पटना उच्च न्यायालय : बी.एस.एफ. कांस्टेबल की देरी से दायर याचिका पर सख्त टिप्पणी (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

यह मामला सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक कांस्टेबल से संबंधित था, जिसे ड्यूटी से लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के कारण सेवा से हटा दिया गया था। कांस्टेबल की नियुक्ति 22 दिसंबर 2008 को हुई थी। उसने 22 अगस्त 2012 से 9 सितंबर 2012 तक 15 दिनों की आकस्मिक छुट्टी ली थी, लेकिन वह छुट्टी खत्म होने के बाद ड्यूटी पर नहीं लौटा।

बी.एस.एफ. प्रशासन ने उसे 14 जनवरी 2013 को एक शोकॉज नोटिस जारी किया, जिसमें बताया गया था कि उस पर सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968 की धारा 11(2) तथा नियम 177 (BSF Rules, 1969) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। याचिकाकर्ता ने इस नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया। परिणामस्वरूप, 4 मार्च 2013 को उसका नाम बल की सेवा सूची से हटा दिया गया।

इसके बाद भी उसने कोई अपील या आवेदन नहीं किया और लगभग आठ साल बाद, यानी 2020 में पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उसने यह दावा किया कि उसने 2017 में एक आवेदन डीजी (BSF) को भेजा था, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए उसे फिर से ज्वाइन करने की अनुमति दी जाए।

माननीय न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद ने पूरे मामले की समीक्षा करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का आचरण पूरी तरह लापरवाही और निष्क्रियता से भरा हुआ है। इतना लंबा विलंब “असाधारण देरी और निष्क्रियता” (delay and laches) की श्रेणी में आता है, जिसे अदालतें स्वीकार नहीं कर सकतीं।

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध निर्णय Chennai Metropolitan Water Supply & Sewerage Board v. T.T. Murali Babu (2014) 4 SCC 108 का हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया था कि जो व्यक्ति वर्षों तक अपने अधिकारों के प्रति सोया रहता है, वह अनुच्छेद 226 के तहत राहत पाने का हकदार नहीं होता, क्योंकि रिट अधिकार असाधारण और न्यायसंगत (equitable) प्रकृति का होता है।

न्यायालय ने उद्धृत किया कि —

“देरी न्याय की दुश्मन है। जो व्यक्ति वर्षों तक निष्क्रिय रहता है, उसके अधिकार स्वतः समाप्त माने जाते हैं। कानून किसी को भी ‘कुम्भकर्ण’ या ‘रिप वैन विंकल’ की तरह सोने और अचानक जागने की अनुमति नहीं देता।”

अदालत ने कहा कि यदि इस प्रकार के पुराने और जमे हुए विवादों को फिर से खोला जाएगा, तो यह अन्य कर्मचारियों के अधिकारों को भी प्रभावित करेगा, जो इस बीच स्थिर हो चुके हैं।

चूँकि याचिकाकर्ता 2012 से अनुपस्थित था, 2013 के नोटिस का जवाब नहीं दिया, और आठ साल बाद अदालत पहुंचा, इसलिए यह याचिका स्पष्ट रूप से समयबद्धता की कमी से ग्रसित है। अदालत ने कहा कि ऐसी याचिका पर विचार करने का कोई औचित्य नहीं है और इसे प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज किया जाना चाहिए था।

अंततः, न्यायालय ने याचिका को देरी और निष्क्रियता (delay and laches) के आधार पर खारिज कर दिया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह निर्णय सरकारी सेवाओं, सशस्त्र बलों और अर्धसैनिक बलों में कार्यरत सभी कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है।

  • यदि कोई सरकारी या सुरक्षा बल का कर्मचारी बिना अनुमति के लंबे समय तक अनुपस्थित रहता है, तो यह गंभीर अनुशासनहीनता मानी जाएगी।
  • शोकॉज नोटिस का जवाब न देना या समय पर अपील न करना भविष्य में सभी कानूनी अधिकारों को समाप्त कर देता है।
  • कोई भी व्यक्ति यदि कई वर्षों तक निष्क्रिय रहकर बाद में अदालत में याचिका दायर करता है, तो उसे राहत नहीं मिलेगी।
  • अदालतों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे केवल उन याचिकाकर्ताओं की मदद करेंगी जो ईमानदार, सक्रिय और तत्पर हैं।

सरकारी संस्थाओं के लिए यह फैसला राहत भरा है, क्योंकि यह पुष्टि करता है कि नियमित प्रक्रिया से किए गए अनुशासनात्मक आदेशों को अदालत द्वारा आसानी से पलटा नहीं जा सकता। यह भी सुनिश्चित करता है कि पुराने मामलों को फिर से खोलकर अन्य कर्मचारियों के स्थायी अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जाएगा।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या याचिकाकर्ता आठ साल बाद सेवा में पुनः बहाली की मांग कर सकता था?
    ❌ नहीं। अदालत ने कहा कि इतनी लंबी देरी अस्वीकार्य है।
  • क्या शोकॉज नोटिस का जवाब न देना और बिना कारण अनुपस्थित रहना उचित था?
    ❌ नहीं। बी.एस.एफ. ने वैधानिक प्रक्रिया के तहत सेवा समाप्त की।
  • क्या अदालत इतनी देरी के बाद राहत दे सकती है?
    ❌ नहीं। न्यायालय ने कहा कि कानून सोए हुए अधिकारों को पुनर्जीवित करने की अनुमति नहीं देता।
  • अंतिम निर्णय:
    याचिका खारिज कर दी गई।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Chennai Metropolitan Water Supply & Sewerage Board & Ors. v. T.T. Murali Babu, (2014) 4 SCC 108

मामले का शीर्षक

Yachikakarta v. Union of India & Others (BSF Service Dismissal Case)

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 3984 of 2020

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 377

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से — श्री रमाकांत यादव, अधिवक्ता
  • प्रतिवादी (Union of India एवं BSF) की ओर से — श्री नरेश अक्षित एवं श्री उत्सव आनंद, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

MTUjMzk4NCMyMDIwIzEjTg==-yG7vRSgI0w8=

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News