निर्णय की सरल व्याख्या
यह मामला एक पत्नी और उसके नाबालिग बेटे से जुड़ा है, जिन्होंने फैमिली कोर्ट, गोपालगंज में दायर भरण-पोषण केस में हार जाने के बाद पटना हाई कोर्ट में पुनः न्याय की मांग की। पत्नी ने धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत पति से मासिक भरण-पोषण की मांग की थी। लेकिन फैमिली कोर्ट ने पति के आरोपों को सही मानते हुए आवेदन खारिज कर दिया। बाद में पत्नी और बच्चा इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट पहुँचे।
पृष्ठभूमि क्या थी?
- शादी 06.03.2012 को हिन्दू रीति-रिवाज से हुई थी।
- पत्नी 08.03.2012 को ससुराल गई।
- 16.11.2012 को एक बेटे का जन्म हुआ, वह भी शादी रहते हुए।
- पत्नी का आरोप था कि पति उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता था और किसी अन्य महिला से अवैध संबंध बनाए हुए था।
- आखिरकार उसे घर से निकाल दिया गया, और वह बच्चे के साथ मायके में रहने लगी।
- पत्नी के अनुसार पति नौसेना में सरकारी कर्मचारी है, उसके पास ज़मीन और किराये की आय भी है।
पत्नी ने अपने और अपने बेटे के लिए 20,000 रुपये मासिक भरण-पोषण की मांग की।
पति का बचाव
पति ने मुख्य रूप से दो बातें कहीं—
- बच्चा उसका नहीं है:
उसने कहा कि पत्नी शादी से पहले ही गर्भवती थी और बच्चा किसी और का है।
इस आधार पर उसने डीएनए रिपोर्ट और हॉस्पिटल की डिस्चार्ज स्लिप का सहारा लिया। - पत्नी व्यभिचार कर रही है और आय अर्जित करती है:
उसने आरोप लगाया कि पत्नी व्यभिचारी जीवन जी रही है तथा एक ब्यूटी पार्लर चलाकर 25,000 रुपये कमाती है।
फैमिली कोर्ट ने पति की बात मान ली और कहा कि पत्नी “अनैतिक जीवन” जी रही थी तथा बच्चा पति का नहीं है। इस तरह भरण-पोषण का दावा खारिज कर दिया गया।
हाई कोर्ट ने मामले को कैसे देखा?
पटना हाई कोर्ट ने पूरे मामले की गहराई से जांच की—
- गवाहों के बयान
- दस्तावेजों की वैधता
- भरण-पोषण, पितृत्व और डीएनए टेस्ट से जुड़े कानून
- धारा 125(4) CrPC और धारा 112 साक्ष्य अधिनियम की कानूनी व्याख्या
और आखिरकार फैमिली कोर्ट का आदेश पूरी तरह पलट दिया।
व्यभिचार (Living in Adultery) पर हाई कोर्ट का स्पष्ट रुख
हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण बात कही:
- धारा 125(4) CrPC में “living in adultery” का मतलब है—शादी के बाद लगातार और स्पष्ट रूप से व्यभिचारी संबंध रखना।
- शादी से पहले के किसी भी व्यवहार या संबंध को ‘living in adultery’ नहीं माना जा सकता।
- पति ने केवल सामान्य आरोप लगाए। यह नहीं बताया कि किसके साथ, कब, कहाँ और कैसे पत्नी व्यभिचार कर रही थी।
इसलिए पत्नी को भरण-पोषण से वंचित करने का कोई कानूनी आधार नहीं था।
बच्चे की पैदाइश, पितृत्व और डीएनए रिपोर्ट पर कोर्ट की राय
- बच्चा शादी के दौरान पैदा हुआ था।
- पति ने यह नहीं कहा कि उसे पत्नी तक पहुँच (access) नहीं थी।
- ऐसे में धारा 112 साक्ष्य अधिनियम के अनुसार बच्चा पति का ही माना जाएगा, जब तक पति यह साबित न कर दे कि उसके पास पत्नी तक “पहुंच ही नहीं थी”।
डीएनए रिपोर्ट और हॉस्पिटल की डिस्चार्ज स्लिप को कोर्ट ने खारिज कर दिया क्योंकि—
- इन्हें सही कानूनी प्रक्रिया से रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया गया।
- रिपोर्ट बनाने वाले डॉक्टर या अधिकारी का बयान नहीं लिया गया।
- पत्नी को आपत्ति दर्ज करने और जिरह करने का मौका नहीं मिला।
इसलिए ये दस्तावेज़ प्रमाण के रूप में मान्य नहीं थे।
हाई कोर्ट ने साफ कहा:
शादी के 255 दिन बाद बच्चा होना बिल्कुल संभव है, क्योंकि कई बच्चे समय से पहले (pre-mature) भी जन्म लेते हैं।
इस प्रकार बच्चा वैध पुत्र माना गया और उसे भरण-पोषण का पूरा अधिकार मिला।
धारा 125 CrPC का उद्देश्य: भूख से बचाना, चरित्र पर आघात नहीं
हाई कोर्ट ने याद दिलाया कि:
- यह एक सामाजिक सुरक्षा प्रावधान है।
- इसमें जटिल सबूतों की अनिवार्यता नहीं होती।
- इसका उद्देश्य पत्नी, बच्चों और माता–पिता को बुनियादी जीवन सुरक्षा देना है।
