पटना उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय : एम्बुलेंस टेंडर में मनमानी को रद्द किया गया (2023)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति (SHSB) द्वारा जारी 102 एम्बुलेंस सेवा टेंडर को लेकर एक अहम फैसला सुनाया। यह मामला दो अलग-अलग याचिकाओं से जुड़ा था — एक उस पक्ष की, जिसकी तकनीकी बोली (technical bid) को खारिज कर दिया गया था, और दूसरी एक प्रतिस्पर्धी पक्ष की, जिसने उस बोलीदाता (L1) को चुनौती दी थी जिसे अंततः ठेका दे दिया गया था।

अदालत ने पाया कि राज्य स्वास्थ्य समिति ने बोली की जांच प्रक्रिया में मनमानी की थी — एक ओर तो उसने एक पक्ष को गैर-जरूरी दस्तावेज़ों की कमी बताकर बाहर कर दिया, और दूसरी ओर उसने दूसरे पक्ष की योग्यता की कमियों को नज़रअंदाज कर दिया।

यह टेंडर पूरे बिहार में एम्बुलेंस और शववाहन सेवाओं के संचालन के लिए था, जो “Public Private Partnership (PPP)” मॉडल पर चलाया जाना था। बोली लगाने वालों के लिए दो मुख्य शर्तें थीं:

  1. पिछले तीन वित्तीय वर्षों में एम्बुलेंस सेवाओं से न्यूनतम वार्षिक टर्नओवर।
  2. एक निर्धारित संख्या में बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) और एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट (ALS) एम्बुलेंस संचालित करने का अनुभव।

पहला विवाद: तकनीकी बोली की अस्वीकृति

पहली याचिका में याचिकाकर्ता की बोली इसलिए अस्वीकार की गई कि उसने अपने ऑडिटेड बैलेंस शीट के “notes” यानी व्याख्यात्मक नोट्स नहीं लगाए थे। समिति ने कहा कि ये “अनिवार्य दस्तावेज़” हैं। अदालत ने आरएफपी (Request for Proposal) के क्लॉज 2.2 को ध्यान से पढ़ा और पाया कि उसमें “notes to accounts” की कोई अनिवार्यता नहीं दी गई थी।
इसलिए, केवल इस आधार पर तकनीकी बोली खारिज करना अनुचित और मनमाना कदम था। न्यायालय ने यह अस्वीकृति रद्द कर दी।

दूसरा विवाद: L1 बोलीदाता की पात्रता

दूसरी याचिका में यह सवाल था कि राज्य स्वास्थ्य समिति ने एक अन्य पक्ष को पात्र कैसे मान लिया, जबकि वह RFP में दी गई टर्नओवर और अनुभव की शर्तें पूरी नहीं करता था। अदालत ने सभी वित्तीय दस्तावेज़ और अनुभव प्रमाण पत्रों की जाँच की और पाया कि उक्त पक्ष तीनों वित्तीय वर्षों (2018–19, 2019–20, 2020–21) के लिए आवश्यक टर्नओवर और अनुभव नहीं दिखा पाया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि “तीन वर्षों का अनुभव” का मतलब हर वर्ष अलग-अलग रूप से अनुभव होना चाहिए, न कि तीन सालों का कुल मिलाकर अनुभव। इस आधार पर, न्यायालय ने उस पक्ष की तकनीकी योग्यता, L1 घोषित किए जाने की स्थिति, और कार्यादेश (work order) — सभी को रद्द कर दिया।

न्यायालय की आगे की दिशा

हालाँकि न्यायालय ने यह भी माना कि ठेकों से जुड़े मामलों में अदालतों को बहुत हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, परंतु जब सरकारी निर्णय मनमाना, अनुचित या असंवैधानिक हो, तब हस्तक्षेप आवश्यक होता है।
इसलिए, अदालत ने राज्य स्वास्थ्य समिति को निर्देश दिया कि वह पूरी प्रक्रिया को तकनीकी मूल्यांकन चरण से दोबारा शुरू करे, जिसमें सभी पात्र बोलीदाता (जैसे BVG इंडिया लिमिटेड और Ziqitza हेल्थ केयर लिमिटेड) शामिल हों। यह कार्य दो महीने के भीतर पूरा करने का आदेश दिया गया।

