अपील का रास्ता छोड़ा तो याचिका खारिज: पटना हाईकोर्ट का GST मामलों पर सख्त रुख (पटना उच्च न्यायालय, 2023)

निर्णय की सरल व्याख्या

यह फैसला पटना उच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2023 में दिया गया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि अगर किसी व्यक्ति को टैक्स से जुड़ा कोई आदेश गलत लगता है, तो उसे सबसे पहले कानून में दिए गए अपील के रास्ते का उपयोग करना चाहिए। सीधे हाईकोर्ट आना हर मामले में सही तरीका नहीं होता।

इस मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ राज्य कर विभाग द्वारा एक GST आकलन आदेश (assessment order) पारित किया गया था। यह आदेश 9 अक्टूबर 2021 का था। इस आदेश में याचिकाकर्ता के व्यापार के टर्नओवर, टैक्स योग्य राशि और देय टैक्स का निर्धारण किया गया था।

याचिकाकर्ता का कहना था कि यह आकलन सही नहीं है। लेकिन समस्या यह थी कि उन्होंने इस आदेश के खिलाफ बिहार GST अधिनियम में दिए गए अपील के प्रावधान का इस्तेमाल नहीं किया। सीधे वर्ष 2023 में उन्होंने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर दी।

अदालत ने सबसे पहले यह देखा कि क्या याचिकाकर्ता के पास अपील करने का मौका अभी भी था या नहीं। इस संदर्भ में अदालत ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोविड-19 महामारी के दौरान दिए गए आदेशों का उल्लेख किया। इन आदेशों में कहा गया था कि 15 मार्च 2020 से 28 फरवरी 2022 तक की अवधि को लिमिटेशन (समय-सीमा) की गणना से बाहर रखा जाएगा।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि 1 मार्च 2022 से 90 दिनों के भीतर अपील दाखिल की जा सकती है। इस हिसाब से याचिकाकर्ता 29 मई 2022 तक अपील कर सकते थे। इतना ही नहीं, बिहार GST अधिनियम की धारा 107(4) के तहत अपील में देरी होने पर एक महीने की अतिरिक्त छूट (condonation) का भी प्रावधान है। इसका अर्थ यह हुआ कि अधिकतम 28 जून 2022 तक अपील दायर की जा सकती थी।

लेकिन अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने इस पूरी अवधि में भी कोई अपील दाखिल नहीं की। यानी कानून ने जो अवसर दिया था, उसका उपयोग नहीं किया गया।

इसके बाद अदालत ने यह सवाल उठाया कि क्या ऐसे हालात में हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप करना चाहिए। अदालत ने साफ कहा कि हाईकोर्ट की शक्ति बहुत व्यापक जरूर है, लेकिन यह शक्ति विवेकाधीन (discretionary) होती है। इसका मतलब यह है कि हर मामले में इसका इस्तेमाल जरूरी नहीं।

यदि किसी कानून में प्रभावी और पर्याप्त वैकल्पिक उपाय (alternate remedy) उपलब्ध है, तो आमतौर पर हाईकोर्ट सीधे हस्तक्षेप नहीं करता। खासकर टैक्स मामलों में, जहां अपील और पुनरीक्षण जैसी व्यवस्थाएं पहले से मौजूद हैं।

अदालत ने यह भी बताया कि अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप तभी किया जाता है जब—

  • प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ हो
  • आदेश बिना अधिकार क्षेत्र के पारित हुआ हो
  • मौलिक अधिकारों का हनन हुआ हो
  • या किसी कानून की वैधता को चुनौती दी गई हो

इस मामले में याचिकाकर्ता ने इनमें से कोई भी ठोस आधार नहीं लिया था। न तो यह कहा गया कि सुनवाई का मौका नहीं मिला, न ही यह कि अधिकारी को आदेश देने का अधिकार नहीं था।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि टैक्स की गणना, टर्नओवर का निर्धारण और देय टैक्स जैसे प्रश्न तकनीकी और तथ्यात्मक होते हैं, जिन्हें अपीलीय प्राधिकारी बेहतर तरीके से देख सकता है। हाईकोर्ट इन मामलों में पहली अदालत की तरह काम नहीं कर सकता।

एक और महत्वपूर्ण बात जो अदालत ने कही, वह यह कि जब किसी कानून में अपील और देरी माफी की स्पष्ट समय-सीमा दी गई हो, तो न तो अपीलीय प्राधिकारी और न ही हाईकोर्ट उस समय-सीमा को बढ़ा सकता है। अदालतें सहानुभूति के आधार पर कानून की तय सीमा को नहीं तोड़ सकतीं।

अंत में, अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की अपनी लापरवाही के कारण वह अपील का अधिकार खो बैठा है। ऐसे में वह हाईकोर्ट की असाधारण शक्ति का सहारा नहीं ले सकता। इसलिए रिट याचिका को खारिज कर दिया गया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह फैसला आम व्यापारियों और करदाताओं के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। अगर किसी टैक्स आदेश से असहमति है, तो समय रहते अपील करना बेहद जरूरी है। हाईकोर्ट को अंतिम विकल्प के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

सरकार और कर विभाग के लिए यह निर्णय राहत देने वाला है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि अदालतें वैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करने की अनुमति नहीं देंगी। इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी कम होगी और कर व्यवस्था अधिक सुव्यवस्थित बनेगी।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या अपील किए बिना रिट याचिका दाखिल की जा सकती है?
    → नहीं, जब प्रभावी वैकल्पिक उपाय मौजूद हो।
  • कोविड काल की लिमिटेशन छूट का लाभ
    → अदालत ने माना कि पूरी छूट के बाद भी याचिकाकर्ता ने अपील नहीं की।
  • अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की भूमिका
    → यह विवेकाधीन है और हर मामले में इस्तेमाल नहीं की जा सकती।
  • क्या तय समय-सीमा बढ़ाई जा सकती है?
    → नहीं, कानून में दी गई सीमा अंतिम है।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • State of H.P. बनाम Gujarat Ambuja Cement Ltd., (2005) 6 SCC 499
  • In Re: Cognizance for Extension of Limitation, Suo Motu Writ Petition (C) No. 3 of 2020

मामले का शीर्षक

Pankaj Kumar Vs. State Goods And Services Tax

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 2751 of 2023

न्यायमूर्ति गण का नाम

  • माननीय मुख्य न्यायाधीश
  • माननीय न्यायमूर्ति पार्थ सारथी

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से सरकारी अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

MTUjMjc1MSMyMDIzIzEjTg==-AzmAgrZXSI0=

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News