पटना हाई कोर्ट ने इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) की समय-सीमा को वैध ठहराया — पटना हाई कोर्ट 2023

निर्णय की सरल व्याख्या

यह पटना हाई कोर्ट का फैसला जीएसटी कानून के एक बहुत ही महत्वपूर्ण और व्यावहारिक मुद्दे से जुड़ा है, जिसका असर बिहार समेत पूरे देश के व्यापारियों और व्यवसायियों पर पड़ता है। मामला इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) से संबंधित है और यह सवाल उठाया गया था कि क्या सरकार किसी व्यापारी का ITC केवल इस आधार पर रोक सकती है कि उसने जीएसटी रिटर्न देर से दाखिल किया।

सरल शब्दों में समझें तो, जीएसटी प्रणाली में जब कोई व्यापारी सामान या सेवा खरीदता है, तो वह उस पर जीएसटी चुकाता है। बाद में जब वही व्यापारी अपने ग्राहक को सामान या सेवा बेचता है और जीएसटी वसूलता है, तो कानून उसे यह अनुमति देता है कि वह पहले चुकाए गए टैक्स (इनपुट टैक्स) को बाद में वसूले गए टैक्स से घटा ले। इसी सुविधा को इनपुट टैक्स क्रेडिट कहा जाता है। इसका उद्देश्य “टैक्स पर टैक्स” को रोकना है।

लेकिन जीएसटी कानून ने इस सुविधा के लिए कुछ शर्तें भी तय की हैं। CGST Act और BGST Act की धारा 16(4) के अनुसार, किसी भी वित्तीय वर्ष का ITC एक निश्चित समय सीमा के भीतर ही क्लेम किया जा सकता है। यदि व्यापारी उस समय सीमा के भीतर GSTR-3B रिटर्न दाखिल नहीं करता, तो वह उस ITC को खो सकता है, चाहे खरीद पूरी तरह सही और वास्तविक क्यों न हो।

इसी प्रावधान को चुनौती देते हुए कई व्यापारियों ने पटना हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। मुख्य याचिका CWJC No. 9108 of 2021 थी, जिसके साथ अन्य समान मामलों को भी एक साथ सुना गया।

मामला कैसे शुरू हुआ

याचिकाकर्ता एक पंजीकृत व्यापारी था। उसने वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान सामान और सेवाएं खरीदीं और उस पर जीएसटी का भुगतान भी किया। लेकिन वह कुछ महीनों की GSTR-3B रिटर्न समय पर दाखिल नहीं कर सका। बाद में जब उसने देर से रिटर्न दाखिल किया और ITC का दावा किया, तो टैक्स विभाग ने नोटिस जारी किया।

विभाग ने कहा कि चूंकि ITC का दावा धारा 16(4) में दी गई समय सीमा के बाद किया गया है, इसलिए यह स्वीकार्य नहीं है। इसके बाद टैक्स, ब्याज और जुर्माने की मांग करते हुए आदेश पारित कर दिया गया। अपील करने पर भी अपीलीय प्राधिकारी ने यही कहते हुए अपील खारिज कर दी कि कानून में समय सीमा स्पष्ट है।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

व्यापारियों ने हाई कोर्ट के सामने कई महत्वपूर्ण तर्क रखे:

  1. ITC उनका अधिकार है – याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जब उन्होंने टैक्स चुका दिया है, तो ITC उनका “विधिक अधिकार” और “संपत्ति” है। इसे केवल देरी के आधार पर छीना नहीं जा सकता।
  2. अनुच्छेद 300A का उल्लंघन – उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 300A कहता है कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल कानून के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है। ITC भी संपत्ति है, इसलिए इसे इस तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
  3. धारा 16(4) केवल प्रक्रिया है – उनका तर्क था कि ITC का मूल अधिकार धारा 16(1) और 16(2) में है, जबकि धारा 16(4) केवल एक प्रक्रियात्मक शर्त है, जिसे सख्ती से लागू नहीं किया जाना चाहिए।
  4. धारा को “रीड डाउन” किया जाए – याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से आग्रह किया कि धारा 16(4) की व्याख्या नरमी से की जाए, ताकि वास्तविक और वैध ITC केवल तकनीकी देरी के कारण न छीना जाए।

