पटना उच्च न्यायालय : बी.एड. स्पॉट एडमिशन में हुई अनियमितताओं पर कड़ा फैसला (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

यह मामला बिहार बी.एड. संयुक्त प्रवेश परीक्षा (B.Ed. CET – 2020) से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने यह आरोप लगाया कि अंतिम दौर यानी “स्पॉट काउंसलिंग” के दौरान कॉलेज ने कम अंकों वाले कई उम्मीदवारों को दाखिला दे दिया, जबकि वह स्वयं उच्च अंक प्राप्त करने के बावजूद बाहर रह गया। पटना उच्च न्यायालय ने पूरे एडमिशन रिकॉर्ड, हाथ से लिखे रजिस्टर और नोडल यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट की जांच की और पाया कि कॉलेज ने नियमों के विरुद्ध “पिक एंड चूज़” तरीके से एडमिशन किए। अदालत ने ऐसे दाखिलों को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को पाँच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।

इस याचिका में याचिकाकर्ता एक योग्य अभ्यर्थी था, जो पिछड़ा वर्ग (EBC) श्रेणी से था। उसने निर्धारित सभी चरणों की काउंसलिंग में भाग लिया था। जब स्पॉट राउंड की घोषणा हुई, तो उसने समय पर आवेदन और शुल्क जमा कर दिया था। लेकिन बाद में उसे पता चला कि कई कम अंक वाले अभ्यर्थियों को सीटें मिल गईं। उसने अदालत से न्याय की गुहार लगाई कि कॉलेज और विश्वविद्यालय ने नियमों का उल्लंघन किया है।

नोडल विश्वविद्यालय (ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय) ने 24 दिसंबर 2020 को एक नोटिस जारी किया था कि 26 से 30 दिसंबर के बीच खाली सीटें स्पॉट काउंसलिंग के जरिए भरी जाएंगी। इसके लिए कॉलेजों को मेरिट सूची के आधार पर ही चयन करना था। लेकिन जिस कॉलेज में विवाद हुआ, वहाँ 30 दिसंबर को दोपहर 3 बजे के बाद अचानक एक हस्तलिखित सूचना जारी की गई जिसमें लिखा था कि अब 3 बजे तक चयन सूची से रजिस्ट्रेशन होगा और उसके बाद जो भी छात्र उपस्थित रहेंगे, उनमें से मेरिट के आधार पर सीट दी जाएगी। अदालत ने पाया कि यह बदलाव पूरी तरह मनमाना था और नोडल विश्वविद्यालय के निर्देशों के विपरीत था।

रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि कई छात्रों के नाम और तिथि आपस में मेल नहीं खाते थे। उदाहरण के लिए, एक छात्र को 30 दिसंबर को “स्पॉट एडमिशन” दिखाया गया, लेकिन उसके शुल्क रसीद में 26 दिसंबर की तारीख दर्ज थी। कुछ छात्रों का एडमिशन 31 दिसंबर तक दिखाया गया, जबकि आधिकारिक समय सीमा 30 दिसंबर शाम 5 बजे थी। विश्वविद्यालय की जांच समिति ने भी स्वीकार किया कि 3 बजे के बाद किए गए दाखिले मेरिट के अनुसार नहीं थे।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान को प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और योग्यता का सिद्धांत बनाए रखना अनिवार्य है। अदालत ने Modern Dental College vs State of Madhya Pradesh (2016) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भले ही निजी या स्व-वित्तपोषित कॉलेजों को कुछ स्वायत्तता प्राप्त है, लेकिन उन्हें राज्य द्वारा बनाए गए प्रवेश नियमों का पालन करना ही होगा। Gurdeep Singh vs State of J&K (1995) मामले को उद्धृत करते हुए कहा गया कि धोखे से प्राप्त लाभ को बनाए नहीं रखा जा सकता, और Dr. Priyambada Sharma (2022) के मामले का हवाला देकर स्पष्ट किया गया कि नियमों और समय-सीमा का उल्लंघन कर किए गए दाखिले अवैध होते हैं।

