणों से” जैसी अस्पष्ट भाषा पर्याप्त नहीं है।
  3. प्रशासनिक हस्तक्षेप पर रोक: टेंडर दस्तावेज़ में जिस प्राधिकरण को निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है, केवल वही निर्णय ले सकता है। ऊपर के विभागीय अधिकारी या सचिव उस प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
  4. प्राकृतिक न्याय का अनुपालन: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुबंध या वाणिज्यिक निर्णयों में भी अगर किसी व्यक्ति के अधिकार प्रभावित होते हैं, तो उसे सुनवाई का अवसर देना जरूरी है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या निगम बिना कारण बताए टेंडर रद्द कर सकता है?
    ❖ नहीं। ऐसा आदेश गैरकानूनी है क्योंकि उसमें कोई कारण नहीं बताया गया।
  • क्या लेबर लाइसेंस और “कोई लंबित वाद नहीं” कॉलम जरूरी था?
    ❖ नहीं। ये शर्तें अनिवार्य नहीं थीं। निगम पहले इन्हें स्वीकार कर चुका था, इसलिए बाद में इन पर आपत्ति नहीं उठा सकता।
  • क्या प्रधान सचिव के निर्देश पर टेंडर रद्द किया जा सकता है?
    ❖ नहीं। अधिकार केवल निगम को था, बाहरी आदेश पर कार्रवाई अवैध है।
  • क्या रद्दीकरण से पहले सुनवाई जरूरी थी?
    ❖ हाँ। क्योंकि याचिकाकर्ता से बड़ी राशि ली जा चुकी थी, इसलिए बिना सुनवाई के निर्णय प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है।
  • क्या बाद में हलफनामे से कारण बताए जा सकते हैं?
    ❖ नहीं। आदेश की वैधता उसी में लिखे कारणों पर तय होगी।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • State of Bihar & Ors. v. Bihar Rajya Bhumi Vikas Bank Samiti, (2018) 9 SCC 472
  • Poddar Steel Corporation v. Ganesh Engineering Works & Ors., (1991) 3 SCC 273
  • Dharampal Satyapal Ltd. v. Deputy Commissioner of Central Excise, Guwahati & Ors., (2015) 8 SCC 519
  • Tata Cellular v. Union of India, (1994) 6 SCC 651

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Mohinder Singh Gill v. Chief Election Commissioner, (1978) 1 SCC 405
  • Dharampal Satyapal Ltd. v. Deputy Commissioner of Central Excise, (2015) 8 SCC 519
  • Poddar Steel Corporation v. Ganesh Engineering Works, (1991) 3 SCC 273
  • Tata Cellular v. Union of India, (1994) 6 SCC 651

मामले का शीर्षक

  • Yash Raj, Dhrublok (J.V.) v. Bihar State Tourism Development Corporation Ltd. & Ors.
    (प्रकाशन के लिए नामों का उपयोग न करें; “याचिकाकर्ता” और “प्रतिवादी निगम” लिखें।)

केस नंबर

  • Civil Writ Jurisdiction Case No. 11974 of 2021

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 35

न्यायमूर्ति गण का नाम

  • माननीय न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री पी.के. शाही (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री सत्यं शिवम सुंदरम
  • प्रतिवादी निगम की ओर से: सुश्री अनुकृति जयपुरियार
  • हस्तक्षेपकर्ता की ओर से: श्री रंजीत कुमार सिंह

निर्णय का लिंक

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