पटना उच्च न्यायालय का फैसला : बरी होने के बाद भी पदोन्नति से वंचित करना असंवैधानिक — पिछली तारीख से पदोन्नति देने का निर्देश (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ लंबित विभागीय या आपराधिक कार्यवाही के कारण उसकी पदोन्नति रोकी गई हो, और बाद में वह पूरी तरह बरी (acquitted) या दोषमुक्त (exonerated) हो जाए, तो उसे पदोन्नति से वंचित रखना अनुच्छेद 14 और 16 के तहत भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक होगा।

यह मामला बिहार स्टेट पावर (होल्डिंग) कंपनी लिमिटेड में कार्यरत एक कर्मचारी से संबंधित था, जिसकी पदोन्नति उसके कनिष्ठों (juniors) को मिल चुकी थी, लेकिन स्वयं उसे केवल इस आधार पर पदोन्नति नहीं दी गई कि उसके खिलाफ कार्यवाही लंबित थी।

बाद में जब कर्मचारी न केवल विभागीय जांच में दोषमुक्त हुआ, बल्कि आपराधिक मामले में भी अदालत से बरी हो गया, तब भी विभाग ने उसे पदोन्नति नहीं दी। इसी कारण कर्मचारी ने पटना उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया।

इस रिट याचिका का निर्णय माननीय न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद द्वारा 29 अगस्त 2022 को दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता बिहार स्टेट पावर (होल्डिंग) कंपनी लिमिटेड में Assistant Controller (Transmission) के पद पर कार्यरत थे और Controller (Transmission) पद पर पदोन्नति के लिए पूरी तरह योग्य थे।

उनका मामला—

  • 06 जून 2011 को विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) के समक्ष रखा गया।
  • उसी बैठक में उनके कई कनिष्ठों को पदोन्नति दे दी गई।
  • लेकिन याचिकाकर्ता की पदोन्नति यह कहकर रोक दी गई कि उनके खिलाफ वर्ष 2007 से विभागीय कार्यवाही लंबित है।

इसके बाद—

  • 02 अगस्त 2011 को फिर DPC की बैठक हुई।
  • इस बार भी याचिकाकर्ता को केवल लंबित कार्यवाही के कारण पदोन्नति नहीं दी गई।

यहाँ महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि—
👉 याचिकाकर्ता की योग्यता, वरिष्ठता या उपयुक्तता (suitability) पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया गया।

बाद के घटनाक्रम

समय के साथ याचिकाकर्ता के पक्ष में स्थिति पूरी तरह बदल गई—

  • 15 मार्च 2013 को विभागीय जांच में उन्हें पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया गया।
  • 06 अप्रैल 2019 को आपराधिक मामले में भी उन्हें अदालत से बरी कर दिया गया।
  • उनके ठीक नीचे वरिष्ठता सूची में आने वाले अधिकारी को पहले ही 17 जून 2011 को पदोन्नति मिल चुकी थी।
  • याचिकाकर्ता इस बीच 31 जनवरी 2014 को सेवानिवृत्त (retire) भी हो चुके थे।

इसके बावजूद विभाग ने उन्हें पदोन्नति नहीं दी।

विभाग का तर्क

विभाग ने न्यायालय के समक्ष यह दलील दी कि—

  • वर्ष 2014 के बाद कोई नई DPC बैठक नहीं हुई।
  • 11 अप्रैल 2019 को राज्य सरकार द्वारा पदोन्नति और DPC पर रोक (ban) लगा दी गई थी।
  • इसलिए याचिकाकर्ता को पदोन्नति देना संभव नहीं था।

उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

पटना उच्च न्यायालय ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं— याचिकाकर्ता की योग्यता कभी संदिग्ध नहीं थी

न्यायालय ने कहा कि दोनों DPC बैठकों में याचिकाकर्ता को योग्य और पात्र पाया गया था। उसकी पदोन्नति केवल लंबित कार्यवाही के कारण रोकी गई थी।