ताकि एम्बुलेंस सेवा बाधित न हो, न्यायालय ने कहा कि तब तक मौजूदा व्यवस्था जारी रहे।

इस प्रकार, एक ओर जहाँ अदालत ने पहले याचिकाकर्ता की तकनीकी अस्वीकृति को रद्द किया, वहीं दूसरी ओर उसने L1 बोलीदाता की नियुक्ति को भी अमान्य ठहराया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  • सरकारी टेंडरों में पारदर्शिता की मिसाल: यह निर्णय बताता है कि किसी सरकारी एजेंसी को नियमों से हटकर कोई अतिरिक्त शर्त नहीं जोड़नी चाहिए और न ही किसी आवश्यक शर्त की अनदेखी करनी चाहिए।
  • RFP की शर्तें अंतिम मानी जाएंगी: यदि दस्तावेज़ RFP में “अनिवार्य” नहीं है, तो उसकी अनुपस्थिति पर बोली को खारिज नहीं किया जा सकता। और यदि कोई शर्त अनिवार्य है, तो उसका कड़ाई से पालन होना चाहिए।
  • सेवा में निरंतरता सुनिश्चित: अदालत ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए एम्बुलेंस सेवा जारी रखने का निर्देश दिया ताकि जनता की जरूरतें प्रभावित न हों।
  • सरकारी अधिकारियों के लिए मार्गदर्शन: इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि बोली मूल्यांकन में मनमानी या ढिलाई स्वीकार्य नहीं होगी।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या ऑडिटेड बैलेंस शीट के “notes” न लगाने से बोली अस्वीकृत की जा सकती है?
    — नहीं। RFP में यह शर्त अनिवार्य नहीं थी। इसलिए इस आधार पर अस्वीकृति अवैध और मनमानी है।
  • क्या L1 बोलीदाता पात्र था जबकि उसने टर्नओवर और अनुभव की शर्तें पूरी नहीं की थीं?
    — नहीं। उसने क्लॉज 2.2 और 2.3 के अनुसार जरूरी अनुभव और टर्नओवर साबित नहीं किया। उसकी तकनीकी योग्यता, L1 स्थिति और कार्यादेश सभी रद्द कर दिए गए।
  • न्यायालय ने क्या सुधारात्मक कदम तय किया?
    — तकनीकी मूल्यांकन चरण से दोबारा पूरी प्रक्रिया कराई जाए, सभी पात्र बोलीदाताओं को शामिल किया जाए, दो माह में पूरा किया जाए और तब तक वर्तमान व्यवस्था जारी रखी जाए।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Poddar Steel Corporation v. Ganesh Engineering Works, (1991) 3 SCC 273
  • B.S.N. Joshi & Sons Ltd. v. Nair Coal Services Ltd., (2006) 11 SCC 548
  • Dutta Associates (P) Ltd. v. Indo Mercantiles (P) Ltd., (1997) 1 SCC 53

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Reliance Energy Ltd. v. MSRDC, (2007) 8 SCC 1
  • N.G. Projects Ltd. v. Vinod Kumar Jain, (2022) 6 SCC 127
  • Municipal Corporation, Ujjain v. BVG India Ltd., (2018) 5 SCC 462
  • National High Speed Rail Corp. Ltd. v. Montecarlo Ltd., (2022) 6 SCC 401
  • New Horizons Ltd. v. Union of India, (1995) 1 SCC 478
  • Vidarbha Irrigation Development Corp. v. Anoj Kumar Agarwala, (2020) 17 SCC 577

मामले का शीर्षक

BVG India Ltd. & Ors. बनाम State of Bihar & Ors.; साथ में M/s Ziqitza Health Care Ltd. बनाम State of Bihar & Ors.

केस नंबर

CWJC No. 16899 of 2022 (साथ में) CWJC No. 8553 of 2023

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी
माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री एस. डी. संजय, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सहायक वकीलगण
  • प्रतिवादी संख्या 4 की ओर से: श्री जितेंद्र सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सहायक वकीलगण
  • राज्य स्वास्थ्य समिति/राज्य की ओर से: श्री उमेश प्रसाद सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं श्री रामाधार सिंह, जी.पी.-25, सहायक अधिवक्ताओं के साथ
  • दूसरी याचिका में याचिकाकर्ता की ओर से: श्री अभिनव श्रीवास्तव, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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