पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: भागलपुर की संपत्ति विवाद से जुड़ा आपराधिक मामला रद्द (2025)

निर्णय की सरल व्याख्या

यह मामला भागलपुर जिले के एक स्थानीय ज़मीन और दुकान विवाद से जुड़ा है। वादी (शिकायतकर्ता) ने बताया कि वह सुजागंज, भागलपुर में नारियल और फल का व्यापार करता था। उसका कहना था कि उसने और उसके भाइयों ने साल 1999 में रजिस्ट्री के माध्यम से वह दुकान खरीदी थी।

लेकिन दुकान के बगल में स्थित हाट/बाजार के मालिक (याचिकाकर्ता) ने वह दुकान हड़पने की कोशिश की। जब शिकायतकर्ता ने मना किया, तो आरोपी ने दुकान के पास खुदाई शुरू कर दी ताकि दुकान की दीवार गिर जाए। शिकायतकर्ता ने थाने और वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

शिकायत के अनुसार, 10 नवम्बर 2008 की रात करीब 11 बजे आरोपी कुछ लोगों के साथ आया, दुकान में घुस गया, और नारियल, पैसे का बक्सा, पेट्रोमैक्स, लोहे का ग्रिल आदि सामान ट्रैक्टर में लादकर ले गया। फिर दुकान तोड़ दी और धमकी दी कि अगर दुकान बेच नहीं दी, तो जान से मार देंगे। इससे लाखों का नुकसान हुआ। पुलिस ने जब कोई कार्रवाई नहीं की, तो उसने 13 नवम्बर 2008 को भागलपुर के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) के पास एक शिकायत दर्ज की।

लेकिन दिलचस्प बात यह थी कि उसी दिन और उसी घटना के लिए पहले ही एक एफआईआर (Kotwali P.S. Case No. 755/2008) दर्ज हो चुकी थी। पुलिस ने जांच की और दिसंबर 2009 में “अंतिम रिपोर्ट” (Final Form) दी कि मामला नागरिक (civil) प्रकृति का है — यानी यह ज़मीन या कब्ज़े से जुड़ा विवाद है, कोई अपराध नहीं। अदालत ने उस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया।

फिर भी, उसी घटना पर आधारित अलग शिकायत (Complaint Case No. 2065(C)/2008) पर 2009 में न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणी, भागलपुर ने धारा 323, 379, 34 आईपीसी के तहत संज्ञान (cognizance) ले लिया। इस आदेश (दिनांक 22.06.2009) को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में धारा 482 सीआरपीसी के तहत आवेदन दिया।

पक्षकारों के तर्क

याचिकाकर्ता (आरोपी) का कहना था:

  • यह झगड़ा पूरी तरह से ज़मीन और दुकान के कब्ज़े का है, अपराध नहीं।
  • इसी घटना पर पहले पुलिस जांच कर चुकी है और नागरिक विवाद बताते हुए केस बंद कर चुकी है।
  • शिकायत में पुराने आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर लिखा गया है।
  • शिकायत बिना शपथ-पत्र (affidavit) के दी गई है, जो Priyanka Srivastava बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2015) 6 SCC 287 के खिलाफ है।
  • मजिस्ट्रेट ने बिना कारण बताए, केवल औपचारिक तरीके से संज्ञान ले लिया।

राज्य और शिकायतकर्ता (विपक्ष) का कहना था:

  • दुकान वैध रूप से खरीदी गई थी; इसमें कोई नागरिक विवाद नहीं।
  • आरोपी प्रभावशाली व्यक्ति है, पुलिस ने उसके दबाव में आकर रिपोर्ट दी।
  • अगर शिकायत सही है, तो नागरिक विवाद होने से आपराधिक जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
  • याचिकाकर्ता पहले भी इस आदेश के खिलाफ एक रिवीजन केस कर चुका है, इसलिए यह याचिका गलत मंशा से की गई है।

न्यायालय का विचार

माननीय न्यायाधीश ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने केवल शिकायत, शपथ-पत्र और दो गवाहों के बयान देखकर सीधा आदेश दे दिया कि आरोप बनते हैं। आदेश में न तो कोई विश्लेषण है, न यह बताया गया कि पुलिस की अंतिम रिपोर्ट का क्या असर होगा।

उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया — जैसे Gulam Mustafa v. State of Karnataka (2023 SCC OnLine SC 603), Priyanka Srivastava (2015), Babubhai v. State of Gujarat (2010) और Neeharika Infrastructure (2021)। इन सभी में कहा गया है कि:

  • जब एक ही घटना पर पहले से एफआईआर दर्ज हो और पुलिस जांच कर चुकी हो, तो दूसरी शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती, जब तक कोई बिल्कुल नया अपराध न हुआ हो।
  • यदि शिकायत में विरोधाभास हों, या सबूत कमज़ोर हों, और मामला नागरिक प्रकृति का हो, तो न्यायालय 482 सीआरपीसी के तहत कार्रवाई रद्द कर सकता है।
  • हर शिकायत के साथ शपथ-पत्र अनिवार्य है, ताकि झूठे मामलों पर रोक लग सके।

अदालत ने यह भी देखा कि जांच में खुद शिकायतकर्ता ने माना था कि कब्ज़े को लेकर झगड़ा है, लेकिन उसने कोई दीवानी मुकदमा नहीं किया। गवाहों के बयान भी परस्पर विरोधी थे — किसी ने कहा चोरी हुई, किसी ने नहीं।

इससे यह साफ हुआ कि शिकायत में गंभीर खामियां हैं और आपराधिक मामला बनता नहीं है। अतः न्यायालय ने कहा कि इस तरह की शिकायत का मकसद प्रतिशोध या दबाव बनाना है, जो न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

इसलिए पटना उच्च न्यायालय ने भागलपुर न्यायालय का संज्ञान आदेश दिनांक 22.06.2009 रद्द कर दिया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

  • यह फैसला बताता है कि हर ज़मीन या दुकान विवाद को आपराधिक केस में नहीं बदला जा सकता।
  • अगर कोई पहले ही पुलिस जांच करवा चुका है और वह मामला “नागरिक” पाया गया, तो फिर से उसी घटना पर अपराध का केस बनाना गलत है।
  • अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना शपथ-पत्र के दी गई शिकायत पर कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।
  • यह निर्णय बिहार के व्यापारियों, ज़मीन मालिकों और किरायेदारों के लिए उपयोगी है — क्योंकि इससे पता चलता है कि सिर्फ दबाव बनाने के लिए आपराधिक मुकदमे नहीं किए जा सकते।
  • मजिस्ट्रेटों को भी चेतावनी दी गई है कि संज्ञान आदेश हमेशा कारण सहित होना चाहिए।
  • यह फैसला प्रशासन और पुलिस दोनों के लिए मार्गदर्शक है कि कानून के दुरुपयोग को रोकने में न्यायालय सख्त रुख अपनाएगा।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या एक ही घटना पर दो अलग आपराधिक केस चल सकते हैं?
    ✅ नहीं। अगर पहले से एफआईआर और पुलिस रिपोर्ट है, तो दूसरी शिकायत नहीं चलेगी।
  • क्या मजिस्ट्रेट का बिना कारण दिया गया संज्ञान आदेश वैध है?
    ❌ नहीं। ऐसा आदेश “यांत्रिक” माना जाएगा और रद्द किया जा सकता है।
  • क्या शिकायत में शपथ-पत्र ज़रूरी है?
    ✅ हाँ। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इससे झूठे मामलों पर अंकुश लगता है।
  • क्या नागरिक विवाद में आपराधिक आरोप लगाए जा सकते हैं?
    ⚠️ सिर्फ तभी जब अपराध के पर्याप्त सबूत हों। अन्यथा मामला दीवानी अदालत का विषय होगा।
  • अंतिम निर्णय:
    ✔ भागलपुर की अदालत का आदेश दिनांक 22.06.2009 (Complaint Case No. 2065(C)/2008) रद्द किया गया और याचिका स्वीकृत की गई।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Priyanka Srivastava v. State of U.P. (2015) 6 SCC 287
  • Babubhai v. State of Gujarat (2010) 12 SCC 254
  • Neeharika Infrastructure v. State of Maharashtra (2021) 19 SCC 401
  • Gulam Mustafa v. State of Karnataka (2023 SCC OnLine SC 603)

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • State of Haryana v. Bhajan Lal, 1992 Supp (1) SCC 335
  • Priyanka Srivastava (2015) 6 SCC 287
  • Babubhai v. State of Gujarat (2010) 12 SCC 254
  • Neeharika Infrastructure (2021) 19 SCC 401
  • Gulam Mustafa (2023 SCC OnLine SC 603)

मामले का शीर्षक

दीपक कुमार @ दीपक साह बनाम बिहार राज्य

केस नंबर

Criminal Miscellaneous No. 17078 of 2020
उत्पन्न: Complaint Case No. 2065(C)/2008, थाना – Kotwali, जिला – Bhagalpur
(संबंधित एफआईआर: Kotwali P.S. Case No. 755/2008)

उद्धरण (Citation)

2025 (2) PLJR 113

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति चंद्रशेखर झा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री प्रवीण कुमार, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: श्री जय नारायण ठाकुर, ए.पी.पी.
  • विपक्ष संख्या 2 की ओर से: श्री अरविंद कुमार, श्रीमती प्रतीमा कुमारी, श्री एस. अज़ीम, श्री अक्षय लाल पंडित, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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