अदालत ने कहा कि 30 दिसंबर को दोपहर 3 बजे के बाद और 31 दिसंबर को किए गए सभी दाखिले अवैध हैं। इन छात्रों के दाखिले रद्द किए जाएंगे और उनके द्वारा जमा की गई फीस वापस की जाएगी। याचिकाकर्ता का दाखिला न होना पूरी तरह अवैध और अन्यायपूर्ण बताया गया। हालांकि, शैक्षणिक सत्र समाप्त हो जाने के कारण अदालत ने उसे पुनः दाखिला देने का आदेश नहीं दिया, बल्कि उसे पाँच लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह राशि विश्वविद्यालय प्रबंधन को देनी होगी और दोषी अधिकारियों से वसूली करने की अनुमति दी गई।

इस प्रकार, याचिका स्वीकार की गई और अदालत ने साफ संदेश दिया कि प्रवेश प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश यह है कि चाहे “स्पॉट राउंड” कितना भी अंतिम चरण क्यों न हो, मेरिट (योग्यता) को नज़रअंदाज़ करके प्रवेश देना कानूनन अस्वीकार्य है। बिहार के विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को यह निर्णय याद दिलाता है कि प्रवेश प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए, चाहे वह ऑनलाइन हो या ऑफलाइन।

अदालत ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को चेतावनी दी कि यदि प्रवेश नियमों का उल्लंघन किया गया तो न केवल दाखिले रद्द होंगे बल्कि दोषी अधिकारियों पर आर्थिक जिम्मेदारी भी तय की जाएगी।

छात्रों के लिए यह फैसला उम्मीद की किरण है कि यदि उन्हें योग्यता के बावजूद प्रवेश से वंचित किया गया, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है और उन्हें उचित मुआवजा दिला सकता है। यह फैसला बिहार जैसे राज्यों में शिक्षा प्रणाली की पारदर्शिता को मजबूत करेगा और अधिकारियों में जवाबदेही लाएगा।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या कॉलेज 3 बजे के बाद नोडल यूनिवर्सिटी के नियम बदलकर स्वयं प्रक्रिया तय कर सकता था?
    ❌ नहीं। अदालत ने कहा कि ऐसा परिवर्तन पूरी तरह अवैध और मनमाना था।
  • क्या 30 दिसंबर के बाद या 31 दिसंबर को किए गए दाखिले मान्य थे?
    ❌ नहीं। सभी ऐसे दाखिले रद्द किए गए और छात्रों को फीस वापसी का आदेश दिया गया।
  • क्या याचिकाकर्ता को प्रवेश से वंचित करना कानूनी था?
    ❌ नहीं। अदालत ने इसे अवैध घोषित किया और याचिकाकर्ता को पाँच लाख रुपये का मुआवजा दिया।
  • क्या दोषी अधिकारियों पर जिम्मेदारी तय होगी?
    ✅ हाँ। विश्वविद्यालय प्रबंधन मुआवजा देगा और दोषी अधिकारियों से राशि की वसूली कर सकेगा।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Modern Dental College and Research Centre v. State of Madhya Pradesh, (2016) 7 SCC 353
  • Gurdeep Singh v. State of J&K, 1995 Supp (1) SCC 188
  • Board of Governors in Supersession of MCI v. Dr. Priyambada Sharma, 2022 SCC OnLine SC 1442

मामले का शीर्षक

Yachikakarta v. State of Bihar & Others (B.Ed. Spot Admission Dispute)

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 5526 of 2021

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 370

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से — श्री खुर्शीद आलम, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से — श्री राम विनय प्रसाद सिंह (AC to GA-12)
  • नोडल यूनिवर्सिटी (L.N. Mithila University) की ओर से — श्री नदीम सिराज
  • B.N. Mandal University की ओर से — श्री रितेश कुमार
  • निजी प्रतिवादी की ओर से — श्री संजय सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता
  • प्रतिवादी संख्या 8 की ओर से — श्री ओंकार नाथ

निर्णय का लिंक

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