निर्णय की सरल व्याख्या
इस निर्णय में पटना उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि क्या किसी निष्पादन (Execution) की कार्यवाही को केवल इसलिए रोका जा सकता है क्योंकि देनदार पक्ष (यानी याचिकाकर्ता) ने उसी संपत्ति पर नया सिविल वाद (Title Suit) दायर कर दिया है।
यह मामला एक लंबे समय से चल रहे मकान मालिक और किरायेदार के विवाद से जुड़ा है। यह विवाद 1998 में दायर किए गए बेदखली मुकदमे से शुरू हुआ था। उस मुकदमे में मकान मालिक के पक्ष में फैसला हुआ, जिसे अपील और द्वितीय अपील में भी बरकरार रखा गया। अब 2011 से उस डिक्री को लागू करने के लिए निष्पादन मामला चल रहा है ताकि संपत्ति का कब्ज़ा मकान मालिक को सौंपा जा सके।
2020 में याचिकाकर्ता (किरायेदार) ने निष्पादन रोकने के लिए आदेश 21 नियम 29 सीपीसी के तहत एक आवेदन दायर किया। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने 2020 में नया टाइटल सूट दायर किया है, जिसमें दावा किया गया है कि वह अब भी “मासिक किरायेदार” है और खरीदार (प्रतिवादी) का स्वामित्व विवादित है। याचिकाकर्ता ने कहा कि जब तक नया टाइटल सूट निपट नहीं जाता, तब तक निष्पादन रोका जाए।
निष्पादन न्यायालय ने यह आवेदन 29 अगस्त 2024 को खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने इस आदेश को चुनौती देते हुए पटना उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 227 के तहत याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि संपत्ति के माप में गड़बड़ी है। मूल प्लॉट 40 कट्ठे (लगभग 4 डेसिमल) बताया गया था, जबकि बिक्री विलेख में मात्र 927.50 वर्गफुट का ज़िक्र है। इसलिए याचिकाकर्ता ने कहा कि उसकी दुकान उस सीमा में नहीं आती, और डिक्री की कार्यवाही उस पर लागू नहीं हो सकती।
प्रतिवादी पक्ष ने विरोध किया कि यह मामला 1998 से चल रहा है, डिक्री पहले ही अपीलों में कायम रह चुकी है, और अब नया वाद केवल देरी करने की मंशा से दायर किया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि उच्च न्यायालय ने पहले ही आदेश दिया था कि निष्पादन छह महीने में पूरा किया जाए, इसलिए इसे फिर से रोकना न्यायोचित नहीं होगा।
उच्च न्यायालय ने पाया कि निष्पादन न्यायालय ने एक “स्पीकिंग ऑर्डर” दिया था, जिसमें सभी तर्कों पर विचार किया गया। साथ ही, उच्च न्यायालय ने यह भी याद दिलाया कि उसने पहले ही आदेश दिया था कि निष्पादन शीघ्र निपटाया जाए। इस स्थिति में, नया दायर किया गया टाइटल सूट केवल निष्पादन रोकने का माध्यम नहीं बन सकता।
न्यायालय ने कहा कि निष्पादन न्यायालय का काम केवल डिक्री को लागू करना है, उसे दोबारा सुनना या संशोधित करना नहीं। यदि संपत्ति की सीमा या बिक्री विलेख की व्याख्या को लेकर विवाद था, तो यह पहले ही ट्रायल और अपील के दौरान उठाया जाना चाहिए था। एक बार जब डिक्री अंतिम रूप ले चुकी है, तब कोई नया टाइटल सूट दायर कर निष्पादन को रोकना कानून की भावना के विरुद्ध है।
अंततः उच्च न्यायालय ने निष्पादन रोकने से इंकार कर दिया और याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया। यह निर्णय यह स्थापित करता है कि आदेश 21 नियम 29 सीपीसी का प्रयोग केवल वास्तविक और लंबित विवादों में किया जा सकता है, न कि पुराने मुकदमे के परिणाम को टालने के लिए।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह निर्णय बिहार में मकान मालिकों और किरायेदारों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। अक्सर किरायेदार डिक्री के बाद निष्पादन रोकने के लिए नए मुकदमे दायर करते हैं, जिससे मकान मालिक वर्षों तक संपत्ति वापस नहीं ले पाते। यह फैसला बताता है कि जब कोई डिक्री अपीलों में भी कायम रह चुकी हो, तब केवल नया वाद दायर करने से निष्पादन अपने आप नहीं रुकता।
सरकार और न्यायपालिका के दृष्टिकोण से यह फैसला लंबित निष्पादन मामलों को जल्दी निपटाने में मदद करेगा और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ाएगा। इससे देरी की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा और वास्तविक न्याय समय पर मिलेगा।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या नया टाइटल सूट दायर करने से निष्पादन रोका जा सकता है?
✦ नहीं। यदि डिक्री पहले ही अपीलों में कायम रह चुकी है, तो नया वाद निष्पादन पर रोक का आधार नहीं बन सकता। - क्या संपत्ति के माप में अंतर का तर्क निष्पादन रोकने का कारण बन सकता है?
✦ नहीं। यह तर्क पहले के मुकदमों में उठाया जा चुका था और खारिज हो चुका है। निष्पादन न्यायालय इसे दोबारा नहीं देख सकता। - क्या अनुच्छेद 227 के तहत उच्च न्यायालय हस्तक्षेप करेगा?
✦ नहीं। जब निचली अदालत ने तर्कपूर्ण आदेश दिया हो, तो उच्च न्यायालय केवल इस आधार पर हस्तक्षेप नहीं करता कि याचिकाकर्ता असंतुष्ट है।
मामले का शीर्षक
अजय कुमार बनाम देवदीन प्रसाद
केस नंबर
Civil Miscellaneous Jurisdiction No. 1183 of 2024
उद्धरण (Citation)
2025 (2) PLJR 221
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा
निर्णय की तारीख: 04.03.2025
अपलोडिंग तारीख: 05.03.2025
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री रंजन कुमार दुबे, अधिवक्ता; श्री कुमार गौरव, अधिवक्ता
- प्रतिवादी की ओर से: श्री जितेन्द्र प्रसाद सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्रीमती श्रीप्रिया सिन्हा, अधिवक्ता
निर्णय का लिंक
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