निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने 4 मार्च 2021 को दिए गए एक निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि किसी छात्र की उत्तर पुस्तिका का पुनर्मूल्यांकन (Re-evaluation) पहले ही किया जा चुका है, तो वह दोबारा पुनरीक्षण (Second Re-evaluation) की मांग नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि अकादमिक मूल्यांकन (Academic Evaluation) विशेषज्ञों का क्षेत्र है, और जब तक कोई गंभीर त्रुटि या नियमों का उल्लंघन न हो, तब तक न्यायालय को इसमें दखल नहीं देना चाहिए।
यह मामला सीबीएसई (CBSE) की कक्षा 12वीं परीक्षा 2020 से जुड़ा था। याचिकाकर्ता छात्रा ने अर्थशास्त्र विषय में मिले अंकों पर आपत्ति जताई थी। उसे प्रारंभिक रूप से राजनीति विज्ञान में 91, अर्थशास्त्र में 97 और शारीरिक शिक्षा में 98 अंक प्राप्त हुए थे। उसने इन विषयों में पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया।
पुनर्मूल्यांकन के बाद सीबीएसई ने उसके अंक बढ़ाए —
- राजनीति विज्ञान में 91 से 99,
- शारीरिक शिक्षा में 98 से 99,
- और अर्थशास्त्र में 97 से 98 (प्रश्न संख्या 23 में 1 अंक की वृद्धि)।
हालांकि, छात्रा का कहना था कि अर्थशास्त्र के प्रश्न संख्या 15 में भी उसका उत्तर पूरी तरह सही था, परंतु उसे उसका पूरा अंक नहीं दिया गया। इस एक अंक के लिए उसने पटना उच्च न्यायालय में याचिका दायर की और पुनः पुनर्मूल्यांकन का आदेश मांगने लगी।
याचिकाकर्ता के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि अर्थशास्त्र के प्रश्न संख्या 15 का उत्तर पूरी तरह सही था, लेकिन मूल्यांकनकर्ता ने उसे नजरअंदाज कर दिया। चूँकि उसके अन्य विषयों में अंक पुनर्मूल्यांकन के बाद बढ़ाए गए थे, इसलिए अर्थशास्त्र में भी निष्पक्षता के लिए एक और समीक्षा आवश्यक है।
सीबीएसई का जवाब
सीबीएसई की ओर से कहा गया कि छात्रा की पुनर्मूल्यांकन की मांग पहले ही स्वीकार कर ली गई थी और उसके अंक निष्पक्ष रूप से बढ़ाए भी गए हैं। बोर्ड के नियमों के अनुसार दूसरी बार पुनर्मूल्यांकन की कोई व्यवस्था नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि सीबीएसई की मूल्यांकन प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी और विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में होती है, इसलिए अदालत को अंक निर्धारण में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
अदालत की टिप्पणियाँ
माननीय न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया —
- यूजीसी बनाम नेहा अनिल बोबडे (2013) 10 SCC 519
— सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अकादमिक मामलों में न्यायालय तभी दखल दे सकता है जब कोई स्पष्ट कानूनी उल्लंघन हो। मूल्यांकन का कार्य विशेषज्ञों के अधिकार क्षेत्र में आता है। - तीर्थ सारथी मुखर्जी बनाम गौहाटी उच्च न्यायालय (2019) 16 SCC 663
— इस निर्णय में कहा गया कि यदि किसी परीक्षा नियम में पुनर्मूल्यांकन की व्यवस्था नहीं है, तो छात्र इसे अधिकार के रूप में नहीं मांग सकता। लेकिन दुर्लभ और असाधारण मामलों में, जब उत्तर सही होते हुए भी अंक नहीं दिए गए हों और कोई विवाद न हो, तब न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। - उत्तर प्रदेश राज्य बनाम मोहम्मद नूह (1958 SCR 595)
