पटना उच्च न्यायालय का फैसला: दक्षिण बिहार ग्रामीण बैंक की रिट याचिका खारिज — ग्रेच्युटी विवाद में पहले वैधानिक अपील का रास्ता अपनाने का निर्देश (2023 का निर्णय)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 4 जनवरी 2023 को एक महत्वपूर्ण निर्णय में दक्षिण बिहार ग्रामीण बैंक (पूर्व में मध्य बिहार ग्रामीण बैंक) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया।

यह याचिका भुगतान अधिनियम, 1972 (Payment of Gratuity Act, 1972) के अंतर्गत दिए गए एक आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी, जिसमें बैंक को एक दिवंगत कर्मचारी की पत्नी को ₹8,32,882/- ग्रेच्युटी और ब्याज सहित भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

न्यायालय ने कहा कि बैंक को पहले कानून द्वारा निर्धारित वैधानिक अपील दायर करनी चाहिए थी, न कि सीधे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए था।

यह निर्णय माननीय न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथ्री द्वारा सिविल रिट जुरिस्डिक्शन केस नं. 1919/2021 में दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

दक्षिण बिहार ग्रामीण बैंक के एक कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी ने बैंक से ग्रेच्युटी और ब्याज की मांग की। मामला सहायक श्रम आयुक्त (केंद्रीय), पटना के समक्ष पहुँचा, जो ग्रेच्युटी अधिनियम के तहत नियंत्रक प्राधिकारी (Controlling Authority) हैं।

दिनांक 5 जून 2020 को सहायक श्रम आयुक्त ने आदेश दिया कि बैंक को कर्मचारी की पत्नी को ₹8,32,882/- का भुगतान करना होगा। यह आदेश बैंक को 22 जून 2020 को प्राप्त हुआ।

बैंक ने इस आदेश के खिलाफ ग्रेच्युटी अधिनियम की धारा 7(7) के अंतर्गत अपील दायर करने के बजाय, सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर दी।

बैंक का कहना था कि उसने पहले ही ₹8,24,851/- का भुगतान कर दिया है, इसलिए आदेश की आवश्यकता नहीं है।

दूसरी ओर, प्रतिवादी पक्ष (कर्मचारी की पत्नी) ने कहा कि बैंक को पहले अपील का वैधानिक रास्ता अपनाना चाहिए था, और रिट याचिका “वैकल्पिक प्रभावी उपाय” (alternative remedy) होने के कारण अस्वीकार्य है।

कानूनी प्रावधान

  1. धारा 7(7), भुगतान अधिनियम, 1972:
    इसमें प्रावधान है कि नियंत्रक प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध अपील की जा सकती है, परंतु अपील स्वीकार करने से पहले विवादित राशि का भुगतान या आंशिक जमा करना आवश्यक है।
  2. संविधान का अनुच्छेद 226:
    उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति देता है, लेकिन यह तभी किया जाता है जब अन्य कोई प्रभावी वैधानिक उपाय उपलब्ध न हो।
  3. सीमाबद्धता अधिनियम, 1963 की धारा 14:
    यदि कोई पक्ष गलत मंच पर सद्भावना से मुकदमा करता है, तो वह समय सीमा (limitation) में छूट पाने का हकदार हो सकता है।

न्यायालय की टिप्पणियाँ

माननीय न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथ्री ने अपने आदेश में कहा —

  • बैंक के पास ग्रेच्युटी अधिनियम के अंतर्गत अपील का वैधानिक प्रावधान था।
  • बिना अपील दाखिल किए सीधे रिट दायर करना कानून की प्रक्रिया का उल्लंघन है।
  • केवल आंशिक भुगतान कर देने से बैंक को कानूनी प्रक्रिया से छूट नहीं मिल सकती।

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय State of J&K v. R.K. Zalpuri (AIR 2016 SC 3006) का हवाला देते हुए कहा कि जब वैकल्पिक प्रभावी उपाय उपलब्ध हो, तो उच्च न्यायालय रिट याचिका स्वीकार नहीं कर सकता।