सरकार की दलील

केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने इन सभी दलीलों का विरोध किया। उनका साफ कहना था कि:

  • ITC कोई मौलिक या प्राकृतिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह कानून द्वारा दी गई एक सुविधा (concession) है।
  • जब कानून सुविधा देता है, तो वह उसके लिए शर्तें भी तय कर सकता है।
  • धारा 16(4) एक अनिवार्य शर्त है, न कि केवल औपचारिक प्रक्रिया।
  • यदि समय सीमा का पालन नहीं किया गया, तो ITC का अधिकार पैदा ही नहीं होता।

कोर्ट का विचार

पटना हाई कोर्ट ने सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि ITC तब तक “संपत्ति” नहीं बनता, जब तक कानून की सभी शर्तें पूरी न हों। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कर कानूनों में दी गई छूट या लाभ, तब तक अधिकार नहीं माने जा सकते, जब तक वैधानिक शर्तों का पालन न किया जाए।

कोर्ट ने माना कि अनुच्छेद 300A महत्वपूर्ण है, लेकिन यहां “कानून का अधिकार” खुद धारा 16 में मौजूद है। जब कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि ITC एक निश्चित समय तक ही लिया जा सकता है, तो उस समय सीमा के बाद कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि वह किसी स्पष्ट और साफ प्रावधान को “रीड डाउन” नहीं कर सकती, जब तक वह पूरी तरह असंवैधानिक न हो। यहां धारा 16(4) न तो मनमानी है और न ही असमानता पैदा करती है।

अंत में, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के VAT कानूनों से जुड़े फैसलों का सहारा लेते हुए कहा कि समय सीमा तय करना सरकार का वैध अधिकार है। इसलिए, सभी याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  1. व्यापारियों के लिए चेतावनी: यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि जीएसटी में देरी भारी पड़ सकती है। रिटर्न समय पर दाखिल न करने से स्थायी ITC नुकसान हो सकता है।
  2. कानूनी स्पष्टता: बिहार में ITC से जुड़े विवादों में यह फैसला मार्गदर्शक बनेगा।
  3. सरकारी व्यवस्था को मजबूती: टैक्स प्रशासन में निश्चितता आएगी और पुराने मामलों को बार-बार खोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
  4. अनुशासन का संदेश: जीएसटी को केवल टैक्स नहीं, बल्कि एक समयबद्ध प्रणाली के रूप में देखने का संकेत मिलता है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • मुद्दा: क्या CGST/BGST Act की धारा 16(4) असंवैधानिक है?
    निर्णय: नहीं। यह पूरी तरह वैध है और संविधान का उल्लंघन नहीं करती।
  • मुद्दा: क्या ITC एक संपत्ति/मौलिक अधिकार है?
    निर्णय: नहीं। यह एक वैधानिक सुविधा है, जो शर्तों के अधीन है।
  • मुद्दा: क्या समय सीमा को नजरअंदाज किया जा सकता है?
    निर्णय: नहीं। समय सीमा अनिवार्य है।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Vinoy Viswam v. Union of India, (2017) 7 SCC 59
  • Modern Dental College v. State of MP, (2016) 7 SCC 353
  • K.T. Moopil Nair v. State of Kerala, AIR 1961 SC 552

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • ALD Automotive Pvt. Ltd. v. CTO, (2019) 13 SCC 225
  • Jayam and Company v. Assistant Commissioner, (2016) 15 SCC 125
  • Jilubhai Nanbhai Khachar v. State of Gujarat, 1995 Supp (1) SCC 596

मामले का शीर्षक

M/s Tara Fertilizers Gulabbagh Purnia Vs. The State of Bihar

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 9108 of 2021

न्यायमूर्ति गण का नाम

  • माननीय न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह
  • माननीय न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सहित अन्य अधिवक्ता
  • भारत संघ की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल
  • बिहार राज्य की ओर से: महाधिवक्ता, बिहार

निर्णय का लिंक

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