— संविधान पीठ ने कहा कि यद्यपि वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने पर आमतौर पर अदालत हस्तक्षेप नहीं करती, फिर भी विशेष परिस्थितियों में अदालत अपने विवेकाधिकार से दखल दे सकती है।
इन सभी न्यायिक उदाहरणों को ध्यान में रखते हुए, न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई “असाधारण या दुर्लभ” कारण नहीं है। सीबीएसई ने पहले ही पुनर्मूल्यांकन कर अंक बढ़ाए हैं, जिससे उसकी निष्पक्षता और पारदर्शिता सिद्ध होती है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि छात्रा के कुल औसत अंक 97.6% से बढ़कर 98.4% हो गए हैं, जिससे यह साबित होता है कि मूल्यांकन निष्पक्ष था।
न्यायालय का निर्णय
पटना उच्च न्यायालय ने कहा:
- सीबीएसई ने नियमों के अनुसार पुनर्मूल्यांकन किया है, इसलिए दूसरी बार पुनरीक्षण की मांग अस्वीकार्य है।
- अदालत इस प्रकार के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी जब तक कोई कानूनी त्रुटि या भेदभाव साबित न हो।
- याचिकाकर्ता का औसत प्रदर्शन अत्यंत उत्कृष्ट है, अतः न्यायालय ने उसे “भविष्य के लिए शुभकामनाएँ” देते हुए याचिका खारिज कर दी।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
- यह निर्णय स्पष्ट करता है कि अकादमिक मूल्यांकन न्यायालय का विषय नहीं है, जब तक कोई स्पष्ट नियम उल्लंघन न हो।
- छात्रों के लिए यह संदेश है कि एक बार पुनर्मूल्यांकन हो जाने के बाद दूसरी बार समीक्षा की मांग स्वीकार नहीं की जाएगी।
- यह फैसला सीबीएसई जैसे राष्ट्रीय बोर्डों की विश्वसनीयता और अंतिमता को बनाए रखता है।
- यह निर्णय शिक्षा संस्थानों को अनावश्यक मुकदमों से राहत देता है और मूल्यांकन प्रणाली को स्थिर रखता है।
- साथ ही यह भी बताता है कि न्यायालय केवल “दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों” में ही हस्तक्षेप करेगा।
कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)
- क्या छात्र दोबारा पुनर्मूल्यांकन की मांग कर सकता है?
— नहीं। सीबीएसई के नियमों में इसका प्रावधान नहीं है। - क्या अदालत अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप कर सकती है?
— केवल असाधारण मामलों में, जब सही उत्तर को गलत अंकित किया गया हो। - क्या सीबीएसई ने निष्पक्षता बरती?
— हाँ। पुनर्मूल्यांकन के बाद अंक बढ़ाए गए, जो निष्पक्ष प्रक्रिया को दर्शाता है। - क्या न्यायालय को हस्तक्षेप करना चाहिए था?
— नहीं। मामला न्यायिक हस्तक्षेप योग्य नहीं पाया गया।
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- UGC v. Neha Anil Bobde (Gadekar), (2013) 10 SCC 519
- Tirtha Sarathi Mukherjee v. High Court of Gauhati, (2019) 16 SCC 663
- State of U.P. v. Mohammad Nooh, 1958 SCR 595
- Maharashtra Chess Association v. Union of India, 2019 SCC OnLine SC 932
मामले का शीर्षक
Sonalika Rani v. The Central Board of Secondary Education & Ors.
केस नंबर
Civil Writ Jurisdiction Case No. 8887 of 2020
उद्धरण (Citation)
2021(2) PLJR 396
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री कौशल किशोर, अधिवक्ता
- सीबीएसई (प्रतिवादी संख्या 1-4) की ओर से: श्री विजय कृष्ण त्रिपाठी, अधिवक्ता
निर्णय का लिंक
MTUjODg4NyMyMDIwIzEjTg==-EpmhYmTs8hw=
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