पटना उच्च न्यायालय का फैसला (2022): बिहार में भूमि अभिलेखों के आधुनिकीकरण पर जनहित याचिका — सरकार के चल रहे कार्य को न्यायालय की स्वीकृति

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय की खंडपीठ — माननीय न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार सिंह और माननीय डॉ. न्यायमूर्ति अंशुमान — ने 11 जुलाई 2022 को सिविल रिट जूरिस्डिक्शन केस नंबर 11105/2017 में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। यह मामला बिहार राज्य में भूमि अभिलेखों (Record of Rights/खतियान) को आधुनिक बनाने और पुनरीक्षण (revision) कराने से जुड़ी एक जनहित याचिका था।

याचिकाकर्ता ने स्वयं अदालत में पेश होकर यह कहा कि बिहार में भूमि अभिलेखों का आखिरी बार संपूर्ण सर्वेक्षण लगभग एक सदी पहले किया गया था। प्रारंभिक कैडस्ट्रल सर्वे (cadastral survey) बंगाल टेनेंसी एक्ट, 1885 के तहत हुआ था। उसके लगभग 50 वर्ष बाद, वर्ष 1935 में एक रिविजनल सर्वे (revisional survey) किया गया था, जिसका उद्देश्य पुराने खतियान को अद्यतन करना था। परंतु उसके बाद से राज्य सरकार ने कोई व्यापक सर्वेक्षण नहीं किया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि आज भी बिहार में ज़मीन से जुड़े विवादों का मुख्य कारण यही है कि अभिलेख पुराने और असंगठित हैं। कोई व्यक्ति ज़मीन खरीदता है, पर बाद में यह पता चलता है कि खतियान में उसका नाम नहीं है, या किसी दूसरे व्यक्ति का दावा दर्ज है। ऐसे में लोगों को वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इसलिए, उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया कि राज्य सरकार को आदेश दिया जाए कि वह सभी जिलों में भूमि अभिलेखों का पुनरीक्षण और डिजिटलीकरण करे।

राज्य सरकार की ओर से राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग और भूमि अभिलेख निदेशालय ने अपना विस्तृत जवाब (counter affidavit) दाखिल किया। सरकार ने बताया कि यह काम पहले से ही तेज़ी से चल रहा है।

सरकार ने स्पष्ट किया कि उसने पुरानी सर्वे प्रणाली को समाप्त कर दिया है और “बिहार विशेष सर्वे एवं बंदोबस्त अधिनियम, 2011” (Bihar Special Survey and Settlement Act, 2011) लागू किया है। इस कानून के तहत राज्य के सभी जिलों में आधुनिक तकनीकों जैसे GPS, Electronic Total Station (ETS) और Aerial Photography (हवाई फोटोग्राफी) की मदद से भूमि सर्वेक्षण किया जा रहा है।

सरकार ने बताया कि भूमि अभिलेखों के कंप्यूटरीकरण और डिजिटलीकरण का काम “Digital India Land Records Modernization Programme (DILRMP)” के तहत चल रहा है। इसमें तीन मुख्य चरण शामिल हैं:

  1. खतियान और जमाबंदी अभिलेखों का कंप्यूटरीकरण
  2. नक्शों का डिजिटलीकरण
  3. ऑनलाइन म्यूटेशन (Online Mutation) यानी स्वामित्व परिवर्तन की डिजिटल प्रविष्टि

सरकार के हलफनामे में बताया गया कि —

  • सभी 38 जिलों में हवाई फोटोग्राफी पूरी हो चुकी है, केवल मधुबनी जिले के कुछ हिस्से और कुछ रक्षा-प्रतिबंधित क्षेत्र शेष हैं।
  • 45,354 गांवों के अभिलेख कंप्यूटरीकृत किए जा चुके हैं।
  • 3.39 करोड़ जमाबंदी रिकॉर्ड्स में से लगभग 2.81 करोड़ का डेटा एंट्री पूरा हो गया है।
  • 186 अंचलों में ऑनलाइन म्यूटेशन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
  • सभी जिलों के कैडस्ट्रल नक्शे डिजिटलीकृत हो चुके हैं।
  • रिविजनल नक्शे 28 जिलों और कंसॉलिडेशन नक्शे 25 जिलों में पूरे किए जा चुके हैं।

