पटना उच्च न्यायालय ने एक अहम निर्णय दिया, जो उन कर्मचारियों के लिए राहत भरा है जिन्होंने वर्षों तक “एड-हॉक” या अस्थायी पदोन्नति पर काम किया और सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन निर्धारण में अनदेखे रह गए। यह मामला एक ऐसे रेलकर्मी से जुड़ा था जिसने “कंस्ट्रक्शन विंग” में सीनियर सेक्शन इंजीनियर (SSE) के रूप में करीब सत्रह–अठारह साल तक लगातार सेवा दी। इस दौरान उसे उच्च पद का वेतन और वार्षिक वृद्धि मिलती रही, लेकिन पेंशन बनाते समय विभाग ने उसका वेतन निचले मूल पद के आधार पर तय कर दिया। सवाल यह था कि क्या इतने लम्बे समय की एड-हॉक सेवा को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?
1 दिसंबर 2022 को पटना उच्च न्यायालय की द्वैत्यपीठ, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति श्री पी. बी. बजंथ्री और माननीय न्यायमूर्ति श्री पुर्णेंदु सिंह शामिल थे, ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश को रद्द करते हुए यह कहा कि पेंशन निर्धारण कर्मचारी के अंतिम वास्तविक वेतन के आधार पर किया जाए, न कि केवल उस पद पर जिसकी लीन (substantive post) तकनीकी रूप से दर्ज है। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी लगभग दो दशक तक उच्च पद पर लगातार कार्य करता रहा है, उच्च जिम्मेदारियाँ निभाई हैं, और विभाग ने कभी उसे वापस नहीं भेजा, तो “एड-हॉक” शब्द का महत्व केवल कागज़ी रह जाता है।
निर्णय की सरल व्याख्या
याचिकाकर्ता को 21 अक्टूबर 1997 को एड-हॉक आधार पर सीनियर सेक्शन इंजीनियर बनाया गया था और उसने 31 मार्च 2015 तक उसी पद पर सेवा दी। इस पूरी अवधि में उसे SSE का वेतन-मान, सभी बढ़ोतरी और वही जिम्मेदारियाँ दी गईं। विभाग ने न तो उसे वापस भेजा और न ही उसकी सेवा पर कोई आपत्ति दर्ज की। फिर भी, सेवानिवृत्ति के बाद उसकी पेंशन को उसके मूल पद—जो ओपन लाइन में था—के आधार पर गणना किया गया।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने पहले राहत देने से इनकार कर दिया था। अधिकरण का तर्क था कि कंस्ट्रक्शन विंग अस्थायी प्रकृति का है, कर्मचारी की लीन ओपन लाइन में रहती है, और उसने वहाँ पदोन्नति परीक्षा नहीं दी थी। इसलिए एड-हॉक सेवा को नियमित सेवा नहीं माना जा सकता।
पटना उच्च न्यायालय ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताई। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता लगभग अठारह साल तक उच्च पद पर कार्य करता रहा और उच्च वेतन लेता रहा। यदि विभाग ने इतने वर्षों में उसे नियमित नहीं किया या वापस नहीं भेजा, तो यह विभाग की लापरवाही है—और इस गलती की सज़ा कर्मचारी को नहीं दी जा सकती।
अदालत ने यह भी कहा कि बीते अठारह साल की सेवा के बाद अब पुराने नियमों, पदोन्नति या पात्रता को दोबारा जांचना व्यावहारिक नहीं है। यह न केवल जटिल होगा, बल्कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों के साथ अन्याय भी होगा। अतः अदालत ने व्यावहारिक और न्यायसंगत समाधान देते हुए कहा कि कर्मचारी को उस पूरी अवधि के लिए “मानो वह नियमित पद पर था” मानकर वेतन-पुनर्निर्धारण और पेंशन निर्धारण किया जाए।
अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि विभाग 21 अक्टूबर 1997 से 31 मार्च 2015 तक की अवधि के लिए कर्मचारी को नियमित SSE के रूप में माने, वेतन और पेंशन को उसी आधार पर तय करे, एरियर की गणना करे और तीन माह में भुगतान करे। यदि भुगतान में देरी होती है, तो 8% वार्षिक ब्याज देना होगा।
इस प्रकार, न्यायालय ने कहा कि पेंशन का निर्धारण केवल औपचारिक काग़ज़ी स्थिति पर नहीं, बल्कि वास्तविक सेवा और वेतन के आधार पर होना चाहिए। पेंशन कर्मचारी की जीवनभर की सेवा का सम्मान है, और उसे तकनीकी देरी या प्रक्रिया की वजह से कम नहीं किया जा सकता।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला उन सभी सेवानिवृत्त सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए अहम है जिन्होंने वर्षों तक ऊँचे पदों पर “एड-हॉक” रूप से काम किया है। यह निर्णय बताता है कि यदि किसी व्यक्ति ने लम्बे समय तक उच्च जिम्मेदारी निभाई और उस पद का वेतन पाया, तो सेवानिवृत्ति के बाद उसकी पेंशन उसी वास्तविक वेतन पर आधारित होनी चाहिए।
सरकारी विभागों के लिए यह एक चेतावनी भी है कि वे पदोन्नति और नियमितीकरण की प्रक्रिया को समय पर पूरा करें। यदि विभाग वर्षों तक किसी कर्मचारी को ऊँचे पद पर रखता है और उसे उच्च वेतन देता है, तो बाद में पेंशन में उसे नकारना न केवल अन्याय होगा बल्कि वित्तीय बोझ और ब्याज देनदारी भी बढ़ाएगा।
यह फैसला भविष्य में अनावश्यक मुकदमेबाज़ी को भी कम कर सकता है, क्योंकि यह एक स्पष्ट सिद्धांत स्थापित करता है—यदि कोई कर्मचारी दस वर्ष या उससे अधिक समय तक लगातार उच्च पद पर कार्य करता रहा है और विभाग ने उसे स्वीकार किया है, तो उस सेवा को पेंशन निर्धारण में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या वर्षों तक उच्च पद पर “एड-हॉक” रूप में कार्य करने के बाद पेंशन निचले पद के आधार पर तय की जा सकती है?
निर्णय: नहीं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को नियमित SSE के रूप में माना जाए और उसकी पेंशन अंतिम वास्तविक वेतन पर तय की जाए। - क्या CAT का आदेश सही था?
निर्णय: नहीं। उच्च न्यायालय ने CAT का आदेश रद्द किया क्योंकि उसने लम्बी सेवा अवधि, उच्च वेतन और विभागीय निष्क्रियता जैसे प्रमुख तथ्यों को नज़रअंदाज़ किया था। - क्या राहत दी गई?
निर्णय: विभाग को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता को 21 अक्टूबर 1997 से 31 मार्च 2015 तक नियमित SSE मानकर वेतन और पेंशन का पुनर्निर्धारण करे, तीन माह में एरियर का भुगतान करे, और देरी पर 8% वार्षिक ब्याज दे।
मामले का शीर्षक
Yogendra Prasad v. Union of India & Ors.
केस नंबर (in English)
Civil Writ Jurisdiction Case No. 4737 of 2017
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 175
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथ्री
माननीय श्री न्यायमूर्ति पुर्णेंदु सिंह
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
याचिकाकर्ता की ओर से: श्री सतीश चंद्र मिश्रा, श्री मोहम्मद नुरुल होदा, श्री उमाकांत मिश्रा
प्रतिवादी (रेलवे/संघ) की ओर से: श्री राकेश कुमार सिन्हा, C.G.C.
निर्णय का लिंक
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