कनिष्ठ को पदोन्नति, वरिष्ठ को नहीं — स्पष्ट भेदभाव

जब कनिष्ठ अधिकारी को पदोन्नति मिल गई और वरिष्ठ को नहीं मिली, तो यह अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।

बरी होने के बाद पदोन्नति रोकने का कोई आधार नहीं

06 अप्रैल 2019 के बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी विभागीय या आपराधिक मामला लंबित नहीं था।
इसलिए पदोन्नति रोकने का आधार समाप्त हो चुका था।

सरकारी रोक (ban) पहले से अर्जित अधिकार को खत्म नहीं कर सकती

न्यायालय ने कहा कि—
👉 सरकारी आदेश बाद में आया,
👉 जबकि याचिकाकर्ता का पदोन्नति का अधिकार पहले ही बन चुका था।

इसलिए रोक का सहारा लेना गलत है।

नई DPC की आवश्यकता नहीं

चूँकि याचिकाकर्ता का मामला पहले ही DPC द्वारा विचार किया जा चुका था, इसलिए नई DPC बुलाने की आवश्यकता नहीं है।

“Next Below Rule” का सिद्धांत लागू

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय R.K. Sethi बनाम ONGC का हवाला देते हुए कहा कि—
👉 जब कनिष्ठ को पदोन्नति मिल चुकी हो और वरिष्ठ बाद में दोषमुक्त हो जाए,
👉 तो वरिष्ठ को भी पदोन्नति मिलनी चाहिए।

पटना उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय

इन सभी कारणों से पटना उच्च न्यायालय ने—

  • याचिका स्वीकार की।
  • विभाग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को
    👉 Controller (Transmission) पद पर पदोन्नति दी जाए।
  • पदोन्नति 06 अप्रैल 2019 (बरी होने की तिथि) से प्रभावी मानी जाए।
  • सभी वेतन और पेंशन संबंधी लाभ (consequential benefits) दिए जाएँ।
  • किसी नई DPC की आवश्यकता नहीं होगी।
  • यह पूरी प्रक्रिया 8 सप्ताह के भीतर पूरी की जाए।

निर्णय का महत्व और प्रभाव

यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच है—

  • यह स्पष्ट करता है कि
    👉 कार्यवाही लंबित होने मात्र से स्थायी नुकसान नहीं हो सकता।
  • बरी होने के बाद कर्मचारी को उसका वैधानिक अधिकार मिलना चाहिए।
  • सेवानिवृत्ति भी पदोन्नति और वित्तीय लाभ से वंचित करने का आधार नहीं बन सकती।

यह निर्णय प्रशासन को यह संदेश देता है कि—
👉 प्रक्रियात्मक बहाने संविधान के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकते।

कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)

  • क्या बरी होने के बाद पदोन्नति रोकी जा सकती है?
    ➤ नहीं।
  • क्या कनिष्ठ को पदोन्नति मिलने पर वरिष्ठ को वंचित किया जा सकता है?
    ➤ नहीं। यह भेदभाव है।
  • क्या सेवानिवृत्त कर्मचारी को पदोन्नति मिल सकती है?
    ➤ हाँ, नाममात्र (notional) पदोन्नति और वित्तीय लाभ दिए जा सकते हैं।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • R.K. Sethi बनाम Oil & Natural Gas Commission, (1997) 10 SCC 616

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • R.K. Sethi बनाम ONGC, (1997) 10 SCC 616

मामले का शीर्षक

कर्मचारी बनाम बिहार स्टेट पावर (होल्डिंग) कंपनी लिमिटेड एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 332 of 2020

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 600

न्यायमूर्ति का नाम

माननीय न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से:
    श्री संतोष कुमार सिन्हा, अधिवक्ता;
    श्री राकेश अम्बास्था, अधिवक्ता;
    श्री उत्तम कुमार मिश्रा, अधिवक्ता
  • प्रतिवादियों की ओर से:
    श्री विकास चंद्र श्रीवास्तव, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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