इसके अलावा तीन एजेंसियों — IL&FS (नई दिल्ली), IIC Technologies (हैदराबाद) और GIS Consortium (नई दिल्ली) — को बिहार के सभी जिलों में डिजिटल सर्वे और हवाई फोटोग्राफी का काम सौंपा गया है।

राज्य सरकार ने यह भी बताया कि सर्वेक्षण कार्य में जनशक्ति की कमी और कुछ तकनीकी अनुमति (NOC) के कारण देरी हो रही है, लेकिन प्राथमिकता के आधार पर 13 जिलों में विशेष सर्वे का कार्य तेजी से जारी है।

न्यायालय ने सरकार की इस विस्तृत प्रगति रिपोर्ट को पढ़ा और पाया कि राज्य सरकार ने वास्तव में काम शुरू कर दिया है तथा पर्याप्त प्रगति हो चुकी है। इसलिए, न्यायालय ने कहा कि अब किसी विशेष दिशा-निर्देश की आवश्यकता नहीं है।

इस प्रकार, न्यायालय ने याचिका का निपटारा (dispose) करते हुए कहा कि राज्य सरकार पहले से ही भूमि अभिलेखों के आधुनिकीकरण पर काम कर रही है, इसलिए अदालत का हस्तक्षेप आवश्यक नहीं।

साधारण शब्दों में, यह निर्णय इस बात की पुष्टि करता है कि बिहार में भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण और सर्वेक्षण का काम अब सरकारी प्राथमिकता में है और अदालत इसे लेकर संतुष्ट है।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह निर्णय राज्य और नागरिक दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।

  • आम जनता के लिए:
    इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश गया कि सरकार बिहार के हर नागरिक की भूमि की सही जानकारी डिजिटल रूप से सुरक्षित करने के लिए कार्य कर रही है। इससे भविष्य में ज़मीन संबंधी विवादों, धोखाधड़ी, और लंबे मुकदमों में कमी आएगी।
  • सरकार के लिए:
    अदालत ने सरकार के प्रयासों की सराहना की और उसे और गति से कार्य जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। यह फैसला Digital India मिशन और भूमि सुधार कार्यक्रमों के प्रति विश्वास को मज़बूत करता है।
  • न्यायपालिका के लिए:
    अदालत ने प्रशासनिक मामलों में न्यायिक संयम (judicial restraint) दिखाया — यानी जब सरकार सही दिशा में काम कर रही है, तो अदालत को हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती।

इस तरह यह निर्णय नीति निर्माण और प्रशासनिक उत्तरदायित्व दोनों के लिए एक मार्गदर्शक उदाहरण बनता है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या भूमि अभिलेखों के आधुनिकीकरण के लिए अदालत को आदेश देना चाहिए?
    • अदालत ने कहा — नहीं, क्योंकि यह काम पहले से सरकार द्वारा Bihar Special Survey and Settlement Act, 2011 के तहत चल रहा है।
  • क्या नागरिकों को पुराने अभिलेखों से हानि हो रही है?
    • अदालत ने माना कि समस्या वास्तविक है, परंतु अब सरकार ने सक्रिय रूप से सुधार शुरू कर दिया है।
  • क्या न्यायिक निगरानी की आवश्यकता है?
    • अदालत ने कहा कि सरकार ने पर्याप्त प्रगति दिखाई है, इसलिए फिलहाल न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक नहीं।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

Shambhu Sharan Singh v. The State of Bihar & Others

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 11105 of 2017

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 127

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार सिंह
माननीय डॉ. न्यायमूर्ति अंशुमान

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री शंभु शरण सिंह (स्वयं उपस्थित)
  • राज्य की ओर से: श्री विश्व विभूति कुमार सिंह, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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