इसी तरह City and Industrial Development Corporation v. Dosu Aardeshir Bhiwandiwala (2009) 1 SCC 168 में यह कहा गया था कि रिट सुनवाई से पहले न्यायालय को यह देखना चाहिए —

  • क्या मामला जटिल तथ्यों से जुड़ा है,
  • क्या याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक उपाय है,
  • क्या विलंब या त्रुटि हुई है,
  • और क्या राहत देना सार्वजनिक नीति के विपरीत तो नहीं है।

इन सिद्धांतों के आधार पर न्यायालय ने बैंक की रिट याचिका को अस्वीकार्य (not maintainable) माना।

न्यायालय का निर्णय

  • रिट याचिका को खारिज कर दिया गया।
  • लेकिन बैंक को यह छूट (liberty) दी गई कि वह ग्रेच्युटी अधिनियम की धारा 7(7) के अंतर्गत अपील दायर कर सकता है।
  • चूंकि बैंक पहले ही कुछ राशि चुका चुका है, इसलिए उसे अपील दाखिल करते समय केवल 50% विवादित राशि जमा करनी होगी।
  • अपीलीय प्राधिकारी को यह भी निर्देश दिया गया कि वह सीमाबद्धता अधिनियम की धारा 14 के तहत बैंक द्वारा गलत मंच पर बिताए गए समय को ध्यान में रखे और विलंब माफी (condonation of delay) पर विचार करे।

इस प्रकार, न्यायालय ने बैंक की रिट को खारिज करते हुए भी उसके लिए वैधानिक अपील का रास्ता खुला रखा।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

यह निर्णय उस कानूनी सिद्धांत को दोहराता है कि —
👉 जब किसी कानून में अपील या अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध हो, तो सीधे रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती।

बैंकों, सरकारी संस्थानों और नियोक्ताओं के लिए यह एक स्पष्ट संदेश है कि कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।

कर्मचारियों और आश्रितों के लिए यह निर्णय भरोसा दिलाता है कि भुगतान अधिनियम (Gratuity Act) एक प्रभावी कानूनी माध्यम है, जिसके अंतर्गत उनके अधिकारों की रक्षा की जाएगी।

कुल मिलाकर, यह फैसला न्यायालयों के कार्यक्षेत्र और वैधानिक प्रक्रियाओं के बीच संतुलन बनाए रखने का एक उदाहरण है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय (Legal Issues and Findings)

  • क्या रिट याचिका बिना वैधानिक अपील दाखिल किए स्वीकार्य थी? ❌ नहीं।
  • क्या आंशिक भुगतान करने से अपील की आवश्यकता समाप्त हो जाती है? ❌ नहीं।
  • क्या न्यायालय ने कोई राहत दी? ✔️ हाँ, बैंक को 50% राशि जमा कर अपील दाखिल करने की अनुमति दी गई।
  • क्या देरी माफ की जा सकती है? ✔️ हाँ, यदि बैंक उचित कारण बताए तो धारा 14 के तहत छूट मिल सकती है।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • State of Jammu and Kashmir v. R.K. Zalpuri & Others, AIR 2016 SC 3006
  • City and Industrial Development Corporation v. Dosu Aardeshir Bhiwandiwala, (2009) 1 SCC 168

मामले का शीर्षक

The Chairman, Dakshin Bihar Gramin Bank (Erstwhile Madhya Bihar Gramin Bank) बनाम Union of India एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 1919 of 2021

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 696

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथ्री

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • बैंक की ओर से: श्री रंजीत कुमार पांडेय, अधिवक्ता
  • प्रतिवादी पक्ष की ओर से: श्रीमती कनक वर्मा, श्री हरेंद्र सिंह एवं श्री जय प्रकाश सिंह, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

MTUjMTkxOSMyMDIxIzEjTg==-5x4Zzvk9LWI=

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News