फैमिली कोर्ट ने जिस तरह से पत्नी को “अनैतिक” कहा और बच्चे को “अवैध” घोषित जैसा निष्कर्ष निकाला, वह बिल्कुल गलत था।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
- फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द।
- पत्नी और बेटे दोनों को भरण-पोषण का अधिकार।
- पति देगा—
- 3,000 रुपये प्रति माह पत्नी को,
- 3,000 रुपये प्रति माह बेटे को,
- भुगतान की तिथि 12.08.2013 (आवेदन की तिथि) से लागू।
- 50,000 रुपये मुकदमेबाजी खर्च (litigation cost) भी पति को देना होगा।
- आदेश की प्रति बिहार के सभी फैमिली कोर्ट को भेजी जाएगी ताकि भविष्य में सही मार्गदर्शन हो सके।
यह बेहद महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि यह फैमिली कोर्ट की कार्यप्रणाली के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करता है।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला बिहार की हजारों महिलाओं, बच्चों और फैमिली कोर्टों के लिए मार्गदर्शक है।
- व्यभिचार के नाम पर पत्नी को बदनाम करने की प्रवृत्ति पर रोक
अब पति केवल आरोप लगाकर भरण-पोषण से बच नहीं सकता। उसे ठोस, स्पष्ट और कानूनी सबूत देने होंगे। - डीएनए रिपोर्ट का दुरुपयोग नहीं होगा
अदालत ने कहा कि डीएनए टेस्ट तभी मान्य है जब उसे सही प्रक्रिया से पेश किया जाए। - बच्चों की वैधता की रक्षा
कोई भी बच्चा अपनी पैदाइश को लेकर अपमानित न हो—यह सिद्धांत फिर से मजबूत हुआ है। - फैमिली कोर्टों को चेतावनी
गलत प्रक्रिया से बनाए गए निष्कर्ष—जैसे पितृत्व से इंकार—बहुत गंभीर होते हैं, इसलिए सावधानी और कानून का पालन अनिवार्य है। - भविष्य के मामलों में स्पष्ट मार्गदर्शन
बिहार भर में यह निर्णय अब एक मापदंड के रूप में उपयोग होगा।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या पत्नी “living in adultery” थी?
- नहीं।
- पति सबूत नहीं दे पाया, और शादी से पहले का कोई आरोप भरण-पोषण रोकने का आधार नहीं है।
- क्या बच्चा पति का वैध पुत्र है?
- हाँ।
- शादी के दौरान जन्म और धारा 112 साक्ष्य अधिनियम के आधार पर।
- क्या डीएनए रिपोर्ट स्वीकार्य सबूत थी?
- नहीं।
- इसे सही तरीके से साबित नहीं किया गया था।
- क्या हाई कोर्ट पुनरीक्षण न्यायिक (revision) में सबूतों की दोबारा जांच कर सकता है?
- हाँ, जब फैमिली कोर्ट ने गंभीर कानूनी गलती की हो।
- क्या पत्नी और बच्चा भरण-पोषण के हकदार हैं?
- हाँ।
- पति सक्षम है और उसने उनके भरण-पोषण की उपेक्षा की।
- भरण-पोषण किस तारीख से मिलेगा?
- आवेदन की तारीख 12.08.2013 से।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Nandlal Wasudeo Badwaik v. Lata Nandlal Badwaik & Anr., (2014) 1 SCR 120
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Hitesh Deka v. Jinu Deka, 2025 SCC OnLine Gau 259
- Sukhdev Pakharwal v. Rekha Okhale, 2018 SCC OnLine MP 1687
- Ashok v. Anita, 2011 SCC OnLine MP 2249
- Sandha v. Narayanan, 1999 SCC OnLine Ker 64
- Pandurang Barku Nathe v. Leela Pandurang Nathe & Anr., 1997 SCC OnLine Bom 264
- Kamala v. M.R. Mohan Kumar, (2019) 11 SCC 491
- Dwarika P. Satpathy v. Bidyut Prava Dixit, (1999) 7 SCC 675
- Santosh v. Naresh Pal, (1998) 8 SCC 447
मामले का शीर्षक
Suman Devi @ Suman Gupta & Anr. v. The State of Bihar & Anr.
केस नंबर
Criminal Revision No. 1080 of 2019
(arising out of Maintenance Case No. 156 of 2013)
उद्धरण (Citation)
2025 (2) PLJR 281
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- श्री पंकज कुमार दूबे — याचिकाकर्ता (पत्नी और बच्चे) की ओर से
- श्री चन्द्रसेन प्रसाद सिंह, ए.पी.पी — राज्य की ओर से
- श्री रंजीत कुमार पांडे — प्रतिवादी (पति) की ओर से
- श्री अजय कुमार ठाकुर — एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae)
निर्णय का लिंक
NyMxMDgwIzIwMTkjMSNO-ATNnusDxiPc=
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