पटना उच्च न्यायालय 2024 : जीएसटी असेसमेंट में व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर न देने पर आदेश रद्द, समय-सीमा और रिटर्न स्क्रूटनी की आपत्ति खारिज

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने हाल ही में कई जीएसटी (GST) मामलों पर एक साथ फैसला सुनाया। इन मामलों में अलग-अलग व्यवसायी और करदाता (याचिकाकर्ता) ने असेसमेंट आदेशों को चुनौती दी थी। कर विभाग ने उनके खिलाफ धारा 73/74 CGST-BGST कानून के तहत टैक्स, ब्याज और पेनाल्टी लगाई थी।

याचिकाकर्ताओं ने तीन बड़ी आपत्तियाँ उठाईं –

  1. ये आदेश समय-सीमा (Limitation) से बाहर हैं, इसलिए रद्द होने चाहिए।
  2. विभाग ने धारा 61 (स्क्रूटनी ऑफ रिटर्न) के तहत पहले जांच और नोटिस नहीं दिया। बिना स्क्रूटनी, सीधे धारा 73 में असेसमेंट नहीं हो सकता।
  3. विभाग ने व्यक्तिगत सुनवाई (Personal Hearing) का अवसर नहीं दिया और सीधे प्रतिकूल आदेश पारित कर दिया।

न्यायालय ने इन तीनों मुद्दों पर विस्तार से विचार किया।

समय-सीमा का मुद्दा
कोर्ट ने देखा कि वार्षिक रिटर्न दाखिल करने की तारीख सरकार ने कई बार बढ़ाई थी। जैसे –

  • 2017-18 का रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख बिहार में 07.02.2020 तक बढ़ाई गई।
  • 2018-19 की तारीख 31.12.2020 तक।
  • 2019-20 की तारीख 31.03.2021 तक।

साथ ही, कोविड-19 महामारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 15.03.2020 से 28.02.2022 तक की अवधि को “समय-सीमा से बाहर” मान लिया था। इसका मतलब यह है कि यह समय गिना ही नहीं जाएगा।

इस तरह जब इन सभी विस्तार और छूटों को जोड़कर देखा गया, तो असेसमेंट आदेश समय पर ही माने गए। यानी आदेश समय-सीमा से बाहर नहीं थे।

रिटर्न स्क्रूटनी का मुद्दा
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि पहले धारा 61 के तहत स्क्रूटनी होनी चाहिए और ASMT-10 फॉर्म में नोटिस आना चाहिए। उसके बाद ही धारा 73 लागू हो सकती है। लेकिन न्यायालय ने साफ कहा कि यह जरूरी नहीं है। धारा 73 अपने आप में स्वतंत्र है। अगर अधिकारी को लगता है कि टैक्स कम भरा गया है या आईटीसी (ITC) गलत लिया गया है, तो वह सीधे शो-कॉज नोटिस देकर असेसमेंट कर सकता है। स्क्रूटनी एक रास्ता है, लेकिन अनिवार्य नहीं।

व्यक्तिगत सुनवाई का मुद्दा
यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था। धारा 75(4) में साफ लिखा है कि जब कोई प्रतिकूल आदेश पारित करना हो, तो व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। यह तब भी जरूरी है जब करदाता ने खुद सुनवाई की मांग न की हो, लेकिन उसने शो-कॉज नोटिस का उत्तर दे दिया हो।

कोर्ट ने पाया कि कई मामलों में अधिकारी ने बिना सुनवाई दिए सीधे आदेश पारित कर दिया। इसे न्यायालय ने गलत माना। ऐसे सभी आदेशों को रद्द कर दिया गया और मामलों को विभाग को वापस भेज दिया गया। अब विभाग को फिर से नोटिस देकर सुनवाई करनी होगी और तीन महीने के भीतर नया आदेश पारित करना होगा।

लेकिन जिन मामलों में पहले ही सुनवाई दी गई थी, वहाँ याचिका खारिज कर दी गई।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  1. करदाताओं के लिए सबक – अगर जीएसटी असेसमेंट में व्यक्तिगत सुनवाई नहीं दी गई है, तो यह आदेश अदालत में चुनौती देकर रद्द कराया जा सकता है। यह करदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा है।
  2. विभाग के लिए चेतावनी – टैक्स अधिकारियों को हर प्रतिकूल आदेश से पहले सुनवाई का अवसर अनिवार्य रूप से देना होगा। नहीं तो आदेश टिकेगा नहीं और समय व संसाधन दोनों बर्बाद होंगे।
  3. समय-सीमा को लेकर स्पष्टता – इस निर्णय ने यह साफ कर दिया कि कोविड-19 के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई छूट और सरकार द्वारा तारीखें बढ़ाने के कारण 2017-18 से 2019-20 तक के असेसमेंट आदेश समय-सीमा में ही माने जाएंगे।
  4. भविष्य के मुकदमों पर असर – अब केवल समय-सीमा या स्क्रूटनी की दलील देकर जीएसटी असेसमेंट को रद्द नहीं कराया जा सकेगा। असली ध्यान इस बात पर रहेगा कि सुनवाई का अवसर दिया गया या नहीं।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या आदेश समय-सीमा से बाहर थे?
    ❌ नहीं। अदालत ने कहा कि वार्षिक रिटर्न की तारीखें बढ़ी थीं और सुप्रीम कोर्ट ने कोविड अवधि को छूट दी थी। इसलिए आदेश समय पर ही थे।
  • क्या स्क्रूटनी (धारा 61) पहले जरूरी है?
    ❌ नहीं। अदालत ने कहा कि धारा 73 स्वतंत्र है और सीधे लागू हो सकती है।
  • क्या व्यक्तिगत सुनवाई अनिवार्य है?
    ✅ हाँ। अगर सुनवाई का मौका नहीं दिया गया तो आदेश अमान्य होगा। अदालत ने ऐसे आदेश रद्द कर दिए।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • In Re: Cognizance for Extension of Limitation, सुप्रीम कोर्ट का आदेश दिनांक 10.01.2022 (जिसमें कोविड-19 अवधि को समय-सीमा से बाहर रखा गया था)।

मामले का शीर्षक

CWJC No. 4180 of 2024 “विनोद सिंह बनाम बिहार राज्य एवं अन्य”

केस नंबर

CWJC No. 4180 of 2024

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय मुख्य न्यायाधीश के. विनोद चन्द्रन
माननीय न्यायमूर्ति पार्थ सारथी

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री विजय कुमार गुप्ता, डॉ. आलोक कुमार सिन्हा, श्री डी.वी. पाठी, श्री सदाशिव तिवारी एवं अन्य।
  • भारत सरकार (CGST) की ओर से: डॉ. के. एन. सिंह, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल; सहायक – श्री अंशुमन सिंह, श्री देवांश शंकर सिंह, श्री शिवादित्य डी. सिन्हा।
  • बिहार राज्य की ओर से: श्री विकास कुमार, स्टैंडिंग काउंसल-11; सरकारी वकील-7।

निर्णय का लिंक

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