पटना उच्च न्यायालय का फैसला: बिना सुनवाई नियुक्ति रद्द करना अवैध — हिंदी स्टेनोग्राफर भर्ती मामला (2023)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 2 जनवरी 2023 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि किसी भी सरकारी भर्ती में चयन या नियुक्ति रद्द करने से पहले उम्मीदवार को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक है। यह मामला सिविल कोर्ट में हिंदी स्टेनोग्राफर पद पर चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति रद्द किए जाने से जुड़ा था।

दोनों अपीलें — Letters Patent Appeal No. 940 of 2019 और Letters Patent Appeal No. 923 of 2019 — को एक साथ सुना गया क्योंकि दोनों में समान मुद्दे थे। अपीलकर्ताओं को चयनित कर नियुक्ति पत्र जारी किया गया था, लेकिन बाद में उनकी नियुक्ति यह कहते हुए रद्द कर दी गई कि उनकी शैक्षणिक योग्यता “साहित्य आलंकार” (Sahitya Alankar) जो हिंदी विद्यापीठ, देवघर से प्राप्त थी, स्नातक (graduation) के समकक्ष नहीं है।

पृष्ठभूमि

दोनों अपीलकर्ता बिहार सिविल कोर्ट के अधीन Bihar Civil Courts Staff (Class-III and Class-IV) Rules, 2009 के अनुसार हुई भर्ती प्रक्रिया के तहत चयनित हुए थे। नियुक्ति पत्र मिलने के बाद एक उम्मीदवार (विजय कुमार) ने 14 अगस्त 2015 को जॉइनिंग की, लेकिन 17 सितंबर 2015 को उसकी सेवा समाप्त कर दी गई। दूसरे उम्मीदवार (मनोज कुमार) को तो जॉइनिंग की अनुमति ही नहीं दी गई।

प्रशासन का कहना था कि 2013 में उच्च न्यायालय के एक निर्णय के अनुसार हिंदी विद्यापीठ, देवघर का “साहित्य आलंकार” स्नातक डिग्री के बराबर नहीं माना गया था, इसलिए इनकी नियुक्ति अमान्य है। लेकिन न्यायालय ने पाया कि बिना किसी कारण बताओ नोटिस (show cause notice) दिए ही नियुक्ति रद्द कर दी गई। यह सीधे-सीधे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन है।

न्यायालय का विश्लेषण

माननीय न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी और माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा की खंडपीठ ने कहा कि —

“यदि किसी व्यक्ति की नियुक्ति या चयन रद्द किया जा रहा है, तो उसे पहले सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। ऐसा न करना प्रशासनिक निर्णय की वैधता को समाप्त कर देता है।”

न्यायालय ने दो प्रमुख निर्णयों पर भरोसा किया —

  1. Rajesh Kumar v. State of Bihar, 2019 (5) BLJ 558 — जिसमें कहा गया कि बिना सुनवाई सेवा समाप्त करना प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है।
  2. Esteem Properties Pvt. Ltd. v. Chetan Kamble, 2022 (4) SCALE 284 — जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर प्रशासनिक कार्रवाई में प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।

साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Rule 9(6) of Bihar Civil Courts Staff Rules, 2009 में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि नियुक्ति रद्द करने से पहले नोटिस नहीं देना है। इसलिए विभाग की यह दलील गलत थी कि वे बिना नोटिस के कार्रवाई कर सकते हैं।

न्यायालय का निर्णय और आदेश

न्यायालय ने अपीलकर्ताओं के पक्ष में निर्णय दिया और निम्नलिखित आदेश पारित किए —

  1. 18 जुलाई 2019 को एकल न्यायाधीश द्वारा दिया गया आदेश रद्द किया गया।
  2. 31 अगस्त 2015 को जारी नियुक्ति रद्द करने का आदेश भी निरस्त किया गया।
  3. मामला संबंधित अधिकारी को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेजा गया (remanded)।

अब संबंधित अधिकारी को यह करना होगा —

  • अपीलकर्ताओं को कारण बताओ नोटिस जारी करें कि उनकी नियुक्ति क्यों रद्द की जाए।
  • उम्मीदवारों को यह अवसर दें कि वे यह साबित कर सकें कि साहित्य आलंकार डिग्री स्नातक के समकक्ष है।
  • उनकी प्रतिक्रिया और दस्तावेजों पर विचार करते हुए विस्तृत (speaking) आदेश पारित करें।
  • यह पूरी प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए।

न्यायालय ने यह भी कहा कि शैक्षणिक योग्यता की समानता (equivalency) तय करने का अधिकार राज्य सरकार या विश्वविद्यालय के पास होता है, न कि भर्ती करने वाले अधिकारियों के पास।

निर्णय का महत्व और प्रभाव

• सरकारी भर्ती एजेंसियों के लिए: यह निर्णय एक बार फिर याद दिलाता है कि कोई भी नियुक्ति या चयन बिना प्रक्रिया और सुनवाई के रद्द नहीं किया जा सकता।
• उम्मीदवारों के लिए: यह फैसला उम्मीदवारों के अधिकारों की सुरक्षा करता है। चयन या नियुक्ति के बाद उन्हें मनमाने तरीके से बाहर नहीं किया जा सकता।
• प्रशासनिक कानून के दृष्टिकोण से: यह मामला “Natural Justice” के सिद्धांतों को और मजबूत करता है, जो कहता है कि किसी व्यक्ति को दंड या नुकसान पहुँचाने से पहले उसकी बात सुनी जानी चाहिए।
• शैक्षणिक संस्थानों के लिए: इससे यह सवाल भी उठता है कि पारंपरिक संस्थानों (जैसे हिंदी विद्यापीठ, देवघर) की डिग्रियों को मान्यता देने की प्रक्रिया को स्पष्ट किया जाए।

कानूनी मुद्दे और न्यायालय का निर्णय

• क्या बिना सुनवाई चयन/नियुक्ति रद्द की जा सकती है?
– नहीं, ऐसा करना प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है।

• क्या नियम 9(6) के तहत बिना नोटिस कार्रवाई की जा सकती है?
– नहीं, नियम ऐसा कहने की अनुमति नहीं देता।

• क्या डिग्री की समानता तय करना प्रशासन का अधिकार है?
– नहीं, यह अधिकार राज्य सरकार या विश्वविद्यालय के पास है।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  1. Rajesh Kumar v. State of Bihar, 2019 (5) BLJ 558
  2. Esteem Properties Pvt. Ltd. v. Chetan Kamble, 2022 (4) SCALE 284

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

उपरोक्त ही दो निर्णयों का उल्लेख किया गया।

मामले का शीर्षक

Manoj Kumar & Anr. v. The State of Bihar & Ors.
(साथ में Vijay Kumar & Anr. v. The State of Bihar & Ors.)

केस नंबर

Letters Patent Appeal Nos. 940 of 2019 and 923 of 2019
(arising out of CWJC Nos. 17072 and 17588 of 2015)

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 325

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी
माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

• अपीलकर्ताओं की ओर से – श्री अरविंद कुमार शर्मा, अधिवक्ता
• प्रतिवादियों की ओर से – श्री प्रभात कुमार वर्मा (AAG-3), अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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